Sunday, March 3, 2024

दो मुक्तक

 



मस्तक पर हिमगिरी हिमालय नैनों में गंगा यमुना

अंतर में हैं विन्ध्य अरावलि सुन्दर संस्कृति का सपना

मुट्ठी में बंगाल की खाड़ी और अरब सागर उत्ताल

भारत मेरा अपना है और मैं हूँ भारत का अपना !

 

जन्म लिया जिस माटी में हम क़र्ज़ उतारेंगे उसका

पाया जिसके कण कण से हम फ़र्ज़ निभायेंगे उसका

आँख उठा कर देखेगा यदि दुश्मन भारत माँ की ओर

पल भर की भी देर न होगी शीश काट लेंगे उसका !

 

 साधना वैद 


9 comments:

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    1. हार्दिक धन्यवाद हरीश जी ! आभार आपका !

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  2. देशभक्ति से ओतप्रोत सुंदर रचना

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    1. हार्दिक धन्यवाद अनीता जी ! आभार आपका !

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  3. Replies
    1. हार्दिक धन्यवाद आलोक जी ! बहुत बहुत आभार !

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  4. वाह!!!
    देशप्रेम की भावना के साथ लाजवाब मुक्तक।

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    1. हार्दिक धन्यवाद ! बहुत बहुत आभार आपका !

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  5. हार्दिक धन्यवाद यशोदा जी ! सप्रेम वन्दे !

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