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Saturday, August 1, 2015

बरसा सावन





धरा नवोढ़ा
डाले अवगुंठन
प्रफुल्ल वदन
तरंगित तन
धारे पीत वसन  
उल्लसित मन
विहँसती क्षण-क्षण !
उमड़े घन
करते गर्जन
कड़की बिजली
तमतमाया गगन
बरसा सावन 
तृप्त तन मन
कुसुमित कण-कण
संचरित नवजीवन
खिले सुमन
सजा हर बदन
सुरभित पवन
पंछी मगन
हर्षित जन-जन
धरा पुजारन  
मुग्ध नयन
अश्रु जल से
धोये चरण
करे अर्पण
निज जीवन धन
प्रकृति सुन्दरी  
तुम्हें नमन !  


साधना वैद


Wednesday, March 4, 2015

सूर्य और धरा


अपनी स्वर्ण रश्मियों की
       सुदीर्घ लेखनी से        
बालारुण जब
उषा काल के
इस बृह्म मुहूर्त में 
धरा के प्रशस्त भाल पर
सुनहरे शब्दों से अपनी
दिव्य शुभाशंसा उकेर देता है
धरा विभोर हो
उस शुभाशंसा के हर शब्द को
अपनी प्रभाती के
कोमल स्वरों में शामिल कर
समूचे बृह्मांड में
विस्तीर्ण कर देती है ! 

 

मध्यान्ह की बेला में
प्रखर प्रभाकर जब
अपनी अग्नि शलाका सी
विशाल बाहुओं की
ऊर्जावान उँगलियों से
धरा के चप्पे चप्पे की
निराई करता है और 
अपने प्रगल्भ, प्रचण्ड ताप से
उर्वर धरा को उष्मित कर
उस पर जलाशयों से संचित
वाष्प का छिड़काव करता है  
अति प्रफुल्लित एवं उपकृत धरा
अपने रोम-रोम से
अंकुरित, पल्लवित, कुसुमित हो
इस महादानी की कृपा का
प्रतिदान देती है !

संध्याकाल में जब
यही चितेरा भुवन भास्कर
धरा के सौंदर्य पर विमुग्ध हो  
अपनी सुकुमार रश्मियों की
दीर्घ तूलिकाओं को
इन्द्रधनुषी रंगों में डुबो कर
उसका श्रृंगार करने के लिये
गगन से नीचे उतारता है
दिन भर के श्रम से क्लांत
उसके थरथराते हाथों से
रंगों की यह प्याली
नीचे गिर जाती है और  
धरा से अम्बर तक
समूचा संसार
मनमोहक सप्तवर्णी रंगों से
सराबोर हो जाता है ! 


दूर क्षितिज में
कदाचित अपनी भूल से क्षुब्ध
कुछ सकुचाया सा
कुछ शर्माया सा
पश्चाताप में डूबा
लज्जित आदित्य
आरक्त मुख लिये
धरा से विदा ले
पश्चिम दिशा की ओर
उन्मुख हो जाता है
किन्तु तभी
आकुल व्याकुल व्यग्र धरा
निस्तेज निष्प्रभ सूर्य को
आकाश से नीचे खींच
अतिशय दुलार से
अपनी ममतामयी गोद में 
आश्रय दे देती है !  



साधना वैद


  



Saturday, January 10, 2015

सफ़ेद मछली




छोटे से एक्वेरियम में बंद
बेचैनी से चक्कर काटती
उस सफ़ेद मछली को  
देखती रहती हूँ मैं अपलक !
कितनी छोटी सी थी
जब मैं लाई थी उसे
अब बूढ़ी हो चली है !
सारा जीवन काट दिया उसने
इस छोटे से काँच के घर में
ऊपर नीचे दायें बाएं
अथक चक्कर लगाते !
कभी कुछ नहीं माँगा
कभी इस चारदीवारी से
बाहर नहीं निकली !
मैंने भी तो उसे
भोजन के चंद दानों के सिवा
कभी कुछ और कहाँ दिया !
कभी-कभी सोचती हूँ
क्या फर्क है इस मछली में
और एक आम स्त्री के जीवन में !
पिता का घर छोड़ 
छोटी उम्र में ही
आ जाती है वह भी
अपने काँच के घर वाली
ससुराल में और दिन रात
अथक चक्कर लगाती रहती है
अंतहीन दायित्वों के निर्वहन में !
सास-ससुर, जेठ-जेठानी,
देवर-देवरानी, ननद-नंदोई,
पति बच्चे और तमाम सारे
नाते रिश्तेदार, 
दोस्त अहबाब और पास पड़ोसी 
सबकी ज़रूरतों का ध्यान रखते
वह कब बूढ़ी हो जाती है
पता ही नहीं चलता !
बुनियादी ज़रूरतों को
पूरा करने के अलावा
कब कोई जानने की
कोशिश करता है कि उसे भी
कुछ ज़रूरत हो सकती है  
उसकी भी कोई ख्वाहिश हो सकती है
उसका भी कोई अरमान हो सकता है !
वह तो बस एक ज़रिया  
बन कर रह जाती है
और सब की ज़रूरतों को
पूरा करने के लिये
और सब की ख्वाहिशों को
तरजीह देने के लिये
और सब के अरमानों को 
सजाने सँवारने के लिये !  
काँच की दीवारों के बाहर का
आसमान उसे दिखाई तो देता है
लेकिन उड़ान भरने के लिये
उसके पास ना तो पंख होते हैं,
ना हौसला, ना ही काँच के
उस मजबूत घर से
बाहर निकलने के लिये
उसे कोई द्वार ही दिखाई देता है !
बेजुबान मछली की तरह  
उसके भाग्य में भी इसी तरह
अपने दायित्वों की परिधि पर 
घर की धुरी के इर्द गिर्द आजीवन
चक्कर काटना ही बदा है
अथक निरंतर अहर्निश
बिना कुछ कहे
बिना कुछ माँगे !

साधना वैद