Thursday, May 16, 2019

छाया




जीवन के मरुथल में
अनवरत कड़ी धूप में चलते चलते
तपती सलाखों सी सूर्य रश्मियों को
अपने तन पर सहने की इतनी
आदत हो गयी है कि
अब मुझे किसी छाया की
दरकार नहीं रह गयी है !
वैसे भी सामने फैला पड़ा है
रेत का अनंत असीम समंदर
जिसमें दूर दूर तक न कोई
मरुद्यान दिखाई देता है
ना ही शीतल छाँह का कोई ठौर
कि अपने झुलसे तन को
थोड़ी सी तो राहत दे सकूँ !
तभी तो छाया के लिए  
अपने दुखों की चादर को ही
खूँटों से बाँध कर  
एक वितान बना लिया है मैंने
कि उसके साये में तनिक
विश्राम कर सकूँ !
शीतल जल पीने के लिए  
अपने ही श्रम सीकरों को
एकत्रित कर सुराही में भर लिया है
कि तृषा से चटकते अपने अधरों को
तनिक गीला कर सकूँ !  
और अपने अशक्त रुग्ण पंखों को
अपने ही हाथों से बार बार सहला कर
एक बार फिर पुनर्जीवित कर लिया है
कि वे हौसलों की उड़ान भरने के लिए
एक बार फिर तैयार हो सकें  
क्योंकि मंज़िल अभी दूर है
और सफ़र बहुत लंबा है !



साधना वैद  



17 comments:

  1. हमेशा की तरह लाज़बाब ,सादर नमस्कार दी

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  2. हार्दिक धन्यवाद कामिनी जी ! आभार आपका !

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  3. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (18 -05-2019) को "पिता की छाया" (चर्चा अंक- 3339) पर भी होगी।

    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    ....
    अनीता सैनी

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  4. हार्दिक धन्यवाद एवं आभार आपका अनीता जी !सादर वन्दे!

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  5. आपका हृदय से बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार यशोदा जी ! सादर वन्दे !

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  6. बहुत ही अच्छी रचना दी जी
    सादर

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  7. बहुत सुंदर रचना साधना जी

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  8. हार्दिक धन्यवाद अनीता जी ! आभार आपका !

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  9. आपका हृदय से बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार अनुराधा जी !

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  10. वाह!!!
    बहुत लाजवाब....हमेशा की तरह...।

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  11. हार्दिक धन्यवाद सुधा जी! आभार आपका !

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  12. सुन्दर रचना

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  13. हार्दिक धन्यवाद केडिया जी!आभार आपका !

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  14. सादर नमस्कार ,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (19 -4 -2020 ) को शब्द-सृजन-१७ " मरुस्थल " (चर्चा अंक-3676) पर भी होगी,

    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    ---
    कामिनी सिन्हा

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