Monday, July 30, 2012

भूल तो तुमसे भी हुई है


हे प्रभु
जब तुमने नारी को बनाया
तो क्यों उसे इतना कोमल
कमनीय बनाया कि
इस निर्मम संसार में
चहुँ ओर पसरे दरिंदों से
अपनी रक्षा करने में
वह कमज़ोर पड़ जाती है ,
और फिर जीवनपर्यंत एक
अकथनीय वेदना और
शर्मिंदगी के बोझ तले
अपने ही मन के गह्वर में
कहीं गहराई तक नीचे
गढ़ जाती है !
तुमने जब उसका
करुणा से ओत-प्रोत
अत्यंत कोमल ह्रदय
बनाया था तो साथ ही
उसमें हिमालय सा अटल
अडिग और वज्र सा कठोर
निर्णय लेने का हौसला भी
दिया होता ताकि वह
अविचलित हो
अपने अपराधियों का
सटीक न्याय कर पाती ,
और हर आताताई को
अपने समक्ष
घुटने टेकने के लिए
विवश कर पाती !
तुमने जब उसके नयनों में
बहाने के लिए    
अगाध प्यार, ममता और
करुणा का गहरा सागर
भर दिया तो उसके
नैनों के तरकश में
अनवरत रूप से चलने वाले
अक्षय अग्नेयास्त्र भी
क्यों नहीं भर दिये
कि वह हर पापी को उसके
पाप का दण्ड वहीं दे
न्याय कर पाती ,
और ऐसे कई असुरों को
अपने अग्निबाणों से
भस्म कर इस धरा को
पापियों से मुक्त कर पाती !  
तुमने जब संसार के
सबसे बड़े वरदान
मातृत्व का सुख उठाने के लिए
उसके शरीर में कोख बनाई  
तो क्यों नहीं उसके शरीर में
ऐसी शक्तिशाली
विद्युत तरंगें भी डाल दीं
कि गंदे इरादों से उसे स्पर्श
करने वालों को छूते ही
कई हज़ार वोल्ट का
झटका लग जाता  
और वह वहीं का वहीं
ढेर हो जाता ,
और यह संसार एक
हिंसक एवं आक्रामक
आदमखोर पशु के बोझ से
उसी वक्त हल्का हो जाता !

बोलो प्रभु
मानते हो ना
भूल तो तुमसे भी हुई है !
है ना?

साधना वैद  

Thursday, July 26, 2012

ऐ मेरे वतन के लोगों ज़रा आँख में भर लो पानी !

 

ऐ मेरे वतन् के लोगो! तुम खूब लगा लो नारा !
ये शुभदिन है हम सबका! लहरा लो तिरंगा प्यारा
पर मत भूलो सीमा पर! वीरों ने है प्राण गँवाए!
कुछ याद उन्हें भी कर लो -२! जो लौट के घर न आए -२
ऐ मेरे वतन के लोगो! ज़रा आँख में भरलो पानी!
जो शहीद हुए हैं उनकी! ज़रा याद करो क़ुरबानी |प|
जब घायल हुआ हिमालय! खतरे में पड़ी आज़ादी!
जब तक थी साँस लड़े वो! फिर अपनी लाश बिछादी
संगीन पे धर कर माथा! सो गये अमर बलिदानी!
जो शहीद हुए हैं उनकी! ज़रा याद करो क़ुरबानी |१|
जब देश में थी दीवाली! वो खेल रहे थे होली!
जब हम बैठे थे घरों में! वो झेल रहे थे गोली
थे धन्य जवान वो अपने! थी धन्य वो उनकी जवानी!
जो शहीद हुए हैं उनकी! ज़रा याद करो क़ुरबानी |२|
कोई सिख कोई जाट मराठा -२! कोई गुरखा कोई मदरासी -२!
सरहद पे मरनेवाला! हर वीर था भारतवासी
जो ख़ून गिरा पर्वत पर! वो ख़ून था हिंदुस्तानी!
जो शहीद हुए हैं उनकी! ज़रा याद करो क़ुरबानी |३|
थी खून से लथपथ काया! फिर भी बन्दूक उठाके!
दस-दस को एक ने मारा! फिर गिर गये होश गँवा के
जब अन्त समय आया तो! कह गये के अब मरते हैं!
ख़ुश रहना देश के प्यारो -२! अब हम तो सफ़र करते हैं -२
क्या लोग थे वो दीवाने! क्या लोग थे वो अभिमानी!
जो शहीद हुए हैं उनकी! ज़रा याद करो क़ुरबानी |४|
तुम भूल न जाओ उनको! Bold textइसलिये कही ये कहानी!
जो शहीद हुए हैं उनकी! ज़रा याद करो क़ुरबानी
जय हिन्द। जय हिन्द की सेना -२!
जय हिन्द, जय हिन्द, जय हिन्द||[3]
"Aye Mere Watan Ke Logo" (ऐ मेरे वतन के लोगों; "O! the people of my country!") is an Indian patriotic song written in Hindi by Kavi Pradeep and composed by C. Ramchandra commemorating Indian soldiers who died during the Sino-Indian War. It was famously performed live by Lata Mangeshkar in the presence of Prime Minister Jawaharlal Nehru at the Ramlila grounds in New Delhi on Republic Day (26 January) 1963, several months after the end of the war.[1] A copy of the soundtrack spool was also gifted to Nehru on the occasion. According to popular legend, Nehru was moved to tears by the song.
The lyrics of the song not only reflected Kavi Pradeep's sentiments but his nationalistic thinking of the country at large. With singer Lata Mangeshkar and composer C Ramchandra he brought tears to every eye including Nehru's.
None of the artists and technicians involved with the song — including singers, musicians, music director, lyricist, recording studio, sound recordist — charged for the song, and later, lyricist Kavi Pradeep pledged the royalty of the song to the 'War Widows Fund'

महान क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल की इन पंक्तियों को तोड़ने मरोड़ने की धृष्टता की क्षमा याचना के साथ ,

शहीदों की चिताओं पर लगेंगे किस बरस मेले
वतन पे मरने वालों का कभी कोई निशाँ होगा ?

कहीं ऐसा तो नहीं जिन शहीदों के बलिदान के लिए हमें कृतज्ञ एवं आभारी होना चाहिए हम उन्हें भुला बैठे हैं ! ज़रा अपना ह्रदय टटोल कर देखिये !

साधना वैद

Monday, July 23, 2012

जाग जाओ


  
मत डरो 
साहस जुटाओ
जाग जाओ !
 
बीन कंटक  
राह अपनी
खुद बनाओ !
हो सबल, 
अबला नहीं तुम
जान जाओ !
 
मुक्त होवो 
बेड़ियों को
काट डालो !
 
चल पड़ो
निज शस्त्र धारो
अरि हराओ !
 
मत भजो
देवी बनो खुद
असुर मारो ! 
 
भाल पर
चंदन रचा 
मस्तक सजाओ !

साधना वैद

Wednesday, July 18, 2012

आखिर कब !












कब तक तुम नारी को
सवालों के घेरे में
कैद करके रखोगे !
और उसके मुख से निकले
हर शब्द, हर आचरण की
शल्य चिकित्सा में
प्राण प्रण से जुटे रहोगे !  
देखो, तुम्हारे सवालों के
तीक्ष्ण बाणों ने
किस तरह उसके तन मन को
छलनी कर रख दिया है !
क्यों सदियों से उसे
उन गुनाहों का दण्ड
भुगतना पड़ रहा है
जिनके उत्तरदायी तो
कोई और थे लेकिन
जिनके परिमार्जन के लिये
भेंट उसे चढ़ा दिया गया !
वह चाहे सीता हो या कुंती,
पांचाली हो या प्रेम दीवानी मीरा
हर विप्लव का कारण
उसे ही ठहराया गया और
सबके क्रोध की ज्वाला में
झुलसना उसीको पड़ा !
परोक्ष में छिप कर बैठे
इन सभी दुखांत नाटकों के
सूत्र धारों के असली चेहरे
कोई पहचान न पाया
और शुद्धिकरण के यज्ञ में
आहुति उसीकी पड़ी !
क्यों आज भी अपने हर
गुनाह के धब्बों को  
पोंछने के लिये तुम्हें
एक स्त्री के पवित्र आँचल
की आवश्यकता पड़ती है ?
क्यों तुम दर्पण में
अपना चेहरा नहीं देख पाते ?
क्या सिर्फ इसलिए कि
बलिवेदी पर भेंट चढ़ाने के लिये
एक बेजुबान पशु के मस्तक की
व्यवस्था करना तुम्हारे लिये
बहुत आसान हो गया है ? 
आज भी शायद इसीलिये
हर शहर में, हर गाँव में
हर गली में, हर मोड़ पर
अपमान और ज़िल्लत की शिकार
सिर्फ औरत ही होती है
और इन सबके गुनाहगार
शर्मिंदगी की सारी कालिख
औरत के चेहरे पर पोत
अपने चेहरों पर शराफत और
आभिजात्य का मुखौटा चढ़ाये  
बेख़ौफ़ सरे आम घूमते हैं !
क्या आज की नारी भी
अपनी अस्मिता की रक्षा
करने में अक्षम है ?
कब वह अपने अंदर की
दुर्गा, काली, चंडिका और
महिषासुरमर्दिनी को जागृत
कर पायेगी और अपने  
चारों ओर पसरे असुरों का
संहार कर अपने लिए
एक भयमुक्त समाज की
रचना कर पायेगी ?
आखिर कब ?
   
साधना वैद

Monday, July 9, 2012

सुमित्रा का संताप
















नहीं समझ पाती जीजी
रक्ताश्रु तो मैंने भी
चौदह वर्ष तक तुमसे
कम नहीं बहाए हैं
फिर मेरे दुःख को कम कर
क्यों आँका जाता है ,
केवल इसीलिये कि
मैं राम की नहीं
लक्ष्मण की माँ हूँ
मेरे अंतर के व्रणों को
हृदयहीनता के स्थूल आवरण
के तले मुँदी हुई पलकों से
क्यों झाँका जाता है ?
बोलो जीजी
पुत्र विछोह की पीड़ा
क्या केवल तुमने भोगी थी ?
मैंने भी तो उतने ही
वर्ष, मास, सप्ताह, घड़ी, पल
पुत्र दरस का स्वप्न
आँखों में लिए
तुम्हारी परछाईं बन
तुम्हारे साथ-साथ ही काटे थे ना
फिर मेरी पीड़ा तुम्हारी पीड़ा से
बौनी कैसे हो गयी ?
वैधव्य का अभिशाप भी
अकेले तुमने ही तो नहीं सहा था ना
मैंने भी तो उस दंश की चुभन को
तुम्हारे साथ-साथ ही झेला था !
मेरे सुख सौभाग्य का सूर्य भी तो
उसी दिन अस्त हो गया था
जिस दिन कैकेयी की लालसा, ईर्ष्या
और महत्वाकांक्षा का मोल
महाराज दशरथ को
अपने प्राण गँवा कर
चुकाना पड़ा था !
फिर सारा विश्व कौशल्या की ही
व्यथा वेदना से आकुल व्याकुल क्यों है
क्या मेरी व्यथा वेदना किसी भी तरह
तुमसे कम थी ?
जीजी, राम की
भौतिक और भावनात्मक
आवश्यकताओं के लिये तो
उनकी संगिनी सीता उनके साथ थीं
लेकिन मेरे लक्ष्मण और उर्मिला ने तो
चौदह वर्ष का यह वनवास
नितांत अकेले शर शैया
की चुभन के साथ भोगा है !
वियोगिनी उर्मिला के
जीवन में पसरे तप्त मरुस्थलों की
शुष्कता, तपन और सन्नाटों की
भाषा को मैंने शब्द-शब्द पढ़ा है ,
और किसी भी तरह उन्हें
कम ना कर सकने की
अपनी लाचारी के आघात
को भी निरंतर अपने मन पर झेला है
फिर मेरी पीड़ा का आकलन
यह संसार कम कैसे कर लेता है ?
मेरा दुःख गौण और बौना
क्या सिर्फ इसीलिये हो जाता है
कि मैं मर्यादा परुषोत्तम राम
की माँ कौशल्या नहीं
उनके अनुज लक्ष्मण
की माँ सुमित्रा हूँ ?

साधना वैद

चित्र -- गूगल से साभार

Friday, July 6, 2012

चेहरे पर लिखी इबारतें


चेहरे की भाषा पढ़ना तो
वक्त शायद सबको ही सिखा देता है
लेकिन उसे पढ़ने के लिए
कम से कम चेहरे का
सामने होना तो ज़रूरी है !
लेकिन क्या मीलों दूर के
फासलों के साथ 
महज़ ख्यालों में ही
किसीके चेहरे का तसव्वुर कर
उस पर लिखी तहरीर को
पढ़ा जा सकता है ?
कैसे कोई जान सकता है
कब उमंग से छलछलाती,
व्यग्रता से उठती गिरती
पलकों के नीचे शनै: शनै:
हताशा की बदली घिर आती है
और आँखों से सावन भादों की
झड़ी बरसने लगती है ! 
 
कब चेहरे पर छाई मृदुल स्मित
की स्निग्ध रेखा विद्रूप की रेखा में
विलीन हो जाती है और
प्रिय मिलन की आस से
सलज्ज रक्ताभ चेहरा
अवश क्षोभ की आँच से तप
अंगार की तरह सुर्ख हो जाता है !
कब मन की हर कोमल भावना  
प्रीतम तक पहुँचाने को आतुर
अधरों की कँपकँपाहट धीरे-धीरे
निराशा के आलम में 
रुलाई के आवेग की थरथराहट में
तब्दील हो जाती है 
जिसे काबू में लाने के लिए
दाँतों का सहारा लेना पड़ता है !
फिर कैसे उदासी की
अपनी पुरानी चिर परिचित
पैबंददार चादर को ओढ़
चेहरे पर मौन का मुखौटा पहन  
आँखों को बाँहों से ढके वह
तकिये की पनाह में जाकर
इस बेदर्द बेरहम दुनिया से
बहुत दूर चले जाने का भ्रम
मन में पाल लेती है
और सबसे विमुख हो
अपने अतीत की वीथियों में
पलायन कर जाती है ! 
इतने लंबे फासलों के साथ
क्या इस अनुभव को
जिया जा सकता है ?  
क्या चेहरे पर हर पल
बदलती इन इबारतों को
पढ़ा जा सकता है ? 

साधना वैद

चित्र-गूगल से साभार !

Sunday, July 1, 2012

रुकी हुई ज़िंदगी













ठहरे हुए पलों में कैद
एक बेमानी बेमकसद
ज़िंदगी के सलीब को खुद
अपने ही कन्धों पर
ढोना पड़ता है ,
अगर ज़िंदा होने के अहसास
से रू ब रू होना हो तो
बीते दिनों की खुशबू और
यादों के घने वनांतर में
गहराई तक अंदर जा
खुद को ही नये सिरे से
खोना पड़ता है !

रंगीन तितलियों जैसे
जाने कितने सुखद पल
वक्त के बाजीगर की
जादूगरी से
नितांत खाली मुट्ठी में
अचानक से सिमट आते हैं ,
और ना जाने कितने
खूबसूरत मंज़र गगन में
दूर तक फ़ैले 
चाँद सितारों की तरह
मनाकाश पर छा जाते हैं !

वो छोटे से शहर की
पतली-पतली गलियों में  
सहेली को चलती
साइकिल पर बिठा
डबल सवारी चलाने की
कोशिश करना ,
और डगमगाते हैंडिल को
सम्हालते-सम्हालते
सहेली को भी गिराना
और खुद भी गिरना !  

फिर आस पास हँसते लोगों
की नज़रों से बचने की कोशिश में    
धीरे से नहीं बैठ सकती थी पागल
कह सहेली को झिड़कना ,
और जल्दी से कॉपी किताबें समेट
हवा की सी तेज़ी से
वहाँ से खिसकना ! 

वो हिन्दी के सर की
क्लास बंक कर
कॉलेज के गार्डन के कोनों में 
सखियों के संग
गपशप की चटपटी चटनी के साथ
समोसे पकौड़ों की पार्टी करना ,
और चुपके से कभी दुपट्टे में
तो कभी रिबन में गाँठ लगा
दो लड़कियों को
जी भर के तंग करना ! 

वो तीरथगढ़ और चित्रकूट
जलप्रपातों की सैर ,
वो इन्द्रावती का किनारा ,
वो बैडमिंटन और कैरम के मैच
वो कॉमन रूम में
सहेलियों का शरारत भरा इशारा !

मन के किसी कोने में
दबी छुपी ये यादें ही
आज की ठहरी ज़िंदगी को
रवानी देती हैं ,
और उम्रदराज़ होती
दिल की थकी हुई
लस्त तमन्नाओं को
जी उठने का
नायाब सलीका सिखा
फिर से नयी
जवानी देती हैं !


साधना वैद