Monday, July 6, 2009

माँ

रात की अलस उनींदी आँखों में
एक स्वप्न सा चुभ गया है ,
कहीं कोई बेहद नर्म बेहद नाज़ुक ख़याल
चीख कर रोया होगा ।

सुबह के निष्कलुष ज्योतिर्मय आलोक में
अचानक कालिमा घिर आयी है ,
कहीं कोई चहचहाता कुलाँचे भरता मन
सहम कर अवसाद के अँधेरे में घिर गया होगा ।

दिन के प्रखर प्रकाश को परास्त कर
मटियाली धूसर आँधी घिर आई है ,
कहीं किसी उत्साह से छलछलाते हृदय पर
कुण्ठा और हताशा का क़हर बरपा होगा ।

शिथिल शाम की अवश छलकती आँखों में
आँसू का सैलाब उमड़ता जाता है ,
कहीं किसी बेहाल भटकते बालक को
माँ के आँचल की छाँव अवश्य मिली होगी ।

साधना वैद

2 comments:

  1. शिथिल शाम की अवश छलकती आँखों में
    आँसू का सैलाब उमड़ता जाता है ,
    कहीं किसी बेहाल भटकते बालक को
    माँ के आँचल की छाँव अवश्य मिली होगी ।
    बहुत सुन्दर भाव मयभिव्यक्ति है बधाई

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  2. सुन्दर भावाव्यक्ति!! बधाई.

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