औरतों ने पुरुषों की तरह पैसे कमाए
तो भी किसीने उन्हें शाबाशी नहीं दी
औरतों ने पुरुषों की तरह घर की बागडोर सम्हाली
उन्हें तब भी किसी ने शाबाशी नहीं दी
औरतों ने ज़ुल्म के खिलाफ आवाज़ उठाई
तब भी किसीने उनका साथ नहीं दिया
औरत ईश्वर का रचा वह अक्षय पात्र है
जिसका अवदान कभी घटता नहीं
प्रेम, दया, करुणा
सेवा, सहानुभूति, संवेदना
वह जितनी बाँटती है
प्रभु उसका अक्षय पात्र फिर से भर देता है !
स्त्री से सिर्फ लोगों को अपेक्षा ही अपेक्षा है
न उसका कोईअधिकार है
न उसकी कोई ज़रुरत
न उसका कोई ख्वाब है
न उसकी कोई हसरत
वह सिर्फ एक पेड़ की छाँव है
जिसके नीचे पथिक अपनी थकन उतार कर
चला जाता है और जाने के बाद
कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखता
कि किस पेड़ ने खुद दिन भर
कठिन धूप में जल कर
उसे ठंडी छाँव दी थी !
चित्र - गूगल से साभार
साधना वैद
