Thursday, December 3, 2009

तुमसे कुछ भी नहीं चाहिये ।

नयनों ने बह-बह कर कितनी सींची धरती ,
आहों ने ऊपर उठ कितना जल बरसाया ,
भावों ने मथ अंतर कितने खोदे कूँए ,
क्योंकर इसका लेखा जोखा तुमको दूँ मैं ।
यह दौलत तो मेरी, बस केवल मेरी है
मुझे तुम्हारी साझेदारी नहीं चाहिये ।

मैंने टूटे इंद्रधनुष गिरते देखे हैं ,
सपनों की गलियों में दुख पलते देखे हैं ,
तारों के संग उड़ते अगणित पंछी के दल
पंखहीन नभ से भू पर गिरते देखे हैं ।
मैंने अपना लक्ष्य और पथ ढूँढ लिया है
मुझे तुम्हारी दूरदर्शिता नहीं चाहिये ।

तुमने कब मेरे सच का विश्वास किया है,
मेरे हर संवेदन का परिहास किया है ,
मेरी आँखों ने जो देखा जाना परखा
तुमने तो केवल उसका उपहास किया है ।
अपने सच की उँगली थाम मुझे जीने दो
मुझे तुम्हारी सत्यधर्मिता नहीं चाहिये ।

मेरा सच वो सच है जिसको जग जीता है ,
सत्य तुम्हारा वैभव के पीछे चलता है ,
मेरा सपना है सबकी आँखों का सपना ,
स्वप्न तुम्हारा धन दौलत तुमको फलता है ।
देखूँ निज प्रतिबिम्ब स्वेद के दर्पण में मैं
मुझे तुम्हारी दुनियादारी नहीं चाहिये ।

साधना वैद

7 comments:

  1. तुमने कब मेरे सच का विश्वास किया है,
    मेरे हर संवेदन का परिहास किया है ,
    मेरी आँखों ने जो देखा जाना परखा
    तुमने तो केवल उसका उपहास किया है ।
    अपने सच की उँगली थाम मुझे जीने दो
    मुझे तुम्हारी सत्यधर्मिता नहीं चाहिये ।
    बहुत ही सुन्दरता और सहज भाव से नारी मन मे उठने वाले क्षोभ को शब्द दिये हैं। शुभकामनायें

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  2. "मेरा सपना है सबकी आखों का सपना "
    बहुत सुन्दर विचार और सशक्त अभिब्यक्ति,बधाई
    आशा

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  3. "मेरा सपना है सब की आँखों का सपना "
    बहुत सुन्दर भाव और अभिव्यक्ति |
    हार्दिक बधाई |
    आशा

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  4. "मेरा सच वो सच है जिसको जग जीता है ,
    सत्य तुम्हारा वैभव के पीछे चलता है , "


    बेहतरीन


    सादर

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  5. 'मेरा सच वो सच है जिसको जग जीता है ,
    सत्य तुम्हारा वैभव के पीछे चलता है ,
    मेरा सपना है सबकी आँखों का सपना ,
    स्वप्न तुम्हारा धन दौलत तुमको फलता है ।
    देखूँ निज प्रतिबिम्ब स्वेद के दर्पण में मैं
    मुझे तुम्हारी दुनियादारी नहीं चाहिये ।'
    - कितनी प्रखर अभिव्यक्ति - प्रभावित करती है !

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