झीना था प्रतिरूप तुम्हारा, छीना था हर चैन हमारा
अच्छा था मोहक था खेल, सच्चा था रोचक था मेल
करते रहे तुम्हें हम दूर, कहते रहे तुम्हें हम हूर
छलना था कितना आसान, कहना था बस दो फरमान
तुमको हमने चाहा यह सुख अपना था
तुमको पा हम लेंगे यह एक सपना था !
सपने लेकिन
होते हैं केवल सपने
हमको पल-पल
तिल-तिल करके तपना था !
जागी जगती, जागे पक्षी, जलचर जागे
जागी धरती, तारे, चंदा, अम्बर जागे
जागो तुम अब जाग गया सूरज देखो
जागी प्रकृति सकल सृष्टि अंतर जागे !
साधना वैद
ReplyDeleteआपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" बुधवार 18 फरवरी 2026 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
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