प्यार तुम्हारा साथ रहेगा हरदम
याद तुम्हारी साथ रहेगी हरदम
तुमने कब हमको तनहा छोड़ा है
भले दूर हो साथ रहोगे हरदम !
चित्र - गूगल से साभार
साधना वैद
सच्चे अर्थों में
मित्रता वरदान होती है,
भाग्य का उपहार होती है,
हमारे जीवन की
सबसे बड़ी उपलब्धि होती है,
हमारी बिगड़ी सुर ताल की
सुरीली तान होती है,
नसीब से मिली हुई हमें
हमारी सबसे बड़ी सौगात होती है !
जब जी चाहा
रो लिए जाकर उसके पहलू में
और हल्का कर लिया अपना मन,
जब जी चाहा
झगड़ लिए और शांत कर लिया अपना गुस्सा,
जब जी चाहा
डाँट दिया और खुद निर्द्वंद्व हो गए,
जब जी चाहा
छेड़-छेड़ कर उसे रुला दिया
और खुद मज़े लेते रहे !
लेकिन मित्र ने कभी बुरा न माना,
कभी बैर न ठाना,
न कभी छोड़ा आना जाना !
उसका प्यार सदा अक्षुण्ण रहा
उसकी बाहें सदा गले लगाने को फ़ैली रहीं
उसके काँधे सर टिकाने के लिए
सदा उपलब्ध रहे
उसकी बाहें सहारा देने को
सदा तत्पर रहीं
और हम उसकी बैसाखियों के सहारे
जीवन की हर दौड़ में
स्पर्धा के लिए सदा तैयार रहे
क्योंकि हमारा मित्र हमारे साथ था
एक अचल, अडिग पर्वत की तरह
और हमारे लिए यह सबसे बड़ा
सहारा था !
चित्र - गूगल से साभार
साधना वैद
🙏🌹🌹🌹🙏
तितली प्यारी
दिन भर फूलों पे
करे सवारी
उड़ती फिरे
उपवन के हर
फूल-फूल पे
चखती रहे
सुमधुर पराग
रस से भरा
संचित करे
सुकोमल पंखों में
ढेर सी ऊर्जा
अर्जित करे
कोमल हृदय में
अदम्य शक्ति
पीना है उसे
मधुर मकरंद
हर पुष्प का
पाना है उसे
रस गंध सौन्दर्य
सारे बाग़ का !
साधना वैद
देखते हो मुझे
कैसे कुदरत का कहर टूटा मुझ पर
और कैसे आँधी तूफ़ान ने
बर्बाद कर दिया मुझे !
कुदरत तो कुदरत थी
उस पर किसका वश था
लेकिन जड़ से उखड़े मेरे जिस्म पर
संसार के सबसे जहीन
इस ‘बुद्धिजीवी’ इंसान ने भी
ज़रा तरस नहीं खाया
और काट-काट कर
मेरी हर डाल,
नोच-नोच कर मेरा हर फूल,
मेरा हर पत्ता इस नाशुक्रे इंसान ने
बिलकुल निरावृत कर दिया मुझे !
लेकिन मेरी जिजीविषा देखो
देखो मेरे हृदय की उदारता को !
किस तरह मेरा कटा नुचा भग्न शरीर
अपनी खंडित साँसों के साथ भी
तुम्हें जीवन दान देने के लिए
अपनी पूरी ताकत से लड़ रहा है
मेरा रोम-रोम अंकुरित हो रहा है
तुम्हें शीतल छाँह देने के लिए,
फल-फूल, खुशबू देने के लिए,
तुम्हारे थके हुए फेंफडों को
प्राण वायु देने के लिए !
यही फर्क है एक पेड़ में और इंसान में
पेड़ सिर्फ देना ही देना जानते हैं
प्रतिदान में कुछ नहीं माँगते
और इंसान ?
वह सिर्फ लेना ही लेना जानता है
अपने जीवन दाता हरे-भरे वृक्ष को
को चीर फाड़ कर
ख़त्म कर देने में भी
उसे कोई एतराज़ नहीं होता !
साधना वैद
जलते रहे
ज़िंदगी की धूप में
पाँव के छालों की
परवाह किये बगैर
बिना रुके बिना थमे
दिन रात बस चलते रहे
चलते ही रहे ।
न मिला हमें ठौर कहीं
न ही कहीं मिली छाँह
और हम अभिशप्त से
समय की झंझा में
डाल से टूटे पत्ते की तरह
बेबस और बेआस बस
उड़ते रहे
उड़ते ही रहे ।
हालात की दुश्वारियों ने
इस तरह कर दिया लाचार
कि हम आज गर्दिशों के
उफनते सैलाब में
तिनके की तरह
बहते रहे
बहते ही रहे
सुनाई किसीको भूले से
कभी जो दास्ताने गम
ऊब कर वो उठ गया
और हम कहते रहे
कहते रहे
कहते ही रहे ।
चित्र - गूगल से साभार
साधना वैद
टी वी पर समाचार चल रहे थे ! इन दिनों की सबसे प्रमुख खबर, केतन अग्रवाल मर्डर मिस्ट्री को बड़े विस्तार के साथ दिखाया जा रहा था ! शालिनी का मन घबराने लगा था ! उनके घर में भी जवान बेटी है सुनेत्रा ! बहुत सुन्दर, सुशिक्षित, आधुनिक ख्यालों वाली ! खूब प्रखर और मुखर भी ! एकदम निर्भीक और आत्मविश्वास से भरी हुई ! स्कूल कॉलेज में हर एक्टीविटी में सबसे आगे रहने वाली और घर परिवार में भी सबसे अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाने वाली ! शालिनी माँ होकर भी हमेशा उसकी हर बात मानतीं और खुद से भी अधिक उसके फैसलों पर भरोसा करतीं !
खबरें देखते-देखते उनका मन विचलित हो रहा था ! जाने कैसा डर उनके मन में घनीभूत होता जा रहा था ! उसी समय बड़े करीने से सजी धजी सुनेत्रा अपने हाथ में घड़ी बाँधती हुई घर कमरे में आई !
“मम्मी, मैं जा रही हूँ शाम को आने में देर हो जाए तो फ़िक्र मत करना ! हम लोग मूवी देखने जा रहे हैं ! आज रोहित का जन्मदिन है ! उसके बाद वह हमें डिनर के लिए ले जाएगा ! प्रज्ञा और विनोद भी जा रहे हैं साथ में ! दस बजे तक आ जाएंगे ! देर होगी तो फोन कर दूँगी आपको !” सुनेत्रा अपना सामान इधर उधर से समेटती हुई पर्स में रखती जा रही थी और शालिनी को अपने शाम के प्रोग्राम के बारे में बता भी रही थी !
“तुम कहीं नहीं जा रही हो !” शालिनी की कठोर आवाज़ सुन कर सुनेत्रा दंग थी ! आज तक मम्मी ने उसके साथ इस टोन में बात नहीं की थी !
“क्या हुआ मम्मी ? आपकी तबीयत तो ठीक है ? आज के प्रोग्राम के बारे में मैंने आपको तीन चार दिन पहले ही बता दिया था ! उसके बाद ही सबसे हाँ कहा था ! अब क्या हो गया ? जल्दी आने की कोशिश करूँगी ! एन वक्त पर नहीं जाउँगी तो सबका मूड खराब होगा ! कुछ हुआ है क्या ?“
सुनेत्रा की नज़रें मम्मी की नज़रों का अनुसरण करते हुए टी वी समाचारों पर टिक गईं ! सिया केतन की कहानी को विस्तार के साथ वहाँ दिखाया जा रहा था ! शालिनी ने काँपते हाथों से सुनेत्रा के हाथों को थाम लिया ! सुनेत्रा ने आगे बढ़ कर टी वी बंद कर दिया !
“क्या मम्मी ! आप भी बस जाने क्या-क्या सोचती रहती हो ! अच्छा यह बताओ आपको मेरे चरित्र और संस्कारों पर संदेह है या अपनी परवरिश और सीख पर ? क्या सच में आपको इतना डरने की ज़रुरत है ?” सुनेत्रा मम्मी की पीठ को हौले-हौले सहला रही थी और शालिनी का उद्विग्न मन धीरे-धीरे शांत होता जा रहा था ! उसने प्यार से सुनेत्रा के माथे को चूम लिया, “अब जा जल्दी से नहीं तो फिल्म छूट जाएगी !” और सुनेत्रा लम्बे-लम्बे डग भरते हुए कमरे से बाहर निकल गई !
साधना वैद
चित्र - गूगल से साभार