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Friday, September 11, 2026

ये धारावाहिक

 



कहाँ चल दिए जनाब? फोटो शूट के लिए जा रहे हैं? अरे वाह, टी वी धारावाहिक के लिए ऑडीशन की तैयारी कर रहे हैं, बहुत बढ़िया जनाब ! लेकिन आप तो बिलकुल चिकने-चुपड़े से जा रहे हैं फोटो शूट के लिए ! यहीं गच्चा खा जाएँगे ! ज़रा कुछ देर दर्पण के सामने हर तरह से रोते हुए अपनी तस्वीर देख लीजिये ! आजकल जैसा ट्रेंड चल रहा है धारावाहिकों का उसके अनुसार हीरो हीरोइन कहानी में हँसते कम हैं रोते ज्यादह हैं ! तो आपको इस बात का ख़याल रखना है कि हँसते हुए शक्ल अच्छी लगे या न लगे रोते हुए आपका चेहरा सुन्दर भी लगना चाहिए और प्रभावशाली भी तभी तो आपके अभिनय की धाक जमेगी ! हँसते हुए तो बदसूरत आदमी भी अच्छा लगने लगता है ! लेकिन रोते हुए खूबसूरत स्त्री-पुरुष दोनों को ही झेलना मुश्किल हो जाता है क्योंकि भावातिरेक में लोग इस बात पर ध्यान नहीं दे पाते कि इस समय उनका चेहरा दर्शनीय लग रहा है या नहीं लेकिन आपको इस बात का ध्यान ज़रूर रखना होगा ! धारावाहिक अगर पारिवारिक है तो यह तो तय है कि 30 मिनट के एपिसोड में आपको कम से कम बीस मिनट तो ज़रूर ही भयंकर टेंशन की एक्टिंग करनी होगी ! या तो आप गुस्से से मुट्ठियाँ भींच रहे होंगे, खाली कमरे में चीख-चीख सारे गुलदानों को और क्रॉकरी को फेंक-फेंक कर तोड़ रहे होंगे, या महिलाओं की तरह किसी के कंधे पर सर टिका कर फूट-फूट कर रो रहे होंगे ! तो भाईजान, फोटो शूट से पहले इन सारी सिचुएशंस में खुद को डाल कर आईने के सामने खुद को निरख ज़रूर लेना ! अगर आपकी शक्ल अच्छी लग रही है तब तो ठीक है वरना तो जो राम जी चाहें ! और यह बड़ी नफासत से शेव करके कहाँ चल दिए ! अपने मुखड़े पर कुछ हरियाली उगा लो तभी रोल में फिट हो पाओगे ! समझे जनाब ! आजकल चिकने-चुपड़े चॉकलेटी चेहरे और टीन एज लुक वाले हीरोज़ का ज़माना नहीं रहा ! अब तो देवदास की तरह दुखियारी लुक देने वाले और बात-बात में उबाल खाकर तोड़-फोड़ करने वाले एंग्री यंग मैन की छवि वाले नायकों का दौर है ! पहले सुना करते थे कि सच्चे मर्द किसीके सामने नहीं रोते लेकिन अब तो धारावाहिकों के नायक हमारी नायिकाओं से भी ज्यादह रोते हैं ! यों कहिये कि आधे घंटे के एपीसोड में कम से कम 20 मिनिट तो उन्हें रोना पड़ता ही है या आसमान फाड़ कर चीख-चीख कर भगवान् जी से जवाबतलब करना पड़ता है ! इन सारी बातों को अभिनय में उतारने के लिए बड़ी इनर्जी लगती है ! धारावाहिक में काम करना चाहते हो बरखुरदार तो पहले इन पैमानों पर खुद को परख कर देखो ! 

आजकल के धारावाहिकों में सबसे प्रशंसनीय जो बात देखने में आती है वह यह है कि ये वसुधैव कुटुम्बकम की अवधारणा को पूरी निष्ठा से निभाते हैं ! दोस्ती-दुश्मनी की परवाह बिलकुल नहीं करते ! अपने परिवार के परम शत्रु को सब जानते समझते हुए भी अपने घर में बुला कर ससम्मान रखते हैं और उनकी हर छोटी से छोटी ज़रूरत का पूरा ध्यान भी रखते हैं ! घर के सारे सदस्य उनके साथ पूरा शिष्टाचार निभाते हैं आखिर संस्कारों और पारिवारिक मूल्यों का सार्थक संदेश भी तो समाज को देना है ! वो और बात है कि हर बार संस्कारों के इस मिथ्या प्रदर्शन के बाद कलाकार को दाँत पीसते हुए भी दिखा दिया जाता है ! 

अतिथि बने हुए शत्रु दल के सभी सदस्य साधिकार पूरे घर के हर कमरे में किसी भी समय चहलकदमी करते रहते हैं किसी के भी कमरे से अलमारियाँ खोल-खोल कर ज़रूरी सामान और दस्तावेजों को चुराते रहते हैं और मेजबानों के खिलाफ निर्द्वंद्व होकर षड्यंत्र रचते रहते हैं ! घर के लोग इतने भोले-भाले मासूम होते हैं या कहिये बेवकूफ होते हैं कि शत्रु दल को अपने घर में रहने के लिए आमंत्रित करने के बाद और उसकी नीयत से भली प्रकार परिचित होने के बाद भी किसी तरह की सतर्कता और सावधानी नहीं बरतते ! न ज़रूरी कागजातों की जगह बदल कर उन्हें सुरक्षित स्थान पर रखते हैं, न अलमारी को लॉक करते हैं, न सोने से पहले अपने कमरे को ही अन्दर से बंद करते हैं ! जब उनके कमरे में चोरी हो रही होती है वो निश्चिन्त होकर सो रहे होते हैं ! अगर संयोग से आँख खुल भी गई तो चूहे बिल्ली की शरारत समझ पानी पीकर आराम से करवट बदलते हैं और फिर से सो जाते हैं ! यह भरोसे की पराकाष्ठा है या मूर्खता की, क्या कहा जाए ! लेकिन कमोबेश हर धारावाहिक में ऐसा ही होता है ! शत्रु घात पर घात करता है और सबको अपनी उँगलियों पर नचाता रहता है और घर वाले ‘अतिथि देवो भव’ के कथन को चरितार्थ करते हुए और खून का घूँट पीते हुए उसकी हर इच्छा, हर आज्ञा का पालन करते हैं क्योंकि वे संस्कार, सदाचार और शिष्टाचार की पक्की डोर से बँधे होते हैं ! और मज़े की बात यह होती है कि धारावाहिकों में सारे पड्यंत्रों की मास्टर माइंड स्त्रियाँ ही होती हैं ! सारे कुचक्र वे ही रचती हैं और उनका नेटवर्क इतना पावरफुल होता है कि घर के अन्दर बैठे-बैठे ही वे कहीं से भी किसी को किडनैप करा सकती हैं, किसी को ब्लेकमेल कर सकती हैं, किसीकी सुपारी किलर्स से ह्त्या करवा सकती हैं, किसी के घर या व्यवसाय केंद्र में आग लगवा सकती हैं या किसी को भी बम से उड़ा सकती हैं ! देश विदेश के सभी गुंडे बदमाश और डॉन माफिया टाइप के भाई लोगों के नम्बर्स उनके पास फोन में सेव्ड रहते हैं और सारे बदमाश उनके इशारों पर ऐसे नाचते हैं कि वे किसी साधारण से मध्यम वर्गीय परिवार की गृहणी न होकर किसी बड़े शक्तिशाली अपराधी गैंग की मुखिया हों ! नारी को दया, ममता, करुणा का पर्याय समझा जाता है लेकिन हमारे इन धारावाहिकों में ‘नारी’ के ऐसे वीभत्स रूप को स्थापित किया जाता है ! मुझे तो लगता है सोनम, सिया और उन जैसी यथार्थ जगत की तमाम स्त्रियों को अपराध करने के आइडियाज़ इन्हीं धारावाहिकों से मिले होंगे और अपने इरादों को इतनी क्रूरता और निर्ममता से अंजाम देने की प्रेरणा और प्रशिक्षण भी शायद यहीं से मिला होगा !  

एक यह ड्रामा भी खूब चलता है धारावाहिकों में कि जो सदाचारी है, सच्चा है, अच्छा है वह जीवन भर अपनी भलमनसाहत की कीमत चुकाता रहता है और हमेशा सब उसे धोखे देते हैं, उसका उत्पीडन करते हैं, उसका शोषण करते हैं और उसे निचोड़-निचोड़ कर उसका इस्तेमाल कर अपना घर भरते रहते हैं और वह सदाचारी चाहे नायक हो या नायिका सदैव स्वयं को थाली में परोस कर औरों के लिए उपलब्ध कराता ही रहता है ! बदले में उसे क्या मिलता है ? सबकी नफ़रत, अपमान, असफलता, निराशा और मोटे-मोटे आँसू ! ज़रा सोचिये चार दिन की ज़िंदगी की फिलोसॉफी में यकीन रखने वाले दर्शक अपना छोटा सा जीवन कभी ख़त्म न होने वाले संघर्ष और हताशा के हवाले क्यों करना चाहेंगे ? उनकी तो फ़िलोसॉफ़ी ही यह रहती है - 

चाहे कोई खुश हो चाहे गालियाँ हज़ार दे 

मस्तराम बनके ज़िंदगी के दिन गुज़ार दे ! 

तो धारावाहिक बनाने वालों का नैतिक मूल्यों की स्थापना का यह इरादा भी यहाँ इसलिए फेल हो जाता है कि उनका मूल्यों का वाहक किरदार पूरे वक्त संघर्ष करता है, असफल होता है, प्रताड़ित होता है और तकलीफें उठाता रहता है ! न उसे प्यार मिलता है, न सम्मान, न भरोसा, न भौतिक सुख और न ही खुशी ! तो ऐसे धारावाहिकों का क्या फ़ायदा ? 

सेंसर बोर्ड या जो भी विभाग इन धारावाहिकों को प्रसारण की अनुमति देता है वह इस तरफ ध्यान क्यों नहीं देता कि घर में अशांति, और कोलाहल तथा समाज में भय और नकारात्मकता फैलाने वाले ऐसे धारावाहिकों के निर्माण और प्रसारण पर प्रतिबंध लगना ही चाहिए ! स्वस्थ मनोरंजन देने वाले और ज्ञानवर्धन करने वाले उत्कृष्ट धारावाहिकों का निर्माण तो अब जैसे बंद ही हो चुका है ! सच तो यह है कि मनोरंजन का सबसे सहज सुलभ साधन टी वी हर घर में उपलब्ध है तो ऐसे घटिया धारावाहिकों के निर्माताओं की खूब बन आई है ! अपरिपक्व समझ वाले दर्शक भी खूब मिल जाते हैं जो ऐसे स्तरहीन धारावाहिकों की टी आर पी बढ़ाने में मददगार होते हैं ! 


साधना वैद 



Wednesday, September 9, 2026

शाबाशी - लघुकथा

 



नन्ही वंशिका स्कूल से आते ही अपनी मम्मी के गले से लिपट गयी ! वह आज बहुत खुश थी ! चहकते हुए उसने बताया कि आज उसे स्कूल में टीचर से खूब शाबाशी मिली क्योंकि उसने पंद्रह अगस्त के कार्यक्रम में स्कूल के सारे अध्यापकों, बच्चों और आमंत्रित अतिथियों के सामने मंच पर बिना भूले बिना अटके पूरी कविता पूरे जोश के साथ सुना दी !   

वंशिका शहर के सबसे नामी इंग्लिश मीडियम स्कूल में तीसरी कक्षा में पढ़ती है जहाँ के बच्चे धारा प्रवाह अंग्रेज़ी में बात करते हैं और उस स्कूल में हिन्दी में बात करने पर बच्चों को सज़ा भी दी जाती है ! मम्मी हैरान थीं, “अच्छा ! यह तो बहुत खुशी की बात है लेकिन यह तो बताओ तुमने कौन सी कविता सुनाई ! तुम्हारी अंग्रेज़ी की किताब में तो सभी नई कवितायेँ हैं और मैंने तो तुम्हें कोई कविता याद करते हुए देखा ही नहीं !”
“खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी !”
वंशिका ने मुस्कुरा कर कहा !


चित्र - गूगल से साभार 


साधना वैद


Friday, September 4, 2026

एक टूटा सपना

 



उस दिन बड़े सवेरे मेरा मन 

मीठी सी खुशबू से महक गया 

शायद मेरे मन की बगिया में 

बहार आ गई थी,  

मेरी आँखों में सपने जाग गए, 

मेरे अधरों पर मुस्कान सज गई!  

वो शायद तेरा ख़याल था 

तेरे आने की आहट थी, 

तेरा तसव्वुर था 

या मेरी खामखयाली थी 

नहीं जानती 

बस जानती हूँ तो सिर्फ यह 

कि मुद्दतों बाद एक आस जगी थी 

एक विश्वास दृढ हुआ था 

एक इंतज़ार को कुछ और 

जीने की मोहलत मिल गई थी! 

उस शाम बड़ी उम्मीद से 

दरवाज़े पर निगाहें टिकी थीं

कान हर आहट पर 

चौकन्ने हो रहे थे 

लेकिन अनायास ही 

तेरे कदमों की आहट पीछे मुड़ गई 

और फिर धीरे-धीरे धीमी होती हुई 

नेपथ्य में विलीन हो गई,

फूलों की खुशबू मंद हो गई,

सपना टूट गया, 

अधरों पर चिर परिचित टीस

फिर से उभर आई और 

आँखें एक निर्मम. नीरस, बेरंग 

यथार्थ को झेलने के लिए 

ऐसी खुलीं कि अब 

किसी भी तरह

सोना ही नहीं चाहतीं! 


साधना वैद 

 

चित्र - गूगल से साभार 


Wednesday, September 2, 2026

देशी परदेशी – लघुकथा

 



“रोहित, कहीं जा रहे हो क्या ? पहले मुझे बाज़ार से ये सामान लाकर दे जाना उसके बाद कहीं और जाना ! शाम को कुछ मेहमान आने वाले हैं खाने पर ! मुझे बहुत तैयारी करनी है !” बाहर का दरवाज़ा खटकने की आवाज़ आते ही सुमित्रा चौकन्नी हो गईं ! समझ गईं कि बेटा रोहित स्क्वैश खेलने के लिए अपने दोस्तों के साथ स्टेडियम जाने के लिए निकल रहा होगा ! कहीं चला न जाए यह सोच कर सुमित्रा ने किचिन से ही रोहित को आवाज़ लगाई और जल्दी-जल्दी सामान की सूची बनाने लगीं ! 

तभी रोहित खीझता हुआ किचिन में आया, “ओफ्फोह मम्मी, मैं जब खेलने के लिए जाने वाला होता हूँ आपको लास्ट मोमेंट पर ही शॉपिंग का ध्यान क्यों आता है ? आई एम् गेटिंग लेट !”

सुमित्रा ने जल्दी से उसे सामान की सूची थमाई, “आज कुछ मेहमान आ रहे हैं बेटा ! मुझे खाना बनाना है ! यह बहुत ज़रूरी सामान है ! समय से नहीं आया तो खाना बनाने में बहुत देर हो जाएगी !” सुमित्रा ने नर्म होकर रोहित को समझाने की कोशिश की ! 

रोहित सामान की फेहरिस्त देख कर बौखला रहा था, “यह क्या है मम्मी आपको कितनी बार कहा है लिस्ट इंग्लिश में बनाया करो ! मुझे नहीं समझ में आ रहा क्या लिखा है आपने ! सामान गलत-सलत आ जाए तो मुझे कुछ मत कहना !”

“सामान सब सही आए इसीलिये लिस्ट हिन्दी में बनाई है ! तुम्हें समझ में नहीं आ रहा है तो कोई बात नहीं दुकानदार को सब समझ में आ जाएगा ! उसके यहाँ सामान लेने वाले निन्यानवे प्रतिशत हिन्दी बोलने और लिखने पढ़ने वाले लोग ही आते हैं ! तुम्हारे जैसे अंग्रेज़ी के भक्त तो शायद एकाध प्रतिशत ही होंगे और तुम भी अंग्रेज़ी के आसमान से नीचे अपनी मातृभाषा की ज़मीन पर उतर आओ तो तुम्हारे लिए भी वही ठीक होगा ! कम से कम अपनी भाषा बोलने वाले लोगों से जुड़ तो सकोगे ! मुझे डर है कहीं तुम अपने ही देश में परदेशी न बन जाओ !” 

 

चित्र - गूगल से साभार 


साधना वैद 


Sunday, August 23, 2026

प्रवासी पंछी

 





फैला के पंख 

उड़ चला विदेश 

छोड़ के नीड़


प्रवासी पंछी 

अनजान देश में 

ढूँढे बसेरा 


छूटे माँ बाप 

छूटा कुल कुनबा 

गाँव शहर 


पंछी से तुम 

जा बसे परदेश

रोक न पाए  


कैसे बुलाएं 

कौन जतन करें 

कैसे बताएं 


जोहती बाट

आजा मेरे दुलारे 

हो रही रात 


हुआ अँधेरा 

डूब गया सूरज 

घबराए माँ


आकुल हो वो 

नीड़ से शाख तक 

डोलती फिरे 


नहीं आया वो 

हुआ मन विदीर्ण 

रो पड़ीं आँखें 


हो गया सूना 

एक माँ का जीवन 

घर आँगन 


प्रार्थना माँ की 

रही अनसुनी सी 

माँ घबराई 


हुई उदास 

नियति की छलना 

रास न आई !



साधना वैद 

 


चित्र - गूगल से साभार 



Friday, August 21, 2026

हाइकु मुक्तक - सावन

 



सीला सावन, तृषित तन मन, दूर सजन 

मुग्ध वसुधा, उल्लसित गगन, सौंधी पवन

व्याकुल बूँदें, बिखर धरा पर, बुलाएं तुम्हें

गाते विहग, सुरभित सुमन, आओ सजन ! 


आया सावन, सुन कर पुकार, धरा मुस्काई 

फूल ही फूल, चूनर में अपनी, टाँक ले आई 

बरसी बूँदें, गरजे घन घटा, तड़पे जिया

हर्षित धरा, लहरा के आँचल, ले अँगड़ाई !


चित्र - गूगल से साभार 

साधना वैद 




Sunday, August 16, 2026

इसलिए नहीं आ सका

 




याद तो आई थी माँ

अपने जन्मदिन पर 

तुझे याद कर मेरी 

आँख भी भर आई थी,

जब यारों ने बाज़ार से लाकर 

रेडीमेड केक खिलाया था 

तेरे हाथ के बने मुलायम पूए 

और मीठी-मीठी खीर की भी 

बहुत याद आई थी माँ

लेकिन भारत माँ की रक्षा की 

कसम भी तो मैंने ही खाई थी न माँ

इसलिए नहीं आ सका ! 

सावन के महीने में रक्षा बंधन पर 

तेरी बहुत याद आई थी बहना 

अपनी सूनी कलाई देख 

मेरी आँख भी भर आई थी, 

मेरे माथे पर रोली अक्षत का 

पावन तिलक लगाती

अपने हाथों बड़े प्यार से मुझे 

घेवर का बड़ा सा टुकड़ा खिलाती 

तेरी मासूम छवि मेरी आँखों में 

उभर आई थी प्यारी बहना 

लेकिन भारत की सभी बहनों की 

रक्षा की कसम भी तो 

मैंने ही खाई थी न छोटी 

इसलिए आना तो बहुत चाहता था 

पर नहीं आ सका ! 

दीवाली से कुछ दिन पहले ही तो 

फ़ौज में मेरी भर्ती की 

सुखद सूचना आई थी, 

याद है पापा, आपने ही तो

अपने हाथों मुझे फौजी की यह 

गौरवशाली वर्दी पहनाई थी ! 

और जब गर्व से आपने मुझे 

अपने सीने से लगाया था 

आपके साथ-साथ मेरी आँख भी 

भर-भर आई थी 

उस वर्ष हमने कितने उत्साह के साथ 

दीवाली मनाई थी ! 

छोटे भाई के साथ खूब सारे पटाखे 

खरीद कर मैं ले आया था 

सारे घर में माटी के दीपक जला 

पूरे घर को हर्ष और उल्लास की 

रोशनी से जगमगाया था ! 

हर तरफ पटाखों का शोर था 

हृदय में आस और विश्वास की गूँज थी !

पापा, आज भी मोर्चे पर गूँज है 

आतंकियों के धमाकों की,

उनके नापाक नारों की, इरादों की, 

मशीनगनों और गोला बारूद की,

इस गूँज को तो खामोश करना ही है 

दुश्मनों का खात्मा तो करना ही है 

इसलिए नहीं आ सका ! 

जब-जब गुलमोहर देवदार पर बहार आई 

बुरांश के फूलों पर अरुणिमा छाई

तुम्हारा सलज्ज मुखड़ा याद कर प्रिये

मेरी आँख भी भर-भर आई ! 

यह मादक मतवाला मौसम 

मन भारी कर जाता है 

तुम्हारे साथ बिताया हर खूबसूरत पल 

याद दिला जाता है !

तुम्हारे कंगन, तुम्हारी चूड़ी

तुम्हारी पायल की खनक 

सुनाई देती है,

पंछियों की सरगम में मुझे

तुम्हारे गीतों की प्रतिध्वनि

सुनाई देती है ! 

तभी सुदूर घाटी से भारत माँ की 

घुटी-घुटी सी चीत्कार भी 

मुझे सुनाई दे जाती है ! 

मेरा मधुर स्वप्न टूट जाता है, 

यथार्थ का निर्मम प्रहार 

मुझे मोहनिद्रा से जगा जाता है ! 

भारत माँ ने कातर हो मुझे

रक्त रंजित घाटियों से आवाज़ लगाई है, 

मेरी आँखों में खून उतर आया है 

अंतर में प्रतिकार ने आग भड़काई है !

तुम जानती तो हो न प्रिये 

इस पुकार को मैं किसी भी हाल में 

अनसुनी नहीं कर सकता 

इसीलिये नहीं आ सका ! 


चित्र - गूगल से साभार 


साधना वैद