Sudhinama
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Saturday, August 1, 2015
बरसा सावन
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धरा नवोढ़ा डाले अवगुंठन प्रफुल्ल वदन तरंगित तन धारे पीत वसन उल्लसित मन विहँसती क्षण-क्षण ! उमड़े घन ...
Wednesday, March 4, 2015
सूर्य और धरा
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अपनी स्वर्ण रश्मियों की सुदीर्घ लेखनी से बालारुण जब उषा काल के इस बृह्म मुहूर्त में धरा क...
Saturday, January 10, 2015
सफ़ेद मछली
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छोटे से एक्वेरियम में बंद बेचैनी से चक्कर काटती उस सफ़ेद मछली को देखती रहती हूँ मैं अपलक ! कितनी छोटी सी थी जब मैं...
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