Followers

Friday, July 23, 2021

फैमिली कोर्ट - लघुकथा

 



फैमिली कोर्ट के छोटे से कमरे में अधेड़ वय के पति पत्नी बैठे हुए थे ! पति अत्यंत क्षुब्ध और अप्रसन्न दिखाई दे रहा था पत्नी बेहद असंतुष्ट और दुखी ! मजिस्ट्रेट शालिनी उपाध्याय बारीकी से उनके हाव भाव निरख परख रही थीं ! उन्होंने दोनों से इस उम्र में तलाक के लिए आवेदन करने का कारण पूछा –

शालिनी – “विवाह के पैंतीस साल बाद आप एक दूसरे से तलाक क्यों लेना चाहते हैं ?”

पति – “ये हद दर्जे की झगडालू, बदमिजाज़ और ज़िद्दी हो गयी हैं ! कोई भी लॉजिकल बात इन्हें समझ में नहीं आती ! घर का वातावरण बहुत ही खराब हो गया है ! मेरी कोई बात नहीं सुनतीं जीना दूभर हो गया है !”

पत्नी – “ये एकदम तानाशाह हो गए हैं ! मेरी किसी इच्छा का इनके आगे कोई मोल नहीं है ! सबको अपनी उँगली पर नचाना चाहते हैं ! ये जो चाहें जैसा चाहें बस वही हो घर में ! मैं बिलकुल तंग आ गयी हूँ घर नहीं जेल हो जैसे ! न कहीं घूमने जाना, न किसीसे मिलना जुलना न कभी कोई फिल्म देखने या चाय कॉफ़ी पीने जाना ! पूछिए ज़रा इनसे मेरे लिए कभी कोई उपहार ये कितने साल पहले लाये थे ! हमसे अच्छे तो जेल के कैदी होते हैं अपना काम ख़त्म कर एक दूसरे से हँस बोल तो लेते हैं ! इन्होंने तो खुद अपना व्यवहार ऐसा कड़क बना लिया है कि चहरे पे मुस्कान देखे हुए बरसों बीत गए ! कुछ कहो तो काटने दौड़ते हैं ! कोई भी तो नहीं है घर में जिससे बोल बतिया कर मन हल्का कर लूँ ! बेटियाँ अपनी ससुराल की हो गयीं और बेटे अपनी नौकरी और बहुओं के !” बोलते बोलते पत्नी की आँखों से धाराप्रवाह गंगा जमुना बह रही थी !

पति ने फ़ौरन कमीज़ की जेब से काम्पोज़ की गोली निकाल कर जल्दी से पत्नी के मुँह में रखी और सामने रखा पानी का गिलास उसके होंठों से लगा दिया !

पति - “यही तो है मुसीबत है ज़रा ज़रा सी बात पर रोना धोना शुरू हो जाता है और बी पी बढ़ा लेती हैं ! खुद तो पट हो जाती हैं हम रात रात भर पागलों की तरह सम्हालते फिरें !” झल्लाते हुए पति बोला !

पत्नी – “और आपका ख़याल कौन रखता है ? सारी सारी रात पीठ की सिकाई कौन करता है ? घुटनों में तेल की मालिश कौन करता है ? मेरा किया तो कुछ नज़र ही नहीं आता ना आपको !” पत्नी का रोना और तीव्र हो गया था !

पति – “अच्छा अच्छा ठीक है ! चलो घर चलें ! जैसे इतनी गुज़र गयी लड़ते झगड़ते बाकी भी गुज़र ही जायेगी ! न मुझे तुझ सी कोई और मिलेगी न तुझे मुझसा कोई और !”  मजिस्ट्रेट की ओर देखे बिना दोनों एक दूसरे की बाहों का सहारा लिये कमरे से बाहर आ गये थे ! 


चित्र - गूगल से साभार 

 

साधना वैद


Tuesday, July 20, 2021

मत कुरेदो घाव मन के


 

मत कुरेदो घाव मन के

फिर वही शिकवे गिले और चाँदमारी

हर समय ज़िल्लत सहें किस्मत हमारी  

अब न बाकी ताब है जर्जर हृदय में

कह नहीं पायेंगे शब कैसे गुज़ारी !

बस तुम्हें तो दोष देना सोहता है 

भूल कर भी फ़िक्र कब की है हमारी  

हम अगर कहने पे कुछ जो आ गए तो

खामखाँ जग में हँसी होगी तुम्हारी !

इसलिए तुम मत कुरेदो घाव मन के

दर्द सहना बन चुकी आदत हमारी

तुम रहो खुशहाल अपनी ज़िंदगी में

रंजो गम से दोस्ती है अब हमारी !



चित्र - गूगल से साभार  

साधना वैद  

Tuesday, July 13, 2021

सार्थक चिंतन - कुछ हाइकु

 



मुँह में राम

बगल में खंजर

आम मंज़र

 

आम के आम

गुठलियों के दाम

मौके की बात

 

अब न मिलें

ऐसे सुअवसर

वक्त की घात

 

माता का प्यार

चोंचला अमीरों का

खाते हैं मार

 

सुख न दुःख

निस्पृह है जीवन

बैरागी हम

 

नन्हा परिंदा

उड़ चला गगन

मन मगन 

 

मन पतंग

ज़िंदगी थामे डोर

मंझा हालात

 

कटी पतंग 

भरे आसमान में 

हुई निसंग  

 

साधना वैद

 


Friday, July 2, 2021

कितनी सुन्दर होती धरती

 



कितनी सुन्दर होती धरती, जो हम सब मिल जुल कर रहते

झरने गाते, बहती नदिया, दूर क्षितिज तक पंछी उड़ते

ना होता साम्राज्य दुखों का,  ना धरती सीमा में बँटती

ना बजती रणभेरी रण की, ना धरती हिंसा से कँपती !

पर्वत करते नभ से बातें, जब जी चाहे वर्षा होती

सूखा कभी ना पड़ता जग में, फसल खेत में खूब उपजती

निर्मम मानव जब जंगल की, हरियाली पर टूट न पड़ता

भोले भाले वन जीवों के, जीवन पर संकट ना गढ़ता

जब सब प्राणी सुख से रहते, एक घाट पर पीते पानी

रामराज्य सा जीवन होता, बैर भाव की ख़तम कहानी

पंछी गाते मीठे सुर में, नदियाँ कल कल छल छल बहतीं

पेड़ों पर आरी ना चलती, कितनी सुन्दर होती धरती !



साधना वैद


Wednesday, June 23, 2021

ये वादा रहा

 

 

यूँ तो मुझे सरप्राइज़ ज़रा भी अच्छे नहीं लगते

हर काम अच्छी तरह से सोच समझ कर

सुनियोजित सुविचारित रूप से

करना ही मुझे पसंद है

लेकिन मेरी प्यारी सखी

तुझसे मेरी यही इल्तिजा है कि

तू जब भी मेरे घर आये

मुझे कोई भी पूर्व सूचना दिए बिना

आचानक से ही आ जाना ! 

मैं यह अच्छी तरह से जानती हूँ कि

एक न एक दिन तू मेरे घर आयेगी ज़रूर !

मैं लाख मना करूँ, तुझे कितना भी रोकूँ,

तेरे मुँह पर दरवाज़ा बंद कर दूँ

तू कोई न कोई जुगत लगा कर

मेरे पास आ ही जायेगी !

आना ! ज़रूर आना !

मेरी प्यारी सखी,

बस मेरी इतनी सी बात मान लेना

कि तू जब भी आना चाहे मेरे पास

अचानक से ही आ धमकना !

मुझे पहले बता कर

अपनी प्रतीक्षा करवाने के लिए

मुझे मजबूर मत करना !

मुझे किसीका भी इंतज़ार करना

अच्छा नहीं लगता !

और तेरा तो बिलकुल भी नहीं  

रोज़ दम साधे सुबह, दोपहर, शाम, रात

आँखों में काटना,

रोज़ व्याकुल होकर बार बार रास्ते पर

निगाहें बिछा कर बैठे रहना,

भगवान् से मिन्नतें प्रार्थनाएं करना

और तेरे आगमन की प्रतीक्षा में

असह्य अनिर्वचनीय कष्ट और

मानसिक संताप को झेलना

मुझे ज़रा भी अच्छा नहीं लगेगा !

इस बार तो मैंने तुझे चकमा देकर

लौटा दिया था अपने दर से !

जानती हूँ हर बार यह संभव न होगा !

एक दिन तो मुझे हर हाल में

तेरा स्वागत करना ही होगा !

बस उस दिन तू मुझे

अपनी बाहों में भर कर

खामोशी से चुरा कर ले जाना

दूर बहुत दूर !

मैं तुझसे कोई सवाल नहीं करूँगी

हम दोनों हाथों में हाथ डाले खुशी खुशी

चलेंगे साथ साथ अनचीन्हे रास्तों पर

जहाँ पथ पर रोशनी ही रोशनी हो,

जहाँ वातावरण में दिव्य संगीत गूँजता हो

और जहाँ अपार शान्ति हो, सुकून हो

और हो तेरा साथ !

तो किसी दिन आना ज़रूर सखी !

उस दिन बिलकुल चुपके से

मुझे सरप्राइज देने के लिए

अनायास ही तुम आ धमकना

इस सरप्राइज़ का मैं ज़रूर

तहे दिल से स्वागत करूँगी

ये वादा रहा !


चित्र - गूगल से साभार  


साधना वैद

 


Tuesday, June 15, 2021

एक आत्मा का स्वर्गारोहण

 


अस्पतालों में पसरी बदइन्तज़ामी

प्राणरक्षक दवाइयों की किल्लत

और रोज़ मरने वालों की बढ़ती तादाद,

इतनी परेशानियों के बीच

बस एक ही सुखद खबर कि मुझे

मुक्ति मिली चालीस साल की कैद से

और लो हो गयी पूरी मेरे मन की मुराद ! 

जाने कैसे और क्यों केवल

दो तीन हफ़्तों के लॉक डाउन से

यह इंसान हो जाता है बेज़ार,

मुझे देखो मैं तो चालीस साल से

कैद थी इस एक ही शरीर में

कुछ भी देखने, कहीं भी आने जाने,

या पल भर को भी कभी इस शरीर से

बाहर निकलने से एकदम लाचार !

आज मिली है आज़ादी इस कैद से

तो मैं खूब जश्न मनाउँगी

अपनी हर ख्वाहिश पूरी करूँगी और

धरती, आकाश, नदी, पहाड़ 

हर जगह घूमने जाउँगी ! “

आत्मा मृतक के शरीर को छोड़

चल दी शहर की सैर पर अस्पताल से दूर,

और देख कर हर गली हर मोहल्ले में

पहाड़ से भी ऊँचे कूड़ों के अम्बार,

मच्छरों और दुर्गन्ध से भरी गंदी नालियाँ,

भर गया उसका मन घृणा से

और लुभाने लगा उसे आसमान का नूर !

आत्मा ने भरी ऊँची सी उड़ान और

उड़ने लगी पल भर में वो पंछियों के साथ

लेकिन ऊँचे आकाश में पहुँच कर

उसका दम घुट रहा था,

धरती के तमाम कल कारखानों और

अनगिनती वाहनों का गाढ़ा गाढ़ा काला धुआँ

सारे वातावरण को प्रदूषित कर रहा था !

दूर गगन से नहीं देख पा रही थी वो 

बर्फ से लदे खूबसूरत पहाड़ और सुन्दर चाँद सितारे

न ही सुन्दर पंछी और न ही धरती के नज़ारे !

धुएं और धूल मिट्टी से लथपथ

क्लांत श्रांत आत्मा अब स्वच्छ होना चाहती थी,

ऊब चुका था उसका मन इस गंदी प्रदूषित दुनिया से

शुद्ध पानी से नहा धोकर अब वह

अपने स्वर्ग के आवास में सुकून से सोना चाहती थी !

पवित्र नदियाँ जिनमें नहा कर मानव का

शरीर ही नहीं आत्मा तक शुद्ध हो जाती है  

बचपन से इन नदियों की महिमा वह सुनती आई थी.

आज जब खुद को स्वच्छ करने की इच्छा जागी

तो उसे इन्हीं पवित्र नदियों की याद हो आई थी !

आत्मा ने आसमान से सीधे डुबकी लगाई

गंगा जल में इस आशा से कि वह

किसी विज्ञापन की नायिका की तरह स्वच्छ सुन्दर हो

श्वेत हंसिनी सी बाहर निकल कर आयेगी,

तन मन निर्मल और शुद्ध हो जाएगा और फिर

पूर्णत: पवित्र हो वह स्वर्ग की राह पर निकल जायेगी !

लेकिन जल को स्पर्श करते ही 

भय के मारे उसके कंठ से चीख निकल गयी,

आत्मा नदी के पाट में पसरी तमाम गन्दगी

और जल में प्रवाहित अनेक शवों के

क्षत विक्षत अंगों के बीच फँस गयी !

अब वह सच में घबराने लगी थी !

ऐसी गंदी, इतनी प्रदूषित दुनिया से तो

उसे अपनी चालीस साल की

मानव शरीर की कैद ही भाने लगी थी !

वह जान चुकी थी कि

नादान इंसान अपनी भूलों से  

पर्यावरण को कितना विषाक्त बना रहा है,

और आने वाली पीढ़ियों के लिये

गंभीर खतरों की नींव रख रहा है !

जो प्रदूषण की यह रफ़्तार नहीं रुकी तो

वर्तमान पर तो संकट मंडरा ही रहा है

भविष्य भी चौपट हो जाएगा,

फिर किसे दोष देगा यह मूर्ख मानव

और किसे अपनी व्यथा सुनाएगा !

 

साधना वैद

 

 

 

 

 

  

 

Saturday, June 12, 2021

पर्यावरण चिंतन

 



रिक्शे में बैठें

साइकिल निकालें

सवारी करें

 

पैदल चलें

शुद्ध रखें हवा को

वर्जिश करें  

 

दोस्ती निभाएं

प्रदूषण घटायें 

साथ में जायें 

 

छोड़ें कारों को

सस्ती ई-गाड़ियों का

लाभ उठायें 

 

दूरियाँ बढ़ीं 

तो वाहन भी बढ़े

धुआँ भी बढ़ा 

 

घुला ज़हर

घुटने लगी साँस

पारा भी चढ़ा 

 

कारें ही कारें

दिखतीं सड़क पे 

हवा में धुआँ 

 

जीना दुश्वार

एक ओर है खाई

तो दूजा कुआँ

 

थोड़ी सी दूरी 

पैदल तय करें 

धुएँ से बचें 

 

खुद को मानें

प्रदूषण का दोषी 

भ्रम से बचें

 

चंदा सूरज 

धुएँ की चादर में 

धुँधले दिखें

 

मानवी भूलें  

गंभीर खतरों की

कहानी लिखें

 

 पेड़ लगायें 

हरियाली बढ़ायें 

प्राण बचायें 

 

पंथी को छाया

पंछी के नीड़ हित

युक्ति लगाएं   

 

 

बीमार हुए 

धूम्रलती के संग 

घर के लोग


अकारण ही

बिना किसी दोष के

लगाया रोग

 

साँस के साथ

ग्रहण करें धुआँ 

होवें बीमार 

 

हुआ अनर्थ

आपके व्यसन से 

बच्चा बीमार 

 

आपकी लत 

आपके अपनों को

करे लाचार

 

अब तो चेतें

सुधार लें खुद को

बनें उदार

 

 चैन से जियें

बीड़ी सिगरेट का

छोड़ें व्यसन

 

संकल्प करें

बनाना ही है स्वच्छ

पर्यावरण

 

 

साधना वैद