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Monday, November 28, 2016

हासिल



कितनी बातें थीं कहने को
जो हम कहते तुम सुन लेते
कितनी बातें थी सुनने को
जो तुम कहते हम सुन लेते !

लेकिन कुछ कहने से पहले
घड़ी वक्त की ठहर गयी  
सुनने को आतुर प्राणों की
आस टूट कर बिखर गयी !

बीत गयी वो घड़ी तो देखो
किस्सा ही सब खतम हुआ
खतम हुआ किस्सा तो घुट कर
दो रूहों की मौत हुई ! 

फिरते हैं अब दोनों ही बुत
अपनी-अपनी धुरियों पर  
जैसे कहीं दूर जाने को
सारी वजहें खतम हुईं  

क्यों जीते हैं सपनों में जब
स्वप्न टूट ही जाते हैं
खामखयाली में जीने की
सज़ा यही तजवीज हुई ! 

सपनों में जीने वालों का
एक यही तो हासिल है   
दिन भी बीता रीता-रीता
रात बिलखते बीत गयी !

साधना वैद