Thursday, January 9, 2020

ताशकंद यात्रा – ६ - तैमूर का शहर समरकंद



ग्रुप के कुछ साथियों का टिकिट किसी कारणवश बुलेट ट्रेन से नहीं हो पाया था इसलिए उन्हें बाद की ट्रेन से आना पड़ा ! हम सभी बस में बैठ कर उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे ! अनजान देश ! ग्रुप से अलग हो गए कुछ सदस्य ! उद्विग्नता भी बनी हुई थी और चिंता भी हो रही थी ! दिन का तापमान बढ़ता जा रहा था और अच्छी खासी गर्मी हो गयी थी ! लेकिन हमें बहुत अधिक प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ी ! जल्दी ही वे लोग भी आ गए और हमारा कारवाँ चल पड़ा समरकंद की सड़कों पर उन ऐतिहासिक इमारतों को देखने के लिए जो सदियों से अपना मस्तक उठाये बड़ी शान से आज भी खड़ी हुई हैं !
समरकंद दो हज़ार सात सौ साल पुराना शहर है ! अगर हम इसकी प्राचीनता का आकलन करें तो यह बेथलीहैम और रोम का समकालीन शहर है ! अमीर तैमूर ने इस शहर को अपनी राजधानी बना कर इसमें एक से बढ़ कर एक खूबसूरत इमारतों और भवनों को बनाने की परम्परा डाली जिसके लिए धन उसने टर्की, ईरान, भारत व अन्य अनेकों देशों में अपने वृहद् लूट के अभियानों द्वारा संचित किया ! इसके पूर्व इस शहर को चंगेज़ खान और सिकंदर ने हमला करके एक तरह से ध्वस्त ही कर दिया था ! तैमूर जितना बहादुर और महत्वाकांक्षी था उतना ही वह क्रूर और निरंकुश भी था ! उसने दो करोड़ निरपराध लोगों की बड़ी बर्बरतापूर्वक हत्या की थी ! उसके नाम का अर्थ ही है ‘फौलाद’ ! वह फौलाद सा ही कठोर और भावना शून्य था ! भारत में उसके द्वारा की गयी दिल्ली की लूट और नृशंस कत्ले आम इतिहास के काले पन्नों में दर्ज़ है ! उसने अनेकों लड़ाइयाँ बड़ी बहादुरी से लड़ीं और विश्व में अपने वर्चस्व का झंडा गाढ़ दिया ! समरकंद का पुनर्निर्माण कर इसे भव्य और सुन्दर बनाया ! इसीलिये बाकी दुनिया वाले उसके बारे में जो भी सोचें या कहें तैमूर को उज्बेकिस्तान में बड़े ही आदर और सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है ! उसका एक पैर युद्ध में स्थायी रूप से चोटिल हो गया था इसलिये वह लंगड़ा कर चलता था ! भारत में उस आतातायी को ‘तैमूर लंग’ के नाम से पुकारते हैं लेकिन समरकंद में उसे बड़े आदर मान के साथ ‘अमीर तैमूर’ कहा जाता है ! वर्तमान में समरकंद शहर प्राचीन युग की भव्य इमारतों और आधुनिक ज़माने के शहरीकरण और मनमोहक साज सज्जा का अनोखा सम्मिश्रण है !
समरकंद की साफ़ सुथरी चौड़ी-चौड़ी सड़कों पर हमारी बस हौले-हौले चल रही थी ताकि हम खिड़की से शहर की खूबसूरती का लुत्फ़ उठा सकें ! मुझे शहर के सड़कों के दोनों और सुन्दर फूलों से सजे गमलों के स्टैंड बहुत ही आकर्षक लगे ! ये स्टैंड्स लोहे के थे और इनमें किसी में तीन किसी में चार पाँच किसी में छ: सात गमले बने हुए थे जिनमें बड़े ही आकर्षक फूल खिले हुए थे ! यह आइडिया मुझे बहुत अच्छा लगा ! अलग अलग शेप्स और साइज़ में ये स्टैंड्स ज़मीन में गढ़े हुए थे जिनमें कम जगह में ही रंग बिरंगे खूबसूरत फूलों के कई गमले आ गए थे और वातावरण को खुशनुमां और सुरभित बना रहे थे ! चलती बस से फोटो लेना संभव नहीं हो पा रहा था लेकिन अपने मन में मैंने इनकी फोटो सहेज ली थी !
सबसे पहला स्थल जो हमने देखा वह था रेगिस्तान रोड पर स्थित अमीर तैमूर स्क्वेयर जहाँ अमीर तैमूर की एक बहुत विशाल एवं भव्य प्रतिमा एक बड़े से चबूतरे पर रखी हुई है ! उसकी नक्काशी और जीवंत भाव भंगिमा देखते ही बनती है ! उसका जालीदार मुकुट, उसकी पोशाक की सिलवटें और उसका बॉर्डर, उसकी कामदार जूती सब देखने लायक हैं ! उसने किसी युद्ध में अपना दाहिना पैर घुटने के नीचे से गँवा दिया था ! यहाँ भी मूर्ति का एक ही पैर बना हुआ है ! इस स्थल पर भी सबने अमीर तैमूर की मूर्ति के साथ खूब तस्वीरें खीचीं और खिंचवाईं ! यहाँ का हॉल्ट छोटा ही था ! हम लोग बस में बैठ कर चल पड़े तैमूर के मकबरे की ओर !
तैमूर के मकबरे को गुर ए आमिर भी कहा जाता है ! अंग्रेज़ी में इसका नाम तैमूर मुसोलियम है ! मध्य युगीन स्थापत्य और कलाकारी का यह अद्भुत नमूना है ! सन १४०३ में इसका निर्माण कार्य आरम्भ हुआ था ! अमीर तैमूर ने अपने सर्वाधिक प्रिय पोते मुहम्मद सुलतान के लिए इसे बनवाया था जिसकी मृत्यु २७ वर्ष की अवस्था में किसी युद्ध में लड़ते हुए हो गयी थी ! लेकिन बाद में यह तैमूर के परिवार के कई सदस्यों की अंतिम ख्वाबगाह बन गया ! तैमूर के दोनों बेटे शाहरुख और मीरान शाह, दोनों पोते मुहम्मद सुलतान और उलुगबेग, स्वयं अमीर तैमूर और उनके परिवार के धर्म गुरु सैयद बारक्का को भी इसी मुसोलियम में दफनाया गया !
इसकी भव्य अष्टकोणीय इमारत और ऊपर की बहुत ही खूबसूरत गुम्बद देखते ही बनती है ! अष्टकोणीय इस चेंबर में चारों तरफ दीवारों पर अत्यंत सुन्दर इनले वर्क हो रहा है ! इसका प्रवेशद्वार एक बेहद प्राचीन और बहुत ही खूबसूरत नक्काशी वाला लकड़ी का दरवाज़ा है जिसे उलुगबेग ने १५ वीं सदी में बनवाया था ! गुम्बद में ६४ रिब्स हैं जो पैगम्बर मोहोम्मद साहेब के जीवन काल के चौंसठ वर्षों की प्रतीक हैं ! अमीर तैमूर की कब्र पर गहरे हरे रंग का जेड (पन्ना) पत्थर रखा हुआ है जिसके बारे में कहा जाता है कि यह विश्व का सबसे बड़ा जेड स्टोन है ! इसकी कहानी भी बड़ी रोचक है ! तैमूर के पोते उलुगबेग ने १५ वीं सदी में इसे मुगलिस्तान से लाकर अपने दादा जी की कब्र पर लगाया था ! कहते हैं कि इस पत्थर में उस वक्त जादुई शक्तियाँ थीं ! चीन में पहले इसकी पूजा हुआ करती थी फिर यह चंगेज़ खान के उत्तराधिकारी चुगताई खान के सिंहासन के रूप में प्रयोग में लाया जाने लगा वहाँ से लूट कर उलुगबेग इसे समरकंद ले आया और अपने दादा तैमूर की कब्र पर लगा दिया ! बाद में १७ वीं शताब्दी में नादिर शाह ने जब समरकंद पर आक्रमण किया तो इस पत्थर को उखाड़ कर वह अपने साथ ले गया और उसने अपने सिंहासन के सामने इसे एक सीढ़ी की तरह उपयोग में लाने के लिए लगा दिया ! लेकिन इसके बाद ही नादिर शाह पर विपत्तियों का सिलसिला शुरू हो गया और उसके बुरे दिन आ गए ! तब लोगों ने उसे सलाह दी कि ये सारी मुसीबतें इस पत्थर की वजह से आ रही हैं और उसे यह पत्थर वापिस समरकंद ले जाकर तैमूर की कब्र पर रख देना चाहिए ! नादिर शाह इसे समरकंद ले जाने के लिए तैयार हो गया ! लेकिन समरकंद ले जाते वक्त यह पत्थर एक दुर्घटना में टूट गया ! इस पत्थर पर अरबी भाषा में लिखा हुआ है “जब मुझे किसी मृतक के ऊपर से हटाया जाएगा तो सारा संसार थर्रायेगा !”
तैमूर के इसी मुसोलियम के कॉम्प्लेक्स में भव्य प्रवेश द्वार के अलावा एक मदरसा और एक खानका भी था ! खानका में उन दिनों प्रिंस मुहम्मद सुलतान का परिवार रहा करता था ! मकबरे की बड़ी खूबसूरत चार मीनारें थीं ! लेकिन अब वहाँ देखने योग्य बस विशाल एवं भव्य प्रवेश द्वार, मकबरा और दो मीनारें ही बची हैं ! खानका, मदरसा और दो मीनारें ध्वस्त हो चुकी हैं ! इसके कोर्टयार्ड में एक बड़ा सा पत्थर रखा हुआ है जो उस ज़माने में सुल्तानों के गद्दीनशीन होने के वक्त काम में लाया जाता था !
आजकल यहाँ मकबरे के पीछे के खंडहरों में पर्यटकों की दिलचस्पी के सोवेनियर्स, कपडे, स्कार्फ, पर्स, फ्रिज मैगनेट आदि सामान बिकते हैं !
तैमूर मुसोलियम का कॉम्प्लेक्स काफी बड़ा है ! वाश रूम्स भी हैं जो काफी दूरी पर हैं ! एक बार उसे इस्तेमाल करने के लिए एक हज़ार सोम की फीस चुकानी पड़ती है ! भारत में दो रुपये पाँच रुपये सुनने के आदी कान एक हज़ार सोम सुन कर झनझना गए ! लेकिन देना तो थे ही ! उस समय कौन एक्चेंज रेट का हिसाब लगाता है ! ऐसा लगा कहीं ठगे तो नहीं जा रहे ! लेकिन थोड़ी देर बाद ही सब भूल गये ! ग्रुप के सभी लोग शायद बाहर चले गये थे ! अलका चौधरी जी हमारे साथ थीं ! हम बाहर निकले तो कोई भी दिखाई नहीं दे रहा था ! न बस ना ही ग्रुप के सदस्य ! अभी तक किसी होटल में भी नहीं रुके थे कि वहीं से कुछ पता लगाने का प्रयास करते ! धीरे-धीरे हम उसी दिशा में चल पड़े जहाँ बस ने उतारा था ! दूर तक कहीं कोई दिखाई नहीं दे रहा था ! स्थानीय निवासी सिर्फ इशारों में बात समझते थे ना वो हिन्दी जानते थे ना अंग्रेज़ी ! और उनसे पूछते भी क्या जब स्वयं हमें ही अपना पता ठिकाना मालूम न था ! माथे पर चिंता की लकीरें उभरने लगी थीं ! तभी सड़क किनारे के हरे भरे उद्द्यान में कुछ भगवा रंग की झलक सी दिखाई दी ! यह रंग जाना पहचाना सा लगा ! हमारे ग्रुप के ही डॉ. स्वामी विजयानंद जी ऐसे ही भगवा परिधान पहनते हैं ! उनके पीछे हमने दौड़ लगा दी तो ग्रुप के और सदस्य भी दिखाई दिये और पास में बस भी दिखाई दे गयी ! हमारी जान में जान आई ! भटकते-भटकते बच गए ! सब हम लोगों का ही इंतज़ार कर रहे थे ! मन कृतज्ञता से भर आया !
चलिए आप भी आराम करिए अब ! बहुत रात हो चुकी ! अगले स्थानों की सैर अगले अंक में ! तो चलती हूँ ! श्रंखला की इस कड़ी के लिखने में बड़े व्यवधान आ गए थे तो देर हुई लेकिन अब अगली कड़ियाँ जल्दी जल्दी आयेंगी यह वादा रहा ! आप साथ में चल तो रहे हैं ना मेरे ?
साधना वैद

4 comments:

  1. हाँ दी, मैं पढ़ रही हूँ। अभी समय की कमी से टिप्पणी नहीं कर पा रही।

    ReplyDelete
    Replies
    1. हार्दिक आभार आपका मीना जी ! दिल से शुक्रिया !

      Delete
  2. सुप्रभात
    शानदार लेख |मैंने आपकी आँखों से पूरा समरकंद देख लिया बहुत जीवंत वर्णन किया है |

    ReplyDelete
    Replies
    1. हार्दिक धन्यवाद जीजी ! यह अभी आधा समरकंद घूमा है आपने ! अगली कड़ी में पूरा होगा ! फेसबुक पर पढ़ लीजिये ! वहाँ अगली कड़ी पोस्ट कर दी है मैंने !

      Delete