Friday, December 24, 2010

गुत्थी

कभी-कभी
नितांत अजनबी,
अपरिचित चेहरों पर
जैसा अपनत्व,
जैसी गहन आत्मीयता,
और जैसी
एक कोमल सी अंतरंगता का
मधुर सा प्रतिबिम्ब झलक जाता है
वह उन चेहरों की रुखाई
और अजनबियत से कितना
अलग होता है ना
जिन्हें ईश्वर ने
आपका सगा संबंधी बना कर
इस धरती पर भेजा है,
और जिनके लिये आपने
ना जाने
कितनी कसमसाती रातों के
अंधेरों की दहशत
और कितने सुलगते दिनों की
तपती धूप को
उनकी हर विपदा में
उनके साथ झेला है ?

कभी-कभी
किसी नितांत अजनबी,
अपरिचित की वाणी में
कितनी मिठास,
कितना अपनापन और
कितनी सच्चाई महसूस होती है ना
जो आप अपने उन तथाकथित
‘अपनों’ की वाणी में ढूँढने का
बारम्बार भागीरथ प्रयास
करते रहते हैं
लेकिन हर बार
निराशा ही
आपके हाथ लगती है ?

कभी-कभी
कुछ लम्हों की
क्षणिक मुलाक़ात में ही
ना जाने कैसे
किसी अनजान अपरिचित के सामने
आपको अपना हृदय उड़ेल कर
रख देने की प्रेरणा मिल जाती है ना
जिसकी थाह
सदैव आपके साथ रहने वाले
आपके निकटतम संबंधी भी
कभी नहीं ले पाते ?

बहुत सोचती हूँ
ऐसा क्यों हो जाता है ,
ऐसा कैसे हो जाता है ,
लेकिन यह गुत्थी
मैं कभी
सुलझा नहीं पाती !

साधना वैद

16 comments:

  1. आदरणीय साधना वैद जी..
    नमस्कार !

    बहुत सोचती हूँ
    ऐसा क्यों हो जाता है ,
    ऐसा कैसे हो जाता है ,
    लेकिन यह गुत्थी
    मैं कभी
    सुलझा नहीं पाती !
    .............कुछ गुत्थी ऐसी होती है जो नहीं सुलझती

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  2. आप बहुत अच्छा लिखती हैं और गहरा भी.
    बधाई.

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  3. हाँ अक्सर ऐसा होता है ...हम नितांत अजनबी से मन कि बात कह देते हैं ..वो कुछ ही पल में अपना लगने लगता है ....

    बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति

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  4. कभी-कभी
    कुछ लम्हों की
    क्षणिक मुलाक़ात में ही
    ना जाने कैसे
    किसी अनजान अपरिचित के सामने
    आपको अपना हृदय उड़ेल कर
    रख देने की प्रेरणा मिल जाती है ना
    जिसकी थाह
    सदैव आपके साथ रहने वाले
    आपके निकटतम संबंधी भी
    कभी नहीं ले पाते ?


    बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति...

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  5. कभी कभी ऎसा होता हे अजनबी अपना सा लगता हे ओर अपने ही बेगाने.... बस यही जिनद्गी हे.... बहुत गहरे भाव लिये आप की यह सुंदर रचना धन्यवाद

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  6. कभी-कभी
    नितांत अजनबी,
    अपरिचित चेहरों पर
    जैसा अपनत्व,
    जैसी गहन आत्मीयता,
    और जैसी
    एक कोमल सी अंतरंगता का
    मधुर सा प्रतिबिम्ब झलक जाता है
    जैसे मेरे मन मे साधना वैड जी का है। लेकिन इसे गुथी मत बनने दीजियेगा। सुन्दर रचना। नये साल की अग्रिम बधाई शायद कुछ दिन नेट पर न आ पाऊँ। तीनो बेटियाँ परिवार समेत आ रही हैं। शुभकामनायें।

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  7. यही तो गुत्थी है जो सुलझती नहीं , जिनके लिए रात-दिन जलाए...नींदे गंवाई ,पसीने बहाए वो अपने नहीं होते...पर कोई अजनबी पल भर में सारा दर्द समझ लेता है...ऐसा है तो क्यूँ है...
    बड़ी कुशलता से सबके मन की उलझन बयाँ कर दी है.

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  8. बहुत सार्थक रचना..अक्सर जिन लोगों के साथ हम उम्र भर जुड़े होते है उनसे उतना अपनत्व नहीं जोड़ पाते जितना कभी कभी एक नितांत अज़नबी से जो हमें अपना लगने लगता है. बहुत भावपूर्ण प्रस्तुति ..आभार

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  9. aapki kavita pyar ko hara hua darshaati hai...kya pyar kabhi haar sakta hai? kya jeewan ke aise katu rishte bhi ho sakte hain jinhe pyar se jeeta nahi ja sakta ?

    jeeta ja sakta hai...bas jarurat thodi aur saadhna ki hai. mere khayaal se koi aisa rishta nahi jise pyar se jeet na ja sake. basharte bina swarth ke poorn manoyog se pyar ko aajmaaya jaye.

    aur jo rishta pal bhar me ajnabiyon se itna atrang ho jata hai...jaruri nahi vo utna hi apki kasauti par khara utre....waise bhi kahte hain na door ke dhol suhaavne hi hote hain. :):):)

    sunder rachna jiske ander ke marm ko me samajh rahi hun.
    ye to bas ek drishtikon hai jo apke aage rakha hai.

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  10. बहुत सुन्दर, हर एक के दिल की बात आपने शब्दों में उतार दी, सचमुच ऐसा ही होता है!

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  11. एक अनसुलझी गुत्त्थी का सुन्दर विवेचन ।
    आभार।

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  12. कोई गुत्थी सुलझ जाए तो गुत्थी नहीं रह जाती |बहुत सुन्दर भाव पूर्ण कविता बहुत बहुत बधाई
    आशा

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  13. कितनी कसमसाती रातों के
    अंधेरों की दहशत
    और कितने सुलगते दिनों की
    तपती धूप को
    उनकी हर विपदा में
    उनके साथ झेला है ?

    पूरी कविता और विशेष रूप से यह पंक्तियाँ बहुत प्रभावित करती हैं.

    सादर

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  14. आज की ब्लॉग बुलेटिन खोना मुझे मंजूर नहीं मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  15. बहुत सुन्दर रचना | बधाई

    कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
    Tamasha-E-Zindagi
    Tamashaezindagi FB Page

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