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Wednesday, September 14, 2016

हिन्दी दिवस और हिन्दी






हिन्दी दिवस भी हमारे देश में साल में एक बार किसी त्यौहार की तरह ही मनाया जाने लगा है ठीक उसी तरह जैसे हम होली, दीवाली, ईद, क्रिसमस मनाते हैं ! यह ‘दिवस’ मनाने का चलन भी खूब निकला है ! बस साल के पूरे ३६५ दिनों में एक दिन, असली हों या नकली, हिन्दी के मान सम्मान की ढेर सारी बातें कर लो, अच्छे-अच्छे लेख, कवितायें, कहानियाँ लिख कर अपनी कर्तव्यपरायणता और दायित्व बोध का भरपूर प्रदर्शन कर लो और फिर बाकी ३६४ दिन निश्चिन्त होकर मुँह ढक कर गहरी नींद में सो जाओ अगले हिन्दी दिवस के आने तक ! 

जब तक हम अंग्रेज़ी भाषा की मानसिक दासता से खुद को मुक्त नहीं करेंगे और हिन्दी भाषा को पढ़ाई का माध्यम नहीं बनायेंगे हिन्दी इसी तरह अपने ही घर के बाहर सिसकती खड़ी दिखाई देगी ! स्कूलों में पढ़ाई का माध्यम हिन्दी भाषा को होना चाहिये और अंग्रेज़ी भाषा को सेकण्ड लेंग्वेज की तरह पढ़ाया जाना चाहिए न कि हिन्दी को ! बच्चे जिस भाषा में सारे विषय पढ़ते हैं उनकी पकड़ उस भाषा पर मज़बूत हो जाती है और वे सहजता से उस भाषा में अभिव्यक्ति कर पाते हैं ! 

इससे बड़ी विडम्बना और शर्म की बात और क्या होगी कि आजकल स्कूलों में बच्चों को हिन्दी में बात करने के लिए दण्डित किया जाता है ! यदि बच्चे स्कूल परिसर में अवकाश के समय में भी आपस में हिन्दी में बात करते हुए पाए जाते हैं तो टीचर्स उन्हें डाँटते हैं ! इस पर हम हिन्दी दिवस पर हिन्दी के उत्थान और सम्मान की बातें करते हैं और हिन्दी भाषा के भविष्य के प्रति अपनी चिंता व्यक्त करते हैं ! जिस भाषा में बात करने पर सज़ा मिले उस भाषा का सम्मान आज की युवा होती पीढ़ी कैसे करेगी और क्यों करेगी ? अपनी मातृ भाषा में बात करने पर किस देश में स्कूलों में बच्चों को दण्डित किया जाता है यह शोध का विषय हो सकता है ! क्या इस सन्दर्भ में हमारे शिक्षाविद् और स्कूलों के व्यवस्थापक किसी सकारात्मक नीति का निर्धारण करेंगे ? वैसे आज स्कूल से घर आने के बाद मेरी पोती ने बड़े खुश होकर मुझे बताया कि हिन्दी दिवस की वजह से आज स्कूल में हिन्दी में बात करने पर किसीको डाँट नहीं पड़ी ! क्या बात है ? साल में एक दिन तो बच्चों को अपनी मातृ भाषा में बात करने की आज़ादी मिली ! स्कूल प्रशासन को फूलों का गुलदस्ता पेश करना चाहिए !

अंग्रेज़ी भाषा से मेरा कोई विरोध नहीं है ! अपने ज्ञान में वृद्धि करने के लिए और विश्व की विभिन्न भाषाओं के साहित्य का अध्ययन करने के लिए जितनी भाषाओं को सीखा जाए उतनी कम हैं ! फिर केवल अंग्रेज़ी भाषा के लिए ही यह पक्षपात पूर्ण आग्रह क्यों ? जिस व्यक्ति में सीखने की इच्छा और ललक है वह कोई भी भाषा किसी भी अवस्था में सीख सकता है लेकिन इसके लिए अपनी राष्ट्र भाषा का तिरस्कार करना ज़रूरी तो नहीं ! आज का युग ग्लोबलाइजेशन का युग है इस बात से इनकार नहीं ! अध्ययन एवं कैरियर की माँग के अनुसार लोगों का विदेशों में आना जाना पहले से अधिक बढ़ गया है यह भी सच है लेकिन इसके लिए जब जैसी आवश्यक्ता हो उस देश की भाषा को सीखा जा सकता है ! दूसरे देश की भाषा का अल्प ज्ञान होगा तो कोई नहीं हँसेगा लेकिन अपनी ही भाषा की सम्यक् जानकारी न होने पर वे सब जगह उपहास के पात्र बनेंगे ! आजकल के बच्चे हिन्दी के वाक्य रोमन में लिखने में अधिक सहज अनुभव करते हैं क्योंकि उन्हें या तो हिन्दी के वर्णों को ठीक से बनाना नहीं आता या सोच कर बनाने में देर बहुत लगती है ! अंग्रेज़ी के लेटर्स वे जल्दी से बना लेते हैं ! हिन्दी केवल एक विषय के रूप में पढ़ाई जाती है जिसे पढ़ने में बच्चों को कोई रूचि नहीं होती ! इससे अधिक दयनीय दशा और क्या होगी हिन्दी की ! स्कूलों में बच्चों को यदि सारे विषय हिन्दी में पढ़ाए जाएँ और उनके प्रश्न उत्तर भी बच्चों से हिन्दी में ही लिखवाये जाएँ तो उन्हें हिन्दी सीखने में रूचि भी होगी और हिन्दी के प्रति उनकी सोच भी बदलेगी ! अपने समय में हमारी समवयस्क पीढ़ी ने हिन्दी माध्यम से ही शिक्षा ग्रहण की है और आज के अंग्रेज़ी माध्यम से पढ़े हुए शिक्षित वर्ग से हम स्वयं को किसी भी तरह कम नहीं आँकते ! 

हिन्दी के प्रति उपेक्षात्मक रवैये और अंग्रेज़ी भाषा के अधकचरे ज्ञान ने आज के औसत बच्चों को ऐसे दोराहे पर ला खड़ा किया है जहाँ से उन्हें अपने उज्ज्वल भविष्य के लिए कोई रास्ता दिखाई नहीं देता ! घरों में भी माता-पिता की मानसिकता बच्चों को येन केन प्रकारेण परीक्षा में उत्तीर्ण कराने भर की रह गयी है ! बच्चे क्या सीख रहे हैं किस भाषा का कितना और कैसा अध्ययन कर रहे हैं इस बारे में जानने का ना तो उनके पास समय है और ना ही वे इसे जानने में कोई रूचि रखते हैं ! यही कारण है कि आज हिन्दी सिर्फ बोलचाल की साधारण सी भाषा बन कर रह गयी है ! आज के बच्चों के हिन्दी लेखन में ना तो गुणवत्ता के दर्शन होते हैं ना ही साहित्यिकता के ! और सबसे अधिक दुःख की बात यह है कि जिस अंग्रेज़ी भाषा में तीन चार साल की उम्र से बच्चे पढ़ रहे हैं उसमें भी यदि चंद अपवादों को छोड़ दें तो आम साधारण बच्चे एक पैरेग्राफ भी शुद्ध रूप से नहीं लिख पाते ! 

क्या हमारे नीति नियंताओं ने कभी इस ओर ध्यान दिया है और क्या वे इस दिशा में कोई ठोस कदम उठा सकेंगे ?
                        
साधना वैद