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Friday, May 11, 2018

ख़्वाबों की पोटली



रात कस कर गाँठ लगी
अपने ख़्वाबों की पोटली को
बड़े जतन से एक बार फिर
मैंने खोला है !
कभी मैंने ही अपने हाथों से
इसे कस के गाँठ लगा
संदूक में सबसे नीचे
डाल दिया था कि आगे
फिर कभी यह मेरे हाथ न आये !
शायद डर लगा होगा
नन्हें, सुकुमार, सलोने सपने
पोटली से बाहर खिसक
मेरी आँखों के सूने दरीचों में
टहलने के लिये ना चले आयें !
और नींदों से खाली
मेरी जागी आँखों में
इन सपनों की उंगलियाँ थाम
व्योम के पार कहीं उस
सतरंगी दुनिया के
इन्द्रधनुषी आकाश में
विचरण करने की साध
एक बार फिर से
जागृत ना हो जाये
जिसे बहुत पहले मैंने
अपने ही हाथों से अपने
मन के किसी कोने में
बहुत गहराई से दबा दिया था !
लेकिन कल रात
संदूक के तल से मुझे
किसीके दबे घुटे रुदन की
आवाज़ सुनाई दे रही थी ,
वो मेरे सपने ही थे जो
वर्षों से पोटली में निरुद्ध  
प्राणवायु के अभाव में
अब मुक्त होने के लिये
जी जान से छटपटा रहे थे
और शुद्ध हवा की एक साँस
के लिये मेरे अंतर का द्वार
खटखटा कर मेरे सोये हुए
स्वत्व को जगा रहे थे !
मेरे सपनों की इस पोटली में
प्यार के इज़हार के नाम पर 
 एक सुर्ख गुलाब की वो चंद 
सूखी बिखरी पाँखुरियाँ थीं 
जो तुम तक कभी पहुँच ही न पाईं
और थे चंद आधे अधूरे ख़त 
जिन्हें तुमने कभी पढ़ा ही नहीं !
पोटली में और था 
एक नशाएक इंतज़ार
 एक हताशा एक खुमार  
और थी वफ़ा के नाम पर एक कसक
अपने प्यार के यूँ सरेआम 
रुसवा हो जाने की तीखी कसक 
और था एक बड़ा शदीद सा दर्द 
जो मेरी इन सारी कोशिशों के
यूँ तमाम हो जाने से उपजा था !  
इनकी पुकार मैं अनसुनी
नहीं कर सकी और मैंने
पोटली खोल उन सपनों को
कल मुक्त कर दिया  
अनन्त आकाश में उड़ने के लिये,
जी भर कर ताज़ी हवा में
साँस लेने के लिये और
कभी चुपके से
मेरी आँखों के दरीचों में आ
हौले से मेरी पलकों को सहला
मेरे नींदों में इन्द्रधनुषी रंग
भरने के लिये ! 
कहो, ठीक किया ना मैंने ! 

साधना वैद