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Monday, May 20, 2024

माँ की याद - कतौता

 



जब तुम थीं 

सुबह मुस्काती थी 

साँझ भी हर्षाती थी 


जब तुम थीं 

हर दिन गीत था 

जीवन संगीत था 


जब तुम थीं 

कितना दुलार था 

जी भर के प्यार था 


जब तुम थीं 

मन में उमंग थी 

दिल में तरंग थी 


तुम थीं न माँ

तब मैं बच्ची सी थी 

अक्ल से कच्ची सी थी 


तुम क्या गईं 

मैं तो बड़ी हो गई

खुद खड़ी हो गई


आता है याद 

बचपन सुहाना 

वो गुज़रा ज़माना 


जो गुज़ारा था 

तुम्हारे रेशमी से

आँचल की छाँव में 


हिल मिल के 

स्वर्ग से भी सुन्दर 

सुहाने से गाँव में 


चित्र - गूगल से साभार 

साधना वैद 

Saturday, May 18, 2024

कटघरा

 




आज फिर तुम मुझे घेर कर
कटघरे में खड़ा करना चाहते हो
मेरे हर जवाब, हर तर्क,
हर सफाई, हर गवाही की
धिज्जियाँ उड़ा उन्हें
फूँक मार हवा में उड़ाना चाहते हो !
और करना चाहते हो
अपनी हर मंशा पूरी
मुझे अपमानित करने की,
मुझे प्रताड़ित करने की
और मुझे पराजित करने की !
करना चाहते हो तो देख लो करके
यह भी कोशिश
इस बार तुम्हें सिर्फ और सिर्फ
मायूसी ही हाथ लगेगी
अपनी हर जिरह, हर बहस, हर कुचाल
मुँह के बल ज़मीन पर
औंधी पड़ी तुम्हें मिलेगी !
क्योंकि अब हमें तुम्हारी हर चाल का
जवाब देना आ गया है
कटघरे की इन दीवारों के बीच
सालों खड़े रहने के बाद  
हमें तुम्हारे अनर्गल प्रलाप की निरर्थकता
और अपने मौन की सुदृढ़ किलेबंदी का
महत्त्व समझ में आ गया है
अब हमें तुम्हारे माथे पर लिखी
हार की इबारत में  
अपनी जीत का जश्न मनाने का
सलीका आ गया है !

साधना वैद   


Tuesday, May 14, 2024

एक चिट्ठी माँ के नाम

 



मेरी बहुत अच्छी वाली मम्मी,

लगभग ३८ साल हो गए तुमको गए हुए लेकिन क्या ३८ पल के लिए भी कभी मेरे ख्यालों से
, मेरी यादों से, मेरी चेतना से, मेरे हर क्रिया कलाप से तुम विलग हुई हो? तुम्हारे बिना सुबह कैसी होती है, दिन कैसा होता है, रात कैसी होती है कभी जाना ही नहीं| कभी तुम्हें याद करने की सायास कोशिश तो की ही नहीं लेकिन किसी भी पल तुम्हें भूली हूँ वह भी तो याद नहीं आता| हर छोटे से छोटा काम करते वक्त पता नहीं कैसे पार्श्व से तुम्हारा ही चेहरा झाँकने लगता है| चाहे किचिन में खाना बनाना हो, कविता कहानी लिखनी हो, अचार डालना हो या सिलाई, कढ़ाई बुनाई करनी हो| जहाँ भी अटक जाती हूँ तुम पता नहीं कहाँ से आ जाती हो और चुटकियों में मेरे मानस पटल पर अवतरित हो मेरी उलझन सुलझा कर अंतर्ध्यान हो जाती हो|
“क्या कर रही है! नमक आधा कर! कड़वी हो जायेगी सब्जी|”
“अरे! समझाया था न तुझे बॉर्डर के बाद स्वेटर की पूरी लम्बाई का जब एक तिहाई रह जाए तब आर्महोल के फंदे छाँटते हैं! अभी से छाँट देगी तो स्वेटर ऊँचा हो जाएगा ना!”
“अरे इस फूल को लॉन्ग एंड शॉर्ट स्टिच से काढ़ ले शेडेड धागे से बहुत सुन्दर लगेगा|”
और यूँ तुम्हारे जाने के इतने साल बाद भी मुझ पर तुम्हारे नियंत्रण की डोर अभी भी उसी तरह से कसी हुई है जैसे तब हुआ करती थी जब मैं स्कूल कॉलेज जाया करती थी|
कभी तुम्हारे प्यार की, तुम्हारी परवाह की तब कद्र ही नहीं की मम्मी| आज सोचती हूँ तो मन पश्चाताप से और आँखें आँसुओं से भर जाती हैं| ज़रा-ज़रा सी बात पर मैं गुस्सा हो जाती थी| तुमसे रूठ जाती थी और अबोला ठान कर बैठ जाती थी अपने कमरे में
| तब तुम कितना मनाती थीं, अपने हाथों से कौर बना कर मुझे खिलाती थीं और मैं निष्ठुर सी तुम्हारे हर प्रयास को निष्फल सा करती जाती थी| मुझे याद है शादी से पहले एक बार तुमसे बहुत नाराज़ हो गयी थी मैं| तुम कितनी स्नेहमयी हो, संवेदनशील हो, कोमल हृदय की हो सारी बातें झूठी लगती थीं| मुझे दुःख था जब तुम मेरे मन को नहीं समझ सकीं, मेरी पीड़ा को नहीं पहचान पाईं, मेरी व्यथा की गहराई नहीं नाप सकीं तो तुम्हारा कवियित्री होने का कोई अर्थ नहीं है लेकिन मैं उस समय नहीं समझ सकी थी कि तुम इन सबसे ऊपर एक ‘माँ’ थीं जो कभी अपने बच्चों का अहित नहीं होने दे सकती ! वह बच्चों के जीवन में आने वाले संभावित खतरों को पहले ही भाँप लेती है और फिर मान अपमान हानि लाभ के समीकरणों को भूल वह सबसे पहले बच्चों को अपने सुदृढ़ और कठोर संरक्षण में छिपा लेती है फिर चाहे उसमें बच्चों को अपना दम घुटता सा ही क्यों न लगे| उस समय सारी दया माया भूल वह सिर्फ एक तटस्थ रक्षक होती है जिसे किसी भी कीमत पर अपने बच्चों के हितों की रक्षा करनी होती है|
अपनी उस नादानी के लिए मुझे आज भी बहुत संताप होता है मम्मी| उस समय तुम निष्ठुर नहीं हो रही थीं निष्ठुर तो मैं हो रही थी
| उन दिनों की स्मृति को मैं अपने जीवन से मिटा देना चाहती हूँ लेकिन कोई ऐसा रबर या इरेज़र भी तो नहीं मिलता कहीं जो यह चमत्कार करके दिखा दे|  
तुमसे जुड़ी न जाने कितनी बातें हैं जो आज भी मेरे मन और आँखें दोनों को भिगो जाती हैं| मुझे याद है ज़िंदगी भर तुम अपनी हर नई साड़ी सम्हाल कर बक्से में रख देती थीं और तब तक खुद नहीं पहनती थीं जब तक पहले मैं उसे ना पहन लूँ| मेरी शादी के बाद भी इस परम्परा में कभी व्यवधान नहीं आया
| जब मैं मायके आती तो सबसे पहले तुम्हारा संदूक खुलता और अपनी सारी नई साड़ियाँ तुम मुझे निकाल कर दे देतीं, “जो पसंद हो ले लो जो नहीं पसंद हो पहन कर नई कर दो फिर मैं पहन लूँगी|”
अब वर्षों से यह सिलसिला बंद हो चुका है| लेकिन नई साड़ी देखते ही तुम्हारा सरल तरल चेहरा आँखों के आगे प्रगट हो जाता है और मेरे नैनों को भी तरल कर जाता है| दो महीने और बचे हैं| पूरे ७६ वर्ष की हो जाऊँगी लेकिन मन अभी भी बच्चा ही है और तुम्हारे सानिध्य के लिये तड़पता है
| याद आता है कि ज़रा सा ज्वर आते ही जहाँ बाबूजी डॉक्टर बुलाने के लिये उपक्रम करते थे तुम चुपके से राई नोन लाल मिर्चें मुट्ठी में दबा कर नज़र उतारने की जुगत में व्यस्त हो जाती थीं| बाबूजी को यही लगता था कि यह डॉक्टर की दवा का असर था कि मैं इतनी जल्दी ठीक हो गयी लेकिन तुम्हारा विश्वास अडिग होता था कि मेरा ज्वर तुम्हारे नज़र उतारने की वजह से भागा है|         
एक कविता तुम्हारे लिए लिखी थी आज तुम्हें ही समर्पित कर रही हूँ !

ममता की छाँव


वह तुम्हीं हो सकती थीं माँ

जो बाबूजी की लाई

हर नयी साड़ी का उद्घाटन

मुझसे कराने के लिये

महीनों मेरे मायके आने का

इंतज़ार किया करती थीं ,

कभी किसी नयी साड़ी को

पहले खुद नहीं पहना ! 

 

वह तुम्हीं हो सकती थीं माँ

जो हर सुबह नये जोश,

नये उत्साह से

रसोई में आसन लगाती थीं

और मेरी पसंद के पकवान बना कर

मुझे खिलाने के लिये घंटों

चूल्हे अँगीठी पर कढ़ाई करछुल से

जूझती रहती थीं !

मायके से मेरे लौटने का

समय समाप्त होने को आ जाता था

लेकिन पकवानों की तुम्हारी लंबी सूची

कभी खत्म ही होने को नहीं आती थी ! 

 

वह तुम्हीं हो सकती थीं माँ

मेरा ज़रा सा उतरा चेहरा देख

सिरहाने बैठ प्यार से मेरे माथे पर  

अपने आँचल से हवा करती रहती थीं

और देर रात में सबकी नज़र बचा कर

चुपके से ढेर सारा राई नोन साबित मिर्चें

मेरे सिर से पाँव तक कई बार फेर

नज़र उतारने का टोटका

किया करती थीं !  

 

वह तुम्हीं हो सकती थीं माँ

जो ‘जी अच्छा नहीं है’ का

झूठा बहाना बना अपने हिस्से की  

सारी मेवा मेरे लिये बचा कर

रख दिया करती थीं

और कसम दे देकर मुझे

ज़बरदस्ती खिला दिया करती थीं !

 

सालों बीत गये माँ

अब कोई देखने वाला नहीं है

मैंने नयी साड़ी पहनी है या पुरानी ,  

मैंने कुछ खाया भी है या नहीं ,

मेरा चेहरा उदास या उतरा क्यूँ है ,

जी भर आता है तो

खुद ही रो लेती हूँ

और खुद ही अपने आँसू पोंछ

अपनी आँखें सुखा भी लेती हूँ

क्योंकि आज मेरे पास

उस अलौकिक प्यार से अभिसिंचित

तुम्हारी ममता के आँचल की 

छाँव नहीं है माँ

इस निर्मम बीहड़ जन अरण्य में

इतने सारे ‘अपनों’ के बीच

होते हुए भी

मैं नितांत अकेली हूँ !  

न जाने कितना कुछ उमड़ता आ रहा है तुमसे कहने को मम्मी लेकिन जानती हूँ अब इस अरण्यरोदन का कुछ हासिल नहीं है| लेकिन यही सोच कर तसल्ली कर लेती हूँ कि अब तुमसे मिलने के दिन समीप आते जा रहे हैं| जो कुछ मैंने तुम्हारे जाने के बाद यहाँ मिस किया है वह सब कुछ तुम्हारे पास आकर सूद सहित वसूलूँगी| बहुत याद आती है तुम्हारी हँसी, तुम्हारी बातें, तुम्हारी कवितायेँ, तुम्हारे स्वादिष्ट व्यंजन और तुम्हारा प्यार भरा आँचल| मुझे सब कुछ जीना है एक बार फिर से तुम्हारे साथ| मुझे जल्दी आना है तुम्हारे और बाबूजी के पास| अब कभी रूठ कर नहीं बैठूँगी कोपभवन में यह वचन देती हूँ| इस बार मुझे क्षमा कर दो ना| तुम्हारी गोद में सोने को आतुर, 
तुम्हारी साधना   

 

साधना वैद

 

 

 


Monday, April 29, 2024

मुस्काते पल - सेदोका

 



तुम्हारा आना

नयनों का लजाना

बातों का बिसराना

पुराने दिन

कॉलेज का ज़माना

तेरा खिलखिलाना


याद आ गयीं

वो बिसरी सी बातें

मीठी सी मुलाकातें

मुस्काते पल 

हँसते हुए दिन 

खिलखिलाती रातें  


कैसे भूलेंगे

टेनिस का रैकेट 

कैरम की गोटियाँ

वो शरारतें 

वो खिलन्दड़ापन

छोटी लम्बी चोटियाँ 

 

आओ फिर से

महफ़िल सजाएं

हँस लें मुस्कुराएँ

न जाने फिर

ऐसे सुन्दर दिन

कभी आयें न आयें  

 

आ जाओ साथी

खुशियाँ फिर जी लें

सुख मदिरा पी लें

चूक न जाएँ

दो दिन का जीवन 

हँस हँस के जी लें !

 

चित्र - गूगल से साभार 


साधना वैद


Wednesday, April 24, 2024

एक दिलकश कहानी

 



दुनिया है फानी

सदा आनी जानी


सुनाती हूँ तुमको

सुनो ये कहानी


गज़ब था बुढापा

अजब थी जवानी


वो थी शाहजादी

बला की दीवानी


भाया था उसको

एक बूढा अमानी


था झुर्रीदार चेहरा 

नज़र थी रूहानी


हसीना को भाई

कमर की कमानी


सुनती थी उससे

हर दिन कहानी


धड़कता था दिल

छलकता था पानी


सुनाता था उसको

जब वो कहानी


उसे देख रोता

पिलाता था पानी


मनाता था उसको

सिखाता था मानी


सभी जानते थे

था रिश्ता रूहानी


करते थे इज्ज़त

बड़ी थी रवानी


है कितनी मनोरम

और कितनी सुहानी


दोनों अजूबों की

दिल कश कहानी


 

साधना वैद


Tuesday, April 2, 2024

भूमंडलीकरण का प्रभाव

 



इसमें संदेह नहीं है कि भूमंडलीकरण एवं बाजारवाद ने आज के युग में हर परिवार की जीवन शैली पर बड़ी तेज़ी से असर डाला है| पहले अपने घर आँगन, अपने मोहल्ले, अपने शहर तक जन जीवन सीमित था अब भूमंडलीकरण ने सबको एक जगह पर ला खड़ा किया है| पहले हर प्रांत की, हर देश की एक विशिष्ट वेशभूषा होती थी, एक संस्कृति होती थी, एक ख़ास तरह का खान पान होता था, अपने स्थान के विशेष त्योहार होते थे जो उस स्थान की पहचान होते थे लेकिन अब सबकी वेशभूषा, खान-पान, तीज त्योहार सब एक जैसे होते जा रहे हैं| टी वी और समाचार पत्रों की बातों पर विश्वास किया जाए तो अब मुस्लिम महिलाएं भी करवा चौथ का व्रत रखना चाहती हैं और कई महिलाओं ने इस वर्ष रखा भी था| इसका श्रेय भूमंडलीकरण को ही जाता है| देश विदेश की फ़िल्में, टी वी धारावाहिक और तेज़ी से पैर पसारती सोशल मीडिया ने भूमंडलीकरण को विस्तार देने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई है| 

पश्चिमी देशों के पिट्जा, बर्गर, हॉट डॉग, चीन के चाऊमीन, मंचूरियन, मैगी इत्यादि भारत में भी हर शहर के हर क्षेत्र में बहुत लोकप्रिय हैं और अब हर जगह मिल जाते हैं| यहाँ तक कि भारत के गाँव भी इससे अछूते नहीं रह गए हैं| वैसे ही भारत के छोले भटूरे, समोसे जलेबी, इडली डोसा, ढोकला थेपले, आलू टिक्की, दही बड़ा भी विदेशों में बहुत लोकप्रिय हो चुके हैं और हर जगह मिलते हैं| यह भूमंडलीकरण का ही प्रमाण है| इसी तरह अब युवा लड़के लड़कियों ने विदेशों की देखा देखी जीन्स और टॉप की वेशभूषा को अपना लिया है तो अब यह पहचानना मुश्किल होता है कि वे मूल रूप से वे किस जगह के रहने वाले हैं| आप किसी भी पर्यटन स्थल पर जाइए अधिकतर युवा लड़के लड़कियाँ एक ही तरह की कटी फटी जींस, एक ही तरह के ढीले ढाले टॉप और आँखों पर बड़े साइज़ के विभिन्न रंगों के गॉगल्स चढ़ाए दिख जायेंगे| अब अगर आप उनकी कुण्डली खोलने के लिए बहुत आतुर हैं तो अनुमान लगाते रहिये कि ये किस देश से यहाँ आये होंगे|

साहित्य भी इसके प्रभाव से अछूता नहीं है| भाषा पर भी इसका प्रभाव पड़ा है| अध्ययन या नौकरी के सिलसिले में युवा पीढ़ी का बाहरी देशों में जाने का सिलसिला बढ़ा है| इस कारण अंग्रेज़ी भाषा का आधिपत्य भी बढ़ा है| आज की पीढ़ी हिन्दी साहित्य के स्थान पर अंग्रेज़ी की पुस्तकें पढ़ना अधिक पसंद करती है| हिन्दी का कोई उपन्यास अगर पढ़ना चाहें भी तो वे उसका अंग्रेज़ी में अनूदित वर्जन ही पढ़ना चाहेंगे हिन्दी में नहीं| यहाँ तक कि बच्चों के लिए भी अगर कॉमिक्स खरीदना हों तो वे अमर चित्र कथा, पंचतंत्र या जातक कथाओं के कॉमिक्स भी अंग्रेज़ी भाषा में अनूदित ही खरीदते हैं क्योंकि बच्चे ढाई तीन साल की उम्र से ही अंग्रेज़ी माध्यम के स्कूलों में पढ़ते हैं इसलिए उन्हें हिन्दी न तो पढ़ना आती है, न लिखना आती है, न ही बोलना या समझना आती है| मुझे भय है कि कुछ वर्षों के अंतराल के बाद आज के छोटे बच्चों के लिए हिन्दी सिर्फ घर में काम करने वाले सहायकों से बोलने की भाषा बन कर ही रह जायेगी| और अब जबकि अंग्रेज़ी का वर्चस्व इतना अधिक बढ़ चुका है तो बेस्ट सेलर्स भी अंग्रेज़ी के उपन्यास ही अधिक होते हैं| यह सोच कर बहुत दुःख होता है कि अत्यंत उत्कृष्ट एवं स्तरीय हिन्दी साहित्य होने के उपरान्त भी उसे भूमंडलीकरण के इस दौर में दोयम दर्जे का स्थान ही प्राप्त है|

साधना वैद

 


Saturday, March 30, 2024

रंगमंच

 




रंगमंच है

ये समूचा संसार

प्रभु की लीला

 

करने आये

यहाँ अपना काम

रंग रंगीला

हम सब हैं

उँगलियों से बँधी

कठपुतली

 

नाचना हमें

उस के इशारों पे

बन के भली  

 

नाचेंगे हम

जैसे वो नचाएगा

जीवन भर

 

कभी राजा तो

कभी बन के रानी

कभी नौकर

 

कभी दुलहा

कभी दुलहन तो

कभी बाराती

 

कभी सिपाही

कभी तुरही वाला

तो कभी हाथी

 

हमारा काम

नाचना इशारों पे

जैसे वो चाहे   

 

उसका काम

नचाना डोरियों पे

जब जी चाहे

 

मानते हम

हुकुम मालिक का

सर झुका के  

 

खुश हो जाते

सभी देखने वाले

ताली बजाते  

 

हँसते गाते

लोग चले घर को

खेल ख़तम

 

साथ ही हुआ   

कठपुतली का भी

किस्सा ख़तम   




 

साधना वैद