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Tuesday, September 17, 2013

उसके हिस्से का आसमान

असमंजस की भूलभुलैया में
उसकी आँखों पर
दुराग्रहों की काली पट्टी बाँध
चुनौतियों की दोधारी
पैनी तलवार पर तुम उसे
सदा से चलाते आ रहे हो !
उसके हिस्से के सुख,
उसके हिस्से के फैसले,
उसकी आँखों के सपने,
उसके हिस्से की महत्वाकांक्षायें,
सब दुबका के रख लिये हैं
तुमने अपनी कसी हुई
बंद मुट्ठी के अंदर
जिन्हें तुम अपनी मर्जी से
खोलते बंद करते रहते हो !  
लेकिन क्या तुम जानते हो
तुम्हारी इन गतिविधियों के
तूफानी थपेड़े
उसके अंतर की ज्वाला को
धौंकनी की तरह हवा देकर
किस तरह और तेज़
प्रज्वलित कर जाते हैं !
किसी दिन यह आग
जब विकराल दावानल का
रूप ले लेगी तो तुम्हारे
दंभ और अहम का
यह मिथ्या संसार
क्षण भर में जल कर
राख हो जायेगा !
उसे अपना जीवन खुद जीने दो
उसे अपने फैसले खुद लेने दो
उसे अपने सपने खुद
साकार करने दो !
फिर देखना कैसी
शीतल, मंद, सुखद समीर
तुम्हारे जीवन को सुरभित कर
आनंद से भर जायेगी !
उसे अपनी पहचान सिद्ध करने दो
उसे अपने चुने हुए रास्ते पर
अपने आप चलने दो
उसके कमरे की सारी
बंद खिड़कियाँ खोल कर
उसे तुम ताज़ी हवा में
जी भर कर साँस लेने दो  !
उसे बंधनों से मुक्ति चाहिये  
उसकी श्रृंखलाओं को खोल कर
तुम उसे उसके हिस्से का
आसमान दे दो !
उस पर विश्वास तो करो
जहाज के पंछी की तरह
वह स्वयं लौट कर अपने
उसी आशियाने में
ज़रूर वापिस आ जायेगी ! 




साधना वैद !