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Friday, May 8, 2026

मदर्स डे

 




क्या इस बार भी  

खूबसूरत आभासी गुलदस्ते, 

तरह-तरह के आभासी केक 

और वंचना भरे शुभकामना सन्देश

भेज कर मना लोगे तुम

‘मदर्स डे’,

और खुश हो जाओगे  

अपनी दयानतदारी पर, 

या अपनी व्यस्ततम दिनचर्या से 

निकाल पाओगे 

कुछ दिन, कुछ घंटे, कुछ पल 

और कर दोगे उन्हें समर्पित

अपनी वास्तविक माँ के लिए 

जो वर्षों से दूर देश के किसी

निर्जन एकांत में  

तुम्हारी राह देखते-देखते हर क्षण

हताश होती जा रही है,

वृद्ध होती जा रही है,

दुर्बल होती जा रही है ? 

तुम्हारी माँ की आँखें 

अब पथरा गई हैं,

घुटनों के दर्द ने

चलना दुश्वार कर दिया है, 

तुम्हारे लिए स्वादिष्ट पकवान

बनाने वाले अभ्यस्त हाथ 

अब पानी से भरा 

गिलास उठाने में भी 

काँपने लगे हैं !

बिस्तर पर लेटे-लेटे वह

जोहती रहती है तुम्हारी बाट ! 

इससे पहले कि उसकी आँखें 

इतनी धुँधला जाएं कि वह

तुम्हें पहचान ही न पाए 

एक बार तो मना लो ‘मदर्स डे’

उसके साथ, उसके पास, 

उसके सानिध्य में ! 

इससे बड़ा उपहार उसके लिए 

शायद और कुछ न होगा !

एक बात याद रखना 

दुनिया के सारे खूबसूरत मंज़र 

सदियों बाद भी ऐसे ही 

सुंदर बने रहेंगे लेकिन 

माता-पिता की नश्वर देह 

पल-पल छीजती जाती है,

शिथिल होती जाती है, 

चुकती जाती है !

देर न हो जाए कहीं 

देर न हो जाए !  

 

चित्र - गूगल से साभार 

साधना वैद 

 

  

 


Tuesday, May 5, 2026

कुछ कहते हैं ये ताँका

 




ग़रीब तो हैं 

खुद्दार भी हैं हम

टूटते हैं तो

जानते है जुड़ना

गिर के खड़े होना !


मजदूर हैं 

मजबूर नहीं हैं

रच डालेंगे 

स्वेद की सियाही से

निज सौभाग्यनामा !


उठायें बोझ

सारे जग का हम

और हमारा ?

बोलो, कौन उठाये ?

सीने से चिपटाये ?

 

क्या दोगे तुम

          किताब या कुदाल ?         

खुशी या आँसू ?

खिलौने या फावड़ा?

जीवन या मरण ?


जाती बाहर 

रोटी की जुगत में

माँ काम पर   

मैं हूँ घर की रानी

करती चौका पानी !

 

हर चुनौती

आसान या मुश्किल

साध्य है मुझे !

नहीं स्वीकार अब

वर्चस्व पुरुषों का ! 


ओ मेरे मौला  

माथे पे गहराती

चिंता की रेख

सोने की कलम से

लिख नया सुलेख !


तू है महान

धरा से नभ तक

हर दिशा में

गुंजित तेरा गान

ओ माँ तुझे सलाम ! 


बोझ उठाते

नये घर बनाते

न जाने कैसे

हम बेघर हुए

खुद पे बोझ हुए !


चित्र - गूगल से साभार 


साधना वैद


Wednesday, April 29, 2026

औकात - लघुकथा


 






दीनू एक शानदार भव्य भवन के ऊँचे से गेट के बाहर दो घंटे से खड़ा हुआ घर के मालिक मल्होत्रा जी का इंतज़ार कर रहा था ! उन्होंने ही संदेशा भेज कर उसे गाँव से बुलवाया था ! उनके किसी दोस्त का मकान बन रहा था और उन्हें किसी होशियार मिस्त्री की ज़रुरत थी ! मल्होत्रा जी जानते थे कि इस काम के लिए दीनू से बढ़िया और कोई मिस्त्री नहीं हो सकता इसीलिये उन्होंने उसके पास ड्राईवर की मार्फ़त संदेसा भिजवाया था ! उनका ड्राईवर भी तो उसी गाँव का है जहाँ दीनू रहता है ! जैसे ही मल्होत्रा जी की गाड़ी आई दरबान ने अदब से उठ कर गेट खोला ! गाड़ी के साथ-साथ दीनू ने भी भवन के अहाते में प्रवेश कर लिया !


मल्होत्रा जी अपनी चमचमाती हुई गाड़ी से उतरे और घर की ओर बढ़े ! दीनू भी उनके पीछे चल दिया ! तभी दरबान की कड़कती हुई आवाज़ आई
, “कहाँ घुसा चला जा रहा है ! औकात है तेरी ऐसे फर्श पर पैर धरने की ! चल बाहर निकल ! मालिक को बात करनी होगी तो बुला लेंगे तुझे !”


दीनू वहीं ठिठक गया ! उसकी आँखें भर आईं ! कैसे बताए कि तीन साल पहले इस भवन की हर दीवार की एक-एक ईंट उसीकी ही लगाई हुई है और जिस फर्श पर पाँव धरने की आज उसकी औकात नहीं आँकी जा रही उस फर्श की ऐसी चिकनी और सुन्दर सूरत उसीकी जी तोड़ मेहनत और घिसाई के बाद ही निकल कर आई है ! विडम्बना देखिये आज उसीके बनाए फर्श पर पाँव धरने के लायक उसकी औकात है या नहीं यह एक दरबान तय कर रहा है !

साधना वैद


Friday, April 24, 2026

मूँगफली पुराण

 



कितनी फुर्सत से रचा, प्रभु ने यह उपहार

सजे हुए हैं खोल में, दाने सुंदर चार !

दाने सुंदर चार, ईश की लीला न्यारी 

लगते कितने स्वाद, धरा पर कूड़ा भारी !

कहे साधना आज, बात तो है बस इतनी 

प्रभु ने यह उपहार, रचा फुर्सत से कितनी ! 


बैठे महफिल में सभी, छेड़ रहे हों राग

मूँगफली हों सामने, खुल जायेंगे भाग !

खुल जायेंगे भाग, बड़ी गुणकारी मेवा 

भर-भर बाँटो आज, करो तुम सबकी सेवा 

कहे साधना आज, “अजी तुम काहे ऐंठे 

चलो बढ़ाओ हाथ, रहो ना गुमसुम बैठे !” 


भावे सबको कुरकुरी, स्वाद मिले भरपूर

हाथ रुके ना एक पल, होय न पैकिट दूर !

होय न पैकिट दूर, मज़ा हो जाए दूना 

खाते जाएं दोस्त, लगे कितना भी चूना

कहे साधना आज, न कोई उठ के जावे

मूँगफली के साथ, मसाला सबको भावे ! 


होकर तन्मय देखते, परदे पर है चोर 

अँधियारे में सब सुनें, चटर पटर का शोर !

चटर पटर का शोर, कहीं गिर जाए दाना 

होता मन बेचैन, ढूँढ कर उसको लाना 

कहे साधना आज, दुखी हैं दाना खोकर  

मिल जाए तब फिल्म, देखते तन्मय होकर !  



साधना वैद 

Tuesday, April 14, 2026

फायकू - 2

 




लिख डाले कितने खत

जोश में हमने

तुम्हारे लिए

 

कितने ही कोरे कागज

रंग डाले हमने

तुम्हारे लिए

 

सोचते थे ले आएंगे

तोड़ कर तारे

तुम्हारे लिए

 

चाँद भी उतार लाएंगे

इस ज़मीन पर

तुम्हारे लिए

 

लेकिन चूर चूर हुआ

जो सपना देखा

तुम्हारे लिए

 

हम वंदनवार लगाते रहे 

चौक पुराते रहे

तुम्हारे लिए

 

हज़ारों दीप जलाते रहे

फूल बिछाते रहे

तुम्हारे लिए

 

पूरा घर सजाते रहे

रंगोली बनाते रहे

तुम्हारे लिए

 

तुम अनदेखा करते रहे

हम मिटते रहे

तुम्हारे लिए



चित्र - गूगल से साभार 

 

साधना वैद


Monday, March 30, 2026

कह मुकरी - 2

 




दिन भर मुझको काम बताता

सारे घर में नाच नचाता

लेकिन मन का है वो सच्चा

को सखी साजन ? ना सखी बच्चा !

ले आता मँहगे उपहार

चूड़ी, कंगन, झुमके, हार

चाहे खुश होकर दूँ दाद

को सखी साजन ? ना री दमाद !

१०

रात को जब खिड़की से आये

देख उसे दिल घबरा जाए

मन चाहे कर दूँ मैं शोर

को सखी साजन ? ना सखी चोर !

११

जैसे ही वो घर में आये

मेरी साँस गले घुट जाए

रौब दाब है उसका जबरा

को सखी साजन ? ना सखी ससुरा !

१२

जो कह दूँ वो कभी न सुनता

जो बतलाऊँ उलटा करता

करता है अपनी मनमर्ज़ी

को सखी साजन ? ना सखी दर्ज़ी !

१३

दबे पाँव घर में आ जाए

किचिन खोल सब माल उड़ाये

मक्खन, ब्रेड, जैम, अंगूर

                 को सखी साजन ? ना लंगूर !

१४

जब आकर खिड़की से झाँके

पहरों बैठा मुझको ताके

लगे मुझे हर दुःख तब मंदा

को सखी साजन ? ना सखी चंदा !

१५

मुझे देख कर सीटी मारे

ज़ोर ज़ोर से नाम पुकारे

और सुनाये मीठे बैना

को सखी साजन ? ना सखी मैना !

चित्र - गूगल से साभार 

साधना वैद 


Wednesday, March 25, 2026

गुफ्तगू – लघुकथा

 







महीनों से एक टूटे फूटे कनस्तर में पड़े पत्थर के थोड़े से कोयलों को बड़ी हैरानी हो रही थी ! आज मालकिन ने उन्हें सालों बाद बाहर निकाला है ! सूरज की रोशनी आज ज्यादह चमकदार लग रही थी ! हवा भी तो कितनी खुशनुमां लग रही थी ! वरना इतने दिनों से सीलन भरे डिब्बे में बंद पड़े उनका तो दम ही घुटा जा रहा था ! आज शांता बाई पुरानी-धुरानी अँगीठी को भी बड़े जतन से मरम्मत करके साफ़ सुथरी मिट्टी से पोत रही थी ! पास में एक थैली में कुछ उपले भी रखे थे ! आखिर कोयलों से रहा नहीं गया तो पूछ ही लिया उपलों से ! 

“आखिर बात क्या है उपले भाई ? इतने लम्बे समय से हम तो अपने कनस्तर में बंद पड़े सो रहे थे तो दुनिया की कुछ खबर ही नहीं है हमको ! आज मालकिन को हमारी याद कैसे आ गयी ?”

उपले कुछ गुमसुम से लग रहे थे !

“अरे, तो क्या तुम्हें युद्ध की कोई खबर नहीं है कोयला भाई ? यह जो अमेरिका और इरान में युद्ध छिड़ गया है उसके कारण खाना पकाने वाली गैस की कमी हो गई है ! इसीलिये अब मालकिन को हमारी याद आई है ! यह हमारी खातिर तवज्जो इसीलिये हो रही है कि अब घर वालों की भूख मिटाने के लिए हमें अपना बलिदान देना होगा !”

“अरे, इतनी भी चिंता क्यों कर रहे हो उपले भाई ! मैं हूँ ना चिर युवा ! मेरे होते तुम पर कोई आँच नहीं आएगी ! तुम्हारी साज सजावट तो सिर्फ इसलिए है कि घर में ब्याह शादी हो तो सारे बारातियों को सज धज के तैयार रहना चाहिए ! न जाने किसकी पुकार लग जाए ! तुम चिंता न करो ! मेरे होते तुम्हारी शहादत की ज़रुरत नहीं पड़ेगी इसका भरोसा है मुझे !”

तसल्ली देती यह आवाज़ थी इन्डक्शन चूल्हे की ! 


साधना वैद