Thursday, October 29, 2015

मन की बात


कान तरसते रह गये, बादरवा का शोर 
ना बरखा ना बीजुरी, कैसे नाचे मोर ! 

शीतल जल के परस बिन, मुरझाए सब फूल 
कोयल बैठी अनमनी, गयी कुहुकना भूल ! 

बेटा बेटी में फरक, जाहिल की पहचान 
मन की आँखें खोलिये, बेटी गुण का खान ! 
 
पढ़ी लिखी लड़की बने,  पीहर का अभिमान
उसके संयम से बढ़े, दोनों कुल का मान ! 
 
जितना साधें टूटते, रिश्ते बड़े अजीब 
बिन कोशिश बँध जाँय ये, जिनके बड़े नसीब ! 

जिसने जीवन भर किया, रिश्तों का सम्मान
पूँजी पाई प्यार की, बना वही धनवान ! 

ब्लॉग सभी सूने पड़े, कविगण हुए हताश
जकड़ रहा हर एक को, 'फेस भूख' का पाश ! 

दीपक ले कवि हैं खड़े, स्वागत को तैयार 
शायद कोई ब्लॉग पर, आ जाये इस बार ! 


साधना वैद





Saturday, October 24, 2015

शिक्षक - जीवन शाला के



माँ
मैया तेरे प्यार का, कैसे होय बखान 
अम्बर सा व्यापक अरू, सागर सा धनवान ! 

माँ तेरे सान्निध्य का, हर पल था अनमोल 
जीवन जीने की कला, सिखा गया हर बोल !  



पिता 
नीति नियम के नियंता, घर में होते तात 
अनुशासन की राह पर, चलवाते दिन रात ! 

बरगद जैसी छाँह औ', बादल जैसा प्यार 
कड़वी बोली तात की, निर्मल जल की धार !


गुरू 
जीवन की पूँजी बना,  गुरू का शिक्षा दान 
जीते हर संघर्ष में, पाकर उनसे ज्ञान ! 

कच्ची माटी को दिया, रंग रूप अनमोल 
दुनिया भर के ज्ञान को, पिला दिया रस घोल !


सैनिक 
भारत माता की कसम, खाते वीर जवान 
सीमा की रक्षार्थ हित, देंगे अपनी जान ! 

ब्याह रचाया मौत से, रक्त लगाया भाल 
सेना बाराती बनी, सीमाएं ससुराल ! 

साधना वैद




Thursday, October 22, 2015

प्रेम


निश्छल आँसू प्रेम के, अंतस के उच्छवास !
अनुपम यह उपहार है, ले लो आकर पास ! 

दीपशिखा सी जल रही, प्रियतम मैं दिन रात !
पंथ दिखाने को तुम्हें, पिघलाती निज गात ! 

दर्शन आतुर नैन हैं, कब आओगे नाथ !
तारे भी छिपने लगे, होने को है प्रात ! 

नैन निगोड़े नासमझ, नित्य निहारें बाट !
ना आयेंगे प्राणधन, तज दुनिया के ठाट ! 

पवन पियाला प्रेम का, पी-पी पागल होय !
सारा जग सुरभित करे, स्वयम सुवासित होय ! 

गलियन-गलियन घूमती, गंध गमक गुन गाय !
प्रभु चरणों में वास है, क्यूँ न फिरूँ इतराय !  

अंतस आलोकित किया, दिखलाने को राह !
आ बैठो इस ठौर तुम, नहीं और कुछ चाह ! 

मनमंदिर में नेह की, जला रखी है ज्योत !
प्रियतम पथ भूलें नहीं, मिले न दूजा स्त्रोत ! 


साधना वैद
 

Saturday, October 17, 2015

यह कैसी शिक्षा


     हमारी राष्ट्र भाषा हिंदी है ! हमारी मातृभाषा हिंदी है ! हम अपने घर में हिंदी बोलते हैं और अपने परिवार के हर सदस्य को अपनी मातृभाषा का सम्मान करने के लिये और हिंदी साहित्य की अनमोल पुस्तकों को पढ़ने के लिये प्रोत्साहित भी करते हैं लेकिन हमारे सारे प्रयत्न तब निष्फल होते दिखाई देते हैं जब अंग्रेज़ी माध्यम के स्तरीय विद्यालयों में पढ़ने वाले हमारे बच्चे घर में आकर बताते हैं कि आज स्कूल में हिंदी में बात करने पर कितने बच्चों को दण्डित किया गया और कई बार वे स्वयं भी इस दण्ड के भागी होते हैं !

    यह कैसी विचित्र मानसिकता है ! अपने ज्ञान की वृद्धि के लिये आप कितनी भी भाषाएँ सीख लीजिए आप पर कोई प्रतिबन्ध नहीं है लेकिन अपने ही देश में अपनी ही मातृभाषा बोलने पर स्कूलों में बच्चों को दण्ड दिया जाए यह कहाँ का न्याय है ! जिस भाषा के प्रयोग पर बच्चों को सज़ा मिले उसे सीखने के लिये उनमें कितनी दिलचस्पी बाकी रह जायेगी ! फिर हिंदी दिवस मनाने का या राष्ट्रभाषा के गुणगान का झूठा आडम्बर रचाने का क्या औचित्य है ? 
     गाँधी जी का विचार था कि बच्चों को अंग्रेज़ी भाषा के माध्यम में पढ़ाने से उनकी मौलिक क्षमताओं का स्वाभाविक विकास नहीं हो पाता ! उनमें विषय को ठीक से समझे बिना ही रटने की और नक़ल करने की प्रवृत्ति जन्म लेती है और वे स्वयं को कभी भी सही तरीके से अभिव्यक्त नहीं कर पाते ! उनका मानना था कि जैसे गाय का दूध माँ के दूध का स्थान नहीं ले सकता उसी तरह कोई भी अन्य भाषा अपनी मातृभाषा का स्थान नहीं ले सकती ! वे तो यहाँ तक कहते थे कि यदि कोई उन्हें एक दिन के लिये निरंकुश सत्ताधिकारी बना दे तो वे सबसे पहले स्कूलों से विदेशी भाषा के माध्यम का बहिष्कार कर दें !

     भाषाएँ सभी बहुत समृद्ध और सुन्दर हैं और ज्ञानार्जन के लिये जितनी भी सीख ली जाएँ कम ही हैं ! लेकिन सुख दुःख हर्ष विषाद और आपदा विपदा की स्थिति में अपनी मातृभाषा ही सबसे पहले याद आती है ! चंद्रधर शर्मा गुलेरी की कहानी ‘उसने कहा था’ तो याद ही होगी आपको ! छद्म वेश में छिपे जर्मन सिपाही की पहचान तब ही हो पाती है जब वह घायल हो जाता है और अपनी मातृभाषा में अपने भगवान को याद करता है !

     मुझे ज्ञानार्जन के लिये कुछ भी पढ़ने और कितना भी सीखने से कोई आपत्ति नहीं है ! बस दुःख इसी बात का है कि हमारे स्कूलों के शिक्षक जिन पर एक पूरी पीढ़ी को शिक्षित और संस्कारित करने का दायित्व है वे ही बच्चों को भ्रमित करने में और अपनी राष्ट्रभाषा के सन्दर्भ में उन्हें नकारात्मक रूप से पूर्वाग्रही बनाने में कितनी बड़ी भूमिका निभा रहे हैं ! बच्चे स्कूलों में अपनी राष्ट्र भाषा का सम्मान करना नहीं सीखते बल्कि उस भाषा में अपने मित्रों से साधारण सा संवाद करने पर भी दण्डित किये जाते हैं यह शिक्षा का कैसा विचित्र स्वरुप है ? ज़रा सोचिये ! और यह भी विचार करिये कि दण्ड पाने का वास्तविक अधिकारी कौन है ?



साधना वैद

Tuesday, October 13, 2015

मेरा हौसला


मैंने उदासी भरे लम्हों से 
हर रोज़ खुशियाँ चुराई हैं
मैंने निराशा भरे पलों से 
हर पल हिम्मत जुटाई है
आजमाना चाहो तो 
आजमा लेना जब भी जी चाहे
मैंने मुफलिसी के दौर में भी 
भर हाथ दौलत लुटाई है !

साधना वैद 

Sunday, October 11, 2015

गोरक्षा – एक कठिन समस्या



गोरक्षा भारत में सदियों से एक संवेदनशील विषय रहा है ! देश के अलग-अलग राज्यों में इस मसले पर विभिन्न क़ानून हैं ! गाय, बैल व भैंस को अलग-अलग श्रेणियों में रखा गया है ! इनके सन्दर्भ में कहाँ क्या क़ानून हैं ज़रा प्रान्तों के अनुसार इसकी जानकारी भी लेते चलें !
जम्मू काश्मीर – गाय, बैल व भैंस तीनो के वध पर प्रतिबन्ध है
हिमांचल प्रदेश – तीनों पर प्रतिबन्ध
पंजाब – तीनों पर प्रतिबन्ध
हरियाणा – तीनों पर प्रतिबन्ध
राजस्थान – तीनों पर प्रतिबन्ध
उत्तर प्रदेश – सिर्फ गाय पर प्रतिबन्ध
बिहार – सिर्फ गाय पर प्रतिबन्ध
झारखंड – सिर्फ गाय पर प्रतिबन्ध
उत्तराखंड – तीनों पर प्रतिबन्ध
गुजरात – सिर्फ गाय और बैलों पर प्रतिबन्ध
मध्य प्रदेश – सिर्फ गाय और भैंसों पर प्रतिबन्ध
छत्तीसगढ़ – तीनों पर प्रतिबन्ध
उड़ीसा – सिर्फ गाय पर प्रतिबन्ध
महाराष्ट्र – सिर्फ गाय पर प्रतिबन्ध
कर्नाटक – सिर्फ गाय पर प्रतिबन्ध
गोआ – सिर्फ गाय पर प्रतिबन्ध
तेलंगाना – सिर्फ गाय पर प्रतिबन्ध
आंध्र प्रदेश – सिर्फ गाय पर प्रतिबन्ध
तामिलनाडू – सिर्फ गाय पर प्रतिबन्ध
केरल – कोई प्रतिबन्ध नहीं
बंगाल – कोई प्रतिबन्ध नहीं
आसाम – कोई प्रतिबन्ध नहीं
सिक्किम – कोई प्रतिबन्ध नहीं
मेघालय – कोई प्रतिबन्ध नहीं
अरुणांचल प्रदेश – कोई प्रतिबन्ध नहीं
नागालैंड – कोई प्रतिबन्ध नहीं
मिजोरम – कोई प्रतिबन्ध नहीं
त्रिपुरा – कोई प्रतिबन्ध नहीं
मणीपुर – सिर्फ गाय पर प्रतिबन्ध 



गो वध निषेध का क़ानून सबसे पुराना जम्मू काश्मीर का है जो सन १९३२ से लागू है ! तामिलनाडू में दस वर्ष और बिहार में पन्द्रह वर्ष से अधिक आयु के बैलों के वध पर कोई प्रतिबन्ध नहीं है ! देश के विभिन्न प्रान्तों में विभिन्न कानूनों की वजह से बीफ को परिभाषित करने में संशय (कन्फ्यूज़न) बना रहता है ! तीनों पशुओं के मांस को बीफ ही कहा जाता है ! क्या आप जानना चाहेंगे कि विश्व का सबसे बड़ा बीफ निर्यातक देश कौन है ? उत्तर है हमारा देश भारत ! यहाँ यह बात भी नोट करने योग्य है कि दुनिया में सबसे अधिक पशुधन भी भारत में ही है ! और दुनिया के सबसे अधिक शाकाहारी लोग भी भारत में ही बसते हैं ! पशुपालन भी एक उद्योग ही है और औद्योगिक अर्थशास्त्र के अपने ही नियम और लक्ष्य होते हैं !
यदि हम अपने पड़ोसी देशों की तरफ देखें तो नेपाल में गोवध पर प्रतिबन्ध है, श्रीलंका और म्यांमार, जहाँ का प्रमुख धर्म बौद्ध धर्म है, वहाँ अहिंसा की वजह से गोवध गैर कानूनी है ! इंडोनेशिया, जो एक मुस्लिम आबादी वाला देश है, वहाँ भी बीफ खाना एक टैबू है क्योंकि वे लोग अपने पूर्वजों को हिन्दू मानते हैं और उनका सम्मान करते हैं ! पाकिस्तान और बांग्लादेश में बीफ गरीबों का प्रमुख भोजन है इसलिए भारत से अधिकाँश गायें तस्करों के द्वारा इन्हीं देशों में भेजी जाती हैं !
हकीकत यह है कि सारे प्रतिबंधों के बावजूद अर्थशास्त्र सब पर भारी पड़ता है और इसी कारण से आज पशुपालक भैंस पालना गाय पालने से अधिक लाभकारी पाते हैं ! गाँवों में ट्रैक्टरों का प्रचलन बढ़ता ही जा रहा है और खेतों में बैलों की आवश्यकता निरंतर घट रही है ! सामान ढोने के लिये बैलगाड़ी का स्थान विभिन्न तरह के डीज़ल से चलने वाले वाहनों ने ले लिया है ! ऐसी स्थिति में गोवंश को बचाने के लिये क्या किया जा सकता है ! देश में अनेक गोशालाएं चल रही हैं जहाँ ट्रकों और रेलगाड़ियों के द्वारा कटने के लिये अवैध रूप से ले जाई जा रही गायों व भैसों को छुड़ा कर रखा जाता है ! लोग यदि चाहें तो अपने पशुओं को वहाँ पर आकर दान भी कर सकते हैं ! ऐसी अधिकाँश गोशालाएं अपना खर्च दूध और गोबर बेच कर निकालने का प्रयास करती हैं ! जो कमी पड़ती है वह दान से पूरी की जाती है जो प्राय: आसानी से प्राप्त हो जाता है ! गाड़ियों द्वारा पशुधन को सिर्फ कटने के लिये ही ले जाया जाता हो ऐसा नहीं है ! पालने के लिये भी पशु गाड़ियों द्वारा ही ले जाये जाते हैं ! लेकिन जो पशु पालने के लिये ले जाये जाते हैं उन्हें ठूँस-ठूँस कर नहीं भरा जाता ! उनके साथ यथेष्ट मात्रा में हरे चारे और पीने के पानी का प्रबंध भी किया जाता है ! कटने के लिये ले जाये जा रहे पशुओं के पैरों को रस्सी या जंजीरों से बाँध दिया जाता है ! उनको सींगों से भी इस तरह बाँधा जाता है कि उनकी गर्दन झुक जाए और वह कम स्थान घेरें ! कहीं-कहीं तो एक पशु की पीठ पर दूसरे पशु के पैर रख कर दोनों को एक साथ ही बाँध दिया जाता है ! खैर यह तो मनुष्य कितना क्रूर हो सकता है उस विषय की बात हो गयी पर यह बात विचारणीय है कि यदि गोवध के क़ानून सब राज्यों में एक प्रकार के हों और नागरिक गोवध को रोकने के अभियान में अपना सहयोग करना चाहते हों तो उन्हें ज़ोर देकर गाय के दूध की माँग को बढ़ाना होगा ! गाय का दूध स्वास्थ्य के लिये भैंस के दूध से कहीं अधिक फायदेमंद होता है यह बात सभी जानते हैं ! दूध के अतिरिक्त गाय से प्राप्त अन्य वस्तुओं जैसे गोबर इत्यादि की उपयोगिता का भी भरपूर विज्ञापन किया जाना चाहिए जिससे गो रक्षा के लिये एक सकारात्मक वातावरण तैयार किया जा सके और गोवध को रोका जा सके !
      


साधना वैद  



Thursday, October 8, 2015

व्याकुल प्राण




व्याकुल प्राण

कब तक बाट निहारूँ प्रियतम पथराये हैं नैन
किसे सुनाऊँ पीर हृदय की घायल हैं सब बैन
काठ हुई मैं खड़ी अहर्निश तकते राह तुम्हारी
व्याकुल प्राण देह पिंजर में तड़पत हैं दिन रैन !

साधना वैद   


चित्र - गूगल से साभार