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Monday, January 30, 2017

जो दर्द दिए तूने




जो दर्द दिए तूने वो हँस के पी रहे हैं,

आहें निकल न जाएँ होठों को सी रहे हैं,

तूने क़सर न छोड़ी थोड़ी भी मारने में,

पर देख बेमुरव्वत हम फिर भी जी रहे हैं !

साधना वैद 

Wednesday, January 25, 2017

गणतंत्र दिवस परेड



(१)
आया है गणतंत्र का, शुभ दिन देखो आज
दुल्हन सी दिल्ली सजी, हर्षित सकल समाज !

(२)
गूँज रहे हैं पार्श्व में, देश भक्ति के गीत
उमड़ पड़ा सारा शहर, डरा न पाई शीत !

(३)
सीना फूला गर्व से, मन में हुआ मलाल
मर के सम्मानित हुए, भारत माँ के लाल !

(४)
बढ़ते सीना तान के, पथ पे वीर जवान
कदम मिला कर चल रहे, ऊँट, अश्व अरु श्वान !

(५)
भारत संस्कृति की छटा, सैन्य शक्ति का जोश
   देख विश्व विस्मित हुआ, प्रजा हुई मदहोश ! 
  
 (६)
बच्चों के उत्साह की, महिमा अपरम्पार
गीत नृत्य और बैंड से, मोहा मन हर बार !

(७)
अद्भुत करतब देख के, दर्शक हैं हैरान
ध्वजा बनाते उड़ रहे, नभ में विकट विमान  !

(८)
गज पर बैठे शान से, बच्चों के सरताज 
उनके अद्भुत शौर्य पर, गर्वित हर जन आज !

(९)
अपने इस गणतंत्र से, हमें बहुत है प्यार  
इसकी रक्षा हित सदा, मिटने को तैयार !  


साधना वैद


Saturday, January 21, 2017

बहू – बेटी


उगी मायके

रोपी ससुराल में

बेटी की पौध

बढ़ती गयी

नयी ज़मीन पर

बे अवरोध


मैके की छाया

छोड़ ससुराल की

धूप में खड़ी

बेटी हमारी

सर्व गुण सम्पन्न

हिम्मती बड़ी


सोन चिरैया

कैद हुई पिंजरे

ससुराल में

बेबस हुई

पर कटे पंछी सी

बदहाल में


छूटा मायका

छूटा सुख संसार

बेटी बेज़ार

पी घर मिली

तानों उलाहनों की

तीखी बौछार


ले आई साथ

माँ के दिए संस्कार

पिता की सीख

स्वाभिमानी है

कभी ना स्वीकारेगी

दया की भीख


शक्ति अपार

नापा नभ विस्तार

नए पंखों से

उठा लिया है

गृहस्थी का दायित्व

निज कंधों पे


भरे उड़ान

घर के गगन में

बहू बन के

उन्मुक्त बेटी

परिधि में घूमती

वधू बन के


सोन चिरैया

सिमटी रह गयी

पंख कटा के

फर्क आ गया

बेटी और बहू में

जोड़ घटा के


ढूँढे पिता को

ससुर के रूप में

बहू नवेली

ढूँढती माँ को

सासू माँ के रूप में

वो अलबेली


स्केट्स के बिना

फिरकी सी घूमती

घर में बहू

पर किसीको 

खुश न कर पाई

जला के लहू


बहादुर है

उगा लेगी जल्दी ही

नूतन पंख

गीत गायेगी 

जगा देगी सबको

बजा के शंख 


बेटी हमारी

शक्ति का अवतार

देवी का रूप

सँवार लेगी

जीवन बगिया दे

प्यार की धूप



साधना वैद 

Monday, January 16, 2017

जीवन



लिया जनम

मिला माँ का आँचल

पिता की छाया

जानी दुनिया

जीवन की गतियाँ

जग की माया


स्कूल कॉलेज

खेल कूद पढ़ाई

हो गए बड़े

पता न चला

कब अपने पैरों 

हो गए खड़े


हुआ विवाह

बंध गया बंधन

सुखी संसार

जाने कर्तव्य

जाने जग बंधन

हर्ष अपार


स्वीकार की है

जीवन की चुनौती

पूरे मन से

लड़ेंगे हम

जीवन संघर्ष में

पूरे दम से


बीत जायेंगे

जीवन के संकट

धैर्य के साथ 

जीत जायेंगे

जीवन की ये बाज़ी 

तुम्हारे साथ


धूप या छाँव

जीवन की राहों पे

थके हैं पाँव

ढूँढ ही लेंगे

जीवन छलकाता

प्यारा सा गाँव


बिछी हुई है

जीवन शतरंज

मोहरे हम

जन्म मरण

शाश्वत है नियम

जीवन क्रम


कितनी शांत

कितनी मनोहर

जीवन संध्या

कटने को है

जीवन की पतंग

साँसों की संख्या


निरुद्वेग है

विराम की प्रतीक्षा

आया विमान

जिया जीवन

अब तो करना है

महा प्रस्थान


साधना वैद












Friday, January 13, 2017

दुश्चिंता


ज़िंदगी के टेढ़े मेढ़े रास्तों पर

अब तक चलती आई हूँ

तुम्हारा हाथ थामे !

कभी हाथों में संचित

चंद पाँखुरियाँ बिछा कर

तुम्हारे पैरों को कंकड़ों की

चुभन से बचाने के लिए
   
कभी नीचे झुक कर

यथा शक्ति राह में बिछे

कंकड़ पत्थरों को बीन कर

तुम्हारी राह को सुगम

बनाने के लिए !

उम्र खत्म हुई जाती है

लेकिन राह की दुश्वारियाँ

ज़रा भी कम होतीं

नज़र नहीं आतीं !

समय के साथ

मेरी क्षमता और सामर्थ्य

दोनों अब चुकी जाती हैं !

तुम्हारे ही शब्दों में

अद्भुत इच्छाशक्ति

अदम्य साहस और

अनिर्वचनीय उत्साह का

तुम्हारा यह ‘शक्तिपुंज’

अब बिलकुल रीत चुका है !

तुम समझ रहे हो ना ?

अब आगे का सफर तुम्हें

अकेले ही तय करना होगा !

इस सफर में तुम

सम्हाल तो लोगे ना

खुद को भी और

जब तक मैं हूँ

मुझे भी ?



साधना वैद

Sunday, January 8, 2017

प्रेम


प्रेम का धागा

विश्वास के मनके

रिश्तों की माला


प्रेम के गीत

अधरों पे थिरके

फैला सौहार्द्र



प्रेम की वर्षा

नाचे मन मयूर

भीगा जीवन



प्रेम हो ऐसा 

जैसे चाँद चकोर

मन विभोर



प्रेम हो ऐसा

जैसे अम्बर धरा

खालिस खरा



प्रेम हो नैया

विश्वास पतवार

तुम्हारा साथ



अनन्य प्रेम 

उर में छिपा जैसे 

सीप में मोती



प्रेम का दीप

आलोकित करता

जीवन पथ



भीग गयी मैं 
  
नख से शिख तक

प्रेम रंग में



प्रेम की नदी

नफरत की पौध

बहा ले चली



साधना वैद





Wednesday, January 4, 2017

राजनीति का खेल




बाप रहा ना बाप सा, पूत रहा ना पूत

पाँसे दोनों चल रहे, बिछी हुई है द्यूत !


राजनीति के खेल में, रिश्तों का क्या काम

पापा चाचा बैठ घर, भजें राम का नाम !


सत्ता छूटे ना छुटे, समझो ना यह बात

जो आओगे बीच में, पड़ जायेगी लात !


कुर्सी से इस मोह का, सीखा तुमसे पाठ

मैं बैठा इस पर रहूँ, तुम पकड़ो अब खाट !


अवसरवादी हैं यहाँ, राजनीति में लोग

सब हैं चखना चाहते, सत्ता का सुख भोग !


कौन तुम्हारा मित्र है, याद किसे उपकार

अब सब उसके साथ हैं, जिसकी है सरकार !


सत्ता का यह रूप भी, है कितना बलवान

उगते सूरज को सभी, करते मिले प्रणाम !


साधना वैद 


चित्र - गूगल के सौजन्य से