Wednesday, June 30, 2010

रोज़ गार्डन और कुत्तों की सैर

शीर्षक आपको निश्चित ही अजीब लग रहा होगा लेकिन क्या किया जाए जब दो विशिष्ट प्रकार के अनुभव एक ही दिन एक के बाद एक हो जाएँ तो उन्हें अलग करने की भूल ना ही की जाए तो ही अच्छा है ना ! तो चलिए पहले चलते हैं रोज गार्डन में !
सेनोज़े की एक बेहद खूबसूरत लोकेलिटी में नैगली एवेन्यू स्ट्रीट पर यह रोज गार्डन स्थित है ! जैसे-जैसे उसके पास गाड़ी पहुँच रही थी हवा का हर झोंका और सुरभित और मादक होता जा रहा था ! बहुत ही साफ़ सुथरी जगह ! ना कहीं शोर शराबा ना आइसक्रीम, चना जोर गरम, गोलगप्पे या गुब्बारे वालों का जमघट ना आदमियों की भीड़भाड़ ! लेकिन सड़क पर करीने से कारों की लंबी कतार पार्किंग में लगी हुई थी ! अच्छा भी लग रहा था और आश्चर्य भी हो रहा था ! भारत से अमेरिका आने पर शुरुआती दिनों में ऐसे छोटे-छोटे सुखद शॉक अक्सर लोगों को लगते हैं ! फिर वे जब इस शांत और सौन्दर्यपूर्ण वातावरण को आत्मसात कर उसकी आदत डाल उसमें आनंद खोजने लगते हैं तो भारत लौटने पर उन्हें इससे भी बड़े कई दुखद शॉक लगते हैं जिनके साथ ताल मेल बिठाने में उन्हें अधिक तकलीफ होती है ! खैर ! मैंने यह तय किया है कि तुलना नहीं करूंगी ! हमारा देश फिर हमारा ही देश है ना ! दूसरे के लॉन की हरियाली को देख कर क्या खुश होना !
तो चलिए रोज गार्डन के अंदर चलते हैं ! बेहद सुन्दर और व्यवस्थित ढंग से सुनियोजित हर क्यारी के गुलाब अपने अनुपम सौंदर्य और सौरभ से अपनी और आकर्षित कर रहे थे ! गेट पर छोटे-छोटे गुलाबी गुलाबों की बेल चढ़ाई गयी है जो फूलों से लदी हुई थी ! अंदर प्रवेश करते ही कुछ दूरी पर एक दिलकश पानी का फव्वारा आमंत्रित करता सा बहुत ऊँचाई तक अनवरत पानी की फुहार फेंकने में व्यस्त था ! गार्डन में हर रंग के गुलाबों की अलग-अलग क्यारियाँ हैं ! फूलों का साइज़ देख कर मन मुग्ध हो गया ! सुर्ख लाल, सफ़ेद, पीले, गुलाबी, पीच, नारंगी रंगों के गुलाबों की विस्तृत क्यारियां सामने पसरी हुई थीं और हम सब उनकी सुगंध, उनकी खूबसूरती और उनके आकार को मंत्रमुग्ध से देखे जा रहे थे ! इनके अलावा कई किस्म के शेडेड गुलाबों की वैराइटी भी यहाँ देखने को मिल जाती हैं ! बच्चे भाग-भाग कर यहाँ वहाँ कुलाँचे भरते रहे ! और हम हर फूल, हर क्यारी को कैमरे में कैद करने की कोशिश में सही एंगिल की तलाश में जगह बदलते रहे ! गुलाबों की हज़ारों किस्मों के अलावा बाग में अनेकों प्रकार के फलों के पेड़ हैं जो उस समय फलों से लदे हुए थे ! आडू, खुबानी, नीबू, टैंजरीन आदि प्रमुख हैं ! रोज गार्डन के पीछे की तरफ बहुत विशाल मैदान जैसा है जो करीने से कटी हुई दूब की हरीतिमा से हुल्साया सा लग रहा था ! इसे लोग अक्सर बर्थडे, शादी, विवाह आदि की पार्टीज के लिए भी बुक कर लेते हैं !
रोज गार्डन एक बहुत ही खूबसूरत रिहाइशी इलाके में स्थित है ! यहाँ के सारे मकान विक्टोरियन आर्किटेक्ट के अनुपम उदाहरण हैं ! और यहाँ शहर के अति विशिष्ट और धनाढ्य लोग रहते हैं ! रोज गार्डन की सैर यादगार रही ! बाहर निकलने पर कुछेक वृद्ध शौक़ीन लोग अपने कुत्तों को सैर कराने के लिए सड़क के किनारे बने ख़ूबसूरत फुटपाथ पर टहलते हुए दिखाई दिये ! यह भी एक दिलचस्प नज़ारा था ! ताज्जुब हुआ कि कि कुत्ते कितने अनुशासन के साथ अपने मालिकों के साथ चल रहे थे ! कहीं कोई जोर ज़बरदस्ती या डाँट फटकार की आवाज़ नहीं ! मालिक किसी से बात करने के लिये रुक जाये तो कुत्ता भी शांति से आस पास के नजारों में व्यस्त हो जाता ! कुत्ते के गले में बँधी रस्सी के छोर और मालिक के हाथ में पकडे हुए दूसरे छोर में पर्याप्त ढील होती ! अपने यहाँ भी लोगों को देखा है सडक पर कुत्तों को घुमाते हुए ! पता ही नहीं चलता कि मालिक कुत्ते को घुमा रहा है या कुत्ता मालिक को ! रस्सी से खिंचे हुए बस मालिक जी कुत्ते के पीछे हाँपते-काँपते दौड़ते हुए नज़र आते हैं ! और अगर कहीं सामने कोई दुश्मन दिखाई दे जाये तो मालिक को धूल चटाने में भी कुत्तेजी को कोई एतराज़ नहीं होता !
शहर की सफाई और रख रखाव के बारे में यहाँ के लोग कितने जागरूक और सतर्क हैं इसके कई किस्से मैंने बहू बेटे से सुने थे ! किसी संभावित घटना की प्रतीक्षा में उलझी अपनी उत्सुकता को मन में ही दबाये मेरी नज़रें उन लोगों का ही पीछा कर रही थीं ! कि एक जगह कुत्ते ने अपना काम कर दिया ! सड़क बिलकुल खाली थी ! मैंने कुछ दुष्टानंद के साथ खोजी नज़रें बेटे पर डालीं ! मेरे मन में उठती जिज्ञासा को भाँप कर वह मुस्कुराया, "अभी देखती जाओ !" और जो देखा वह सचमुच अप्रत्याशित था ! वृद्ध सज्जन ने झुक कर हाथ में पकडे हुए थैले में उस गन्दगी को उठाया और स्थान को साफ़ कर दिया ! वाकया सचमुच आँखें खोलने वाला था ! हमारे यहाँ तो शायद कुत्तों को सड़क पर ले जाया ही इसीलिये जाता है कि अपना घर आँगन साफ़ रहे ! सड़क पर कुत्ते ही क्या गाय, भैंस, घोड़े, गधे, बकरी सूअर और भी ना जाने कौन कौन यहाँ तक कि ..........सबकी गंद दिखाई दे जाती है ! ऊप्स ! मैंने तय किया था कि तुलना नहीं करूँगी लेकिन क्या करूँ दिल है कि मानता नहीं ! माना कि हम अमेरिकन्स की तरह धनवान नहीं, माना कि हमारे पास इतने संसाधन और इतना व्यवस्थित परिवेश नहीं है लेकिन क्या अपने साधारण से परिवेश को साफ़ रखने में भी पैसे खर्च होते हैं ? हमारे पास परिकथाओं से सुंदर और मनोहर भवन ना हों चौड़ी-चौड़ी सड़कें ना हों लेकिन जो भी है क्या उसे हम कूड़े कचरे और विभिन्न प्रकार की गन्दगी से बचा कर साफ़ सुथरा नहीं रख सकते ! मेरे ख्याल से व्यवस्थित और स्वच्छ रहने के लिए पैसों की नहीं बल्कि अपनी आदतों को बदलने की ज़रूरत होती है और हमें इस ओर ध्यान देना ही चाहिये ! !

साधना वैद

8 comments:

  1. बदलाव की जरुरत है..निश्चित ही हम कर सकते हैं.

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  2. सुन्दर लेख...प्रेरणादायक

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  3. रोज़ गार्डेन की सैर तो बहुत ही मनभावन रही.
    साफ़-सफाई की बात आपने बिलकुल सही कही...सुबह मॉर्निंग वाक के लिए निकलो...और सड़क के किनारे बच बच कर चलो क्यूंकि लोग इसके पहले अपने कुत्तों को टहलाने के लिए लेकर आते हैं...मन क्षोभ से भर जाता है...इतना शौक है पालने का..फिर सफाई भी तो करें...हमारा देश गरीब ही सही.. ...पर अपने आस-पास साफ़ सफाई रखने में तो पैसे नहीं खर्च होते...ये मानसिकता बदलनी चाहिए.

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  4. बहुत सार्थक लेख है |बहुत अच्छा लगा |रोज़ गार्डन
    का वर्णन आँखों के सामने उसका चित्र दर्शाने में पूर्ण रूप से सक्षम है |
    बधाई

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  5. बीना शर्माJuly 1, 2010 at 4:32 PM

    बात तो सोलह आने ठीक है पर यह सब अपने देश मे रहते हुए क्यो नही कोन्धता ? सफाई तो हम भी रखते है पर मेरा -तेरा की भावना इस कदर हावी है कि सदक को गन्दा किया जा सक्ता है क्योकि वह सर्कारी है और घर हमारी निजी सम्पत्ति है ।
    आंखे खोल देने वाला आलेख ।सच मेन आपकी सूक्ष्म द्रष्टि की मै बहुत कायल हू ।

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  6. साधना जी हम कर तो बहुत कुछ सकते हैं मगर करते नही पश्चिम सभ्यता को कोसते हम थकते नही। मगर उनकी बुरी बातों की नकल कर लेते हैं अच्छी बातें पीछे छोड देते हैं। वहाँ बहुत कुछ अच्छा है कम बुरा। सार्थक पोस्ट हमे उनसे ऐसी बातें जरूर सीखनी चाहिये। धन्यवाद और शुभकामनायें

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  7. बहुत पहले एक आर्टिकल पढ़ा था अब्दुल कलाम जी का...बिलकुल कुछ ऐसी ही बात कही गयी थी..
    आपकी बात से वो सब याद आ गया.

    हम अपने देश की गंदगी पर और मुनिसिपलिटी पर रोते रहते है कभी ये नहीं सोचते की हम खुद कितने जिम्मेदार हैं.

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