घाटी के एक सुरम्य पर्यटन स्थल में सघन सर्च ऑपरेशन चल रहा था ! कुछ विश्वस्त सूत्रों से खबर मिली थी कि दिन में किसी भी समय सैलानियों पर आतंकी हमला हो सकता है ! पहलगाम की घटना के बाद से सेना और प्रशासन बेहद सतर्क और चौकन्ने थे ! वे कोई भी रिस्क नहीं लेना चाहते थे लेकिन सैलानियों को शंकित और भयभीत कर उनके आनंद में विघ्न भी डालना नहीं चाहते थे ! सेना और पुलिस के दर्जनों अधिकारी और फ़ौजी सादा ड्रेस में सैलानियों के साथ मिल वादी की खूबसूरती का लुत्फ़ उठा रहे थे और गरमागरम स्नैक्स, कहवा, चाय, कॉफ़ी के साथ हर तरफ अपनी नज़रों को भी बिछाए हुए थे ! कहीं कोई गिलहरी भागती या चिड़िया पंख फड़फड़ाती तो यह भी उनकी पैनी नज़र से चूकता नहीं था !
तभी गुलमोहर के एक पेड़ के पीछे लेफ्टीनेंट असलम को कुछ हलचल का आभास हुआ ! असलम ने अपनी कमीज़ के नीचे बुलेटप्रूफ जैकेट पहन रखी थी ! वह तेज़ी से पेड़ की तरफ दौड़ा और उसने भागने की तैयारी में जुटे आतंकवादी के चहरे से नकाब खींच ली ! यह अशरफ था उसके बचपन का दोस्त और पड़ोसी ! असलम को देखते ही कुछ पल को आतंकी ठिठका फिर ज़ोर से उसे गले लगा कर बोला, “अरे वाह असलम तुम तो अपने ही यार निकले, तुमने तो जान ही निकाल दी थी मेरी ! चलो मेरे साथ अपने आका से मिलवाता हूँ तुम्हें ! वारे न्यारे हो जाएंगे तुम्हारे भी !” आतंकी ने असलम की बाँह थामी !
तभी असलम ने अशरफ के दोनों बाजुओं को पीठ के पीछे कस कर पकड़ उसे अपने काबू में ले लिया और उसकी कनपटी पर रिवॉल्वर लगा कड़कती हुई आवाज़ में गरजा !
“कौन यार ! किसका यार ? यहाँ तुम सिर्फ एक आतंकी हो, देश और कौम के गुनहगार और मैं हूँ एक फ़ौजी ! भारत माँ का लाल !
चित्र - गूगल से साभार
साधना वैद


