Thursday, August 13, 2020

घटायें सावन की

 

घटायें सावन की
सिर धुनती हैं
सिसकती हैं
बिलखती हैं
तरसती हैं
बरसती हैं
रो धो कर
खामोश हो जाती हैं
अपने आँसुओं की नमी से
धरा को सींच जाती हैं
हज़ारों फूल खिला जाती हैं
वातावरण को
महका जाती हैं
और सबके होंठों पर
भीनी सी मुस्कान
बिखेर जाती हैं !

साधना वैद

10 comments:

  1. उम्दा अभिव्यक्ति |

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद ओंकार जी ! हृदय से आभार !

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  3. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" सोमवार 17 अगस्त 2020 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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    1. आपका हृदय से बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार यशोदा जी ! सप्रेम वन्दे !

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  4. वाह बहुत सुंदर।बिलखती है,तरसती है,बरसती है और को धोकर समाप्त हो जाती है ।बहुत सुंदर सखी।

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    1. हार्दिक धन्यवाद सुजाता जी ! बहुत बहुत आभार आपका !

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  5. दूसरों के चेहरों पर मुस्कान लाने के लिए खुद का अस्तित्व मिटा डालती हैं !

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    1. हार्दिक धन्यवाद गगन जी ! आभार आपका !

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  6. क्या बात है !! सुंदर रचना साधना जी ! घटाओं का रुदन धरती पर वैभव की सौगात लेकर आता है | सस्नेह शुभकामनाएं और प्रणाम |

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