फैला के पंख
उड़ चला विदेश
छोड़ के नीड़
प्रवासी पंछी
अनजान देश में
ढूँढे बसेरा
छूटे माँ बाप
छूटा कुल कुनबा
गाँव शहर
पंछी से तुम
जा बसे परदेश
रोक न पाए
कैसे बुलाएं
कौन जतन करें
कैसे बताएं
जोहती बाट
आजा मेरे दुलारे
हो रही रात
हुआ अँधेरा
डूब गया सूरज
घबराए माँ
आकुल हो वो
नीड़ से शाख तक
डोलती फिरे
नहीं आया वो
हुआ मन विदीर्ण
रो पड़ीं आँखें
हो गया सूना
एक माँ का जीवन
घर आँगन
प्रार्थना माँ की
रही अनसुनी सी
माँ घबराई
हुई उदास
नियति की छलना
रास न आई !
साधना वैद
चित्र - गूगल से साभार
आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर सोमवार 24 अगस्त 2026 को लिंक की गयी है....
ReplyDeletehttp://halchalwith5links.blogspot.in पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!
!