Tuesday, May 5, 2026

कुछ कहते हैं ये ताँका

 




ग़रीब तो हैं 

खुद्दार भी हैं हम

टूटते हैं तो

जानते है जुड़ना

गिर के खड़े होना !


मजदूर हैं 

मजबूर नहीं हैं

रच डालेंगे 

स्वेद की सियाही से

निज सौभाग्यनामा !


उठायें बोझ

सारे जग का हम

और हमारा ?

बोलो, कौन उठाये ?

सीने से चिपटाये ?

 

क्या दोगे तुम

          किताब या कुदाल ?         

खुशी या आँसू ?

खिलौने या फावड़ा?

जीवन या मरण ?


जाती बाहर 

रोटी की जुगत में

माँ काम पर   

मैं हूँ घर की रानी

करती चौका पानी !

 

हर चुनौती

आसान या मुश्किल

साध्य है मुझे !

नहीं स्वीकार अब

वर्चस्व पुरुषों का ! 


ओ मेरे मौला  

माथे पे गहराती

चिंता की रेख

सोने की कलम से

लिख नया सुलेख !


तू है महान

धरा से नभ तक

हर दिशा में

गुंजित तेरा गान

ओ माँ तुझे सलाम ! 


बोझ उठाते

नये घर बनाते

न जाने कैसे

हम बेघर हुए

खुद पे बोझ हुए !


चित्र - गूगल से साभार 


साधना वैद


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