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Sunday, December 22, 2013

व्योम के उस पार


दूर क्षितिज तक पसरे
तुम्हारे कदमों के निशानों पर
अपने पैर धरती
तुम तक पहुँचना चाहती हूँ !
सारी दिशाएँ खो जायें,
सारी आवाजें गुम हो जायें,
सारी यादें धुँधला जायें,
मेरी डायरी में लिखे
तुम्हारे पते की स्याही
वक्त के मौसमों की मार से
भले ही मिट जाये
मेरे मन की मरुभूमि की रेत पर
अंकित ये निशान आज भी
उतने ही स्पष्ट और ताज़े हैं
जितने वो उस दिन थे
जब वर्षों पहले मुझसे
आख़िरी बार मिल कर
तुम्हारे पल-पल दूर जाने से
मेरे मन पर बने थे !  
तुम्हारे कदमों के
उन्हीं निशानों पर पैर रखते हुए
चलते रहना मुझे बहुत
अच्छा लगता है !
फासले कुछ कम होते से
लगते हैं और
उम्मीद की शाख हरी
होने लगती है !
जानती हूँ राह अनन्त है
मंज़िल का कोई ओर छोर भी
दिखाई नहीं देता
लेकिन मुझे विश्वास है
तुम्हारे पैरों के इन निशानों पर
पैर रखते हुए मैं
एक न एक दिन ज़रूर  
तुम तक पहुँच जाऊँगी
फिर चाहे यह मुलाक़ात
इस लोक में हो या
व्योम के उस पार !


साधना वैद