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Saturday, January 21, 2017

बहू – बेटी


उगी मायके

रोपी ससुराल में

बेटी की पौध

बढ़ती गयी

नयी ज़मीन पर

बे अवरोध


मैके की छाया

छोड़ ससुराल की

धूप में खड़ी

बेटी हमारी

सर्व गुण सम्पन्न

हिम्मती बड़ी


सोन चिरैया

कैद हुई पिंजरे

ससुराल में

बेबस हुई

पर कटे पंछी सी

बदहाल में


छूटा मायका

छूटा सुख संसार

बेटी बेज़ार

पी घर मिली

तानों उलाहनों की

तीखी बौछार


ले आई साथ

माँ के दिए संस्कार

पिता की सीख

स्वाभिमानी है

कभी ना स्वीकारेगी

दया की भीख


शक्ति अपार

नापा नभ विस्तार

नए पंखों से

उठा लिया है

गृहस्थी का दायित्व

निज कंधों पे


भरे उड़ान

घर के गगन में

बहू बन के

उन्मुक्त बेटी

परिधि में घूमती

वधू बन के


सोन चिरैया

सिमटी रह गयी

पंख कटा के

फर्क आ गया

बेटी और बहू में

जोड़ घटा के


ढूँढे पिता को

ससुर के रूप में

बहू नवेली

ढूँढती माँ को

सासू माँ के रूप में

वो अलबेली


स्केट्स के बिना

फिरकी सी घूमती

घर में बहू

पर किसीको 

खुश न कर पाई

जला के लहू


बहादुर है

उगा लेगी जल्दी ही

नूतन पंख

गीत गायेगी 

जगा देगी सबको

बजा के शंख 


बेटी हमारी

शक्ति का अवतार

देवी का रूप

सँवार लेगी

जीवन बगिया दे

प्यार की धूप



साधना वैद