Followers

Thursday, January 23, 2014

तुम्हारा मौन



नहीं जानती
तुम्हारा यह मौन  
वरदान है या अभिशाप
कवच है या हथियार
आश्रय है या भटकाव
संतुष्टि है या  संशय
सांत्वना है या धिक्कार
आत्म रक्षा है या प्रहार
आश्वासन है या उपहास  
पुरस्कार है या दण्ड
जो भी है
सिर माथे है ,
अवसान की इस बेला में
जब सूरज डूब चुका है ,
रोशनी भी मद्धम है ,
हवा किसी श्रंखला में जकड़ी 
विवश बंदिनी सी कैद है ,
आसपास के तरुवर  
प्रस्तर प्रतिमा की तरह  
कोई भी हरकत किये बिना
निर्जीव से खड़े हैं ,
आसमान में इक्का दुक्का तारे
यहाँ वहाँ सहमते सकुचाते
जुगनू की तरह
टिमटिमा रहे हैं ,
सारी कायनात
जाने किस अनिर्दिष्ट
आतंक से भयभीत हो
एकदम खामोश है !
ऐसे में जाने क्यों जब
साँसें भी बहुत कम  
हो चली हैं ,
हाथों की पकड़ से सब कुछ
छूटता सा लगता है ,  
तुम्हारी हर बेरुखी
तुम्हारा हर अन्याय
मुझे मन प्राण से 
स्वीकार है !




साधना वैद 



चित्र  - गूगल से साभार