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Tuesday, March 17, 2026

वह लड़का है - लघुकथा

 



राधिका बहुत खुश थी ! उसके परंपरावादी परिवार ने बड़ी कशमकश और तनातनी के बाद अंतत: बड़े भैया माधव के अंतरजातीय विवाह के लिए अनुमति दे ही दी ! उनके रूढ़िवादी ब्राहमण परिवार में यह एक ऐतिहासिक फैसला था कि माधव का विवाह उसके साथ पढ़ने वाली रागिनी के साथ होने जा रहा था ! यद्यपि उसके बाबा दादी और घर के अन्य वरिष्ठ सदस्य अभी भी इस निर्णय के खिलाफ थे ! ऐसा दुस्साहस अभी तक उनके खानदान में किसी ने नहीं किया था लेकिन इकलौते बेटे की जिद के आगे सबको अपने हथियार डालने ही पड़े ! राधिका खुश थी इसलिए कि अब उसका रास्ता भी साफ़ हो गया है ! जब माधव भैया का विवाह वैश्य समुदाय की कन्या के साथ हो सकता है तो उसका विवाह उसके कायस्थ दोस्त के साथ क्यों नहीं हो सकता ! विश्वास बहुत्त ही स्मार्ट, हैंडसम और प्रतिभाशाली नौजवान है और उसके साथ ही एक मल्टी नेशनल कंपनी में काम करता है ! उसके परिवार में सभी उच्च शिक्षित और प्रगतिशील सोच रखने वाले उदारमना लोग हैं ! मन ही मन उसने अपने सुन्दर भविष्य के सपने बुनने भी शुरू कर दिए थे ! रात को ही उसने विश्वास को पत्र में लिख दिया था कि माधव भैया की शादी के बाद वह अपने माता-पिता से अपने बारे में बात करेगी ! यह पत्र आज वह ऑफिस में विश्वास को देने वाली थी ! उसे माधव भैया और अपनी नई नवेली भाभी से भी समर्थन की पूरी आशा थी ! अधरों पर मीठी सी मुस्कान लिए उसने यही बात बताने के लिए विश्वास को वीडियो कॉल मिलाया !
उसी समय आँधी की तरह उसकी मम्मी ने कमरे में प्रवेश किया और उसके हाथ से फोन छीन कर दूर फेंक दिया ! उनके हाथ में राधिका का लिखा हुआ पत्र था !
“क्या है यह सब राधिका ?” माँ की आँखों से खून बरस रहा था !
“तुम्हारी हिम्मत भी कैसे हुई यह सब सोचने की और करने की ?”
“क्या हो गया मम्मी ? माधव भैया अपनी पसंद की लड़की से शादी कर सकते हैं तो मैं अपनी पसंद के लड़के से क्यों नहीं ?” राधिका सहम गयी थी !
“माधव से बराबरी करोगी तुम ? अरे वह लड़का है ! लड़कों के सौ गुनाह भी माफ़ हो जाते हैं लेकिन लड़की का एक गुनाह पूरे कुल को ले डूबता है ! जानती हो तुम
?




साधना वैद
 


Thursday, March 12, 2026

दोहा ग़ज़ल

 




बच्चे शिक्षक का नहीं, करते अब सम्मान
मौक़ा एक न छोड़ते, करते नित अपमान !

कोचिंग कक्षा की बड़ी, मची हुई है धूम
लेकिन लालच ने किया, इसको भी बदनाम !

दुगुनी तिगुनी फीस भर, माथा जाये घूम
कहते विद्या दान से, बड़ा न कोई दान !

साक्षरता के नाम पर, कैसी पोलम पोल
सच्चे झूठे आँकड़े
भरने से बस काम !

नैतिकता कर्तव्य को, ढीठ पी गए घोल !
प्रतिशत बढ़ना चाहिए, साक्षरता के नाम !

कक्षा नौ में छात्र सब, दिए गए हैं ठेल
ऐसी शिक्षा से भला, किसका होगा नाम !

अध्यापक और छात्र में, हो न परस्पर भीत  
शिष्य करें गुरुदेव का, मन से आदर मान !

करना होगा पितृ सम, शिक्षक को व्यवहार
बच्चे भी दर्शन करें शिक्षक में भगवान् !

 

साधना वैद

 


Wednesday, March 4, 2026

होली है

 




बुरा न मानें 

न चिढ़ें, न चिढ़ाएँ

रंग लगाएं

प्रेम और प्यार के 

दें शुभकामनाएं ।


प्यार का पर्व

है रंगों की बहार

मीठी गुंजार

है पानी की फुहार

है होली का त्योहार



चित्र - गूगल से साभार 


                साधना वैद                

Friday, February 20, 2026

सेवा

 



आप घर से बाहर कहीं भी जाइए, वो चाहे किसी भी स्तर का होटल हो, अस्पताल हो, स्कूल कॉलेज हो या कार्यालय हो आपकी सुविधा के लिए आपको हर स्थान पर सहायकों का एक दल मिलेगा जिसे उस संस्था के आयोजक सेवा दल का नाम देते हैं ! सरकारी नौकरी करने वाले लोग भी सेवक कहलाते हैं ! इसका तो नाम ही लोक सेवा आयोग है ! राजनीति में आने वाले लोग भी स्वयं को जनता का सेवक कहते हैं लेकिन उनका तो उद्देश्य ही जनता को ठगना है और सारे छल छद्म करके उनसे वोट हासिल करना है ! मेरी दृष्टि में हर वह कार्य जिसके लिए आपको वेतन मिलता है वह आपकी जीविका का साधन है सेवा नहीं ! इन सभी स्थानों पर परोक्ष या प्रत्यक्ष रूप से आप स्वयं ही इन सेवाओं का भुगतान करते हैं ! कभी किराए के रूप में, कभी टिप के रूप में, कभी फीस के रूप में या कभी रिश्वत के रूप में जिसे आज की प्रचलित भाषा में सुविधा शुल्क कहा जाता है ! सेवा कभी खरीदी या बेची नहीं जा सकती ! सेवा एक अमूर्त भावना है जिसके प्रतिदान में कोई भी अपेक्षा या प्रत्याशा नहीं होती ! यह सिर्फ अनन्य प्रेम, करुणा, दया या श्रद्धा से जुड़ी भावना है जिसके पीछे न कोई स्वार्थ होता है न ही लालच ! सेवा के पीछे परोपकार की भावना जुड़ी होती है जहाँ आप निर्मल मन से केवल सामने वाले के कष्ट को कम करने के प्रयास में तन मन धन से जुट जाते हैं और हर हाल में उसे सुख पहुँचाना चाहते हैं यह जानते हुए भी कि आपको इसके प्रतिदान में कुछ मिलने वाला नहीं है ! सेवा एक विशुद्ध सात्विक कर्म है जो सेवा पाने वाले और सेवा करने वाले दोनों को ही अनिर्वचनीय आनंद से भर देता है और दोनों को ही इससे परम सुख की प्राप्ति होती है !

इस निष्काम सेवा के भी तीन रूप होते हैं ! एक सेवा वह है जिसके तहत हम किसी साधू महात्मा या किसी बुज़ुर्ग को सम्मान देने के लिए उनके सारे काम करते हैं, उनके पैर दबाते हैं, उनके भोजन पानी की व्यवस्था करते हैं और उनके बाकी सारे कार्य भी करते हैं ताकि उनकी सहायता हो जाए और हमें उनका आशीर्वाद मिल जाए !  
दूसरी सेवा के तहत आता है मंदिरों या गुरुद्वारों में जाकर सेवा कार्य करना जैसे इन देवस्थानों की साफ़ सफाई
, जूते चप्पलों का रख रखाव या वहाँ की रसोई में भोजन बनाने या परसने खिलाने में मदद करना ! बर्तनों की साफ़ सफाई इत्यादि !
और तीसरी सेवा वह होती है जो बिलकुल दीन हीन, असहाय
, लाचार अस्वस्थ रोगियों के लिए की जाती है जिन्हें मदद न मिले तो उनका जीवन संकट में आ जाए !  
मेरे विचार से हर मनुष्य जिसमें मानवता शेष है अपनी क्षमता और सामर्थ्य के अनुसार कुछ न कुछ सेवा तो अवश्य ही करता है !

साधना वैद


Saturday, February 14, 2026

नई विधा - जो दोनों ओर से पढ़ी जा सके

 




झीना था प्रतिरूप तुम्हाराछीना था हर चैन हमारा

अच्छा था मोहक था खेलसच्चा था रोचक था मेल

करते रहे तुम्हें हम दूरकहते रहे तुम्हें हम हूर

छलना था कितना आसानकहना था बस दो फरमान  

 

तुमको हमने चाहा यह सुख अपना था

तुमको पा हम लेंगे यह एक सपना था !

सपने लेकिन होते हैं केवल सपने

हमको पल-पल तिल-तिल करके तपना था !

 

जागी जगती, जागे पक्षी, जलचर जागे

जागी धरती, तारे, चंदा, अम्बर जागे

जागो तुम अब जाग गया सूरज देखो

जागी प्रकृति सकल सृष्टि अंतर जागे !

 

साधना वैद

 


Thursday, February 12, 2026

यह भी कविता है

 




उगता सूर्य
क्षितिज की लालिमा
भोर का गान
 

फूलों के हार
अगर की खुशबू
देवों का मान

 

उड़ते पंछी
उमड़ती नदियाँ
ढूँढें सुमीत

 

खिलते फूल
सुरभित पवन
गाते सुगीत  

 

शिशु की हँसी
ममता छलकाती
माँ की मुस्कान

  

लिखे कविता
प्रकृति कलम से
निराली शान

 

भाती सभी को
अद्भुत ये कविता
हे गिरिधारी

छेड़ दो तान
बजाओ न मुरली
कृष्ण मुरारी

 

साधना वैद


 


Wednesday, February 4, 2026

कोशिश कम रही

 






वक्त के उजले सफों पर गर्द सी कुछ जम रही
लाख चाहा भूलना पुरज़ोर, कोशिश कम रही !
हमकदम, न हमनफस, न हमसफर है साथ में
राहे मंज़िल पर अभी से चाल क्यूँ है थम रही !



चित्र - गूगल से साभार 


साधना वैद