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Wednesday, July 4, 2018

बादल तेरे आ जाने से ...




बादल तेरे आ जाने से 
जाने क्यूँ मन भर आता है,
मुझको जैसे कोई अपना,
 कुछ कहने को मिल जाता है ! 

पहरों कमरे की खिड़की से 
तुझको ही देखा करती हूँ ,
तेरे रंग से तेरे दुःख का 
अनुमान लगाया करती हूँ ! 
यूँ उमड़ घुमड़ तेरा छाना 
तेरी पीड़ा दरशाता है ,
बादल तेरे आ जाने से 
जाने क्यूँ मन भर आता है ! 

तेरे हर गर्जन के स्वर में 
मेरी भी पीर झलकती है,
तेरे हर घर्षण के संग-संग 
अंतर की धरा दरकती है ! 
तेरा ऐसे रिमझिम रोना 
मेरी आँखें छलकाता है , 
बादल तेरे आ जाने से 
जाने क्यूँ मन भर आता है ! 

कैसे रोकेगा प्रबल वेग 
इस झंझा को बह जाने दे ,
मत रोक उसे भावुक होकर 
अंतर हल्का हो जाने दे ! 
धरिणी माँ का आकुल आँचल 
व्याकुल हो तुझे बुलाता है , 
बादल तेरे आ जाने से
जाने क्यूँ मन भर आता है ! 

हैं यहाँ सभी तेरे अपने 
झरने, नदिया, धरती, सागर ,
तू कह ले इनसे दुःख अपना 
रो ले जी भर नीचे आकर ! 
तेरा यूँ रह-रह कर रिसना 
इन सबका बोझ बढ़ाता है 
बादल तेरे आ जाने से 
जाने क्यूँ मन भर आता है ! 

तेरे आँसू के ये मोती 
जब खेतों में गिर जायेंगे ,
हर एक फसल की डाली में 
सौ सौ दाने उग जायेंगे !
धरती माँ का सूखा आँचल 
तेरे आँसू पी जाता है ! 
बादल तेरे आ जाने से 
जाने क्यूँ मन भर आता है ,
मुझको जैसे कोई अपना 
   कुछ कहने को मिल जाता है !  



साधना वैद 
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