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Monday, May 2, 2016

पिघलती शाम




स्तब्ध जलधि 
दूर छूटता कूल 
एकाकी मन ! 

रुष्ट है रवि 
रक्तिम है गगन 
दूर किनारा ! 

मेरे रक्ताश्रु 
मिल गये जल में 
रक्तिम झील ! 

सुनाई देती 
सिर्फ चप्पू की ध्वनि 
उठी तरंगें ! 

लोल लहरें 
ढूँढे रवि आश्रय 
छिपा जल में ! 

दग्ध हृदय 
बहता दृग जल 
मन वैरागी ! 

ले चल मुझे 
दूर इस जग से 
नन्ही सी नौका ! 

किसे सुनाऊँ 
अपनी व्यथा कथा 
कोई न पास ! 

ढलती शाम 
छाने को है अँधेरा 
दूर किनारा ! 

डूबा जल में 
सुलगता भास्कर 
दहकी झील ! 

फैला चार सूँ
धरा से नभ तक 
पिघला सोना ! 
 
 
 
साधना वैद