Friday, June 24, 2016

परछाईं




जहाँ तुम कहोगे वहीं मैं चलूँगी
जिधर पग धरोगे उधर पग धरूँगी !

जो चाहोगे मैं खुद को छोटा करूँगी
मैं पैरों के नीचे समा के रहूँगी !

जो चाहोगे दीवार पर जा चढूँगी
मैं तुमसे भी बढ़ कर ज़मीं नाप लूँगी !

मैं पानी की लहरों पे चलती रहूँगी
मैं दुर्गम पहाड़ों पे चढ़ती रहूँगी ! 

जिधर तुम मुड़ोगे मैं संग में मुड़ूँगी
मैं हर एक कदम संग तुम्हारे बढूँगी !

अंधेरों में तुमको मैं घिरने न दूँगी
अकेला कभी तुमको रहने न दूँगी !

रहूँगी सदा साथ परछाईं बन कर
मगर शर्त है दीप बुझने न दूँगी !

मगर शर्त है दीप बुझने न दूँगी ! 


साधना वैद

9 comments:

  1. आपका हृदय से बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार यशोदा जी ! सादर वन्दे !

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  2. वाह !बहुत ख़ूब दी जी
    सादर

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  3. बेहतरीन प्रस्तुति

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  4. रहूँगी सदा साथ परछाईं बन कर
    मगर शर्त है दीप बुझने न दूँगी
    बहुत ही सुंदर रचना ,सादर नमस्कार

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  5. बहुत ही उत्कृष्ट सृजन...
    वाह!!!

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  6. हार्दिक धन्यवाद अनीता जी ! आभार आपका !

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  7. हार्दिक धन्यवाद अनुराधा जी! आभार आपका !

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  8. आपका हृदय से बहुत बहुत धन्यवाद कामिनी जी ! आभार आपका!

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  9. आपका तहे दिल से बहुत बहुत शुक्रिया सुधा जी! आभार आपका!

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