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Monday, March 3, 2014

जा रहा मधुमास है


पंछियों के स्वर मधुर खोने लगे

चाँद तारे क्लांत हो सोने लगे    

क्षीण होती प्रिय मिलन की आस है  

मलिन मुख से जा रहा मधुमास है ! 


वन्दना के स्वर शिथिल हो मौन हैं

करें किसका गान अतिथि कौन है

भ्रमित नैनों में व्यथा का भास है

भाव विह्वल जा रहा मधुमास है !


राह कितनी दूर तक सुनसान है

पंथ की कठिनाइयों का भान है

किन्तु मन में ढीठ सा विश्वास है

‘आओगे तुम’ जा रहा मधुमास है !


प्रेम की प्रतिमा सजाने के लिए

अर्चना के गीत गाने के लिये

तृषित उर में भावना का वास है

चकित विस्मित ठगा सा मधुमास है !


आओगे कब फूल मुरझाने लगे

खुशनुमां अहसास भरमाने लगे

जतन से थामे हूँ जो भी पास है

आ भी जाओ जा रहा मधुमास है ! 



साधना वैद