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Sunday, January 18, 2026

ज़िद

 



कभी सोचती हूँ
कहाँ गलती की थी
जो तुम्हारा साथ चाहा
मैं काँच तुम पत्थर
मैं कमज़ोर तुम कठोर
मैं नाज़ुक तुम मजबूत !
यह सत्य तो तुम भी
जानते ही थे और था
मेरा भी जाँचा, परखा,
सोचा
, समझा, सराहा !
तभी तो यह कसम उठाई थी
कभी नहीं टकराएंगे आपस में,
सदा एक दूरी बना कर रखेंगे
कभी पास नहीं आएंगे और
दुनिया को यह चमत्कार भी
करके ज़रूर दिखाएंगे कि
शीशे और पत्थर का प्यार
बिना टूट-फूट के भी
कामयाब हो सकता है
जो मन में हो हौसला और
कुछ कर गुज़रने की लगन तो
पत्थर पर भी गुलाब
खिल सकता है !

लेकिन जाने फिर क्या हुआ ?
सारे संकल्प धरे रह गए
और पता नहीं कैसे हम
रोज़ आपस में टकराने लगे
छोटे से आघात से मैं रोज़
रेशा-रेशा चटकने लगी और
तुम चोट पर चोट लगाने लगे
मैं रोज़ टुकड़े-टुकड़े टूटने लगी
और तुम बेरहम हो मुझे
टूटता देख हँसने खिलखिलाने लगे !  
मैं हर रोज़ घायल हो
किरच-किरच बिखरने लगी
और तुम मुझे लहुलुहान देख
पता नहीं क्यों जश्न मनाने लगे !  
जानती हूँ यह दुष्परिणाम है
मेरी मूर्खता भरी जिद का
मेरे थोथे आत्मविश्वास का
मेरी खोखली खुशफहमी का
कि मुझमें हुनर है
धाराओं का रुख मोड़ देने का
प्रवाह के विरुद्ध तैरने का
असंभव को संभव कर देने का !
मानती हूँ मैं हार गयी !
लेकिन हार कर भी इतना तो
ज़रूर जान गयी कि
पत्थर कभी फूल से 
मुलायम नहीं होते  
इस धरती पर कभी
चमत्कार नहीं होते !
 

 

साधना वैद 
 
 




Friday, January 16, 2026

सैनिक

 



भारत माता की कसम, खाते वीर जवान 
सीमा की रक्षार्थ हित, देंगे अपनी जान ! 


ब्याह रचाया मौत से, रक्त लगाया भाल 
सेना बाराती बनी, सीमाएं ससुराल ! 


मान बढ़ा कर देश का, लौटा वीर जवान
सोया है ताबूत में, करके जाँ कुर्बान !


जान गँवाई वीर ने, जमा शत्रु पर धाक
मातम छाया देश में, हुआ कलेजा चाक !


सीने में हैं गोलियाँ, क्षत विक्षत है देह
जान लुटा कर देश पे, आया अपने गेह !


बाँध कफ़न सिर पर चले, सैनिक वीर जवान 
मातृभूमि के वास्ते, करने को बलिदान !


उंतिस वर्णी फूल औ' सात रंग के हार
भारत माँ के हृदय पर, शोभित यह गल हार ! 


बाइस भाषा में लिखें, 'भारत मेरी शान'
कोटिक कंठों से करें, माता का गुणगान !

जय हिंद


साधना वैद

Thursday, January 15, 2026

जीवन की पतंग

 




निर्वाण द्वार,

जीवन की पतंग

प्रवेशातुर 


स्वागतोत्सुक 

थामने को पतंग 

प्रभु राम जी 


साधना वैद


चित्र - गूगल से साभार 

Thursday, January 8, 2026

सबक - लघुकथा

 



सरला के घर में आज किटी पार्टी थी! सुबह से सरला घर की साफ़ सफाई, व्यवस्था और साज-सज्जा में व्यस्त थी! किटी की 20 महिला मित्रों के बैठने की व्यवस्था, जल पान का प्रबंध और बीच में खेले जाने खेलों के विजेताओं को इनाम में दिए जाने वाले उपहारों को गिफ्ट पैक करना, सभी कुछ उसे देखना था! रविवार होने की वजह से आज सभी घर में थे लेकिन सरला की सहायता के लिए कोई भी तत्पर नहीं था! पति राजीव अपने लैप टॉप के साथ व्यस्त थे, बेटी सुकन्या अपनी सहेली के यहाँ उसका जन्मदिन मनाने चली गई थी और बेटा सुदीप वीडियो गेम खेलने में लगा हुआ था! सरला ने जब बेटे से सहायता करने को कहा तो उसने कह दिया, “आपकी किटी पार्टी है मैं कैसे करूँगा यह सब? आप देख लो न मम्मा! मुझे थोड़े ही आता है कुछ!” सुदीप अपना फोन उठा कर अपने कमरे में चला गया! 

पतिदेव बिलकुल निर्लिप्त अपने लैपटॉप में रील्स देखने में इतने तल्लीन थे जैसे घर में होने वाले आयोजन का उन्हें कोई अनुमान ही न हो! सरला को बहुत गुस्सा आ रहा था! उसने अपने अकेले के दम पर ही अपनी किटी पार्टी का बहुत अच्छी तरह से इंतज़ाम किया और उसकी सभी सहेलियाँ बेहद खुश होकर गईं!

अगले सप्ताह बेटे सुदीप का जन्मदिन था! वह सुबह से बहुत खुश था! शाम को उसने अपने दस बारह दोस्तों को बुला रखा था! लेकिन आज सुबह से किचिन में कोई हलचल दिखाई नहीं दे रही थी! सुदीप जानता था हमेशा की तरह मम्मी बहुत अच्छी तरह से शाम की पार्टी का सारा इंतजाम सम्हाल लेंगी! लेकिन लंच के बाद जब सरला साड़ी बदल कर अपना शॉपिंग बैग उठा बाहर जाने लगी तो सुदीप और सुकन्या दोनों ही घबरा गए! अभी तक शाम की पार्टी की तैयारी की शुरुआत भी नहीं हुई थी! न केक आया था, न घर में ही कोई पार्टी स्नेक्स सरला ने बना कर या मँगवा कर रखे थे, न कमरे में ही कोई सजावट हुई थी! सुदीप नर्वस होकर सरला के सामने जा खड़ा हुआ
, “मम्मी आप कहाँ जा रही हो? शाम को मेरे दोस्त आएँगे ना मेरा बर्थडे सेलीब्रेट करने! आप कब तक आओगी?”


“अच्छा!” सरला हैरानी से बोली, “तुम्हारा बर्थडे है ना बेटा! मैं कैसे जानूँगी आजकल के बच्चे कैसे पार्टी सेलीब्रेट करते हैं! तुम खुद ही देख लो न बेटा अपने दोस्तों को कैसे एन्टरटेन करना है तुम्हें! मुझे बहुत ज़रूरी काम है ! आने में मुझे देर हो जाएगी!” और सरला रिक्शे में बैठ कर नज़रों से दूर हो चुकी थी !


चित्र - गूगल से साभार 


साधना वैद


Saturday, January 3, 2026

संकल्प नए साल का

 



जला चुकी हूँ
कितने ही बर्तन
स्वादिष्ट खाने
दाल, चावल, सब्जी
चाय, दूध, घी
खीर, खिचड़ी, शीरा
मेरी भूल से
चमकते बर्तन
बने ठीकरा
तवा, कढाई, पैन
नया कुकर,
डेगची औ’ भगौने
भिगौते नैन
देख अपनी शक्ल
और हम भी
बिसूरते रहते
होते लज्जित
देख कर अपनी
ऐसी करनी !
लेकिन करें तो क्या
आदत बुरी
छूटे तो कैसे छूटे
भूल जाते हैं
गैस पर चढ़ा के
दाल या सब्जी
और खुल जाता है
फोन या टी वी
याद जब आती है
जल जाता है
खाना तब तक तो
सुर्ख कुकर
घूरता है हमको
लाल पीला हो !
हम डर जाते हैं
पछताते हैं
शर्मिन्दा हो जाते हैं
खुद पर ही
इसीलिये किया है
पूरी निष्ठा से
इस नए वर्ष में
यह संकल्प
खाना बन जाएगा
तभी आयेंगे
रसोई से बाहर
नहीं छोड़ेंगे
जलती गैस पर
कुछ भी चढ़ा कर !



साधना वैद

Thursday, December 25, 2025

सेंटा न आया

 


आज बड़ा दिन था ! सुबह से सड़कों पर बड़ी चहल-पहल थी ! पास के चर्च से बड़े ही सुन्दर हिम्स की आवाज़ सुनाई दे रही थी ! लगातार लोगों के समूह प्रार्थना करने के लिए चर्च में जा रहे थे ! रात को ठीक 12 बजे यीशु के आगमन के साथ ही चर्च के घंटे बज उठे थे ! पुनिया ने पुल के नीचे अपनी छोटी सी खोली को बड़े उत्साह के साथ यथासंभव सजाया था ! उसने सुना था क्रिसमस के दिन सेंटा क्लॉज़ आते हैं और बच्चों के लिए ढेर सारे तोहफे भी लाते हैं ! सुबह से अपने तकिये के नीचे, गद्दी के नीचे वह बार-बार टटोल कर देख चुकी थी ! अभी तक कोई उपहार उसे नहीं मिला था ! सड़क पर तमाम बच्चों को बड़े सारे उपहारों के पैकिट लिए वह अपने माता-पिता के साथ जाते हुए देख रही थी ! दिन के 12 बज चुके थे ! उसका चेहरा कुम्हला गया था ! आँखों में आँसू भर आए थे ! सोच रही थी क्या सेंटा भी उपहार बड़े घर के बच्चों के लिए ही लाते हैं ! उस जैसे ग़रीब बच्चों के लिए नहीं ? सुबह से कुछ खाया भी नहीं था ! अस्फुट स्वरों से उसके मुख से दुआ निकल रही थी, "और कुछ भले ही न लाओ न लाओ प्यारे सेंटा बस एक रोटी ही ला दो ताकि तुम्हारी राह देखने के लिए आँखें तो खुल सकें !"  

अपना घर
जतन से सजाया
सेंटा न आया

 

साधना वैद


Wednesday, December 17, 2025

नानी का डंडा

 




घर में शादी की खूब रौनक और चहल-पहल थी ! सारा घर खुशी-खुशी शादी की रस्मों रिवाजों को मनाने में लगा हुआ था ! नई बहू नव्या के साथ उसकी छ: वर्षीय भांजी इशिका साए की तरह लगी रहती थी ! पल भर को भी नव्या से दूर रहना उसे मंज़ूर न था ! सुबह होते ही झटपट तैयार होकर नव्या के पास आ जाती और अपनी मीठी-मीठी बातों से उसका मन बहलाए रखती ! नए घर नए परिवेश में नव्या का भी इशिका के साथ बड़ा प्यारा सा रिश्ता जुड़ गया था ! दोनों आपस में खूब हिल-मिल गई थीं !
आज नई बहू से पहली बार रसोई छुलवाई गई थी ! नव्या ने अपनी सासू माँ के आदेश का पालन करते हुए सबके लिए बड़े अरमानों के साथ मूँग की दाल का हलवा बनाया था ! खूब केसर, पिश्ते, बादाम, काजू, किशमिश डाल कर पाक कला की अपनी सारी प्रतिभा को उसने आज इस हलवे में मिला दिया था ! इशिका रसोई में भी नव्या के आस-पास ही मंडराती रही !
डाइनिंग टेबिल पर सब हलवे का बेसब्री के साथ इंतज़ार कर रहे थे ! सबने खूब सराह-सराह कर हलवा खाया और नव्या को नेग में ढेर सारे नोटों से भरे हुए लिफ़ाफ़े भी मिले ! जैसे ही सासू माँ ने हलवा चखा उन्होंने नव्या को प्यार से अपने पास बुलाया और बोलीं, “बेटा हलवा तो बहुत अच्छा बना है लेकिन इसमें चीनी कुछ ज्यादह है ! सबको यहाँ शुगर की बीमारी है इसलिए आगे से कम शक्कर डालना !”
“नहीं माँ ! हलवे में चीनी तो बराबर है भाभी से कहिये आगे से ग्लव्ज़ पहन कर बनाएं हलवा ! उनके हाथों की मिठास भी तो घुल गयी है इसमें !” यह चुटकी देवर सौरभ की थी ! सारा कमरा ठहाके से गूँज उठा !

इशिका अलर्ट हो गयी ! उसने नव्या को नीचे झुका लिया और बड़े रहस्यमय अंदाज़ में उसके कान में फुसफुसा कर बोली, “मामी आप बिलकुल मत डरना मैंने नानी की डंडा अपने कमरे में छुपा दिया है !”
नव्या हैरान थी, “क्यों इशिका ? अब नानी को चलने में परेशानी होगी ना ! तुमने डंडा क्यों छिपाया
?
“वो मेरी दादी बुआ से रोज़ कहती हैं ठीक से खाना बनाना नहीं सीखेगी तो ससुराल में रोज़ सास के डंडे खाने पड़ेंगे ! इसीलिये मैंने नानी का डंडा छिपा दिया !”  

साधना वैद