Followers

Monday, July 27, 2026

एक पेड़ की फ़रियाद

 




देखते हो मुझे 

कैसे कुदरत का कहर टूटा मुझ पर 

और कैसे आँधी तूफ़ान ने 

बर्बाद कर दिया मुझे !

कुदरत तो कुदरत थी 

उस पर किसका वश था 

लेकिन जड़ से उखड़े मेरे जिस्म पर 

संसार के सबसे जहीन 

इस ‘बुद्धिजीवी’ इंसान ने भी 

ज़रा तरस नहीं खाया 

और काट-काट कर 

मेरी हर डाल, 

नोच-नोच कर मेरा हर फूल, 

मेरा हर पत्ता इस नाशुक्रे इंसान ने 

बिलकुल निरावृत कर दिया मुझे ! 

लेकिन मेरी जिजीविषा देखो 

देखो मेरे हृदय की उदारता को !

किस तरह मेरा कटा नुचा भग्न शरीर  

अपनी खंडित साँसों के साथ भी

तुम्हें जीवन दान देने के लिए 

अपनी पूरी ताकत से लड़ रहा है 

मेरा रोम-रोम अंकुरित हो रहा है 

तुम्हें शीतल छाँह देने के लिए, 

फल-फूल, खुशबू देने के लिए,

तुम्हारे थके हुए फेंफडों को 

प्राण वायु देने के लिए ! 

यही फर्क है एक पेड़ में और इंसान में 

पेड़ सिर्फ देना ही देना जानते हैं 

प्रतिदान में कुछ नहीं माँगते 

और इंसान ? 

वह सिर्फ लेना ही लेना जानता है 

अपने जीवन दाता हरे-भरे वृक्ष को 

को चीर फाड़ कर 

ख़त्म कर देने में भी 

उसे कोई एतराज़ नहीं होता ! 




साधना वैद 


Saturday, July 18, 2026

धूप

 




जलते रहे

ज़िंदगी की धूप में

पाँव के छालों की

परवाह किये बगैर

बिना रुके बिना थमे

दिन रात बस चलते रहे

चलते ही रहे ।

न मिला हमें ठौर कहीं

न ही कहीं मिली छाँह

और हम अभिशप्त से

समय की झंझा में 

डाल से टूटे पत्ते की तरह

बेबस और बेआस बस

उड़ते रहे

उड़ते ही रहे ।

हालात की दुश्वारियों ने

इस तरह कर दिया लाचार

कि हम आज गर्दिशों के

उफनते सैलाब में

तिनके की तरह

बहते रहे

बहते ही रहे

सुनाई किसीको भूले से

कभी जो दास्ताने गम

ऊब कर वो उठ गया

और हम कहते रहे

कहते रहे

कहते ही रहे ।

 


चित्र - गूगल से साभार 



साधना वैद


Thursday, July 9, 2026

असर - लघुकथा



टी वी पर समाचार चल रहे थे ! इन दिनों की सबसे प्रमुख खबर, केतन अग्रवाल मर्डर मिस्ट्री को बड़े विस्तार के साथ दिखाया जा रहा था ! शालिनी का मन घबराने लगा था ! उनके घर में भी जवान बेटी है सुनेत्रा ! बहुत सुन्दर, सुशिक्षित, आधुनिक ख्यालों वाली ! खूब प्रखर और मुखर भी ! एकदम निर्भीक और आत्मविश्वास से भरी हुई ! स्कूल कॉलेज में हर एक्टीविटी में सबसे आगे रहने वाली और घर परिवार में भी सबसे अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाने वाली ! शालिनी माँ होकर भी हमेशा उसकी हर बात मानतीं और खुद से भी अधिक उसके फैसलों पर भरोसा करतीं ! 

खबरें देखते-देखते उनका मन विचलित हो रहा था ! जाने कैसा डर उनके मन में घनीभूत होता जा रहा था ! उसी समय बड़े करीने से सजी धजी सुनेत्रा अपने हाथ में घड़ी बाँधती हुई घर कमरे में आई ! 

“मम्मी, मैं जा रही हूँ शाम को आने में देर हो जाए तो फ़िक्र मत करना ! हम लोग मूवी देखने जा रहे हैं ! आज रोहित का जन्मदिन है ! उसके बाद वह हमें डिनर के लिए ले जाएगा ! प्रज्ञा और विनोद भी जा रहे हैं साथ में ! दस बजे तक आ जाएंगे ! देर होगी तो फोन कर दूँगी आपको !” सुनेत्रा अपना सामान इधर उधर से समेटती हुई पर्स में रखती जा रही थी और शालिनी को अपने शाम के प्रोग्राम के बारे में बता भी रही थी ! 

“तुम कहीं नहीं जा रही हो !” शालिनी की कठोर आवाज़ सुन कर सुनेत्रा दंग थी ! आज तक मम्मी ने उसके साथ इस टोन में बात नहीं की थी ! 

“क्या हुआ मम्मी ? आपकी तबीयत तो ठीक है ? आज के प्रोग्राम के बारे में मैंने आपको तीन चार दिन पहले ही बता दिया था ! उसके बाद ही सबसे हाँ कहा था ! अब क्या हो गया ? जल्दी आने की कोशिश करूँगी ! एन वक्त पर नहीं जाउँगी तो सबका मूड खराब होगा ! कुछ हुआ है क्या ?“ 

सुनेत्रा की नज़रें मम्मी की नज़रों का अनुसरण करते हुए टी वी समाचारों पर टिक गईं ! सिया केतन की कहानी को विस्तार के साथ वहाँ दिखाया जा रहा था ! शालिनी ने काँपते हाथों से सुनेत्रा के हाथों को थाम लिया ! सुनेत्रा ने आगे बढ़ कर टी वी बंद कर दिया ! 

“क्या मम्मी ! आप भी बस जाने क्या-क्या सोचती रहती हो ! अच्छा यह बताओ आपको मेरे चरित्र और संस्कारों पर संदेह है या अपनी परवरिश और सीख पर ? क्या सच में आपको इतना डरने की ज़रुरत है ?” सुनेत्रा मम्मी की पीठ को हौले-हौले सहला रही थी और शालिनी का उद्विग्न मन धीरे-धीरे शांत होता जा रहा था ! उसने प्यार से सुनेत्रा के माथे को चूम लिया, “अब जा जल्दी से नहीं तो फिल्म छूट जाएगी !” और सुनेत्रा लम्बे-लम्बे डग भरते हुए कमरे से बाहर निकल गई ! 


साधना वैद  

चित्र - गूगल से साभार 


Wednesday, July 8, 2026

बंद हैं दरवाज़े

 




चित्र - गूगल से साभार 


साधना वैद        

Thursday, July 2, 2026

फ़िल्में और हमारा बचपन

 





हम लोग जब छोटे थे तो मनोरंजन के बहुत ही सीमित साधन हुआ करते थे ! या तो घर में लूडो, साँप सीढ़ी, गुट्टे, अष्टा चंगा खेल लो या शाम के समय बाहर सखियों सहेलियों के साथ घोड़ा है जमालशाही, खो खो, बोल मेरी मछली कितना पानी और छुपम  छुपाई खेल लो ! सिनेमा जाने का कार्यक्रम तभी बन पाता था जब घर के बड़ों को भी जाने का अवकाश मिले या उनके मतानुसार देखने लायक फिल्म हो ! बच्चों के अकेले जाने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता था ! उस ज़माने में ब्लैक एंड व्हाईट फ़िल्में बना करती थीं और उनके कथानक भी बहुत ही सुन्दर और उद्देश्यपूर्ण होते थे ! उस ज़माने की फ़िल्में पारिवारिक,  ऐतिहासिक, सामाजिक, या बालोपयोगी हुआ करती थीं ! उस वक्त के प्रसिद्ध साहित्यिक  उपन्यासों पर भी बहुत ही शानदार फ़िल्में बनीं ! 

देवदास, आनंद मठ, परिणीता, दो बीघा ज़मीन, मंझली दीदी, छोटी बहू, गबन, गोदान आदि अनेकों कालजयी फ़िल्में हैं जो प्रेमचंद, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, शरदचंद्र आदि उपन्यासकारों के उपन्यासों पर बनीं और जिन्होंने न केवल हमारी उत्कृष्ट साहित्य के प्रति रूचि को जगाया वरन हमारी सोच, हमारी भावनाओं और हमारे परिवार के प्रति दायित्व बोध को भी परिमार्जित किया ! 

भाभी, लाजवंती, तूफ़ान और दिया, हीरा मोती, मदर इंडिया, कठपुतली, घर घर की कहानी ऐसी अनेकों पारिवारिक फ़िल्में थीं जिन्होंने नारी उत्पीडन के उन्मूलन में यथेष्ट योगदान दिया और नारी सशक्तिकरण की मशाल को जला कर नारी को  अपने अधिकारों और अस्मिता की रक्षा के लिए जागरूक किया ! 

हम पंछी एक डाल के, जागृति, मासूम, आगरा रोड, प्यार की प्यास, ज़मीन के तारे, भाई बहन जैसी बच्चों की फ़िल्में अलग से बना करती थीं जिनमें बच्चों के लिए सुन्दर सन्देश होते थे ! फ़िल्में न केवल मनोरंजन करती थीं वरन हमारे चरित्र निर्माण में भी प्रमुख भूमिका निभाती थीं और हमें एक स्वस्थ समाजोपयोगी व्यक्ति के रूप में विकसित होने में हमारी सहायता करती थीं ! अगर कोई देश प्रेम की थीम वाली या बच्चों के लिए स्वस्थ मनोरंजन देने वाली फ़िल्में आती थीं तो अक्सर हमें स्कूल से हमारी टीचर्स वे फ़िल्में दिखाने के लिए ले जाती थीं ! हमने के फ़िल्में स्कूल के  सहपाठियों के साथ देखी हैं ! जागृति, भाई बहन, पुरानी वाली मासूम, जमीन के तारे आदि ! आज भी बचपन में देखी हुई अनेकों फ़िल्में ज्यों की त्यों स्मृति में सुरक्षित हैं ! आजकल के तो टी वी धारावाहिक ही कभी कभी इतने घटिया हो जाते हैं कि परिवार के सभी सदस्यों के साथ बैठे हों तो बड़ी ऑकवर्ड सिचुएशन हो जाती है ! लेकिन पहले की फिल्मों में न संवाद घटिया होते थे, न पोशाकें घटिया होती थीं न ही दृश्यांकन घटिया होता था ! पूरा परिवार साथ में फिल्म का आनंद लेता था ! अब न तो इतनी अच्छी फ़िल्में बनती हैं न बच्चों में वैसी मासूमियत रह गयी है ! आजकल की फिल्मों में इतनी हिंसा दिखाई जाती है कि वह बच्चों के कोमल मन पर बहुत अधिक दुष्प्रभाव डालती है ! अवास्तविक दृश्यांकन होते हैं ऐसे दृश्यों के और बच्चे इनकी नक़ल करते हुए कई बार अपनी जान खतरे में डाल देते हैं ! हम लोगों ने अपना बचपन  जितना सुरक्षित और खूबसूरत बिताया है आजकल के बच्चे उसकी कल्पना भी नहीं कर सकते ! वे अति काल्पनिक वीडियो गेम्स में व्यस्त रहते हैं और एकान्तप्रिय होते जा रहे हैं !  


चित्र - गूगल से साभार 

साधना वैद 


Saturday, June 27, 2026

मानसिक रूप से रुग्ण आज की पीढ़ी

 


मानसिक रूप से रुग्ण आज की पीढ़ी हमें सोचने के लिए विवश करती है कि हमारा समाज कहाँ जा रहा है, हमारे बच्चे किस तरह से विकृत मानसिकता के शिकार हो रहे हैं और वे कौन से कारक और कारण हैं जो बच्चों को ऐसे अपराध करने के लिए उकसाते हैं ! माता पिता के दिए संस्कार, उनकी परवरिश, स्कूल कॉलेजों में मिली शिक्षा और ज्ञान क्या सच में अब इतना निरर्थक और बेमानी हो गया है कि बच्चे न उनसे कुछ सीखते हैं, न उन्हें अपने जीवन में उतारते हैं और न ही उनका सम्मान करते हैं ! 

पूना का हाई प्रोफाइल सिया केतन का केस इसी ओर इशारा करता है कि आज की पीढ़ी कितनी आत्म केन्द्रित, स्वार्थी और निरंकुश हो गयी है कि उन्हें अपने सुख के आगे किसी का भी दुःख कुछ लगता ही नहीं ! ऐसी ही एक घटना कुछ समय पूर्व हुई थी जिसमें इंदौर की एक लड़की सोनम ने अपने पति को मेघालय की घाटियों में अपने प्रेमी के साथ मिल कर धकेल दिया था और इस घटना में भी उस युवक की मौत हो गयी थी ! यह मानसिक विकृति की पराकाष्ठा है और लड़कियों की संकुचित सोच और हृदयहीनता को उजागर करती है ! आजकल की पीढी सुविधाभोगी और स्वच्छंद होती जा रही है ! वे शॉर्ट टर्म सुख को देखते हैं और उसे पाने के लिए कुछ भी कर गुज़रने के लिए तैयार हो जाते हैं ! यहाँ तक कि किसी की जान भी लेने से वे पीछे नहीं रहते ! नहीं सोच पाते कि इन घटनाओं का क्या अंजाम होगा ! क्या उन पर अपराध तय हो जाने के बाद उन्हें घर परिवार समाज में कोई स्वीकार्यता मिलेगी ? क्या उनके जानने वाले उनसे वैसा ही प्यार करेंगे, उन्हें वही सम्मान देंगे जो वे अब तक पाती आई हैं ! माथे पर हत्यारिन का टैग लग जाने के बाद क्या उनके ही अपने प्रेमी का परिवार ऐसी हत्यारिन लड़की को बहू के रूप में स्वीकार करेगा और सबसे पहले तो क्या वे पुलिस और क़ानून के शिकंजे से बच भी पाएंगी ! क्या वे खुद से भी नज़रें मिला पाएंगी ! सालों जेल के सींखचों के पीछे अपना शेष जीवन बिताते हुए उनका सारा प्रेम का उबाल ठंडा पड़ जाएगा और पछतावे के सिवा उनको और कुछ हासिल नहीं होगा ! क्या इन्हीं लड़कियों पर हम गर्व कर सकते हैं ? 

अब इस मानसिकता को धार देने वाले कारकों पर दृष्टिपात करें तो मुझे आजकल टी वी पर चौबीसों घंटे चलने वाले घटिया धारावाहिकों और हिंसाप्रधान फिल्मों से बड़ी शिकायत है ! टी वी धारावाहिकों में स्त्री की जैसी छवि दिखाई जाती है वह मुझे हैरान कर देती है ! बचपन से अब तक एक नारी में हमने संसार के सारे सद्गुणों को समाहित होते हुए ही जाना था ! प्यार, ममता, दया, करुणा, त्याग, निष्ठा, समर्पण और आत्मोत्सर्जन की वह अधिष्ठात्री होती है ! वह किसीको ज़रा सा भी कष्ट नहीं दे सकती ! वह औरों की पीड़ा को भी स्वयं झेलने के लिए सदैव तत्पर होती है ! लेकिन ये आजकल की लड़कियाँ तो इस परिभाषा में कहीं से भी फिट नहीं बैठतीं ! वे तो बड़ी बेदिली से किसीके घर के चिराग को फूँक मार कर बुझा देती हैं ! ये तो खुद अपने ही माता पिता की मान प्रतिष्ठा और इज्जत को तार-तार करने में सबसे आगे रहती हैं ! टी वी धारावाहिकों में ऐसी नकारात्मक भूमिका वाले किरदारों की बाढ़ आई हुई है जो तरह-तरह की क्रूर भंगिमाओं के साथ किसीके भी प्राण हर लेने की घोषणा करती रहती हैं ! पिस्तौल रिवॉल्वर से खिलौनों की तरह खेलती हैं ! कमज़ोर मानसिकता वाले युवा ऐसे किरदारों से जल्दी प्रभावित हो जाते हैं और उन्हीं की तरह सोचने लगते हैं ! इन धारावाहिकों पर और ऐसी फिल्मों पर तत्काल प्रभाव से रोक लगनी चाहिए ! ये समाज में निगेटिव प्रभाव डालते हैं और कोमल मन के मासूम बच्चों की सोच को प्रदूषित करते हैं ! सैंसर बोर्ड पर शिकंजा कसना चाहिए जो इन्हें प्रसारण की अनुमति दे देता है ! माता पिता लाख टी वी बंद रखें ! खुद भी देखना बंद कर दें लेकिन आजकल फोन ऐसा जादुई यंत्र है कि अब सब कुछ बच्चों की मुट्ठी में बंद है ! बड़ा मुश्किल वक्त है यह हम देख रहे हैं कि यह भेड़चाल किस तरह से पूरी पीढ़ी को तबाह कर रही है और कोई कारगर समाधान सुझाई नहीं देता !


चित्र - गूगल से साभार 

साधना वैद 

  


Wednesday, June 24, 2026

धरम-भ्रष्ट

 



आज श्रेया बहुत खुश थी उसका जन्मदिन जो था और आज पापा ने प्रोमिस किया था कि वे उसका जन्मदिन सब बच्चों के साथ शहर के सबसे मशहूर स्थान  चोखी धाणी में मनाएंगे ! वहाँ का खाना तो बहुत स्वादिष्ट होता ही है वहाँ मनोरंजन के लिए भी बहुत सारी गतिविधियाँ हैं जैसे ऊँट की सवारी, चरखी वाला झूला, जादू का खेल और नटों के करतब ! सबसे बड़ी बात वहाँ का पारम्परिक खाना दादी को भी बहुत पसंद आता है ! 

पापा के कहने पर श्रेया शाम की पार्टी की बात बताने दादी के पास पहुँची तो देखा दादी काम की तलाश में आई किसी महिला से बातों में उलझी हुई थीं !

“यहाँ आने से पहले किसके घर में काम करती थीं ? वहाँ कितने पैसे मिलते थे ? कौन जात हो ?” 

महिला सवालों की बौछार से घबरा सी गई ! 

“माताजी हम महार हैं ! बगल वाले भल्ला जी के यहाँ काम किया है ! अभी उनकी दूसरे शहर में बदली हो गई है तो नया काम देख रही हूँ !”

दादी सुनते ही चौंक गईं ! “महार हो तो तुमसे कैसे काम करवाएंगे ! अपनी रसोई में तो हम तुम्हें जाने न देंगे ! अपना धरम थोड़े ही भ्रष्ट करना है हमें ! तुम कहीं और देखो काम !” 

महिला मायूस होकर चली गई ! तभी पापा ने श्रेया से कहा, “बेटा आज की पार्टी में तो दादी नहीं जा पाएंगी ! बोलो तो पार्टी घर में ही मना लें ?” 

“अरे, हम काहे नहीं जा पाएंगे ! हम तो ज़रूर जाएंगे बिटिया के जन्मदिन पर ! हमें तो वहाँ की दाल बाटी, चूरमा, खीर सभी बहुत पसंद आती हैं ! तुमसे कौन बोला हम नहीं जाएंगे !” दादी हैरान थीं ! 

“नहीं अम्माँ, वहाँ तुमको कैसे पता चलेगा कि खाना बनाने वाले की और परसने खिलाने वाली की जात कौन सी है ! कहीं तुम्हारा धरम भ्रष्ट हो गया तो क्या होगा !” 

पापा और श्रेया का ठहाका बाहर तक गूँज रहा था और दादी खिसिया गई थीं !  



चित्र - गूगल से साभार 


साधना वैद