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Saturday, January 20, 2018

मैं वोही हूँ जो मैं हूँ



क्यों ढूँढते हो मुझमें
राधा सी परिपक्वता
सीता सा समर्पण
यशोधरा सा धैर्य
मीरा सी लगन
दुर्गा सा पराक्रम
शारदे सा ज्ञान
मर्दानी सी वीरता
टेरीसा सा बलिदान
मुझे वही रहने दो ना
जो मैं हूँ
क्यों उसे ढूँढते हो मुझमें
जो वहाँ है ही नहीं !
मुझमें मुझीको ढूँढो 
उपकार होगा तुम्हारा !
आशाओं अपेक्षाओं के
इस चक्रव्यूह में मैं
इस तरह से गुम हो गयी हूँ
कि बाहर निकलने का
कोई भी मार्ग मुझे
अब दिखाई नहीं देता !
आदर्शों की इस भूलभुलैया में
मैं खुद भी जन्म से अब तक
ढूँढती ही आ रही हूँ खुद को
लेकिन इतने किरदारों में
मैं कौन हूँ
मैं कहाँ हूँ
कोई तो मुझे बताये
मैं क्यों अपने दर्पण में
खुद को न देख कर
किसी और की परछाई देखूँ
क्यों खुद का तिरस्कार कर
किसी और का मुखौटा लगाए
आत्महीनता की आँच में
खुद को सेकूँ    
कोई तो मुझे समझाये !


साधना वैद   

   
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