ग़रीब तो हैं
खुद्दार भी हैं हम
टूटते हैं तो
जानते है जुड़ना
गिर के खड़े होना !
मजदूर हैं
मजबूर नहीं हैं
रच डालेंगे
स्वेद की सियाही से
निज सौभाग्यनामा !
उठायें बोझ
सारे जग का हम
और हमारा ?
बोलो, कौन उठाये ?
सीने से चिपटाये ?
क्या दोगे तुम
किताब या कुदाल ?
खुशी या आँसू ?
खिलौने या फावड़ा?
जीवन या मरण ?
जाती बाहर
रोटी की जुगत में
माँ काम पर
मैं हूँ घर की रानी
करती चौका पानी !
हर चुनौती
आसान या मुश्किल
साध्य है मुझे !
नहीं स्वीकार अब
वर्चस्व पुरुषों का !
ओ मेरे मौला
माथे पे गहराती
चिंता की रेख
सोने की कलम से
लिख नया सुलेख !
तू है महान
धरा से नभ तक
हर दिशा में
गुंजित तेरा गान
ओ माँ तुझे सलाम !
बोझ उठाते
नये घर बनाते
न जाने कैसे
हम बेघर हुए
खुद पे बोझ हुए !
चित्र - गूगल से साभार
साधना वैद