गहरा सागर
उत्ताल तरंगें
कम्पित बदन
कूल न किनारा
घना अँधियारा
व्याकुल है मन !
लम्बी पगडंडी
दूर है मंज़िल
थके हुए पाँव
मुश्किल है जाना
ठौर न ठिकाना
ले चल तू गाँव !
विहँसती हवा
मुस्काता गगन
खिलते सुमन
कहते कान में
दिन क्यों ख़ास है
तू आसपास है !
चित्र - गूगल से साभार
साधना वैद
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