Tuesday, March 28, 2023

नारी उत्पीडन और धार्मिक आस्था




यह बड़े दुख की बात है कि आज के तथाकथित सभ्य, शिक्षित एवं आधुनिक समाज में भी नारी उत्पीडन का शिकार हो रही है ! समाज के कुछ तथाकथित पुरोधा और चंद महिला संगठन कितने ही दावे कर लें आये दिन समाचारपत्रों में छपी घरेलू हिंसा की शिकार हुई स्त्रियों, दरिन्दगी और दुष्कर्म की शिकार हुई बालिग़ नाबालिग बच्चियों के समाचार स्वयमेव इन दावों को झुठला देते हैं !

सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि जब भी धर्म और आस्था की बात आती है हीन मानसिकता वाले कुछ पुरुष अपनी इस दुर्भावना को बड़ी दक्षता के साथ श्रद्धा और भक्ति के मुखौटे के नीचे छिपा कर देवी माँ की पूजा अर्चना आराधना में डूबे दिखाई देते हैं ! नवरात्र के आरम्भ होते ही देवी की पूजा आराधना का पर्व आरम्भ हो जाता है जिसे प्राय: अधिकांश सनातन धर्मावलम्बियों के यहाँ बड़े विधि विधान से मनाया जाता है ! पहले ये पर्व बिना विशेष आडम्बर एवं दिखावे के घरेलू स्तर पर श्रद्धा भाव से मना लिया जाता था लेकिन इधर कुछ समय से फिल्मों एवं दूरदर्शन के प्रभाव के कारण इन छोटे छोटे अनुष्ठानों में भी बहुत अधिक आडम्बर और प्रदर्शन की प्रवृत्ति का समावेश हो गया है ! लोगों के मन में जितनी आस्था, भक्ति या श्रद्धा यथार्थ में नहीं होती उससे कहीं अधिक उसका प्रदर्शन किया जाता है ! अगर यह श्रद्धा सच्ची है तो प्रश्न यह उठता है कि धार्मिक आस्था बढ़ने के साथ साथ महिला उत्पीडन के आँकड़े क्यों बढ़ रहे हैं ? यदि पुरुष सच्चे मन से देवी माँ के महत्त्व और सम्मान के प्रति सजग हैं एवं सच्चे मन से उनकी पूजा करते हैं तो अपने घर परिवार समाज की स्त्रियों के प्रति उनका सम्मान भाव कहाँ तिरोहित हो जाता है जब वे उन पर अपनी कुदृष्टि डालते हैं ? क्या यह श्रद्धा भाव केवल मंदिरों में स्थापित पत्थर की मूर्तियों के लिए ही होता है ! हाड़ माँस की जीती जागती स्त्री को वे केवल भोग की दृष्टि से ही देखते हैं ? जहाँ तक मेरा मानना है यहाँ वास्तविक यथार्थ एवं आडम्बर की समस्या है ! यह पूजापाठ व्रत उपवास अधिकतर पुरुष घर परिवार में युगों से चली आ रही परम्परा के निर्वाह के लिए करते हैं सच्चे श्रद्धा भाव से प्रेरित होकर नहीं ! घर के बड़े बूढ़े खुश हो जाएँ और देवी माँ भी भ्रमित होकर वरदान दे दें बस यही अभीष्ट होता है उनका स्त्रियों के प्रति उनकी मानसिकता में कोई बदलाव नहीं होता !

धार्मिक आस्था सभी पुरूषों के लिए ढकोसला है ऐसा तो नहीं कह सकते हाँ यह कहा जा सकता है कि यह एक आदत की तरह हो गयी है जिसे लोग उसी तरह निभाते हैं जैसे सुबह उठ कर दाँत साफ़ करते हैं या स्नान करते हैं ! इसमें तर्क या बुद्धि का कोई हाथ नहीं होता ! दूर दराज़ के धार्मिक स्थलों पर जाने के पीछे भी घूमने और सैर सपाटे की इच्छा अधिक होती है सच्चे भक्ति भाव से कम ही लोग जाते हैं ! सम्पन्नता आने के बाद एवं पर्यटन स्थलों पर जाने व रहने ठहरने की सुविधाओं में सुधार होने से यह प्रवृत्ति और बढ़ी है इसीलिये पर्यटन में वृद्धि हुई है ! यह पर्यटन के दृष्टिकोण से शुभ संकेत है लेकिन आस्था के नाम पर पुरुषों का यह दिखावा नारी के प्रति उनके मन में बसी सच्ची सद्भावना के प्रति उठे संशयों का शमन कदापि नहीं करता !

नारी उत्पीडन के मामलों में वृद्धि का एक अन्य कारण यह भी है कि आज की नारी शिक्षित तो अवश्य हुई है लेकिन साहस और दुस्साहस में अंतर करने की समझ उसमें विकसित नहीं हुई है ! वह आधुनिक तो हुई है और हर क्षेत्र में पुरुषों को चुनौती देकर विजेता भी बनी है लेकिन इस मद में अपनी सीमाओं और मर्यादाओं का भी कई बार अतिक्रमण कर जाती है और घात लगाए बैठे दरिंदों की कुत्सित मनोवृत्ति का शिकार हो जाती है !

संस्कार और नैतिकता का पाठ लोगों को घोल कर नहीं पिलाया जा सकता ! इसके लिए आज के युवाओं को आत्म चिंतन कर अपनी सोच को परिमार्जित करना होगा, अपनी जीवन शैली और आदतों को बदलना होगा ! सुरुचिपूर्ण साहित्य से नाता जोड़ना होगा और पारिवारिक मूल्यों, नैतिक मूल्यों और धार्मिक मान्यताओं को सही अर्थ के साथ फिर से समझना होगा तब ही कुछ बात बन सकेगी ! घर परिवार, शिक्षा संस्थान, एवं समाज के नीति नियंताओं को भी नए सिरे से पुनर्विचार कर ऐसी व्यवस्था को स्थापित करना होगा कि आज के युवक युवतियों में एक दूसरे के प्रति सम्मान की भावना जागृत हो और वे एक दूसरे को शिकार और शिकारी के भाव से न देख कर एक दूसरे के सहयोगी और मित्र बन कर सामने आयें तब ही सकारात्मक परिवर्तन की संभावनाएं पैदा होंगी और समाज में स्त्री पुरुष के स्वस्थ सहअस्तित्व की आदर्श परम्परा की नींव पड़ सकेगी !  

 

साधना वैद



Sunday, March 19, 2023

‘छलका मधु घट’ आदरणीय डॉ. आर. एस. तिवारी ‘शिखरेश’ जी की नज़र से -



‘छलका मधु घट’ के विमोचन समारोह में कार्यक्रम के अध्यक्ष आदरणीय डॉ. आर. एस. तिवारी ‘शिखरेश’ जी द्वारा रचित समीक्षा जिसे समयाभाव के कारण उन्होंने उस दिन संक्षिप्त में प्रस्तुत किया था किन्तु अपनी हस्तलिखित प्रति उन्होंने मुझे सौंप दी थी ! मैं इसे पढ़ कर इतनी आल्हादित हूँ कि आप सबके साथ इसे साझा करने से स्वयं को रोक नहीं पा रही हूँ ! इसलिए इसे टाइप करके आपके साथ शेयर कर रही हूँ ! आदरणीय ‘शिखरेश जी यह मेरा परम सौभाग्य है कि आप जैसे जौहरी ने मेरे इस हाइकु संग्रह को देखा, पढ़ा और इस पर अपने इतने सुन्दर विचार व्यक्त किये ! आपका हृदय से बहुत बहुत आभार !

आदरणीय ‘शिखरेश जी के विचार -

“हाइकुकार कवियित्री साधना वैद का हाइकु संग्रह, “छलका मधु घट” अपने शीर्षक को सार्थक करता हुआ मूलत: रचनाकार के बहुआयामी व्यक्तित्व का वह दर्पण है जिसमें उसकी संचेतना, संकल्पना, चिंतन एवं मनो दार्शनिक ( psycho phylosophic ) मंथन प्रतिबिम्बित है ! रचनाकार के प्रकृति, पर्यावरण, राष्ट्र प्रेम, भक्तिभाव एवं समाज की विविधता से सम्बंधित सरोकार एवं चिंतन पठनीय होने के साथ-साथ एक अनूठे बहुरंगी यथार्थवादी संसार को रूपायित करने में सफल रहे हैं !

केवल 17 वर्णों में कही जाने वाली सम्पूर्ण रचना अपने आप में एक चुनौती है ! साधना जी ने एक अनुशासित विद्यार्थी की भाँति इस संग्रह को ऊर्जा दी है ! सुन्दर-सुन्दर बिम्बों, रूपक एवं मानवीकरण की कसौटी पर सभी रचनाएँ खरी उतरती हैं ! एक बानगी देखिये :

अँधेरी रात / चलती रही थाम / चाँद का हाथ

भावभूमि की गहनता, संवेदना एवं रूपक संग बिम्ब देखिये :

हल्की सी ठेस / तोड़ जाती पल में / काँच से रिश्ते 

भाषा, भाव एवं अभिधा तथा लक्षणा शैलियों का अद्भुत संगम देखिये जब रचनाकार बेटी को रूपायित करती है :

सिन्धु-सा मन / पर्वत-सा हौसला / फूल-सा तन 

अर्थ की व्यापकता के साथ बोधगम्यता साधना जी की अनूठी शैलीगत विशेषता है ! विषय विविधता की सशक्त हस्ताक्षर साधना जी के तेवर देखते ही बनते हैं ! पर्यावरण पर कवियित्री का चिंतन देखिये :

धुंध ने किये / सूरज, चाँद, तारे / अवगुंठित 

स्वार्थी मानव / युद्ध की विभीषिका / दहकी धरा 

आधुनिकता के नाम पर मनाए जा रहे विभिन्न अवसरों पर सजग हाइकुकार का व्यंग्य देखिये :

मनाने लगे / परिवार दिवस / अजब युग 

जीवन वृक्ष / जड़ है परिवार / रिश्ते शाखाएं 

संग्रह में ‘आ गया वसंत है’ से लेकर ‘होली तक 102 रचनाएं हैं ! प्रथम रचना ‘वसंत एवं अंतिम रचना ‘होली संग्रह के शीर्षक ‘छलका मधु घट को सार्थकता प्रदान करती हैं !

प्राकृतिक छटा की पारखी कवियित्री संग्रह के प्रथम हाइकु में मधुमास का नैसर्गिक रूप चित्रित करती है : पृष्ठ 19,

दूर मंजिल / उदास मधुमास / तुम न पास 

जता देते हैं / भ्रमर के सुगीत / वसंत आया 

साहित्यकार के सच्चे धर्म का निर्वाह करती कवियित्री सामाजिक बुराई के प्रति सचेत करती है : पृष्ठ 21,

जला दें आज / दुश्मनी बैर भाव / होली की आग 

उपमा, रूपक एवं मानवीकरण की अनूठी छटा बिखेरती हुई साधना जी बेटी की उपादेयता को कुछ यूँ स्थापित करती हैं : पृष्ठ 22,

बेटी जन्मी

घटा जीवन तम

लाई खुशियाँ

ज़िंदगी गाने लगी

रोशनी छाने लगी 

कवियित्री चिन्तक है ! उसका आतंकवाद के विरुद्ध स्पष्ट नज़रिया है ! अलंकारिक छंद ! देखिये पृष्ठ 24,

विषैली धरा

नफ़रत के बीज

हिंसा की खाद

फसल में उगते

बेरहम दरिन्दे

प्रेम संग साधना, आराधना एवं भक्ति की मजबूत डोर देखते ही बनती है :

पृष्ठ 28,

भावों के फूल / पिरो आँसू की डोर / अर्पित तुम्हें 

पिरोती रही / वन्दना की माला में / भक्ति के फूल 

यथार्थ संग सवाल करना कोई साधना जी से सीखे – सरल, सहज सपाट बयानी :

पृष्ठ 28,

पेड़ है कटा / अतिक्रमण हटा / बेघर पंछी

पेड़ केवल / देना ही जानते हैं / लेते कहाँ हैं 

कवियित्री में राष्ट्रीय चेतना कूट-कूट कर भरी है ! उसका चेतन मन अनिश्चितता के दौर में प्रश्नों की बौछार ( volley of questions ) करता है ! पृष्ठ 30-31 पर संवेदना एवं संचेतना की प्रबलता देखते ही बनती है ! सारे सवाल अनुत्तरित हैं !

साधना जी के बिम्ब अद्भुत हैं ! रूपक एवं मानवीकरण का प्रयोग अभिव्यक्ति को जीवन्तता प्रदान करता है ! कुछेक चित्र देखिये : पृष्ठ 34-35,

क्रोधित चन्दा / धरने पर बैठा / अमावस्या को 

चन्दा ओ चन्दा / क्या तेरी भी मैली है / आकाशगंगा 

यथार्थ के साथ व्यंग्य की धार देखिये : पृष्ठ 37,

बम की लड़ी / सड़क पर चली / लुढ़के लोग

पटाखा चला / साइकिल सवार / धरा पे गिरा 

राजनीति पर यथार्थ की चुटकी – पृष्ठ 38,

अपनाते हैं / छल बल कौशल / सत्ता के लिए 

बदरंग जीवन, सामाजिक विषमता पर चोट करती साधना जी : पृष्ठ 41,

खाली बर्तन / चुक गया ईंधन / भूखा है तन 

पृष्ठ 42-43 पर ‘जीवन’ शीर्षक रचना में हाइकु संश्लेषण से बुना गया जीवन का ताना बना ! सर्वोत्तम हाइकु जो पूर्ण कविता को मात देती ध्वनित होती है !

पृष्ठ 42-43 पर धरतीपुत्र की पीड़ा कवियित्री की चेतना व संवेदना को झकझोर देती है ! कवियित्री का सामाजिक सरोकार एवं मानवीकरण देखिये :

चाँद ने पूछा

कौन पड़ा उघड़ा ?

रुँधे स्वर में

बोल पड़े सितारे

एक धरतीपुत्र 

शालीन, संवेदनशील व्यंग्य का अनुपम उदाहरण – पृष्ठ 45,

आज भी हल्कू

बिताते सड़क पे

ठण्ड की रात 

कुछ भी न बदला

स्वतन्त्रता के बाद 

राष्ट्रीय चेतना के स्वर, देवी माँ के नौ स्वरूपों की भव्यता का चित्रण, कोविड की विभीषिका में मजदूरों के पलायन का दर्द, प्रेम में विश्वास की उपादेयता, माँ की ममता का खजाना, पिता का साया, राखी की गरिमा, शहीदों को श्रद्धांजलि, रिश्तों की बुनियाद तथा स्वतन्त्रता के मायने आदि-आदि अनगिनत जीवन, राष्ट्र, समाज एवं मानवीयता के स्वरों से झंकृत है यह हाइकु-संग्रह !

भाव पक्ष, कथ्य एवं शिल्प अनूठा एवं तकनीकी प्रकृति का होने के बावजूद संग्रह आद्योपांत सजीवता के साथ इन्द्रधनुषी आभा बिखेरता है ! उपादेयता एवं उदात्तता से आलोकित हाइकु-संग्रह के लिए साधना जी को बधाई एवं अभिनन्दन ! आभार ! शुभकामनाएं !”

12 – 3 – 2023                          डॉ. आर. एस. तिवारी

                                               ‘ शिखरेश ‘   

                                         मो. 9458734783

 

-----------------------------------------------------------------------------------

आपका कृतज्ञ हृदय से बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार आदरणीय ‘शिखरेश जी !

 

साधना वैद  

 

 

 

 

 



 
 


Tuesday, March 14, 2023

छलका मधु घट - विमोचन की विज्ञप्ति

 


साथियों आपके साथ यह शुभ समाचार शेयर करते हुए मुझे हार्दिक प्रसन्नता की अनुभूति हो रही है कि १२ मार्च, दिन रविवार को मेरे सद्य प्रकाशित हाइकु-संग्रह, 'छलका मधु घट' का विमोचन समारोह यूथ हॉस्टल संजय प्लेस आगरा में यहाँ के वरिष्ठ साहित्यकारों के कर कमलों के द्वारा विधिवत संपन्न हुआ ! प्रस्तुत है कार्क्रम की छोटी सी प्रेस विज्ञप्ति आदरणीय कुमार ललित जी द्वारा तैयार की गयी !
हल्की सी ठेस/ तोड़ जाती पल में/ काँच से रिश्ते..
मात्र 17 वर्णों में कही जाने वाली संपूर्ण रचना अपने आप में है एक चुनौती
आगरा राइटर्स एसोसिएशन के बैनर तले साधना वैद के हाइकु संग्रह, 'छलका मधु घट' का यूथ हॉस्टल में विमोचन:
रचनाकार के बहुआयामी व्यक्तित्व का दर्पण है छलका मधु घट: डॉ. आर. एस. तिवारी 'शिखरेश'
विचार की गूढ़ता के साथ काव्यानंद से सराबोर हैं ये हाइकु : डॉ. त्रिमोहन तरल
तीन पंक्तियों में किसी भी विषय वस्तु को समेटने की कठिन विधा में पारंगत हैं रचनाकार: डॉ. अशोक विज
आगरा। आगरा राइटर्स एसोसिएशन के बैनर तले ताजनगरी के गणमान्य कवि एवं साहित्यकारों की गरिमामय उपस्थिति में रविवार को यूथ हॉस्टल में वरिष्ठ साहित्यकार श्रीमती साधना वैद के हाइकु संग्रह, 'छलका मधु घट' का विमोचन संपन्न हुआ।
वरिष्ठ साहित्यकार रमेश पंडित और डॉ. रमा रश्मि ने विमोचित कृति की समीक्षा करते हुए रचनाकार की मुक्त कंठ से सराहना की।
अध्यक्षीय उद्बोधन में वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. आर एस तिवारी 'शिखरेश' ने कहा कि छलका मधु घट अपने शीर्षक को सार्थक करता हुआ मूलतः रचनाकार के बहुआयामी व्यक्तित्व का वह दर्पण है जिसमें उसकी संचेतना, संकल्पना, चिंतन एवं मनो- दार्शनिक मंथन प्रतिबिंबित है।
17 वर्णों में रचना चुनौती
डॉ. आर एस तिवारी 'शिखरेश' ने कहा कि मात्र 17 वर्णों में हाइकु की रचना अपने आप में एक चुनौती है। इस चुनौती को स्वीकार कर साधना जी ने सुंदर बिंबों, रूपकों एवं मानवीकरण के साथ भावपूर्ण कथ्य को जिस तरह बांधा है, वह सराहनीय है। एक बानगी देखें- 'हल्की सी ठेस/ तोड़ जाती पल में/ काँच से रिश्ते..'
विचार की गूढ़ता के साथ काव्यानंद
मुख्य अतिथि डॉ. त्रिमोहन तरल ने कहा कि साधना वैद के हाइकु पाठक को अल्प समय में विचार की गूढ़ता और सघनता से परिचित कराते हुए काव्य का आनंद लेने का अवसर प्रदान करते हैं।
तीन पंक्तियों की कठिन विधा में पारंगत
विशिष्ट अतिथि डॉ. अशोक विज ने कहा कि हाइकु की तीन पंक्तियों में किसी भी विषय वस्तु को समेटना इसे एक कठिन विधा बनाता है जिसमें साधना जी ने स्वयं को पारंगत किया है।
रचनाधर्मिता है सराहनीय
विशिष्ट अतिथि एवं आगरा पब्लिक स्कूल के चेयरमैन महेश शर्मा ने भी साधना वैद की रचना धर्मिता की मुक्त कंठ से सराहना की।
अनुभूतियों के चरम क्षण की प्रतिध्वनि
समारोह के सूत्रधार और आगरा रायटर्स एसोसिएशन के संस्थापक अध्यक्ष डॉ. अनिल उपाध्याय ने कहा कि साधना वैद का हाइकु संग्रह मानवीय अनुभूतियों के चरम क्षण की प्रतिध्वनि है।
गागर में सागर है हाइकु
विमोचित कृति की रचनाकार श्रीमती साधना वैद ने इस अवसर पर कहा कि हाइकु काव्य केवल कुछ अक्षरों या शब्दों का समूह नहीं है। जैसे छोटे-छोटे नारे या दोहे संक्षेप में बहुत गहरी बात कह जाते हैं। ऐसे ही, हाइकु भी अपनी लघुता की विशिष्टता के साथ किसी भी सार्थक संदेश को जन-जन तक पहुँचाने लिए एक सशक्त माध्यम है। हाइकु गागर में सागर के समान है।
ये भी रहे सहभागी
कार्यक्रम का संचालन डॉ. अनिल उपाध्याय ने किया। संगीता अग्रवाल ने शारदे वंदना प्रस्तुत की। अतिथियों का स्वागत आयोजन समिति के अध्यक्ष वीरेंद्र कुमार वैद, सचिव शब्द स्वरूप वैद, स्वागत समिति के सचिव सरन वैद व रश्मि वैद के साथ भरत दीप माथुर, अलका अग्रवाल, नवीन वशिष्ठ और निखिल प्रकाशन के मोहन मुरारी शर्मा ने किया। डॉ. शशि गुप्ता, डॉ. सुषमा सिंह, राजकुमारी चौहान, रमा वर्मा, डॉ. नीलम भटनागर, रीता शर्मा और सुरेंद्र वर्मा 'सजग' ने भी विचार व्यक्त किए। इस प्रेस विज्ञप्ति के रचनाकार हैं श्री कुमार ललित जी !
साधना वैद