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Thursday, May 16, 2019

छाया




जीवन के मरुथल में
अनवरत कड़ी धूप में चलते चलते
तपती सलाखों सी सूर्य रश्मियों को
अपने तन पर सहने की इतनी
आदत हो गयी है कि
अब मुझे किसी छाया की
दरकार नहीं रह गयी है !
वैसे भी सामने फैला पड़ा है
रेत का अनंत असीम समंदर
जिसमें दूर दूर तक न कोई
मरुद्यान दिखाई देता है
ना ही शीतल छाँह का कोई ठौर
कि अपने झुलसे तन को
थोड़ी सी तो राहत दे सकूँ !
तभी तो छाया के लिए  
अपने दुखों की चादर को ही
खूँटों से बाँध कर  
एक वितान बना लिया है मैंने
कि उसके साये में तनिक
विश्राम कर सकूँ !
शीतल जल पीने के लिए  
अपने ही श्रम सीकरों को
एकत्रित कर सुराही में भर लिया है
कि तृषा से चटकते अपने अधरों को
तनिक गीला कर सकूँ !  
और अपने अशक्त रुग्ण पंखों को
अपने ही हाथों से बार बार सहला कर
एक बार फिर पुनर्जीवित कर लिया है
कि वे हौसलों की उड़ान भरने के लिए
एक बार फिर तैयार हो सकें  
क्योंकि मंज़िल अभी दूर है
और सफ़र बहुत लंबा है !



साधना वैद  



Wednesday, May 15, 2019

बदलाव की सुखद बयार




रोज़ सुबह की चाय के साथ समाचार पत्र उठाती हूँ और कुछ ही देर में विरक्त होकर एक तरफ डाल कर किसी और काम में मन रमाने की कोशिश करती हूँ ! रोज़ वही ह्त्या, लूट, छेड़ छाड़, बलात्कार, दुर्घटनाओं और अलग-अलग पार्टियों के छोटे बड़े नेताओं की बेमतलब बयानबाजियों के समाचारों से इतनी ऊब हो गयी है कि अखबार की ओर देखने का भी मन नहीं करता ! लेकिन आज एक इतनी बढ़िया खबर पढ़ने को मिली कि दिल बाग़-बाग़ हो गया ! सोचा आप सबके साथ भी शेयर कर ही लूँ ताकि जो नहीं पढ़ सके वे भी यहाँ पढ़ कर खुश हो जाएँ !
किस्सा कुछ यूँ है कि एक शहर में किसी लड़की के विवाह का आयोजन था ! बरात का भोज चल रहा था ! भोजन के किसी आइटम में नमक मिर्च की मात्रा को लेकर वाद विवाद हो गया ! वाद विवाद ने झगड़े का रूप ले लिया ! मामले ने इतनी तूल पकड़ ली कि मार पीट की नौबत आ गयी और घराती व बराती आपस में भिड़ गए ! ताज्जुब की बात यह है कि आज के युग में भी ऐसे नमूने लोग हमारे समाज में मौजूद हैं जो खाने के किसी आइटम में नमक मिर्च कम या ज्यादह हो जाने पर इस तरह से रंग में भंग करने की हिमाकत भी कर सकते हैं ! खैर मारे गुस्से के तमतमाए लड़की के पिता ने अपनी लड़की ब्याहने से इनकार कर दिया और बारात बिना दुल्हन के वापिस लौटने लगी ! वापिस जाने से पहले दूल्हे ने अपनी होने वाली दुल्हन को फोन किया कि अगर शादी करना चाहती हो तो मेरे साथ चलो ! और लड़की अपने पिता और घर वालों की रजामंदी के खिलाफ बरात के साथ ससुराल चल दी ! बारातियों ने स्थानीय लोगों से मदद माँगी जिसके लिए सब सहर्ष तैयार हो गए और एक मंदिर में जाकर विधि विधान के साथ विवाह का कार्यक्रम संपन्न हुआ ! एक पड़ोसी दम्पत्ति ने कन्यादान किया ! मंदिर में बैंड बाजे शहनाई इत्यादि के अभाव को भी बड़ी खूबसूरती के साथ मंदिर के बाहर बैठे चंद सपेरों ने अपनी बीन बजा कर पूरा कर दिया !
इस रोचक किस्से को पढ़ कर वाकई मन प्रसन्न हो गया ! ज़माने में बदलाव की सुखद बयार चलने लगी है ! लड़कियाँ अब बेजान मेज़ कुर्सी की तरह नहीं रह गयी हैं जिन्हें माता पिता जहाँ चाहें रख दें और जब चाहें हटा दें ! वे अपने फैसले खुद लेने लगी हैं और बात अगर ग़लत हो तो माता पिता का विरोध भी कर सकती हैं ! शाबाश है ऐसी बेटियों को ! आप स्वयं पढ़ें इस समाचार को !
साधना वैद

Sunday, May 12, 2019

माँ



मातृृ दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं 


मीठी सी तान
सुनहरा वितान
  चूमती माथा  

प्रभाती गाती
संसृति को जगाती
हमारी माता

बाँटती सुख
बटोरती है दुःख
 माता हमारी  

चुनती काँटे
बिखेरती है फूल
माता हमारी

प्यार के बोल 
आशीष शारदे का
माता की वाणी

माता की गोदी 
है शैया सर्वोत्तम 
कैसी सुहानी! 


शाश्वत प्रेम 
ममता की मूरत 
मैया हमारी 

देवों की वाणी 
चन्दन सी पावन 
मैया  हमारी 

होना उॠण
तेरी अनुकम्पा से 
कहाँ संभव 

बच्चे हैं तेरे 
आश्रित तुझ पर  
सारा जीवन 




साधना वैद 







Saturday, May 11, 2019

गुलमोहर – मेरा आइना




मेरे सबसे अच्छे दोस्त
मेरे हमदम, मेरे हमराज़,  
मेरे हमनवां, मेरे हमखयाल,
मेरे प्यारे गुलमोहर
हैरान हूँ कि कैसे तुम्हें
मेरे दिल के हर जज़्बात की
खबर हो जाती है
और ना जाने कैसे
मेरे दिल की हर पोशीदा बात
तुम्हारे सुर्ख फूलों की जुबानी
सरे आम हो जाती है !
मृदुल वासंती हवा के
पहले परस के साथ ही
तुम भी पुलकित हो उसी तरह
शर्मा कर लाल हो जाते हो
जैसे नवोढ़ा प्रियतमा की तरह
प्रियतम के प्रथम स्पर्श से
संकुचित हो कभी मैं
सुर्ख हो गयी थी !
मानसिक संताप की बेला में
अंतर में धधकते दावानल के
भीषण ताप को भी तुम्हारे
सुर्ख फूल ही इतनी मुखर
अभिव्यक्ति देते से लगते हैं
कि मुझे यकीन होने लगता है
कि मेरी आहों की आँच
इतनी दूर से भी उन्हें भी
महसूस तो ज़रूर हो रही होगी !   
विरह विदग्ध हृदय की वेदना
की बाढ़ जब अश्रुओं के रूप में
मेरी आँखों से ढलती है
तो तुम्हारे इन्हीं रक्तिम पुष्पों में  
मुझे अपने सूजे हुए
लाल सुर्ख नेत्रों का अक्स  
दिखाई देने लगता है !
सच है प्यारे गुलमोहर
तुम हर तरह से जैसे
मेरा ही आइना हो !
इसीलिये तो तुम्हारे
हर रूप हर रंग में
मुझे अपना ही प्रतिबिम्ब
दिखाई देता है !



साधना वैद  





Friday, May 10, 2019

ज़िंदगी चलती रही


हर जगह, हर मोड़, पर इंसान ठहरा ही रहा,
वक्त की रफ़्तार के संग ज़िंदगी चलती रही ! 

खुशनुमां वो गुलमोहर की धूप छाँही जालियाँ
चाँदनी, चम्पा, चमेली की थिरकती डालियाँ
पात झरते ही रहे हर बार सुख की शाख से
मौसमों की बाँह थामे ज़िंदगी चलती रही !

वन्दना की भैरवी थक मौन होकर रुक गयी ,
अर्चना के दीप की बाती दहक कर चुक गयी ,
पाँखुरी गिरती रहीं मनमोहना के हार की
डोर टूटी हाथ में ले ज़िंदगी चलती रही ! 

खोखले स्वर रह गये और माधुरी चुप हो गयी ,
ज़िंदगी के गीत की पहचान जैसे खो गयी ,
वेदना के भार से अंतर कसकता ही रहा
और टूटी तान सी यह ज़िंदगी चलती रही ! 

चाँद सूरज भाल पर मेरे अँधेरे लिख गये ,
स्वप्न सुंदर नींद में ही तोड़ते दम दिख गये ,
 देवता अभिशाप देके फेर कर मुँह सो गये
दर्द की सौगात देकर ज़िंदगी चलती रही ! 

आत्मा निर्बंध को बंधन नियम का मिल गया ,
पंख टूटी हंसिनी को गगन विस्तृत मिल गया ,
हर कदम पर रूह घायल हो तड़प कर रह गयी
और निस्पृह भाव से बस ज़िंदगी चलती रही !


साधना वैद

Friday, May 3, 2019

मेरी निष्ठा मेरी आराधना




किस तरह बालारुण की  
एक नन्ही सी रश्मि
सागर की अनगिनत लहरों में
प्रतिबिंबित हो उसके पकाश को
हज़ारों गुना विस्तीर्ण कर देती है !
जहाँ तक दृष्टि जाती है
ऐसा प्रतीत होता है मानो  
हर लहर पर हज़ारों सूर्य ही सूर्य
उदित होते जा रहे हैं
जिनका ताप और प्रकाश
हर पल बढ़ता ही जाता है !
जो कदाचित विश्व के कोने-कोने से
अंधकार के अस्तित्व को
मिटा कर ही दम लेने का
   संकल्प धार चुके हैं !  
सारे संसार को ज्योतिर्मय करने वाले
हे भुवन भास्कर  
तुम्हारे इस दिव्य प्रकाश के
असंख्यों वलयों के बीच
एक अभिलाषा लेकर मैं भी खड़ी हूँ
कि सम्पूर्ण रूप से आलोकित
बाह्य जगत के साथ-साथ
मेरे अंतर्मन का अन्धकार भी मिट जाये !
मेरा मन भी आलोकित हो जाये !
हे दिवाकर,
मेरे मन में दृढ़ता से आसन जमाये
इस विकट तिमिर का संहार
तुम कैसे करोगे ?
किस यंत्र से कौन सा छिद्र
तुम मेरे हृदय की ठोस दीवार में करोगे
कि तुम्हारी प्रखर रश्मियाँ
मेरे अंतर्मन के सागर की हर लहर पर
इसी तरह नर्तन कर
हज़ारों सूर्यों का निर्माण कर सकें
और मेरे हृदय में व्याप्त अन्धकार का
समूल नाश हो जाये !
हे दिनकर
संसार में एक अकेली मैं ही नहीं
जो इस अन्धकार में निमग्न है
मुझ जैसे करोड़ों हैं जो प्रति पल
अपने अंतर के अन्धकार से जूझ रहे हैं !
आज तुमसे मेरी यही आराधना है कि
तुम उन सबके मन में भी
ऐसी ज्योति जला दो कि
उनका पथ भी आलोकित होकर
प्रशस्त एवँ सुगम्य हो जाये 
और उन्हें अपना मार्ग 
तलाश करने के लिये
कभी ठोकर न खानी पड़े !
हे ज्योतिरादित्य
आज मेरी निष्ठा, मेरे समर्पण,
मेरी आस्था मेरे विश्वा्स के साथ 
तुम्हारी सामर्थ्य, तुम्हारा पराक्रम,
तुम्हारे अंतस की करुणा
और तुम्हारी दानवीरता 
सभी कसौटी पर कसे हुए हैं 
आज तो तुम्हें स्वयं को 
सिद्ध करना ही होगा मेरे देवाधिदेव !
आज मेरी निष्ठा भी
दाँव पर लगी हुई है !
तथास्तु !



साधना वैद 


Monday, April 29, 2019

रफूगिरी



सारी ज़िंदगी
मरम्मत करती रही हूँ
फटे कपड़ों की
कभी बखिया करके
तो कभी पैबंद लगा के
कभी तुरप के
तो कभी छेदों को रफू करके !
धूप की तेज़ रोशनी और  
साफ़ नज़र की कितनी
ज़रुरत होती थी उन दिनों
सुई में धागा पिरोने के लिए
और सफाई से सीने के लिए !
मरम्मत तो अब भी
करती ही रहती हूँ
कभी रिश्तों की चादर में
पड़े हुए छेदों को
रफू कर जोड़ने के लिए  
तो कभी ज़िंदगी के
उधड़ते जा रहे लम्हों को
तुरपने के लिए
कभी विदीर्ण मन की
चूनर पर करीने से
पैबंद लगाने के लिए
तो कभी भावनाओं के
जीर्ण शीर्ण लिबास को  
बखिया लगा कर  
सिलने के लिए !
बस एक सुकून है कि
इस ढलती उम्र में
यह काम रात के
निविड़ अन्धकार में ही
बड़े आराम से हो जाता है
इसके लिए मुझे
किसी सुई धागे और
तेज़ रोशनी की
ज़रुरत नहीं होती !

साधना वैद