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Friday, October 30, 2026

पत्रिका सी तुम





आती हो तुम मेरे घर में

हर रविवार को किसी

साप्ताहिक पत्रिका सी !

ढेर सारी खुशियों की सौगात लिए

मेरे दिल की तो जैसे

कली-कली खिल जाती है !

किसी आध्यात्मिक आलेख सी

तुम मेरे मन की दुश्चिंताओं के

समाधान मुझे सुझाती हो

मेरे मन की शंकाओं का

शमन कर मुझे शांत कर देती हो !

किसी रोचक कहानी की तरह

मेरी कल्पनाओं को, मेरे सपनों को

कल्पना के पंख देकर

उड़ान भरने के लिए

आसमान में पहुँचा देती हो !

मुझे एक बेहतर इंसान बनाने के लिए

किसी वैचारिक आलेख की तरह

मेरे अन्दर सामाजिक सरोकारों के प्रति

एक अलख सी जगा देती हो !

हर साप्ताहिक पत्रिका की तरह

तुम भी मेरे घर की रसोई को

स्वादिष्ट व्यंजनों की सुगंध से

सुरभित कर देती हो और

मेरे क्षुधित उदर को

साक्षात अन्नपूर्णा की तरह

संतुष्ट और तृप्त कर देती हो !

हर लोकप्रिय पत्रिका में

मन की थकन को दूर करने के

जो हँसी के आभासी गोलगप्पे

प्लेटों में सजे दिखाए जाते हैं

तुम सचमुच के गोलगप्पे खिला कर

मेरे मन की तिक्तता, रिक्तता,

कटुता को दूर भगा कर

मेरी हर व्याधि का

उपचार मनोरंजक बातों से

कर जाती हो और मुझमें फिर से

एक उल्लास, एक उमंग, एक जोश

और ढेर सारी ऊर्जा को जगा जाती हो !  

मुझे अपनी इस साप्ताहिक पत्रिका से

बहुत प्यार है और तुम्हारे जाने के बाद  

मैं फिर से अगले हफ्ते

तुम्हारे आने का इंतज़ार

बड़ी शिद्दत के साथ

करने लगता हूँ !


चित्र गूगल से साभार 


साधना वैद



 





Thursday, October 22, 2026

बस ! अब और नहीं

 



“आज शाम को छह बजे आप ‘हमराज़’ कैफे में आ जाइये ! केबिन में बैठ कर कॉफ़ी के साथ-साथ अगला प्रोजेक्ट भी डिस्कस कर लेंगे |” बॉस ने अर्थपूर्ण दृष्टि से देखते हुए नलिनी से कहा !

नलिनी बॉस का कुत्सित इशारा समझ रही थी | वह खून का घूँट पीकर रह गयी लेकिन कुछ कह न सकी !

“आपका टेलर कौन सा है नलिनी | फिटिंग बहुत बढ़िया होती है आपके कपड़ों की |”

सारे शरीर पर रेंगती बॉस की ललचाई नज़रें उसे कचोट रही थीं | रोज़ रोज़ की इस बदनीयती को कब तक नज़रअंदाज़ करती रहे वह !

नलिनी ने कठोर दृष्टि से बॉस को घूरा ! कुछ सकपका कर बॉस ने जोड़ा, “वो मेरी बेटी दीपा कह रही थी एक दिन ! किसी दिन उसे भी ले जाइयेगा अपने साथ अपने टेलर के पास !”

“जी सर !” कह कर नलिनी बॉस के केबिन से बाहर आकर अपनी डेस्क पर कुछ टाइप करने लगी !

इस बार मुट्ठी में अपना त्यागपत्र थामे नलिनी दृढ़ कदमों से बॉस के कमरे की ओर बढ़ रही थी |

 


चित्र - गूगल से साभार 

साधना वैद


Monday, October 12, 2026

देवी को न देवता को ....

 



आज शालिनी के उत्साह और जोश का कोई ठिकाना नहीं था ! शादी के बाद बेटी अपूर्वा पहली बार ससुराल से अपने मायके आई थी ! आज उसने अपनी सभी सहेलियों को मिलने के लिए बुलाया था ! शालिनी सुबह से बेटी की पसंद के पकवान बनाने में लगी हुई है ! तय समय पर सभी सहेलियाँ आ गईं और सभी ने स्वाद ले ले कर हर व्यंजन खूब सराहते हुए तृप्त होकर खाया ! 

“अरे, तुम लोगों ने तो कुछ खाया ही नहीं ! सब ख़तम करो ! कुछ भी बचना नहीं चाहिए ! अभी तो सभी कुछ वैसा ही रखा हुआ है !” शालिनी सबकी मनुहार में लगी हुई थी ! 

तभी दरवाज़े पर जमादारनी आ खड़ी हुई ! 

“बीबी जी, कुछ हो बचा खुचा तो दे दो मुझे भी आज तो बच्चों के मुँह में दाना भी नहीं गया है ! बड़ी आस लेकर आई हूँ !” 

शालिनी की त्योरियाँ चढ़ गईं, “देख नहीं रही हो मेहमान आये हैं घर में ! देवी को न देवता को नकटा भूत को पहले दे दो ! जाओ अभी ! सुबह आना तब देखेंगे !” 

अपूर्वा हतप्रभ हो उठी थी ! उसने आवाज़ देकर रोका जमादारनी को ! 

“रुको अम्माँ !” तीखी नज़रों से शालिनी को घूरते हुए मेज़ पर रखे सारे बचे हुए पकवान उसने एक थैली में डाल कर जमादारनी को दे दिए ! 

"ले जाओ अम्माँ ! बच्चों को खिला देना घर ले जाकर !" जमादारनी खूब आसीसें देती हुई गदगद भाव से गई !

“क्या मम्मी तुम भी... !” शालिनी का चेहरा बदरंग हो उठा था !


साधना वैद 


Friday, October 9, 2026

नसीहत

 


नव विवाहिता चित्रा अपनी ससुराल में गृहस्थी के सबक सीख रही थी ! पढ़ने में बेहद मेधावी और संगीत, अभिनय, स्पोर्ट्स सब में सबसे आगे रहने वाली चित्रा विवाह की दौड़ में भी सबसे आगे रही ! पिताजी के सेवा निवृत हो जाने के कारण उसका विवाह भी सबसे पहले हो गया और पढाई-लिखाई, खेलकूद, अभिनय, संगीत सब पीछे छूट गए ! अपने घर में सबसे बिंदास, खुशमिजाज़ और मस्तमौला चित्रा रूढ़िवादी ससुराल में परिवार की सबसे बड़ी बहू बन कर आई जिसके कंधे पर गृहस्थी के सुचारू संचालन का भार तो था ही अपने छोटे सदस्यों के सामने अपने अनुशासित आदर्श व्यवहार का उदाहरण रखना भी था ताकि वे घर की परम्परा का पूरी तरह से निर्वाह करने में कभी भूल न करें ! इसीलिये अति अनुशासन प्रिय सासू माँ की सख्त नज़र सदैव चित्रा पर रहती कि किसी भी काम में उससे कोई भूल न हो जाए ! ज़रा सी गलती पर चित्रा को डाँट भी बहुत पड़ती ! चित्रा बेचारी मन ही मन घुटती रहती लेकिन किसीसे कुछ न कहती ! मन में विद्रोह की ज्वाला भड़कती तो भी वह उसे जैसे-तैसे शांत कर लेती ! 

चित्रा के पति सौमित्र सब कुछ देखते समझते हुए भी अपनी माँ से कुछ न कह पाते ! उनकी परवरिश और संस्कार आड़े आ जाते ! लेकिन चित्रा की घुटन भी उन्हें नागवार लगती ! 

एक बार सौमित्र चित्रा को अपने साथ फिल्म दिखाने के लिए ले जाना चाहते थे ! माँ से अनुमति माँगने की हिम्मत चित्रा की हो नहीं रही थी और सौमित्र खुद पूछने में संकुचित हो रहे थे ! जैसे-तैसे बहुत समझाने पर चित्रा ने डरते-डरते सासू माँ से सौमित्र के साथ फिल्म देखने जाने की इजाज़त माँगी ! आशा के अनुरूप उनका गुस्सा सातवें आसमान पर था ! 

“तुम सिनेमा देखने चली जाओगी तो रात का खाना कौन बनाएगा ? एक तो वैसे ही तुम्हें कुछ आता-जाता नहीं है ! उस पर सारा ध्यान सिंगार पटार में और घूमने फिरने में लगा रहता है !”

“नहीं माँ जी ! इनकी मर्जी है जाने की !” चित्रा ने सहमते हुए प्रतिवाद किया ! 

“तो तुम्हीं ने कहा होगा उसे सिनेमा ले जाने लिए ! मन लगता कहाँ है तुम्हारा घर के कामों में !” 

आँखों में आँसू भरे हुए चित्रा कमरे में आ गयी ! सौमित्र का चेहरा तमतमाया हुआ था ! ज़ाहिर है उन्होंने सारी बातें सुन ली थीं ! चित्रा की पीठ पर स्नेह से थपकी देते हुए उन्होंने एक ही बात कही - 

“चित्रा, सत्ता किसीको भी प्लेट में सजी हुई नहीं मिलती न उसके लिए तुम घर वालों की भीड़ जुटा कर मोर्चाबंदी कर सकती हो ! उसके लिए तो तुम्हें खुद ही प्रयत्न करने होंगे अपनी समझदारी से ! कभी नरमी से तो कभी सख्त होकर भी !”  


साधना वैद 


 


Sunday, October 4, 2026

मदर्स डे - लघुकथा

 


आज विधायक जी के घर में बड़ी चहल-पहल थी ! शहर के एकमात्र वृद्धाश्रम में उन्हें आज मदर्स डे के अवसर पर वहाँ रहने वाली निराश्रित महिलाओं को सम्मानित करने के लिए जाना था ! विधायक जी की पार्टी के लोग, शहर के सभी प्रशासनिक अधिकारी, अधीनस्थ कर्मचारी एवं पत्रकारों का अच्छा खासा जमावड़ा था ! पुष्प मालाओं की टोकरी, मिठाई के डिब्बे और नई साड़ियों के पैकेट्स गाड़ियों में रखवाए जा रहे थे ! विधायक जी की पत्नी भी बड़े सलीके से सजी हुई साथ जाने के लिए विधायक जी के पास आकर खड़ी हो गयी थीं ! 

सारी तैयारियों के साथ यह काफिला नियत समय पर वृद्धाश्रम पहुँच गया ! बड़े ही भव्य आयोजन में अपने घर परिवार से तिरस्कृत होने के बाद इस वृद्धाश्रम में रहने को मजबूर हुई सभी बुज़ुर्ग महिलाओं को विधायक जी ने सादर चरण स्पर्श कर पुष्पहार पहना कर सम्मानित किया ! विधायक जी की पत्नी ने उन्हें नई साड़ियाँ भेंट कर मिठाई के लड्डू खिलाए ! रुँधे हुए गले से विधायक जी ने जीवन में माँ की महत्ता एवं स्थान का बड़ा ही भावपूर्ण सारगर्भित भाषण दिया ! पत्रकार और फोटोग्राफर पल-पल की तस्वीरें अपने कैमरे में कैद करते जा रहे थे ! 

“माता का स्थान तो स्वर्ग से ऊपर भी होता है ! माँ के चरणों में ही तो सारे धाम हैं ! जिसने सच्चे मन से माँ की सेवा की उसे तो जीते जी इस संसार में ही मोक्ष मिल जाता है !” भाषण लंबा था ! तालियों की गड़गड़ाहट के साथ कार्यक्रम संपन्न हुआ और विधायक जी का काफिला विजयी भाव से सभा स्थल से लौट चला ! घर पहुँचते ही विधायक जी के ड्राइंग रूम में मटमैली सी पुरानी धोती में एक क्षीणकाय दुर्बल स्त्री ने प्रवेश किया, “काय लल्ला आज तो हमें भी लड़ुआ मिली हैं के नाय ? कितेक दिना से कछु मीठो नाय चखो ! कोऊ बताय रओ हतो, बो का कहत हैं बाए, हाँ आज मदर्स डे है ! जा के लाने ही तुम सबन को लड़ुआ बाँटबे को गए रहे !”  


साधना वैद 


Friday, October 2, 2026

बापू तुम्हें प्रणाम

 



तुमसा जग में कोई 

न था, न हुआ, न शायद होगा 

मानवता के प्रति 

तुम्हारी निष्ठा को प्रणाम 

बापू तुम्हें प्रणाम ! 


तुम सोये तो एक संकल्प लेकर, 

तुम जागे तो दृढ निश्चय के साथ 

अपने उसूलों पर तुम डटे रहे 

पूरी प्रतिबद्धता के साथ  

देश के उत्थान के हित 

तुम्हारे समर्पण को प्रणाम 

बापू तुम्हें प्रणाम ! 


सत्य अहिंसा के तुम पुजारी थे, 

दया, करुणा, प्रेम सब गुणों पर भारी थे 

मानवता बसी थी तुम्हारी रग-रग में, 

स्वतन्त्रता का नारा दिया था 

पूरे विश्वास के साथ सम्पूर्ण जग में 

तुम्हारी जिजीविषा, 

तुम्हारी हठ को प्रणाम 

बापू तुम्हें प्रणाम !


तुम्हारे उसूल, तुम्हारे सिद्धांत, 

तुम्हारे आदर्श, तुम्हारे वृत्तांत

श्रद्धा से सुनता है सारा संसार, 

मनाता है जन्मदिन तुम्हारा 

इस धरा का हर देश 

सातों सागर पार 

तुम्हारा जीवन, तुम्हारा आचरण 

आज भी जन-जन के लिए 

अनुकरणीय है, 

वन्दनीय है, नमनीय है ! 

तुम्हारे देवत्व को प्रणाम 

बापू तुम्हें प्रणाम ! 


साधना वैद 

Thursday, October 1, 2026

टमाटर का सूप - लघुकथा

 



आज घर में बड़ी चहल पहल सी थी । पूरे घर को बड़े करीने से सजाया गया था, मेज़ पर ताज़े फूलों का गुलदस्ता था, किचिन से आती स्वादिष्ट पकवानों की सुगंध सारे घर में भरी हुई थी । शाम को ऋतु दीदी को देखने के लिए मेहरा साहेब सपरिवार आने वाले हैं । सुप्रिया उन्ही की आवभगत की तैयारियों में जुटी थी । सुप्रिया के पति ज्ञानेश बारीकी से हर व्यंजन को निरख परख रहे थे । सभी कुछ बहुत बढ़िया था । अचानक उन्हें खयाल आया कि सुप्रिया ने सूप तो बनाया ही नहीं । सुप्रिया टमाटर का सूप बहुत ही बढ़िया बनाती है । उन्होंने पूछ ही लिया

"सुप्रिया सूप बना लिया क्या ? मुझे तो चखाया ही नहीं । टमेटो सूप के साथ सूप स्टिक्स रखना मत भूलना ।"

"हाय राम सूप का तो ध्यान ही नहीं रहा मुझे । अब तो टमाटर भी दो चार ही बचे हैं ।अब क्या करें । सूप स्टिक्स भी खत्म हो गई हैं । सुनिये पंकज से कहिये ना जल्दी से बाज़ार से टमाटर और सूप स्टिक्स ला दे साथ ही कॉर्नफ्लोर का डिब्बा भी ले आए । सूप तो हाल बन जाएगा । बस सामान जल्दी से आ जाए ।" 

पंकज मम्मी पापा की बातें सुन कर चुपचाप खिसकने की योजना बना रहा था कि ज्ञानेश जी ने उसे ज़ोर से आवाज लगाई ।

"पंकज ज़रा बाजार से मम्मी को कुछ सामान लाकर दे दो जल्दी से । शाम को कुछ मेहमान आ रहे हैं डिनर पर । जल्दी जाओ । वरना देर हो जाएगी ।"

पंकज का फ्यूज उड़ गया था । बिना सूप के भी तो खाना खाया जा सकता है । क्या मुसीबत है । सब्जी मंडी में कितनी भीड़ होती है । कीचड़ गंदगी अलग से । झल्लाया हुआ वह सुप्रिया के पास पहुँचा । 

"क्या मम्मी आपको हर चीज एन वक्त पर ही क्यों याद आती है । टमाटर का सूप नहीं बनेगा तो क्या वो लोग दीदी को रिजेक्ट कर जाएंगे । वैसे भी कौन पसंद करता है टमेटो सूप आजकल । इतना बेकार का होता है ।  फ्रूटी के डिब्बे ला देता हूँ सूप की जगह वो सर्व कर देना ।"

सुप्रिया ने घूर कर पंकज को देखा । ज्ञानेश भी आ गए थे । बेचारा मन मार कर थैला उठा कर बाहर निकल गया । उसे टमाटर का सूप सख्त नापसंद था । इससे तो मम्मी कॉर्न का सूप बना लेतीं या चाइनीज सूप ऑर्डर करके मंगवा लेतीं । लेकिन पापा के आगे उसका बस कहाँ चलता है । 

मेहमानों के आने से पहले टमाटर का गाढ़ा-गाढ़ा स्वादिष्ट सूप तैयार हो गया था । मेहमान आ चुके थे और डिनर का पहला कोर्स सूप ही था । पंकज सबके साथ बैठा हुआ बेमन से किसी तरह उस सूप को गले के नीचे उतार रहा था । उसे फिक्र हो रही थी कहीं इस सूप की वजह से वे लोग ऋतु दीदी को रिजेक्ट ना कर दें । तभी मेहरा साहेब की बुलंद आवाज गूँजी । "भाभी जी आपने घर में बनाया है यह सूप ? भई वाह । मज़ा आ गया । ऋतु बिटिया को सिखाया है या नहीं आपने यह सूप बनाना । आपने तो दिल ही जीत लिया । बिटिया को अच्छी तरह प्रैक्टिस करवा दीजिएगा । शादी के बाद उसे रोज़ बनाना पड़ेगा ऐसा सूप यह तो तय है ।"

और एक सम्मिलित ठहाके से कमरा गूँज उठा । 


साधना वैद