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Saturday, March 22, 2014

हारती संवेदना


क्या करोगे विश्व सारा जीत कर
हारती जब जा रही संवेदना ! 

शब्द सारे खोखले से हो गये ,
गीत मधुरिम मौन होकर सो गये ,
नैन सूखे ही रहे सुन कर व्यथा ,
शुष्क होती जा रही संवेदना ! 

ह्रदय का मरुथल सुलगता ही रहा ,
अहम् का जंगल पनपता ही रहा ,
दर्प के सागर में मृदुता खो गयी ,
तिक्त होती जा रही संवेदना ! 

आत्मगौरव की डगर पर चल पड़े ,
आत्मश्लाघा के शिखर पर जा चढ़े ,
आत्मचिन्तन से सदा बचते रहे ,
रिक्त होती जा रही संवेदना !

भाव कोमल कंठ में ही घुट गये ,
मधुर स्वर कड़वे स्वरों से लुट गये ,
है अचंभित सिहरती इंसानियत ,
क्षुब्ध होती जा रही संवेदना ! 

कौन सत् के रास्ते पर है चला ,
कौन समझे पीर दुखियों की भला ,
हैं सभी बस स्वार्थ सिद्धि में मगन ,
सुन्न होती जा रही संवेदना !

साधना वैद