Wednesday, June 26, 2019

वर्षा



चंचल चुलबुली हवा ने
जाने बादल से क्या कहा
रुष्ट बादल ज़ोर से गरजा
उसकी आँखों में क्रोध की
ज्वाला रह रह कर कौंधने लगी ।
डरी सहमी वर्षा सिहर कर
काँपने लगी और अनचाहे ही
उसके नेत्रों से गंगा जमुना की
अविरल धारा बह चली ।
नीचे धरती माँ से उसका
दुख देखा न गया ,
पिता गिरिराज हिमालय भी
उसकी पीड़ा से अछूते ना रह सके ।
धरती माँ ने बेटी वर्षा के सारे आँसुओं को
अपने आँचल में समेट लिया
और उन आँसुओं से सिंचित होकर
हरी भरी दानेदार फसल लहलहा उठी ।
पिता हिमालय के शीतल स्पर्श ने
वर्षा के दुखों का दमन कर दिया
और उसके आँसू गिरिराज के वक्ष पर
हिमशिला की भाँति जम गये
और कालांतर में गंगा के प्रवाह में मिल
जन मानस के पापों को धोकर
उन्हें पवित्र करते रहे !

साधना वैद


14 comments:

  1. बेहतरीन..
    इस बार सीमा दीदी ने भी एक रचना दी है
    सादर नमन..

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  2. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 27.6.19 को चर्चा मंच पर चर्चा - 3379 में दिया जाएगा

    धन्यवाद

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  3. हार्दिक धन्यवाद यशोदा जी ! आभार आपका !

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  4. आपका हृदय से बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार दिलबाग जी ! सादर वन्दे !

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  5. हार्दिक धन्यवाद सरिता जी ! स्वागत है आपका !

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  6. धन्यवाद उम्दा लिखा है |

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  7. हार्दिक धन्यवाद सु-मन जी !

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  8. आपका हृदय से बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार श्वेता जी ! सप्रेम वन्दे !

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  9. बहुत सुंदर रचना

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  10. वाह!!एक से बढकर एक ...!!! बहुत खूब!साधना जी ।

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  11. बहुत लाजवाब रचना
    वाह!!!

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  12. हृदय से आपका बहुत बहुत धन्यवाद शुभा जी ! दिल से आभार !

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  13. सुधा जी आपका हृदय से बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार !

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