Sunday, November 2, 2008

जीवन संध्या

प्रिय आओ हम तुम मिल जुल कर
जीवन वैतरणी पार करें,
तट दूर नहीं, नैया भटकी
कुछ तुम खे लो कुछ मैं खे लूँ ।
आई आँधी उजड़ी बगिया
फूलों के पौधे टूट गये,
बिखरी पाँखुरियाँ धरती पर
कुछ तुम चुन लो कुछ मैं चुन लूँ ।
जलधार बही सुख स्वप्न धुले
नयनों के क्षितिज हुए सूने,
लो अब अमृत घट छलक रहा
कुछ तुम पी लो कुछ मैं पी लूँ ।
जीवन की गाथा व्यथा बनी
अंतर में घोर अंधेरा है,
जो फिर यह जीवन मिल जाये
कुछ तुम जी लो कुछ मैं जी लूँ ।
गीतों के स्वर अवरुद्ध हुए
जीवन की बीन लगी थमने,
पर शाश्वत गान हुआ मुखरित
कुछ तुम सुन लो कुछ मैं सुन लूँ ।
जीवन संध्या घिर आयी है
सपनों के शीशमहल टूटे,
जो शेष रहे साझे सपने
कुछ तुम बुन लो कुछ मैं बुन लूँ ।

साधना वैद

9 comments:

  1. a very good attempt ,the literary quality is gradually improving and going towards perfection.
    Vijay saxena

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  2. आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल कल 04- 08 - 2011 को यहाँ भी है

    नयी पुरानी हल चल में आज- अपना अपना आनन्द -

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  3. जीवन मार्ग दर्शन देती हुई ...सुलझी हुई ..खूबसूरत रचना ....!!

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  4. फूलों के पौधे टूट गये,
    बिखरी पाँखुरियाँ धरती पर
    कुछ तुम चुन लो कुछ मैं चुन लूँ ।


    बहुत खूबसूरती से लिखा है ..

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  5. जीवन जीने का सलीका बहुत सहजता से बता दिया .... आभार !

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  6. बेहद गहरे अर्थों को समेटती खूबसूरत और संवेदनशील रचना. आभार.
    सादर,
    डोरोथी.

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  7. साथ चल कर ...जीवन में कुछ भी पाया जा सकता है..किन्ही हालातों में भी जिया जा सकता है ...बढ़िया तरीके से यह बात आपने समझा दी है

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  8. sath chalne ki mahetta ko darshati aur sandesh deti ki ek dusre ke sath se har museebat se sath chhoot sakta hai.

    sunder abhivyakti jo chalchitr ki tarah ghoom gayi.

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