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Friday, February 20, 2026

सेवा

 



आप घर से बाहर कहीं भी जाइए, वो चाहे किसी भी स्तर का होटल हो, अस्पताल हो, स्कूल कॉलेज हो या कार्यालय हो आपकी सुविधा के लिए आपको हर स्थान पर सहायकों का एक दल मिलेगा जिसे उस संस्था के आयोजक सेवा दल का नाम देते हैं ! सरकारी नौकरी करने वाले लोग भी सेवक कहलाते हैं ! इसका तो नाम ही लोक सेवा आयोग है ! राजनीति में आने वाले लोग भी स्वयं को जनता का सेवक कहते हैं लेकिन उनका तो उद्देश्य ही जनता को ठगना है और सारे छल छद्म करके उनसे वोट हासिल करना है ! मेरी दृष्टि में हर वह कार्य जिसके लिए आपको वेतन मिलता है वह आपकी जीविका का साधन है सेवा नहीं ! इन सभी स्थानों पर परोक्ष या प्रत्यक्ष रूप से आप स्वयं ही इन सेवाओं का भुगतान करते हैं ! कभी किराए के रूप में, कभी टिप के रूप में, कभी फीस के रूप में या कभी रिश्वत के रूप में जिसे आज की प्रचलित भाषा में सुविधा शुल्क कहा जाता है ! सेवा कभी खरीदी या बेची नहीं जा सकती ! सेवा एक अमूर्त भावना है जिसके प्रतिदान में कोई भी अपेक्षा या प्रत्याशा नहीं होती ! यह सिर्फ अनन्य प्रेम, करुणा, दया या श्रद्धा से जुड़ी भावना है जिसके पीछे न कोई स्वार्थ होता है न ही लालच ! सेवा के पीछे परोपकार की भावना जुड़ी होती है जहाँ आप निर्मल मन से केवल सामने वाले के कष्ट को कम करने के प्रयास में तन मन धन से जुट जाते हैं और हर हाल में उसे सुख पहुँचाना चाहते हैं यह जानते हुए भी कि आपको इसके प्रतिदान में कुछ मिलने वाला नहीं है ! सेवा एक विशुद्ध सात्विक कर्म है जो सेवा पाने वाले और सेवा करने वाले दोनों को ही अनिर्वचनीय आनंद से भर देता है और दोनों को ही इससे परम सुख की प्राप्ति होती है !

इस निष्काम सेवा के भी तीन रूप होते हैं ! एक सेवा वह है जिसके तहत हम किसी साधू महात्मा या किसी बुज़ुर्ग को सम्मान देने के लिए उनके सारे काम करते हैं, उनके पैर दबाते हैं, उनके भोजन पानी की व्यवस्था करते हैं और उनके बाकी सारे कार्य भी करते हैं ताकि उनकी सहायता हो जाए और हमें उनका आशीर्वाद मिल जाए !  
दूसरी सेवा के तहत आता है मंदिरों या गुरुद्वारों में जाकर सेवा कार्य करना जैसे इन देवस्थानों की साफ़ सफाई
, जूते चप्पलों का रख रखाव या वहाँ की रसोई में भोजन बनाने या परसने खिलाने में मदद करना ! बर्तनों की साफ़ सफाई इत्यादि !
और तीसरी सेवा वह होती है जो बिलकुल दीन हीन, असहाय
, लाचार अस्वस्थ रोगियों के लिए की जाती है जिन्हें मदद न मिले तो उनका जीवन संकट में आ जाए !  
मेरे विचार से हर मनुष्य जिसमें मानवता शेष है अपनी क्षमता और सामर्थ्य के अनुसार कुछ न कुछ सेवा तो अवश्य ही करता है !

साधना वैद


Saturday, February 14, 2026

नई विधा - जो दोनों ओर से पढ़ी जा सके

 




झीना था प्रतिरूप तुम्हाराछीना था हर चैन हमारा

अच्छा था मोहक था खेलसच्चा था रोचक था मेल

करते रहे तुम्हें हम दूरकहते रहे तुम्हें हम हूर

छलना था कितना आसानकहना था बस दो फरमान  

 

तुमको हमने चाहा यह सुख अपना था

तुमको पा हम लेंगे यह एक सपना था !

सपने लेकिन होते हैं केवल सपने

हमको पल-पल तिल-तिल करके तपना था !

 

जागी जगती, जागे पक्षी, जलचर जागे

जागी धरती, तारे, चंदा, अम्बर जागे

जागो तुम अब जाग गया सूरज देखो

जागी प्रकृति सकल सृष्टि अंतर जागे !

 

साधना वैद

 


Thursday, February 12, 2026

यह भी कविता है

 




उगता सूर्य
क्षितिज की लालिमा
भोर का गान
 

फूलों के हार
अगर की खुशबू
देवों का मान

 

उड़ते पंछी
उमड़ती नदियाँ
ढूँढें सुमीत

 

खिलते फूल
सुरभित पवन
गाते सुगीत  

 

शिशु की हँसी
ममता छलकाती
माँ की मुस्कान

  

लिखे कविता
प्रकृति कलम से
निराली शान

 

भाती सभी को
अद्भुत ये कविता
हे गिरिधारी

छेड़ दो तान
बजाओ न मुरली
कृष्ण मुरारी

 

साधना वैद


 


Wednesday, February 4, 2026

कोशिश कम रही

 






वक्त के उजले सफों पर गर्द सी कुछ जम रही
लाख चाहा भूलना पुरज़ोर, कोशिश कम रही !
हमकदम, न हमनफस, न हमसफर है साथ में
राहे मंज़िल पर अभी से चाल क्यूँ है थम रही !



चित्र - गूगल से साभार 


साधना वैद

Wednesday, January 28, 2026

वसंत-पंचमी लघुकथा

 


वसंत-पंचमी का त्योहार आने वाला है ! शोभा अनमनी सी बैठी हुई है ! अब तो हर त्योहार जैसे लकीर पीटने की तरह हो गया है ! न कोई उत्साह, न कोई चहल-पहल, न कोई साज-सज्जा, न कोई रौनक ! सब अपने-अपने फोन और लैप टॉप में व्यस्त रहते हैं ! दस आवाजें लगाओ तो बड़ी मुश्किल से मोबाइल में नज़रें गढ़ाए खाने की मेज़ पर आकर बैठ जाते हैं और बिन देखे प्लेट में जो परोस दिया जाता है खाकर उठ जाते हैं ! शोभा की आँखें भर आईं !

वह जब छोटी थी तो हर त्योहार कितने उल्लास के साथ मनाया जाता था ! दो तीन दिन पहले से ही घर में हलचल शुरू हो जाती थी ! घर में हर सदस्य के कपड़े पीले रंग में रँगे जाते थे ! मम्मी, चाची, भाभी की साड़ियाँ, हम बहनों के फ्रॉक या दुपट्टे ! बाबूजी
, चाचाजी, भैया के कुरते और रूमाल ! वसंत के दिन मम्मी केसर डाल कर चावल की फीरनी बनाती थीं ! दिन में भी खूब मेवा डाल कर पोंगल वाले पीले मीठे चावल और मटर पनीर का पुलाव बनता था ! पीले पतंगी कागज़ से घर का पूजाघर सजाया जाता था और हम सब बच्चे अपनी सारी कॉपी किताबें माँ सरस्वती के सामने सुबह से ही रख देते थे ताकि उन पर विद्या की देवी की कृपा हो जाए और उनसे पढ़ कर हम सब बच्चों को भी माँ शारदे का आशीर्वाद मिल जाए ! सबसे अधिक खुशी इस बात की होती थी कि उस दिन पढ़ाई से फुर्सत मिल जाती थी लेकिन फिर भी सरस्वती माँ के आशीर्वाद की गारंटी पक्की होती थी !

शोभा के पति अरुण से शोभा का मुरझाया चेहरा देखा नहीं गया ! उन्होंने शोभा से फीरनी बनाने के लिए कहा और अपना स्कूटर उठा कर बाज़ार चले गए ! लौट कर आए तो उनके पास मिट्टी के बहुत ही कलात्मक सुन्दर शकोरों से भरा हुआ थैला था ! उन्होंने जल्दी से उन्हें बाल्टी में डाल कर पानी से धोया और शोभा से फीरनी उन शकोरों में परसने के लिए कहा ! शोभा शकोरों में फीरनी डालती जा रही थी और अरुण उन पर कटे हुए पिश्ते बुरकते जा रहे थे ! शोभा का मन तरंगित हो उठा ! उसने जल्दी-जल्दी मीठे चावल बनाए और पूजा की सारी तैयारी कर बच्चों को आवाज़ लगाई !

डाइनिंग टेबिल पर मिट्टी के शकोरों में परोसी हुई फीरनी बहुत आकर्षक लग रही थी ! बच्चों की आँखें चमक उठीं, “वाओ मम्मी ! ये क्या है ! यह तो बहुत बढ़िया लग रही है ! आपने पहले तो ऐसे कभी नहीं बनाई !”
शोभा झूम उठी ! आज उसके मन में भी वर्षों के अंतराल के बाद वसंत महक उठा था !

साधना वैद


Friday, January 23, 2026

हे माता सरस्वती

 


ज्ञान की देवी
हे माँ वीणा वादिनी
साध लो सुर  
बहा दो ज्ञान गंगा
कर दो मन चंगा  !


मिटे अंधेरा
हो जाए आलोकित
संसार सारा
विनष्ट हो अज्ञान  
दंभ औ अभिमान !

दिन विशेष
आया वसंतोत्सव
करते पूजा
जलाते हैं दीपक
उतारते आरती !

हे माँ शारदे
रखो वरद हस्त
मस्तक पर
शिक्षा दो संस्कार की
उच्च सदाचार की !



हम बालक
तुम जग जननी
करो कल्याण
हे माता सरस्वती  
करें तुम्हें प्रणाम !
 



चित्र - गूगल से साभार 



साधना वैद 


 


  

Sunday, January 18, 2026

ज़िद

 



कभी सोचती हूँ
कहाँ गलती की थी
जो तुम्हारा साथ चाहा
मैं काँच तुम पत्थर
मैं कमज़ोर तुम कठोर
मैं नाज़ुक तुम मजबूत !
यह सत्य तो तुम भी
जानते ही थे और था
मेरा भी जाँचा, परखा,
सोचा
, समझा, सराहा !
तभी तो यह कसम उठाई थी
कभी नहीं टकराएंगे आपस में,
सदा एक दूरी बना कर रखेंगे
कभी पास नहीं आएंगे और
दुनिया को यह चमत्कार भी
करके ज़रूर दिखाएंगे कि
शीशे और पत्थर का प्यार
बिना टूट-फूट के भी
कामयाब हो सकता है
जो मन में हो हौसला और
कुछ कर गुज़रने की लगन तो
पत्थर पर भी गुलाब
खिल सकता है !

लेकिन जाने फिर क्या हुआ ?
सारे संकल्प धरे रह गए
और पता नहीं कैसे हम
रोज़ आपस में टकराने लगे
छोटे से आघात से मैं रोज़
रेशा-रेशा चटकने लगी और
तुम चोट पर चोट लगाने लगे
मैं रोज़ टुकड़े-टुकड़े टूटने लगी
और तुम बेरहम हो मुझे
टूटता देख हँसने खिलखिलाने लगे !  
मैं हर रोज़ घायल हो
किरच-किरच बिखरने लगी
और तुम मुझे लहुलुहान देख
पता नहीं क्यों जश्न मनाने लगे !  
जानती हूँ यह दुष्परिणाम है
मेरी मूर्खता भरी जिद का
मेरे थोथे आत्मविश्वास का
मेरी खोखली खुशफहमी का
कि मुझमें हुनर है
धाराओं का रुख मोड़ देने का
प्रवाह के विरुद्ध तैरने का
असंभव को संभव कर देने का !
मानती हूँ मैं हार गयी !
लेकिन हार कर भी इतना तो
ज़रूर जान गयी कि
पत्थर कभी फूल से 
मुलायम नहीं होते  
इस धरती पर कभी
चमत्कार नहीं होते !
 

 

साधना वैद