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Saturday, May 16, 2026

परिवार - हाइकु

 



वटवृक्ष सा 

हमारा परिवार 

शीतल छाँव 


मासूम बच्चे 

करते कलरव 

गूँजता घर 


बाबा की सीख 

दादी की कहानियाँ

हमारी नींव 


चाचा का लाड़

चाचियों का दुलार

बुआ का प्यार 


माँ अन्नपूर्णा 

पिता शिव शंकर 

दीदी लक्ष्मी सी 


सारे अपने 

सुर नर किन्नर 

स्वर्ग सा घर 


बचपन का

अनमोल खजाना 

अमीर हम 


मिली सुशिक्षा 

संस्कार, सुविचार 

परिवार में 


है परिवार 

प्रथम पाठशाला 

सब बच्चों की 


अनुशासन, 

सभ्यता, शिष्टाचार 

सीखते यहीं 


जीवन मूल्य 

सीखे हमने इसी 

परिवार में 


बने समाज 

सशक्त औ’ सुदृढ़ 

परिवारों से 


जो कुछ पाया 

उपकार मानते

परिवार का  


मान मर्दन  

कभी होने न देंगे 

इस प्यार का !


चित्र - गूगल से साभार 


साधना वैद 







Friday, May 15, 2026

नसीहत

 


सद्कर्मों का सद्परिणाम

धीरज से तुम लेना काम 

रखना तुम खुद पर विश्वास 

पूरी होगी हर इक आस ! 


मिहनत से होता है नाम 

करना होगा तुमको काम 

घबरा कर मत जाना बैठ 

रखनी होगी गहरी पैठ !


रहना तुम हर पल तैयार 

हर बाधा कर लोगे पार 

श्रम से ही मिलता सम्मान  

मिले तुम्हें प्रभु का वरदान !


चित्र - गूगल से साभार 

साधना वैद 

Monday, May 11, 2026

चौपई – एक प्रयास

 




नमस्कार साथियो,
'चौपई' एक नई विधा है ! यह 'चौपाई' से भिन्न है ! 
इस  पर मेरा एक प्रयास !


मुद्दत से दिल में थी प्यास 

जाने कब पूरी हो आस 

मिल कर जब बैठेंगे पास 

बाटेंगे खुशियाँ तब ख़ास !


हो जाएंगे दुःख सब दूर 

चिंता हो जाएगी चूर 

मन्नत सबकी होगी पूर

चेहरों पर उतरेगा नूर !



चित्र - गूगल से साभार 


साधना वैद 






Friday, May 8, 2026

मदर्स डे

 




क्या इस बार भी  

खूबसूरत आभासी गुलदस्ते, 

तरह-तरह के आभासी केक 

और वंचना भरे शुभकामना सन्देश

भेज कर मना लोगे तुम

‘मदर्स डे’,

और खुश हो जाओगे  

अपनी दयानतदारी पर, 

या अपनी व्यस्ततम दिनचर्या से 

निकाल पाओगे 

कुछ दिन, कुछ घंटे, कुछ पल 

और कर दोगे उन्हें समर्पित

अपनी वास्तविक माँ के लिए 

जो वर्षों से दूर देश के किसी

निर्जन एकांत में  

तुम्हारी राह देखते-देखते हर क्षण

हताश होती जा रही है,

वृद्ध होती जा रही है,

दुर्बल होती जा रही है ? 

तुम्हारी माँ की आँखें 

अब पथरा गई हैं,

घुटनों के दर्द ने

चलना दुश्वार कर दिया है, 

तुम्हारे लिए स्वादिष्ट पकवान

बनाने वाले अभ्यस्त हाथ 

अब पानी से भरा 

गिलास उठाने में भी 

काँपने लगे हैं !

बिस्तर पर लेटे-लेटे वह

जोहती रहती है तुम्हारी बाट ! 

इससे पहले कि उसकी आँखें 

इतनी धुँधला जाएं कि वह

तुम्हें पहचान ही न पाए 

एक बार तो मना लो ‘मदर्स डे’

उसके साथ, उसके पास, 

उसके सानिध्य में ! 

इससे बड़ा उपहार उसके लिए 

शायद और कुछ न होगा !

एक बात याद रखना 

दुनिया के सारे खूबसूरत मंज़र 

सदियों बाद भी ऐसे ही 

सुंदर बने रहेंगे लेकिन 

माता-पिता की नश्वर देह 

पल-पल छीजती जाती है,

शिथिल होती जाती है, 

चुकती जाती है !

देर न हो जाए कहीं 

देर न हो जाए !  

 

चित्र - गूगल से साभार 

साधना वैद 

 

  

 


Tuesday, May 5, 2026

कुछ कहते हैं ये ताँका

 




ग़रीब तो हैं 

खुद्दार भी हैं हम

टूटते हैं तो

जानते है जुड़ना

गिर के खड़े होना !


मजदूर हैं 

मजबूर नहीं हैं

रच डालेंगे 

स्वेद की सियाही से

निज सौभाग्यनामा !


उठायें बोझ

सारे जग का हम

और हमारा ?

बोलो, कौन उठाये ?

सीने से चिपटाये ?

 

क्या दोगे तुम

          किताब या कुदाल ?         

खुशी या आँसू ?

खिलौने या फावड़ा?

जीवन या मरण ?


जाती बाहर 

रोटी की जुगत में

माँ काम पर   

मैं हूँ घर की रानी

करती चौका पानी !

 

हर चुनौती

आसान या मुश्किल

साध्य है मुझे !

नहीं स्वीकार अब

वर्चस्व पुरुषों का ! 


ओ मेरे मौला  

माथे पे गहराती

चिंता की रेख

सोने की कलम से

लिख नया सुलेख !


तू है महान

धरा से नभ तक

हर दिशा में

गुंजित तेरा गान

ओ माँ तुझे सलाम ! 


बोझ उठाते

नये घर बनाते

न जाने कैसे

हम बेघर हुए

खुद पे बोझ हुए !


चित्र - गूगल से साभार 


साधना वैद


Wednesday, April 29, 2026

औकात - लघुकथा


 






दीनू एक शानदार भव्य भवन के ऊँचे से गेट के बाहर दो घंटे से खड़ा हुआ घर के मालिक मल्होत्रा जी का इंतज़ार कर रहा था ! उन्होंने ही संदेशा भेज कर उसे गाँव से बुलवाया था ! उनके किसी दोस्त का मकान बन रहा था और उन्हें किसी होशियार मिस्त्री की ज़रुरत थी ! मल्होत्रा जी जानते थे कि इस काम के लिए दीनू से बढ़िया और कोई मिस्त्री नहीं हो सकता इसीलिये उन्होंने उसके पास ड्राईवर की मार्फ़त संदेसा भिजवाया था ! उनका ड्राईवर भी तो उसी गाँव का है जहाँ दीनू रहता है ! जैसे ही मल्होत्रा जी की गाड़ी आई दरबान ने अदब से उठ कर गेट खोला ! गाड़ी के साथ-साथ दीनू ने भी भवन के अहाते में प्रवेश कर लिया !


मल्होत्रा जी अपनी चमचमाती हुई गाड़ी से उतरे और घर की ओर बढ़े ! दीनू भी उनके पीछे चल दिया ! तभी दरबान की कड़कती हुई आवाज़ आई
, “कहाँ घुसा चला जा रहा है ! औकात है तेरी ऐसे फर्श पर पैर धरने की ! चल बाहर निकल ! मालिक को बात करनी होगी तो बुला लेंगे तुझे !”


दीनू वहीं ठिठक गया ! उसकी आँखें भर आईं ! कैसे बताए कि तीन साल पहले इस भवन की हर दीवार की एक-एक ईंट उसीकी ही लगाई हुई है और जिस फर्श पर पाँव धरने की आज उसकी औकात नहीं आँकी जा रही उस फर्श की ऐसी चिकनी और सुन्दर सूरत उसीकी जी तोड़ मेहनत और घिसाई के बाद ही निकल कर आई है ! विडम्बना देखिये आज उसीके बनाए फर्श पर पाँव धरने के लायक उसकी औकात है या नहीं यह एक दरबान तय कर रहा है !

साधना वैद


Friday, April 24, 2026

मूँगफली पुराण

 



कितनी फुर्सत से रचा, प्रभु ने यह उपहार

सजे हुए हैं खोल में, दाने सुंदर चार !

दाने सुंदर चार, ईश की लीला न्यारी 

लगते कितने स्वाद, धरा पर कूड़ा भारी !

कहे साधना आज, बात तो है बस इतनी 

प्रभु ने यह उपहार, रचा फुर्सत से कितनी ! 


बैठे महफिल में सभी, छेड़ रहे हों राग

मूँगफली हों सामने, खुल जायेंगे भाग !

खुल जायेंगे भाग, बड़ी गुणकारी मेवा 

भर-भर बाँटो आज, करो तुम सबकी सेवा 

कहे साधना आज, “अजी तुम काहे ऐंठे 

चलो बढ़ाओ हाथ, रहो ना गुमसुम बैठे !” 


भावे सबको कुरकुरी, स्वाद मिले भरपूर

हाथ रुके ना एक पल, होय न पैकिट दूर !

होय न पैकिट दूर, मज़ा हो जाए दूना 

खाते जाएं दोस्त, लगे कितना भी चूना

कहे साधना आज, न कोई उठ के जावे

मूँगफली के साथ, मसाला सबको भावे ! 


होकर तन्मय देखते, परदे पर है चोर 

अँधियारे में सब सुनें, चटर पटर का शोर !

चटर पटर का शोर, कहीं गिर जाए दाना 

होता मन बेचैन, ढूँढ कर उसको लाना 

कहे साधना आज, दुखी हैं दाना खोकर  

मिल जाए तब फिल्म, देखते तन्मय होकर !  



साधना वैद