Tuesday, January 30, 2018

उलझन



अभी तक समझ नहीं पाई कि 

भोर की हर उजली किरन के दर्पण में 
मैं तुम्हारे ही चेहरे का 
प्रतिबिम्ब क्यों ढूँढने लगती हूँ ?
हवा के हर सहलाते दुलराते 
स्नेहिल स्पर्श में
मुझे तुम्हारी उँगलियों की 
चिर परिचित सी छुअन 
क्यों याद आ जाती है ?
सम्पूर्ण घाटी में गूँजती 
दिग्दिगंत में व्याप्त 
हर पुकार की 
व्याकुल प्रतिध्वनि में 
मुझे तुम्हारी उतावली आवाज़ के 
आवेगपूर्ण आकुल स्वर 
क्यों याद आ जाते हैं ?
यह जानते हुए भी कि 
ऊँचाई से फर्श पर गिर कर 
चूर-चूर हुआ शीशे का बुत 
क्या कभी पहले सा जुड़ पाता है ? 
धनुष की प्रत्यंचा से छूटा तीर 
लाख चाहने पर भी लौट कर
क्या कभी विपरीत दिशा मे मुड़ पाता है ? 
वर्षों पिंजरे में बंद रहने के बाद 
रुग्ण पंखों वाला असहाय पंछी
दूर आसमान में अन्य पंछियों की तरह
क्या कभी वांछित ऊँचाई पर उड़ पाता है ?
मेरा यह पागल मन 
ना जाने क्यूँ 
उलझनों के इस भँवर जाल में
आज भी अटका हुआ है । 


साधना वैद

Thursday, January 25, 2018

बलिहारी है भंसाली जी


पद्मावती का बवाल इतना विकट होता जा रहा है कि यह कब और कैसे थमेगा समझ ही नहीं आ रहा है ! संजय लीला भंसाली जी की प्रवृत्ति तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत करने की है इसमें तो कोई शंका शुबहा है ही नहीं ! कलात्मक स्वतन्त्रता की आड़ लेकर वे मूल कथा की किस तरह गर्दन मरोड़ते हैं देवदास इसका ज्वलंत उदाहरण है लेकिन इतने नामी निर्माता निर्देशक होने के साथ ही थोड़ी सी व्यावहारिक बुद्धि भी विकसित कर लेते कि कहाँ और किस चरित्र के साथ कितनी छेड़छाड़ करनी चाहिए तो आज उन्हें ये दिन न देखने पड़ते ! पारो, चंद्रमुखी और मस्तानी की पंक्ति में ही पद्मावती को रख कर उन्होंने बहुत बड़ी भूल की है ! देवदास फिल्म में पारो और देवदास का किस तरह से कैरेक्टर एसेसिनेशन किया गया है इसकी पीड़ा उनसे पूछिए जिनके दिलों के बहुत करीब यह उपन्यास है ! 

भंसाली जी को मुख्य पात्रों को नचवाने का बहुत शौक है ! शायद भीड़ को सिनेमा हॉल तक जुटाने का एक यही नुस्खा उन्हें आता है ! शरतचंद्र के उपन्यास में जिन पारो और चंद्रमुखी ने एक दूसरे को कभी रू ब रू देखा भी नहीं भंसाली जी ने अपनी फिल्म में दोनों को एक साथ नचवा दिया !  बाजीराव मस्तानी में भी उन्होनें कलात्मक स्वतन्त्रता के नाम पर लिबर्टी लेकर मराठा रानी और मस्तानी को नचवा दिया ! बाजीराव के वंशजों ने इस बात पर अपना असंतोष भी व्यक्त किया था लेकिन पब्लिक ने इस असंतोष पर अपनी कोई विशेष प्रतिक्रिया नहीं जताई ! शायद इसी बात से उनका हौसला बढ़ गया और फिल्म पद्मावती में भी उन्होंने खुले आँगन में तमाम दरबारियों और प्रजा के सामने अंग प्रदर्शित करते कपड़े पहना कर पद्मावती से घूमर डांस करवा दिया ! लेकिन पद्मावती में उनकी यह चाल उन्हीं पर भारी पड़ गयी ! रानी पद्मावती का आज भी लोगों के दिलों में कितना सम्मान है और क्या स्थान है इसका अनुमान भंसाली जी नहीं लगा पाए ! 

भंसाली जी तो खैर फिल्म के निर्माता हैं इसलिए इसके प्रदर्शन के लिए वे आकाश पाताल एक करने में लगे हुए हैं तो आश्चर्य की कोई बात नहीं लेकिन हमारी सुप्रीम कोर्ट को क्या हुआ है ? उन्हें फिल्म रिलीज़ करने की अनुमति देने के लिए २५ जनवरी का दिन ही सबसे उपयुक्त लगा जबकि गणतंत्र दिवस समारोह कल होना है ? आतंकी धमकियों से राजधानी में हाई अलर्ट जारी किया गया है और दस देशों के राष्ट्राध्यक्ष और अन्य कई राजनेता विशिष्ट अतिथि के तौर पर गणतंत्र दिवस के अवसर पर समारोह में सम्मिलित होने के लिए भारत आ रहे हैं ! ऐसे समय में इस फिल्म का रिलीज़ होना क्या इतना आवश्यक है कि प्रदेशों की सारी पुलिस और सेना को लॉ एंड ऑर्डर मेंटेन करने के लिए बाकी सारे अहम् मुद्दों की अनदेखी करनी पड़ जाए और इस फिल्म के सफल प्रदर्शन की ड्यूटी में उसे जुटना पड़ जाए ? फिल्म के प्रदर्शन के लिए दो एक हफ्ते और नहीं रुका जा सकता था ?

साधना वैद

Tuesday, January 23, 2018

ज़िंदगी का फलसफा



बोलो तो ज़रा   
किसने सुझाई थी तुम्हें ये राह
किसने दिखाई थी ये मंज़िल
किसने आँखों के सामने से
चहुँ ओर फैले जाले हटाये थे ?
ज़िंदगी गिटार या वायोलिन पर
बजने वाली एक मीठी धुन
भर ही नहीं है
ज़िंदगी एक अनवरत जंग है,
संघर्ष है, चुनौती है, स्पर्धा है
एक कठिन इम्तहान है 
यह एक ऐसी अथाह नदी है
जिसे पार करने के लिए
जो इकलौता पुल है वह भी
टूट कर नष्ट हो चुका है
यह एक ऐसा अलंघ्य पर्वत है
जिसके दूसरी ओर जाना
इसलिए मुमकिन नहीं क्योंकि
तुम्हारे पास
शिखर तक जाने के लिए
ना तो पर्याप्त प्राण वायु है  
ना ही यथोचित साधन !
क्या करना चाहते हो
एहसानमंद हो उस शख्स के
कि उसने तुम्हें
सही वक्त पर चेता कर
तुम्हें सत्य के दर्शन करा दिए
और तुम्हें तुम्हारी
औकात और कूवत से
   परिचित करा दिया ?   
या उसकी गर्दन दबोचना चाहते हो
कि सत्य से मुँह चुरा कर
कल्पना के मिथ्या संसार में जीकर
खुद को सूरमा समझ लेने के
एक और खुशनुमां एहसास को
जी लेने के शानदार मौके से
तुम्हें वंचित कर दिया ?  
बोलो क्या चुनना चाहते हो तुम ?
यथार्थ या कल्पना
सत्य या मिथ्या
सही या ग़लत
क्या है तुम्हारा पाथेय ?
क्या है तुम्हारा गंतव्य ?
क्या है तुम्हारा लक्ष्य ?
जब किसी नतीजे पर पहुँच जाओ
तो मुझे भी ज़रूर बताना !


चित्र --- गूगल से साभार 

साधना वैद   




Tuesday, January 16, 2018

पर्व संक्रान्ति



मीठी गजक
चटपटे मंगौड़े
तिल के लड्डू

लैया की पट्टी
मूंगफली की पट्टी
जाड़ों की मेवा

 मीठी रेवड़ी  
बाजरे की टिकिया
खोये के लड्डू

पोंगल भात
बाजरे की खिचड़ी
रस की खीर  

गुड़ की चाय
पकौड़े औ’ चटनी
मीठी गंडेरी

मनायें पर्व 
उड़ायें गगन में 
प्यारी पतंग 

  सूर्य की पूजा 
अन्न वस्त्र का दान
पर्व संक्रांति

सूर्य देवता 
हुए दिशा बदल 
उत्तरायण 




साधना वैद 

Sunday, January 14, 2018

मैं पतंग



यह पतंग भी ना 
हू ब हू मेरे जैसी है !
पहली पहली बार उड़ाने की कोशिश में
वैसे ही बार बार गिर जाती है
जैसे अपने शैशव में
चलना सीखने के प्रक्रिया में
मैं बार बार गिर जाया करती थी !
बार बार दूर जाकर
हवा में खूब ऊँचे उछाल कर
फिर से उडाई जाती है
ठीक वैसे ही जैसे मुझे
बार बार सम्हाला जाता
और फिर चलाया जाता !
और अंतत: यह भी उड़ चली  
वैसे ही जैसे एक दिन
मुझे चलना आ गया !
आसमान की बाकी पतंगों के साथ
पेंच लड़ाने के लिए
पतंग की डोर में
काँच लगा हुआ माँझा
बिलकुल उसी तरह जोड़ा जाता
जैसे भविष्य की सारी स्पर्धाओं में
अव्वल आने के लिए माँ
मेरे जीवन की डोर में
व्यावहारिकता और संस्कारों का
माँझा बाँध दिया करती थी !
हवाओं का साथ पा जैसे
पतंग पलक झपकते ही
आसमान से बातें करने लगती
मैं भी युवा होते ही
अपने आसमान में अपने
संगी साथियों के साथ खूब
ऊँची उड़ने लगी !
सबके साथ सुख दुःख बाँटते
हँसते खिलखिलाते
दूर आसमान में उड़ना
खूब मन को भाने लगा !

कई साथी साथ रहे देर तक
कईयों के रास्ते बदल गए !
कई वक्त के साथ बिछड़ते गए
जिनकी डोर कटती गयी !
हवाओं के पंखों पर सवार
मेरी पतंग अभी भी गगन में
उड़ती जा रही है !
और कब तक उड़ पायेगी
नहीं जानती !
माँझा मज़बूत है या किस्मत
कौन जाने !
लेकिन एक दिन इस डोर का
कटना भी तय है
यह बिलकुल निश्चित है !


साधना वैद





Friday, January 12, 2018

दीप ले आओ



नन्हा सा दीप 
मिटाए जगत का 
अंधेरा घना 

छाँटनी होगी 
ज्ञानालोक के लिए 
मन की धुंध 

गहरा हुआ 
मन का अवसाद 
घुप्प अंधेरा 

जगमगा दो 
मन का कोना-कोना 
दीप ले आओ 

माटी का तन 
कोमल सी वर्तिका 
थोड़ा सा तेल 

देखो तो ज़रा 
जलते ही भगाया 
दूर अंधेरा 

फैला उजाला
निश्चित हुए लक्ष्य  
भागे संशय 

उमंगा मन 
पथ हुआ प्रशस्त 
मंजिल पास 

मन में हुआ 
साहस का संचार 
बढ़ा विश्वास 

नन्हे से दीप 
स्वीकार करो तुम 
मेरा प्रणाम 


साधना वैद 

Sunday, January 7, 2018

नमन तुम्हें मैया गंगे



गिरिराज तुम्हारे आनन को 
छूती हैं रवि रश्मियाँ प्रथम 
सहला कर धीरे से तुमको 
करती हैं तुम्हारा अभिनन्दन 
उनकी इस स्नेहिल उष्मा से 
बहती है नित जो जलधारा 
वह धरती पर नीचे आकर 
करती है जन जन को पावन !



साधना वैद

Thursday, January 4, 2018

ओ करुणाकर




शोभित गगन के ललाट पर 
ओ करुणाकर भुवन भास्कर,
स्वर्णिम प्रकाश से तुम 
उदित हो जाओ 
जीवन में मेरे 
और आलोकित कर दो 
निमिष मात्र में 
मेरा यह तिमिरमय संसार,
जगमगा दो 
मेरे जीवन का 
हर कोना-कोना 
कि चुन सकूँ मैं 
राह के हर कंकड़ को,
हटा सकूँ पथ की 
हर बाधा को 
ताकि सुगम्य होकर 
प्रशस्त हो जाये 
मंज़िल तक का हर मार्ग !



साधना वैद