Followers

Wednesday, January 30, 2019

सुधियों का क्या ... !




सुधियों का क्या ये तो यूँ ही घिर आती हैं 
पर तुमने तो एक बार पलट कर ना देखा ।

जब चंदा ने तारों ने मेरी कथा सुनी 
जब उपवन की कलियों ने मेरी व्यथा सुनी 
जब संध्या के आँचल ने मुझको सहलाया 
जब बारिश की बूँदों ने मुझको दुलराया ।
भावों का क्या ये तो यूँ ही बह आते हैं 
पर तुमने तो एक बार पलट कर ना देखा ।

जब अंतर्मन में मची हुई थी इक हलचल 
जब बाह्य जगत में भी होती थी उथल-पुथल 
जब सम्बल के हित मैंने तुम्हें पुकारा था 
जब मिथ्या निकला हर इक शब्द तुम्हारा था ।
नयनों का क्या ये तो बरबस भर आते हैं
पर तुमने तो एक बार पलट कर ना देखा ।

जब मन पर अनबुझ संतापों का फेरा था 
जब जग की छलनाओं ने मुझको घेरा था 
जब गिन गिन तारे मैंने काटी थीं रातें 
जब दीवारों से होती थीं मेरी बातें । 
छालों का क्या ये तो यूँ ही छिल जाते हैं 
पर तुमने तो एक बार पलट कर ना देखा । 

जब मन में धधका था इक भीषण दावानल 
जब आँखों से बहता था इक सागर अविरल 
जब दंशों ने था दग्ध किया मेरे दिल को 
जब गिरा न पाई मन पर पड़ी हुई सिल को ।
ज़ख्मों का क्या ये तो यूँ ही रिस जाते हैं 
पर तुमने तो एक बार पलट कर ना देखा ।


चित्र - गूगल से साभार 


साधना वैद 

No comments :

Post a Comment