Friday, April 24, 2026

मूँगफली पुराण

 



कितनी फुर्सत से रचा, प्रभु ने यह उपहार

सजे हुए हैं खोल में, दाने सुंदर चार !

दाने सुंदर चार, ईश की लीला न्यारी 

लगते कितने स्वाद, धरा पर कूड़ा भारी !

कहे साधना आज, बात तो है बस इतनी 

प्रभु ने यह उपहार, रचा फुर्सत से कितनी ! 


बैठे महफिल में सभी, छेड़ रहे हों राग

मूँगफली हों सामने, खुल जायेंगे भाग !

खुल जायेंगे भाग, बड़ी गुणकारी मेवा 

भर-भर बाँटो आज, करो तुम सबकी सेवा 

कहे साधना आज, “अजी तुम काहे ऐंठे 

चलो बढ़ाओ हाथ, रहो ना गुमसुम बैठे !” 


भावे सबको कुरकुरी, स्वाद मिले भरपूर

हाथ रुके ना एक पल, होय न पैकिट दूर !

होय न पैकिट दूर, मज़ा हो जाए दूना 

खाते जाएं दोस्त, लगे कितना भी चूना

कहे साधना आज, न कोई उठ के जावे

मूँगफली के साथ, मसाला सबको भावे ! 


होकर तन्मय देखते, परदे पर है चोर 

अँधियारे में सब सुनें, चटर पटर का शोर !

चटर पटर का शोर, कहीं गिर जाए दाना 

होता मन बेचैन, ढूँढ कर उसको लाना 

कहे साधना आज, दुखी हैं दाना खोकर  

मिल जाए तब फिल्म, देखते तन्मय होकर !  



साधना वैद 

2 comments:

  1. वह भाई, आपने मूँगफली जैसे साधारण चीज़ को इतना मजेदार बना दिया कि पढ़ते-पढ़ते ही भूख लगने लगी। महफिल वाला हिस्सा तो बिल्कुल अपने दोस्तों के साथ बैठने जैसा लगता है। हर लाइन में हल्की-फुल्की मस्ती और अपनापन दिखता है।

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    1. हार्दिक धन्यवाद आपका ! बहुत-बहुत आभार !

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