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Sunday, November 15, 2015

दो पंछी


कल सुबह अपने कमरे की
खिड़की से बाहर देखा था मैंने  
धरा से गगन का असीम विस्तार
नापने को तैयार
दो बेहद सुन्दर और ऊर्जावान पंछियों को
हौसलों की उड़ते भरते हुए
देखा था मैंने !

बिल्कुल सम गति सम लय में
समानांतर उड़ रहे थे दोनों,
मधुर स्वर में चहचहाते हुए
कुछ जग की कुछ अपनी
एक दूजे को सुनाते हुए
बड़े आश्वस्त से पुलकित हो   
उड़ रहे थे दोनों !

कुछ देर बाद एक ऊँची सी उड़ान भर
यूकेलिप्टस की पत्रहीन
ऊँची ऊँची दो डालियों पर
आमने सामने बैठ गये वे दोनों  
शायद कुछ सुस्ताने को या फिर
कुछ अनकही कुछ अनसुनी रह गयीं
बातें फिर से दोहराने को
आमने सामने बैठ गये वे दोनों !

तार सप्तक में चह्चहाने की
एक दूजे के स्वर में स्वर मिलाने की 
दोनों की आवाजें सुन रही थी मैं
वो गा रहे थे या लड़ रहे थे  
उग्र थे या उल्लसित
खुश थे या नाखुश
समझ नहीं पा रही थी मैं !

थोड़ी देर के बाद
एक पंछी अपनी डाल छोड़ 
अनंत आकाश में उड़ कर
दूर कहीं बहुत दूर चला गया,
मुझे विश्वास था कि वह लौट कर
अपने साथी के पास ज़रूर आएगा
लेकिन देर तक प्रतीक्षा करने के बाद
मेरा विश्वास छला गया ! 
  
दूसरा पंछी मौन उदास अनमना सा
अपनी डाल पर ही बैठा रह गया
जीवन साथी के चले जाने के बाद
इस अनंत असीम व्योम में वह
नितांत अकेला रह गया ! 

मेरे दिल में जैसे कहीं कुछ
छन्न से टूट गया
शिथिल हुई मेरी पकड़ से
उँगलियों में लिपटा ऊन का
अधबना गोला धरा पर छूट गया ! 

नहीं जानती
यूकेलिप्टस की शाख पर बैठे
उस पंछी को वाकई में थी या नहीं
पर मुझे बड़ी व्यग्रता से प्रतीक्षा थी
उस पंछी के लौट आने की
जो उसे छोड़ कर चला गया था
पता नहीं क्यों
उस पंछी के साथ साथ वह मुझे भी
एक अकथनीय पीड़ा के
अनंत अथाह सागर में
डुबो कर चला गया था !

साधना वैद