Monday, August 22, 2022

आगरा – महारानी विक्टोरिया और मुंशी अब्दुल करीम की कहानी

 



ईंटों पत्थरों की, गुमनाम भूली बिसरी इमारतों की और इतिहास के पन्नों में दफन अनजान अपरिचित लोगों की कहानियाँ सुन सुन कर आप निश्चित तौर पर बोर हो गए होंगे ! चलिए आज ज़रा हट कर आपको एक ऐसी कहानी सुनाती हूँ जो सच भी है और एक बहुत ही मशहूर विश्व प्रसिद्ध राजघराने से जुडी होने के कारण बहुत ही संवेदनशील और रोमांचक भी है ! यह कहानी है अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में आगरा के जेल में काम करने वाले एक मामूली से मुलाजिम अब्दुल करीम की और उन दिनों ब्रिटेन के राजघराने की सबसे महत्वपूर्ण और विश्व की सबसे चर्चित और सम्माननीय हस्ती रानी विक्टोरिया की !
जी हाँ आपसे सुनने में कोई भूल नहीं हुई है ! इस कहानी के मुख्य पात्र हैं उन दिनों आगरा की जेल में तैनात ललितपुर के हाफ़िज़ मोहोम्मद वज़ीरुद्दीन का बेटा अब्दुल करीम और इंग्लैण्ड की महारानी क्वीन विक्टोरिया, जिनकी अंतरंगता ने उस समय इंग्लैण्ड के राजघराने में भूचाल ला दिया था और क्वीन विक्टोरिया का समूचा परिवार उनके ही विरुद्ध खडा हो गया था ! है ना कहानी दिलचस्प ! इस कहानी पर तो एक फिल्म भी बनी है जिसका नाम है ‘विक्टोरिया एंड अब्दुल – द मुंशी’ !
तो किस्सा कुछ इस प्रकार है कि १८५७ के ग़दर के कुछ सालों बाद ईस्ट इंडिया कंपनी का ब्रिटेन राज में विलय हो गया और भारत पर इंग्लैण्ड का आधिपत्य हो गया ! उन दिनों इंग्लैण्ड में क्वीन विक्टोरिया का राज था जिन्होंने बड़ी सहृदयता के साथ भारत की स्थिति का आकलन किया और अंग्रेजों के द्वारा किये गए अन्याय एवं अत्याचारों का भी सूक्ष्म दृष्टि से विश्लेषण किया ! १ मई सन १८७६ को महारानी विक्टोरिया ने ‘एम्प्रेस ऑफ़ इंडिया’ की उपाधि को विधिवत अपनाया ! अब इन्हें भारत देश की संस्कृति, जीवन शैली और भाषा भूषा में दिलचस्पी होने लगी और इसके बारे में और अधिक गहनता से जानकारी प्राप्त करने की उन्हें इच्छा जागृत हुई !
सन १८८७ में इंग्लॅण्ड में महारानी विक्टोरिया के शासनकाल का जुबिली सेलीब्रेशन बड़ी धूमधाम से मनाया जाने वाला था ! इस अवसर पर महारानी विक्टोरिया को उपहार देने के लिए भारत में एक सोने की मोहर को ढाला गया और यह तोहफा उन तक पहुँचाने के लिए बड़ी सरगर्मी के साथ एक लम्बे छरहरे बाँके जवान की तलाश की जाने लगी ! यह तलाश आगरा में समाप्त हुई जहाँ की जेल में एक लंबा खूबसूरत नौजवान मुलाज़िम की तौर पर काम करता था और जिसका नाम था अब्दुल करीम ! उन दिनों भारत में तैनात गवर्नर जनरल ने इस काम के लिये अब्दुल करीम को मोहोम्मद नाम के एक और मुसलिम व्यक्ति के साथ समुद्र के रास्ते इंग्लैण्ड के लिए रवाना कर दिया ! यह घटना सन १८८७ की है ! इंग्लैण्ड के राजघराने के इतने विशिष्ट और भव्य उत्सव में महारानी के सामने जाना कोई साधारण बात नहीं थी ! कुछ पलों की इस क्रिया को अंजाम देने के लिए अब्दुल करीम को शाही शिष्टाचार की औपचारिकताओं की हिदायतों, कठोर अनुशासन की बंदिशों और तनिक सी भी भूल न होने देने की चेतावनियों से गुज़रना पडा ! उन्हें सख्त हिदायत दी गयी थी कि तोहफा देते समय वे अपनी निगाहें नीची ही रखें और भूल कर भी महारानी के चेहरे को देखने का प्रयास न करें ! कार्यक्रम में भोज के उपरान्त जैसे ही वह प्रतीक्षित घड़ी आई और अब्दुल करीम ने उपहार देने के लिए महारानी के सामने मोहर का डिब्बा आगे बढ़ाया महारानी को उस समय शायद झपकी आ गयी थी ! जब महारानी ने कोई प्रतिक्रया नहीं दी तो अब्दुल करीम खुद को रोक नहीं पाए और उन्होंने अपनी नज़रें उठा कर महारानी के चहरे का दीदार कर लिया ! जैसे ही उनकी नज़रें मिली और वो मुस्कुराए तो प्रत्युत्तर में महारानी भी मुस्कुरा दीं ! अब्दुल करीम को तुरंत ही वहाँ से हटा दिया गया !
अगले दिन महारानी विक्टोरिया से जब भारत से आये उपहार के बारे में पूछा गया तो उन्होंने अब्दुल करीम के बारे में अपनी जिज्ञासा प्रकट की और उन्हें अगले दिन के भोज में बतौर वेटर काम पर बुलाने का फरमान जारी कर दिया ! अब्दुल करीम और मोहोम्मद को तुरंत भारत जाने से रोका गया और उन्हें अगले दिन के भोज में रानी व उनके मेहमानों को पुडिंग सर्व करने का काम सौंपा गया ! अब्दुक करीम सहर्ष इस कार्य के लिए तैयार हो गए ! पार्टी में पुडिंग सर्व करने के समय उन्होंने बड़ी श्रद्धा के साथ महारानी विक्टोरिया के पैरों को चूम लिया ! महारानी इस बात से बहुत प्रसन्न हुईं !
धीरे धीरे अब्दुल करीम के प्रति महारानी विक्टोरिया की दिलचस्पी और रुझान बढ़ता जा रहा था ! अब्दुल करीम एक पढ़ा लिखा नौजवान था ! उसे कुरआन की सारी आयतें कंठस्थ थीं और वह हिन्दी का भी बहुत अच्छा जानकार था ! रानी की दिलचस्पी भारतीय भाषाओं को सीखने में पहले से ही थी ! अत: यह दायित्व भी अब्दुल करीम को ही दे दिया गया और अब वह महारानी विक्टोरिया को हिन्दी व उर्दू भी सिखाने लगा ! ‘मुंशी’ की उपाधि भी महारानी विक्टोरिया ने ही उन्हें दी थी !
अपने पति अलबर्ट की मृत्यु के बाद महारानी विक्टोरिया बहुत एकाकी हो गयी थीं ! वो एक नर्म दिल और भावुक प्रकृति की महिला थीं ! लेकिन शाही राजघराने के कठोर नीति नियमों ने उन्हें और एकाकी बना दिया था जहाँ उनका जीवन बिलकुल मशीनी और संवेदनहीन सा हो गया था ! ऐसे में अब्दुल करीम के साथ बिताये गए पल उन्हें बहुत सुख दे जाते थे जिनमें वे एक सामान्य मानवी की तरह स्वयं को अनुभव कर पाती थीं ! लेकिन उनके बेटे एडवर्ड और राजघराने के अन्य लोगों को अब्दुल करीम के साथ महारानी की यह निकटता ज़रा भी रास नहीं आती थी ! कई बार इन बातों को लेकर महल में अनबन भी हुई लेकिन अब्दुल करीम पर महारानी की कृपा बनी रही ! उन्होंने अब्दुल करीम को एक लॉकेट भी उपहार में दिया जिसमें उनकी तस्वीर लगी हुई थी ! महारानी की अब्दुल करीम पर इस कृपा के कारण स्थिति इतनी विस्फोटक हो गयी थी कि राजघराने के लोग महारानी को मानसिक रूप से अस्वस्थ घोषित करने पर आमादा हो गए थे ! इस पर एक बार महारानी ने इस आशय का स्टेटमेंट भी दिया था कि वे बूढी हो सकती हैं, बीमार हो सकती हैं, लालची हो सकती हैं लेकिन पागल कभी नहीं ! महारानी को अपने गिरते स्वास्थ्य के साथ साथ अब्दुल करीम के भविष्य की भी चिंता हो गयी थी ! वे समझ रही थीं कि उनकी मृत्यु के बाद उनके परिवार के लोग अब्दुल करीम के साथ बहुत कठोरता से पेश आयेंगे ! इसीलिये उन्होंने करीम को भारत में कोई ज़मीन दिलाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा दिया ! अब्दुल करीम ने भी महारानी का साथ कभी नहीं छोड़ा और २२ जनवरी १९०१ में जब महारानी ने ८१ वर्ष की अवस्था में इस संसार से विदा ली उसके बाद ही वे भारत वापिस लौटे ! महारानी के बेटे एडवर्ड ने अब्दुल करीम पर बस इतनी मेहरबानी की कि सुपुर्दे ख़ाक करने से पहले सबसे आखीर में उन्होंने अब्दुक करीम को महारानी के अंतिम दर्शन करने की अनुमति दे दी और शव यात्रा में उन्हें भी शरीक होने की इजाज़त दे दी !
महारानी विक्टोरिया ने उन्हें समय समय पर जो उपहार दिये थे वो सब भी इंग्लैण्ड से भारत आते समय विक्टोरिया के बेटे और महल के पदाधिकारियों ने उनसे छीन लिये ! बस एक वही लॉकेट अब्दुल करीम की पत्नी किसी तरह से अपने साथ बचा कर ले आईं थीं जिसमें विक्टोरिया की तस्वीर लगी हुई थी ! भारत आने के बाद २० अप्रेल १९०९ को अब्दुल करीम का भी स्वर्गवास हो गया ! उनके परिवार के लोगों ने उन्हें आगरा में ही पंचकुइया कब्रिस्तान में उनकी पिता की कब्र के पास दफना दिया !
मुंशी अब्दुल करीम का मकबरा आगरा शहर के पंचकुइया कब्रिस्तान में स्थित है ! कदाचित उन दिनों में यह शहर के बाहर हुआ करता हो लेकिन अब तो यह शहर के बीचों बीच में स्थित है और शहर का प्रमुख महात्मा गाँधी मार्ग इसीके बगल से गुज़रता है ! मुंशी अब्दुल करीम का मकबरा देखने के लिए शाम के समय इस विशाल और पुरातन कब्रिस्तान में हम बड़े सम्हल सम्हल कर कदम रख रहे थे कि भूल से भी किसी कब्र पर असावधानी से हमारा पैर न पड़ जाए ! बीच में बनी पतली पतली पगडंडियों से गुज़रते हुए हम तो घंटों भटकते ही रहते अगर समय पर इस मददगार को ईश्वर ने हमारे पास भेज न दिया होता ! यह कब्रिस्तान बहुत पुराना है ! यहाँ हुमायूं के बेटे हिंडल की व मुग़ल काल के शाही घराने के कई सदस्यों की कब्रें हैं जिन पर फारसी में कुछ पंक्तियाँ भी लिखी हुई हैं ! कई कब्रें बहुत ही कलात्मक हैं और उनमें बड़ी सुन्दर नक्काशी हो रही है ! कई कब्रें बड़े से चबूतरे पर गुम्बद के नीचे बनी हुई हैं ! कई के आस पास छतरी जैसी भी बनी हुई है ! इसी कब्रिस्तान में मुगलकालीन एक बारादरी भी है जो बहुत ही खूबसूरत है !
मुंशी अब्दुल करीम की कब्र हरे रंग की है ! उस पर एक बड़ा सा बोर्ड भी लगा हुआ है जो इस बात की पुष्टि करता है कि वे महारानी विक्टोरिया के उस्ताद बन कर इंग्लैण्ड गए थे और महारानी के मित्र के तौर पर जाने जाते थे !
तो दोस्तों यह थी कहानी मुंशी अब्दुल करीम और इंग्लैण्ड की महारानी क्वीन विक्टोरिया की ! आशा है आपको ज़रूर अच्छी लगी होगी ! आज के लिए बस इतना ही ! मिलती हूँ जल्दी ही आपसे फिर किसी नयी जगह की तस्वीरों और कहानी के साथ ! तब तक के लिए विदा दीजिये !
अन्य तथ्यपरक जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर अवश्य क्लिक करें !
और हाँ अगर आपको दिलचस्पी हो तो आपके लिए मैं महारानी विक्टोरिया और ब्दुल करीम के जीवन पर बनी फिल्म, 'विक्टोरिया एंड अब्दुल - द मुंशी', के ट्रेलर की लिंक भी दे देती हूँ ! जब भी समय मिले इसे देखिएगा ज़रूर !
साधना वैद



9 comments:

  1. मेरे लिए तो ये आर्टिकल एक दम नए लगते हैं क्यों कि इतनी बार आगरा देखा है ये ने स्पॉट्स तो देखे ही नहीं |

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  2. बहुत ही रोचक जानकारी

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  3. सच में कहानी राजघराने और एक मामूली काम करने वाली की होने से बड़ी रोचक तो है साथ में मानवीय संवेदनाओं से भी ओत-प्रोत हैं। बहुत सुन्दर

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    1. हार्दिक धन्यवाद कविता जी ! यह सत्य कथा है ! आप इस पर बनी फिल्म भी ज़रूर देखिएगा ! आपको अवश्य आनंद मिलेगा !

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  4. रोचक जानकारी।

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    1. जी विश्वमोहन जी ! यह अद्भुत किन्तु सत्य कथा है ! आपका बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार !

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  6. रोचक जानकारी

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    1. हार्दिक धन्यवाद केडिया जी ! बहुत बहुत आभार आपका !

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