आप घर से बाहर
कहीं भी जाइए, वो चाहे किसी भी स्तर का होटल हो, अस्पताल हो, स्कूल कॉलेज हो या कार्यालय हो आपकी सुविधा के लिए आपको हर
स्थान पर सहायकों का एक दल मिलेगा जिसे उस संस्था के आयोजक सेवा दल का नाम देते
हैं ! सरकारी नौकरी करने वाले लोग भी सेवक कहलाते हैं ! इसका तो नाम ही लोक सेवा
आयोग है ! राजनीति में आने वाले लोग भी स्वयं को जनता का सेवक कहते हैं लेकिन उनका
तो उद्देश्य ही जनता को ठगना है और सारे छल छद्म करके उनसे वोट हासिल करना है ! मेरी
दृष्टि में हर वह कार्य जिसके लिए आपको वेतन मिलता है वह आपकी जीविका का साधन है
सेवा नहीं ! इन सभी स्थानों पर परोक्ष या प्रत्यक्ष रूप से आप स्वयं ही इन सेवाओं
का भुगतान करते हैं ! कभी किराए के रूप में, कभी टिप के
रूप में, कभी फीस के रूप में या कभी रिश्वत के रूप में
जिसे आज की प्रचलित भाषा में सुविधा शुल्क कहा जाता है ! सेवा कभी खरीदी या बेची
नहीं जा सकती ! सेवा एक अमूर्त भावना है जिसके प्रतिदान में कोई भी अपेक्षा या
प्रत्याशा नहीं होती ! यह सिर्फ अनन्य प्रेम, करुणा, दया या श्रद्धा से जुड़ी भावना है जिसके पीछे न कोई स्वार्थ
होता है न ही लालच ! सेवा के पीछे परोपकार की भावना जुड़ी होती है जहाँ आप निर्मल
मन से केवल सामने वाले के कष्ट को कम करने के प्रयास में तन मन धन से जुट जाते हैं
और हर हाल में उसे सुख पहुँचाना चाहते हैं यह जानते हुए भी कि आपको इसके प्रतिदान में
कुछ मिलने वाला नहीं है ! सेवा एक विशुद्ध सात्विक कर्म है जो सेवा पाने वाले और
सेवा करने वाले दोनों को ही अनिर्वचनीय आनंद से भर देता है और दोनों को ही इससे
परम सुख की प्राप्ति होती है !
इस निष्काम सेवा के भी तीन रूप होते हैं ! एक सेवा वह है जिसके तहत हम किसी साधू
महात्मा या किसी बुज़ुर्ग को सम्मान देने के लिए उनके सारे काम करते हैं, उनके पैर
दबाते हैं, उनके भोजन पानी की व्यवस्था करते हैं और उनके बाकी सारे कार्य भी करते
हैं ताकि उनकी सहायता हो जाए और हमें उनका आशीर्वाद मिल जाए !
दूसरी सेवा के तहत आता है मंदिरों या गुरुद्वारों में जाकर सेवा कार्य करना जैसे
इन देवस्थानों की साफ़ सफाई, जूते चप्पलों का रख रखाव
या वहाँ की रसोई में भोजन बनाने या परसने खिलाने में मदद करना ! बर्तनों की साफ़
सफाई इत्यादि !
और तीसरी सेवा वह होती है जो बिलकुल दीन हीन, असहाय, लाचार अस्वस्थ
रोगियों के लिए की जाती है जिन्हें मदद न मिले तो उनका जीवन संकट में आ जाए !
मेरे विचार से हर मनुष्य जिसमें मानवता शेष है अपनी क्षमता और सामर्थ्य के अनुसार
कुछ न कुछ सेवा तो अवश्य ही करता है !
साधना वैद

