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Wednesday, July 26, 2023

अगर सा महकता अगरतला – 15

 



15 मई – उदयपुर के दर्शनीय स्थल

अगरतला आये हुए दो दिन बीत चुके थे ! दोनों दिनों के अनुभव इतने रोमांचक और ज्ञानवर्धक रहे कि कितने भी पन्ने रंग लें उस अनुभूति को अभिव्यक्ति देना संभव नहीं हो सकेगा ! हमारी मेघालय त्रिपुरा यात्रा अब समापन की ओर बढ़ रही थी ! आज 15 मई का दिन अगरतला के आस पास के बचे हुए शेष स्थानों को देखने के लिए नियत अंतिम दिन था ! 16 मई को इस बेहद सुन्दर नगर से विदा लेकर हमें दिल्ली प्रस्थान करना था और हमारी इस सुखद यात्रा का अंत होने वाला था ! लेकिन हम अभी से विदाई की बातें क्यों करें ! आज के जो दर्शनीय स्थल देखने हैं पहले वहाँ तो चलें ! सुबह रोज़ की तरह डाइनिंग रूम में अपने मनपसंद नाश्ते के साथ अपने ग्रुप के सभी साथियों के संग खूब गपशप हुई और सारे दिन की योजना का प्रारूप बना कर हम सब समय से अपनी अपनी गाड़ियों में सवार होकर आज के सफ़र पर निकल पड़े ! आज हमें अगरतला से 55 किलोमीटर्स दूर उदयपुर जाना था और वहाँ के विशेष रूप से प्रसिद्ध स्थलों को देखना था ! हमारा पहला गंतव्य था उदयपुर का भुवनेश्वरी मंदिर !

भुवनेश्वरी मंदिर उदयपुर

सुप्रसिद्ध हिंदू मंदिरों में से एक भुवनेश्वरी मंदिर अगरतला के उदयपुर में स्थित है और यह भारत के पूर्वोत्तर राज्य त्रिपुरा की राजधानी अगरतला से 55 किलोमीटर दूर है ! अतीत में उदयपुर माणिक्य वंश के शासकों का प्रसिद्ध मनपसंद स्थान था ! हालाँकि यह एक छोटा शहर था लेकिन वास्तव में यह प्राचीन काल से ही बहुत सुंदर था ! अगरतला में राजधानी स्थानांतरित करने से पहले उदयपुर ही माणिक्य राजवंश का आधिकारिक निवास और राज्य की राजधानी था !

भुवनेश्‍वरी मंदिर त्रिपुरा राज्य के सबसे पुराने मंदिरों में से एक है ! भुवनेश्‍वरी मंदिर का निर्माण 17 वीं सदी में महाराज गोविंद माणिक्य द्वारा 1660 से 1665 ई. के बीच कराया गया था ! यह मंदिर देवी भुवनेश्‍वरी को समर्पित है !  भुवनेश्वरी मंदिर को नोबेल पुरस्कार विजेता रवीन्द्रनाथ टैगोर ने अपने उपन्यास 'राजर्षि' और नाटक 'विसर्जन' में अमर बना दिया !  यह मंदिर गोमती नदी के किनारे पुराने शाही महल के करीब स्थित है जो वर्तमान में खंडहर हो चुका है ! भुवनेश्वरी मंदिर राज्य के प्रमुख पर्यटक आकर्षणों में से एक है और त्रिपुरा का एक दर्शनीय स्थल है ! राजर्षि उत्सव के दौरान बांग्लादेश और पश्चिम बंगाल से अधिकांश लोग भुवनेश्वरी मंदिर आते हैं ! यह स्थल हिंदू धर्म के लोगों के लिए एक पवित्र स्थान है और लोग यहाँ शांति, स्वास्थ्य और समृद्ध जीवन के लिए प्रार्थना करने आते हैं !

 मंदिर का निर्माण खूबसूरती से किया गया है जिसमें चार चाल छतें, प्रवेश द्वार पर स्तूप और एक मुख्य कक्ष है जो मंदिर की वास्तुकला को पूरा करता है ! मंदिर के स्तंभों में फूल-पैटर्न वाले रूपांकनों को अंकित किया गया है !  इस मंदिर की वास्तुकला बंगाल की चर्चला वास्तुकला से प्रभावित है ! हाँ एक सपाट ऊँचा मंच है जिसके ऊपर एक मेहराबदार प्रवेश द्वार वाला कक्ष बनाया गया है !  इसमें फिनियल के साथ एक घुमावदार छत है ! एक बात और ध्यान देने योग्य है कि मंदिर में स्थापित मूर्ति को इस मंदिर से हटा कर नीचे परिसर में बने एक छोटे से मंदिर में स्थानांतरित कर दिया गया है ! इसके चारों ओर पसरा प्राकृतिक सौन्दर्य देखते ही बनता है ! गुलमोहर, खजूर, नारियल के सघन पेड़ आस पास की वातावरण को और आकर्षक बनाते हैं ! इसीके परिसर में कविवर रबीन्द्रनाथ टैगोर की बहुत बड़ी प्रतिमा भी स्थापित है जहाँ सबने खूब तस्वीरें खिंचवाईं ! कहते हैं रबीन्द्रनाथ टैगोर अक्सर यहाँ आते थे और वे जब भी त्रिपुरा आते थे यहीं ठहरते थे ! उन्होंने अपनी कई साहित्यिक कृतियों की रचना यहीं पर की ! होटल से भुवनेश्वरी मंदिर का रास्ता लम्बा ज़रूर था लेकिन पूरे मार्ग में बाँस, रबर, आम, लीची, आदि के इतने सुन्दर और घने पेड़ थे कि हम तो मंत्रमुग्ध से उन्हीं के सौदर्य में खोये रहे और रास्ता कब ख़त्म हो गया पता ही नहीं चला !

कल्याण सागर झील उदयपुर

बीच में एक सुन्दर सी झील भी पड़ती है जिसका नाम कल्याण सागर है ! इस झील में बहुत सारी मछलियाँ और दुर्लभ प्रजाति के कछुए पले हुए हैं ! कल्याण सागर त्रिपुर सुन्दरी मंदिर के पूर्वी हिस्से में स्थित है ! 6.4 एकड़ में फैला, 224 गज की लंबाई और 160 गज की चौड़ाई के साथ पानी का यह विशाल विस्तार मंदिर परिसर में सुंदरता का एक मनोरम आयाम जोड़ता है, जिसकी पृष्ठभूमि में सुरम्य रूप से उभरी हुई पहाड़ियाँ हैं !  पानी दुर्लभ बोस्टामी कछुओं से भरा हुआ है !  उनमें से कुछ कछुए तो आकार में बहुत बड़े हैं जो भोजन के टुकड़ों की तलाश में किनारे तक आ जाते हैं ! आगंतुक किनारों पर स्थित स्टाल्स से कछुओं और मछलियों को खिलाने के लिए बिस्किट्स आदि खरीदते हैं और इन सरीसृपों को खिलाते हैं ! इस तालाब में विभिन्न प्रकार की मछलियाँ भी पाई जाती हैं ! झील को पवित्र माना जाता है और भक्त मछलियों और बोस्टामी कछुओं की पूजा भी करते हैं ! कछुओं को भी पवित्र माना जाता है क्योंकि माता त्रिपुर सुंदरी का मंदिर परिसर भी एक पहाडी पर स्थित होने के कारण एक कूर्मपीठ जैसा ही दिखाई देता है !  इसके अलावा त्रिपुर सुन्दरी का यह मंदिर पहले एक विष्णु मंदिर ही था और चूँकि कूर्म विष्णु का अवतार है  इसलिए ये बोस्टामी कछुए (बोस्टामी बंगाली शब्द बोस्टाम से आया है जिसका अर्थ है "वैष्णव ब्राह्मण" या "विष्णु की पूजा करने वाले भिक्षु") मंदिर में आने वाले भक्तों द्वारा पवित्र माने जाते हैं !  .

इस झील के पास एक रेस्टोरेंट में हम लोग वाश रूम इस्तेमाल करने के लिए गए थे ! वहाँ संतोष जी के साथ एक दुर्घटना हो गयी ! वाश रूम में ताजा ताज़ा फिट किया हुआ चीनी मिट्टी का वाश बेसिन, जो ठीक से सूख नहीं पाया था, हाथ से छूते ही नीचे ज़मीन पर गिर कर टूट गया ! संतुलन बिगड़ जाने से संतोष जी भी उन टुकड़ों पर गिर गईं ! टूटे हुए वाश बेसिन के टुकडे उन्हें चुभ गए और उन्हें काफी चोट आ गयी ! उनकी तबीयत पहले से ही कुछ नासाज़ थी ! इस एक्सीडेंट से हम सभी लोग घबरा गए ! जल्दी ही उन्हें एक क्लीनिक में फर्स्ट ऐड दिलवाई गयी ! गनीमत यही हुई कि कोई भी घाव बहुत गहरा नहीं था ! झील के किनारे मीठे मीठे डाब बिक रहे थे ! डाब का बहुत ही मीठा तृप्तिदायक पानी पीकर हम सबने अपनी प्यास बुझाई और चल पड़े त्रिपुर सुन्दरी का मंदिर देखने !

त्रिपुर सुन्दरी मंदिर उदयपुर  

त्रिपुर सुन्दरी मंदिर अगरतला शहर से 55 किलोमीटर दूर उदयपुर के पास स्थित है ! यह उदयपुर से तीन किलोमीटर दूर है ! इस मंदिर का निर्माण महाराजा धन्य माणिक्य के शासनकाल में 1501 ई. के दौरान करवाया गया था ! यह मंदिर भारत के 51 महाशक्तिपीठों में से एक है ! यह मंदिर राज्य के प्रमुख पयर्टन स्थलों में से एक है। हज़ारों की संख्या में भक्त प्रतिदिन मंदिर में माता के दर्शनों के लिए आते हैं !

दीवाली के दौरान माता त्रिपुरा सुंदरी मंदिर में भव्‍य स्तर पर दीवाली मेले का आयोजन किया जाता है ! प्रत्येक वर्ष लाखों की संख्या में लोग इस मेले में सम्मिलित होते हैं ! राजमाला के अनुसार इस मंदिर के निर्माण के साथ एक रोचक कथा जुडी हुई है ! यह मंदिर महाराज धन्य माणिक्य द्वारा भगवान् विष्णु के लिए ही बनवाया गया था और निर्माण के पश्चात् मंदिर में सर्वप्रथम भगवान विष्णु की मूर्ति ही स्थापित की गई थी ! लेकिन एक रात महाराजा धन्य माणिक्य के सपने में देवी महा माया आईं और उन्होंने राजा से कहा कि वह उनकी मूर्ति को चित्तौंग से लाकर इस मंदिर में स्थापित कर दें ! इसके बाद माता त्रिपुर सुंदरी की स्थापना इस मंदिर में कर दी गई !  ऐसा माना जाता है कि यह देश के इस हिस्से में सबसे पवित्र हिन्दू मंदिरों में से एक है और असम में कामाख्या देवी के मंदिर के बाद उत्तर-पूर्व भारत में सबसे अधिक पर्यटक इसी मंदिर में आते हैं ! त्रिपुरा राज्य का नाम इसी मंदिर के नाम पर रखा गया है !  लोकप्रिय रूप से माताबारी के नाम से जाना जाने वाला यह मंदिर एक छोटी सी पहाड़ी पर स्थापित है जो कछुए ( कूर्म ) के कूबड़ जैसा दिखता है !  कूर्मपृष्ठी नामक इस आकृति को शक्ति मंदिर के लिए सबसे पवित्र स्थान माना जाता है  इसलिए इसे कूर्म पीठ का नाम भी दिया गया है  !  देवी की सेवा पारंपरिक ब्राह्मण पुजारियों द्वारा की जाती है !

मंदिर को 51 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है !  किंवदंती है कि सती के बाएं पैर की छोटी उँगली यहाँ गिरी थी ! यहाँ शक्ति को त्रिपुरसुंदरी के रूप में पूजा जाता है और उनके साथ आने वाले भैरव त्रिपुरेश हैं !  मुख्य मंदिर त्रिस्तरीय छत वाला एक घनाकार भवन है जिसका निर्माण 1501 ईस्वी में त्रिपुरा के महाराजा धन्य माणिक्य द्वारा करवाया गया था, इसका निर्माण बंगाली एक-रत्न शैली में किया गया है !

मंदिर के गर्भगृह में देवी की दो समान लेकिन अलग-अलग आकार की काले पत्थर की मूर्तियाँ हैं ! 5 फीट ऊँची बड़ी और अधिक प्रमुख मूर्ति देवी त्रिपुर सुंदरी की है और छोटी मूर्ति, जिसे छोटो-माँ (शाब्दिक रूप से, छोटी माँ) कहा जाता है, 2 फीट ऊँची है और देवी चंडी की मूर्ति है ! कहा जाता है कि छोटी मूर्ति को त्रिपुरा के राजा युद्ध के मैदान के साथ-साथ शिकार अभियानों में भी अपने साथ ले जाते थे !  मंदिर में पशु बलि देने की प्रथा भी यहाँ पर प्रचलित एक लोकप्रिय प्रथा है ! हालाँकि   पर अक्टूबर 2019 में प्रतिबंध लगा दिया गया था लेकिन 57 दिनों के प्रतिबंध के बाद दिसंबर 2019 से इसे फिर से शुरू कर दिया गया !

इस मंदिर में दर्शन के लिए काफी पहले ही हमारी गाड़ी के ड्राईवर राजा के एक परिचित की प्रसाद की दूकान में हमने अपने जूते चप्पलों को उतार दिया था ! कितनी दूर जाना होगा इसका तो कोई अनुमान तब था ही नहीं ! वहाँ से प्रसाद और फूल इत्यादि लेकर बड़े भक्तिभाव से हम लोग मंदिर की ओर चले ! टीले पर चढ़ने के लिए काफी सीढ़ियाँ थीं ! नंगे पैर चलने की आदत नहीं है तो पैरों में कंकड़ चुभ रहे थे ! ऊपर मंदिर में शायद कुछ देर पहले ही बकरों की बलि दी गयी थी ! सीढ़ियों पर ताज़े ताज़े खून के छींटे पड़े हुए थे ! मन विचलित हो रहा था ! कहीं पैरों में खून न लग जाए ! बड़े सम्हलते सम्हलते ऊपर चढ़े ! बहुत भीड़ थी ! दर्शनार्थियों की बड़ी लम्बी कतार थी ! प्रसाद और फूलों की डलिया सम्हाले हम भी लाइन में देर तक धीरज धारे खड़े रहे ! अंतत: हमारा नंबर भी आ गया और हमें भी दर्शन का सौभाग्य मिल गया ! फोटोग्राफी बिलकुल भी अलाउड नहीं थी ! इसलिए तस्वीरें बाहर से ही ले सके भवन की ! पैर जल रहे थे ! लौट कर नीचे भी जाना था दूकान तक ! वहाँ का वातावरण मुझे एकदम कट्टर व रूढ़ीवादी सा लगा ! खून के छीटों ने मन खराब कर दिया था ! वहाँ से जल्दी निकलना चाहते थे ! नीचे दूकान पर पहुँच कर जल्दी से जूते चप्पल पहन अपनी अपनी गाड़ियों में हम लोग सवार हो गए !

हमारा अगला पड़ाव था नीर महल ! लेकिन उससे पूर्व हमें रास्ते में राजा के साथ रबर के जंगलों में रबर निकालने की प्रक्रिया को भी देखना था ! राजा को इन सारी चीज़ों का बहुत बढ़िया अनुभव था और बड़ी अच्छी जानकारी भी थी ! बीच रास्ते में रबर के घने जंगलों के बीच राजा ने गाड़ी रोक दी ! वहाँ हमने देखा कि किस तरह से सारे रबर के पेड़ों के तनों पर एक कटोरा बाँधा गया था ! उस कटोरे के ठीक ऊपर तने में गहराई से चीरा लगाया गया था ! उस चीरे से जो रस निकलता है वह बह बह कर उस कटोरे में जमा होता रहता है ! कटोरा जब भर जाता है तो उसे खाली करके दोबारा बाँध दिया जाता है ! इस तरह से जब पर्याप्त रस जमा हो जाता है तब बाद में उसे प्रोसेस करके उससे रबर के उत्पाद बनाए जाते हैं ! राजा के द्वारा दी गयी यह जानकारी हम लोगों के लिए बिलकुल नयी थी ! बहुत ज्ञानवर्धन हुआ हम सबका ! इससे पहले शहरों में कहीं कहीं रबर का एकाध पेड़ देखा था ! हमारे बगीचे में भी थे रबर के दो पेड़ जिन्हें हम बड़े खुश होकर सबको दिखाते थे कि कितने विरले पेड़ हमारे बगीचे में हैं ! वहाँ इन्हीं रबर के पेड़ों के दूर दूर तक फैले जंगलों को हम विस्फारित नेत्रों से देख रहे थे और विस्मय विमुग्ध हो रहे थे !

यूँ देखने लिए अब बस एक ही प्रमुख स्थल शेष रह गया है लेकिन पोस्ट काफी बड़ी हो गयी है और मैं यह बिलकुल नहीं चाहती कि आप बोर होकर मेरी पोस्ट को पढ़ें इसलिए आज की पोस्ट यहीं तक ! अगली पोस्ट में मैं ले चलूँगी आपको यहाँ के बहुत ही सुन्दर नीर महल में जो भवन तो बेहद खूबसूरत है ही वहाँ तक पहुँचने का मार्ग और माध्यम भी उतने ही दिलचस्प हैं ! तो आज मुझे इजाज़त दीजिये ! जल्दी ही आपको लेकर चलूँगी नीर महल यह मेरा वायदा है आपसे ! शुभ रात्रि !

 

साधना वैद

 

 

 

 

 

 


Friday, July 21, 2023

अगर सा महकता अगरतला – 14

 




















 14 मई – अगरतला के शेष दर्शनीय स्थल

अगरतला का हर दर्शनीय स्थल बहुत ही खूबसूरत और आकर्षक तो है ही अपने साथ इतनी ऐतिहासिक एवं सांकृतिक विरासत को भी समेटे हुए है कि अगर उसके बारे में बिना जाने ही बस उसका ज़िक्र भर कर दिया जाए तो यह तो बहुत नाइंसाफी होगी ! कई स्थान ऐसे थे जहाँ जाने पर हम अन्दर नहीं जा सके लेकिन बाहर से ही उस स्थान की भव्यता का नज़ारा कर के बहुत आनंद की अनुभूति हुई ! ऐसा ही एक स्थान था पोर्तुगीज़ चर्च जहाँ हम हेरीटेज पार्क को देखने के बाद पहुँचे !

पोर्तुगीज़ चर्च
यह राज्य की एकमात्र पुर्तगाली बस्ती मरियमनगर में स्थित त्रिपुरा का पहला कैथोलिक मदर चर्च है और इस क्षेत्र के लोगों के लिए यह चर्च बहुत महत्व रखता है !  चर्च के फादर इब्राहिम ने एक बार इस चर्च के बारे में बताते हुए कहा था कि यह पहला कैथोलिक मदर चर्च है और इसी चर्च से कैथोलिक मान्यता पूरे त्रिपुरा में फैली ! पाँच शताब्दी पहले पुर्तगाली यहाँ आये और बस गये ! अपनी सैन्य क्षमता को मजबूत करने के लिए तत्कालीन त्रिपुरा राजा के निमंत्रण पर वे यहाँ आये थे ! वे लगभग 60 पुर्तगाली परिवार थे जिनके वंशज अभी भी इस क्षेत्र में रहते हैं ! उस समय इस क्षेत्र में कोई प्रीस्ट (पुजारी) नहीं था !  कभी-कभी ढाका के प्रीस्ट (पुजारी) यहाँ आते थे और धार्मिक विधियों का निर्वहन किया करते थे !  बाद में  1937 में  मरियमनगर चर्च का निर्माण किया गया और डॉन बॉस्को  होली क्रॉस के फादरों ने इसे चलाने में अपना सहयोग और समर्थन दिया ! त्रिपुरा में आ बसे पुर्तगालियों को तत्कालीन माणिक्य राजाओं ने भाड़े के सैनिकों के रूप में काम पर रखा था ताकि त्रिपुरा रियासत को पास के अराकान के मोग लुटेरों द्वारा बार-बार किये जाने वाले हमलों से बचाने में मदद मिल सके ! वास्को डी गामा के बेड़े को कालीकट का रास्ता मिल जाने के बाद  पुर्तगाली व्यापारियों और समुद्री डाकुओं ने भी तट के आसपास बंगाल की ओर जाने का रास्ता ढूँढ लिया और कई लोग चटगाँव, सैंडविप द्वीप और फरीदपुर (वर्तमान बांग्लादेश में) में बस गए ! त्रिपुरा के शासकों ने चटगाँव में बसे कुछ लोगों को शाही सेना में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया ! उनमें से कई ने गनर और राइफलमैन के रूप में काम किया ! राजा अमर माणिक्य बहादुर (1577-1586) ने चटगाँव और नोआखली से अपनी सेना में पुर्तगाली भाड़े के सैनिकों के एक समूह को शामिल किया था ! बाद में वे त्रिपुरा की तत्कालीन राजधानी रंगमती (उदयपुर) में बस गए ! 1760 में महाराजा कृष्ण माणिक्य द्वारा अपनी राजधानी अगरतला स्थानांतरित करने के बाद उन्हें भी मरियमनगर में लाकर बसाया गया ! त्रिपुरा के अंतिम शासक के पुत्र, प्रद्योत किशोर माणिक्य देबबर्मन, ने बताया कि पुर्तगाली भाड़े के सैनिक अपने साथ सामरिक युद्ध कौशल का काफी ज्ञान लेकर आए थे क्योंकि वे आग्नेयास्त्रों का उपयोग करने में पारंगत थे !

छोटा सा चर्च देखने में बहुत ही खूबसूरत है ! चारों तरफ खूबसूरत फूलों से सुरभित बगीचे से घिरा यह चर्च भी उस वक्त बंद था जब हम इसे देखने पहुँचे ! लेकिन चारों ओर घूमने पर एक खिड़की का दरवाज़ा खुला हुआ था ! हमने अन्दर हॉल का नज़ारा उसी खिड़की से झाँक के कर लिया और अन्दर स्थापित मूर्ति की तस्वीरें भी खींच लीं ! बाहर बरामदे में कलात्मक ढंग से नीले रंग के पेंटेड खम्भे थे और एक तरफ प्रभु यीशु एवं दूसरी तरफ मदर मेरी की आकर्षक पेंटिंग्स लगी हुई थीं ! यहाँ का वातावरण बहुत ही शांत एवं पवित्र लग रहा था ! यहाँ भी सबने अच्छी तरह से फोटोग्राफी का आनंद लिया !

इस्कॉन टेम्पल

चर्च से बाहर निकलते निकलते रिमझिम रिमझिम बारिश होने लगी थी ! हम जब इस्कॉन मंदिर पहुँचे तो सड़कों पर खूब पानी हो गया था ! सम्हल सम्हल कर चलना पड़ रहा था कि कपड़ों पर कीचड़ के छींटे न आ जाएँ और जूते चप्पल कीचड में बहुत अधिक न सन जाएँ ! अन्दर मंदिर में बहुत भीड़ नहीं थी ! मुम्बई, दिल्ली, उज्जैन, वृंदावन आदि शहरों के इतने सुन्दर और भव्य इस्कॉन मंदिर देख चुके हैं कि उनकी तुलना में यह मंदिर बहुत छोटा और साधारण सा ही लगा लेकिन महत्त्व बाहर के भवन का नहीं होता है उस भवन में स्थापित भगवान् का होता है जिनके समक्ष हमारा सर स्वयं ही श्रद्धा से झुक जाता है ! यह मंदिर शहर के बीच में मठ चौमुही में स्थित है ! क्योंकि यह बाज़ार के बीच में है इसलिए इसके आसपास कोई खुला स्थान नहीं है और इसका आकार प्रकार भी बहुत छोटा है ! अन्दर भगवान् जगन्नाथ, बलराम एवं सुभद्रा की सुन्दर मूर्तियाँ स्थापित हैं ! इनके अलावा स्वामी प्रभुपाद की प्रतिमा भी एक आसन पर विराजी हुई है ! मंदिर के अन्दर छत पर सुन्दर चित्रकारी है जो दर्शनीय है ! बाहर की तरफ प्रसाद, धार्मिक पुस्तकों एवं गिफ्ट्स की दूकान भी है जहाँ कम कीमत पर अच्छा सामान मिल रहा था ! यहाँ से मैंने भी कुछ मालाएँ खरीदीं ! यहाँ आने के बाद बहुत अच्छा लगा ! सुबह से चलते चलते बहुत थक गए थे ! आज के दिन का आख़िरी दर्शनीय स्थल और बाकी रह गया था ! अलबर्ट एक्का वार मेमोरियल ! बस अब हम उसे ही देखने जा रहे थे !

अलबर्ट एक्का वार मेमोरियल

यह वह स्थान है जो हमारे दिलों को अकथनीय गर्व, पीड़ा एवं संतोष से भर देता है ! यहाँ हमारे उन वीर सेनानियों की कुर्बानियों और शाहदत के किस्से अंकित हैं जिन्होंने सन् 1971 के बांग्लादेश युद्ध के समय हँसते-हँसते अपने प्राण न्यौछावर कर दिए थे ताकि हम अपने घरों में सुख की नींद सो सकें ! इन वीर सैनिकों के सम्मान में अपने आप ही सर श्रद्धा से झुक गया और सीना गर्व से चौड़ा हो गया ! लेकिन हमें सुख शान्ति से परिपूर्ण जीवन मिले उसके लिए ये वीर योद्धा कितनी कम उम्र में वीरगति को प्राप्त कर लेते हैं यह सोच कर ही मन पीड़ा से भर गया और आँखें नम हो गईं ! मरणोपरांत वीरता के सर्वोच्च सम्मान परम वीर चक्र को पाने वाले वीर सैनिक अलबर्ट एक्का की स्मृति में इस स्थान का नाम अलबर्ट एक्का वार मेमोरियल रखा गया है !

अलबर्ट एक्का की कहानी भी कम रोमांचक नहीं है ! झारखंड के गुमला जिले के जनजातीय बहुल गाँव जारी में जन्मे अल्बर्ट एक्का ने बांगलादेश युद्ध के दौरान पाकिस्तान की सीमा में घुस कर कई बंकर नष्ट किये थे ! बांग्लादेश तब स्वतंत्र देश नहीं था ! यह पूर्वी पाकिस्तान कहलाता था !

अलबर्ट एक्का के अदम्य साहस के कारण ही 1971 के युद्ध में भारत सरकार ने पाकिस्तान को भारी शिकस्त दी थी ! युद्ध के दौरान 15 भारतीय सैनिकों को मरता हुआ देख कर अलबर्ट एक्का बन्दर की तरह दौड़ते हुए टॉप टावर के ऊपर चढ़ गए और टॉप टावर की मशीनगन को कब्जे में लेकर अंधाधुंध फायरिंग से दुश्मन को तहस नहस कर दिया ! इस दौरान उन्हें भी कम से कम बीस पच्चीस गोलियाँ लगीं ! सारा शरीर गोलियों से छलनी हो चुका था लेकिन वो मोर्चे पर तब तक डटे रहे जब तक शरीर बेसुध होकर टॉप टावर से नीचे नहीं गिर गया ! 3 दिसंबर 1971 को इस वीर योद्धा ने देश की रक्षा करते हुए अपने प्राणों का बलिदान कर दिया ! मरणोपरांत इन्हें देश के सर्वोच्च सैनिक सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया ! इनके सम्मान में इनके गाँव जारी में इनके पैतृक निवास को संग्रहालय में तब्दील करने की सरकार की योजना है ताकि आने वाली पीढ़ियाँ उनकी वीरता के बारे में जान कर प्रेरणा ले सकें !

इस वार मेमोरियल में बड़े ही सुन्दर सुन्दर सन्देश भी हैं जो शिलालेखों के रूप में अंकित हैं और तत्कालीन बांग्लादेश युद्ध के समय प्रयोग में लाये जाने वाले पैटन टैंक्स, तोप व अन्य युद्ध सामग्री का भी बड़ी सुन्दरता के साथ प्रदर्शन किया गया है ! इसका परिसर भी खूब लंबा चौड़ा है ! वहीं पर एक छोटे से स्टॉल पर बहुत ही बढ़िया चाय मिल रही थी ! शाम भी गहरा चुकी थी ! दिन भर घूम घूम कर सब खूब थक भी चुके थे और हल्की फुहार भी पड़ रही थी ! ऐसे में गरमागरम स्वादिष्ट चाय ने हम सबकी थकान को छू मंतर कर दिया ! सबने दो दो कप चाय पी ! बड़ा मज़ा आया ! मेमोरियल के सामने ही मुख्य मार्ग के चौराहे पर हमारे सर्वाधिक प्रिय संगीत निर्देशक सचिन देवबर्मन की ब्रोंज कलर की बड़ी सी प्रतिमा लगी हुई थी ! उसे देख कर मन में बर्मन दा के स्वरबद्ध किये हुए न जाने कितने सुरीले गीत गूँजने लगे ! यहाँ की यादों को अपने कैमरों में कैद कर हम लोगों ने फाइनली होटल की राह पकड़ी ! सूर्यास्त का समय हो रहा था ! अस्त होते होते सूरज दादा अपना तेज दिखाने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहे थे ! लिहाजा आसमान में बेहद खूबसूरत इन्द्रधनुष खिंच आया था ! होटल पहुँच कर कार से नीचे उतर कर मैं बड़ी देर तक उस इन्द्रधनुष को ही देखती रही ! नज़रें हट ही नहीं रही थीं आसमान से !

आज जितनी थकान हो रही थी मन उतना ही प्रफुल्लित भी था ! अपने अपने कमरों में पहुँच कर फिर से चाय बिस्किट का एक राउंड और चला ! हमारी टीम लीडर संतोष जी की तबीयत कुछ खराब हो गयी थी ! उनके कमरे में जाकर कुछ देर उनके साथ और विद्या जी के साथ गप शप करते रहे ! फिर रचना जी और अंजना जी के कमरे में जाकर उनकी शिलौंग की पुलिस बाज़ार की शॉपिंग देखी ! रचना जी के हाथ में बहुत दर्द था ! उनका भी हाल चाल लिया ! डिनर टाइम तक समय बिताना ही था ! रात आठ बजे के लगभग हम सब लोग नीचे डाइनिंग हॉल में पहुँचे तो सारे बर्तन खाली थे ! पूछने पर उसने बड़ी पोलाइटली बताया कि आज का डिनर कॉम्प्लीमेंट्री नहीं था इसलिए बना कर नहीं रखा है लेकिन जो भी आर्डर देंगे वह बहुत जल्दी बन जाएगा ! हम सब भी जल्दी ही सोना चाहते थे ! आसान सा मीनू उसे बता दिया गया ! होटल में ठहरे अन्य मेहमानों के लिए जो बन रहा था हमने भी वही बता दिया ! खाना यहाँ का लाजवाब होता था ! बिलकुल गरमागरम खाना खाकर बहुत मज़ा आया ! इसके बाद अब कोई काम नहीं बचा था ! कमरे में जाकर बच्चों से बात करके सबके हालचाल ले लिए ! तसल्ली हो गयी और फिर जल्दी से निंद्रा देवी की शरण में जाने ही भलाई लगी ! सुबह जल्दी उठ कर अगरतला के शेष पर्यटन स्थलों को देखना था ! अब आप भी आराम करिए ! आज की पोस्ट को यहीं विराम देती हूँ ! कल ले चलूँगी आपको अपने साथ कुछ ऐसे स्थानों पर जिनके लिए अगरतला सारे संसार में जाना जाता है ! तो अब इजाज़त दीजिये मुझे ! अगली पोस्ट में जल्दी ही आपसे मुलाकात होगी ! शुभ रात्रि !

 

साधना वैद  

 

 


Tuesday, July 18, 2023

अगर सा महकता अगरतला – १३

 



14 मई – अगरतला के दर्शनीय स्थल

त्रिपुरा प्रदेश की राजधानी अगरतला शहर के बारे में इतनी विस्तृत विषद जानकारी प्राप्त करने के बाद उसके हर दर्शनीय स्थल को देखने की उत्सुकता बढ़ती ही जा रही थी ! होटल एयर ड्राप से निकलने के बाद सबसे पहले हमारा काफिला जगन्नाथ मंदिर पहुँचा !

जगन्नाथ मंदिर

जगन्नाथ मंदिर अगरतला का एक प्रसिद्ध धार्मिक स्थल है ! 19वीं शताब्दी में माणिक्य राजवंश के तत्कालीन महाराजा राधा किशोर माणिक्य देवबर्मन द्वारा निर्मित, जगन्नाथ मंदिर उज्जयंत महल के परिसर में स्थित है और हिंदू देवताओं, जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा को समर्पित है ! इस मंदिर के बाहरी हिस्से में वास्तुकला की इस्लामी शैली प्रमुख है, लेकिन अंदरूनी हिस्से को हिंदू वैभव से सजाया गया है ! मंदिर परिसर में पौराणिक गाथाओं के प्रसंगों की अनेक बहुत भव्य और सुन्दर झाँकियाँ हैं जो भक्तों एवं पर्यटकों को आकर्षित करती हैं !

यह व्यापक रूप से माना जाता है कि पुरी में प्रतिष्ठित नीलमाधव की मूर्ति त्रिपुरा के जगन्नाथ बाड़ी मंदिर से दान में दी गई थी ! शाम की आरती के साथ नित्य पूजा, भोग और प्रसाद का वितरण यहाँ के प्रमुख अनुष्ठान हैं जिनका पालन नियमित रूप से किया जाता है !  मंदिर की सुंदरता और सादगी की सराहना करने के लिए और सर्वशक्तिमान की भक्ति में लीन हो जाने के लिए आरती का आयोजन विशेष रूप से एक अनिवार्य परम्परा है ! रथ यात्रा, मंदिर का वार्षिक उत्सव, एक महत्वपूर्ण त्योहार है जिसे बड़े उत्साह और उमंग के साथ मनाया जाता है और इसमें हर साल सैकड़ों भक्त शामिल होते हैं ! 
जगन्नाथ मंदिर की लोकप्रियता इस तथ्य में निहित है कि यह मंदिर  जितना अधिक धार्मिक महत्व के लिए जाना जाता है, उतना ही यह अपने हिन्दू एवं इस्लामी स्थापत्य के गंगा जमुनी सौंदर्य के लिए भी प्रसिद्ध है ! यह भव्य इमारत आज भी अपनी वास्तुकला की भव्यता की वजह से त्रिपुरा का गौरव है ! जगन्नाथ मंदिर का आधार चमकीले नारंगी रंग की दीवारों के साथ अष्टकोणीय आकार का है ! पिरामिडनुमा शंकु संरचनाएँ मंदिर के स्तंभों को सुशोभित करती हैं !

हम जब मंदिर में दर्शन के लिए पहुँचे तो गर्भ गृह के द्वार बंद थे ! लेकिन पुजारी जी सबको तिलक लगा कर चरणामृत वितरित कर रहे थे ! अन्दर जाकर तो नहीं देख सके लेकिन ग्रिल की सलाखों से प्रभु के दर्शन हमने बाहर से ही कर लिए !

लक्ष्मीनारायण मंदिर

हमारा अगला गंतव्य था अगरतला का एक और बहुत ही प्रसिद्ध एवं लोकप्रिय लक्ष्मीनारायण मंदिर ! लक्ष्मी नारायण मंदिर एक हिंदू मंदिर है जो अगरतला शहर के उज्जयंता राजमहल के बिलकुल पास स्थित है ! यह मंदिर भगवान लक्ष्मी नारायण और विष्णु जी को समर्पित है ! इस मंदिर का निर्माण त्रिपुरा के राजा बीरेंद्र किशोर माणिक्य देवबर्मन ने 1909-1923 में करवाया था ! यह मंदिर प्रसिद्ध उज्जयंता महल के मुख्य द्वार के पास स्थित है ! अगरतला के अन्य पर्यटन स्थलों की तुलना में यहाँ सबसे ज्यादा पर्यटक आते हैं !हाँ के राजा भगवान कृष्ण के भक्त थे और उन्होंने इस मंदिर के अलावा महल के चारों ओर और भी कई मंदिरों का निर्माण करवाया ! चूँकि भगवद् गीता के अनुसार भगवान कृष्ण और तामल वृक्ष के बीच गहरा संबंध है, इसलिए इस मंदिर में आप तामल वृक्ष भी देख सकते हैं ! हर दिन हज़ारों लोग इस मंदिर में मन्नत माँगने के लिए आते हैं ! मंदिर के शिल्प को देख स्वयमेव इस बात का अनुमान हो जाता है कि इसमें प्रचीन और आधुनिक कला का बेजोड़ संगम है ! यह मंदिर त्रिपुरा के राजाओं के गौरवशाली अतीत का जीता जागता उदाहरण है ! यह मंदिर भी अगरतला का एक दिव्य पर्यटन स्थल है ! मंदिर परिसर में भगवान शिव, हनुमान जी का भी मंदिर है ! यह मंदिर एक झील के किनारे बना हुआ है, जिससे इसकी सुंदरता और बढ़ जाती है ! यहाँ हर साल जन्माष्टमी का त्योहार बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है ! इतने खूबसूरत स्थान हों तो फोटो सेशन होना तो आवश्यक हो ही जाता है ! लिहाजा सबने झील के पास और मंदिर के प्रवेश द्वार पर खूब तस्वीरें खींची भी और खिंचवाई भी !

चतुर्दश मंदिर

इस मंदिर को चौदह देवी मंदिर भी कहते हैं ! यह अगरतला से लगभग 14 किलोमीटर की दूरी पर ओल्ड अगरतला में स्थित है !  शमसेर गाज़ी के साथ लगातार युद्ध होने के कारण  महाराजा कृष्ण किशोर माणिक्य ने अपनी राजधानी को उदयपुर से पुराने अगरतला में स्थानांतरित कर दिया था !  नवीन अगरतला में स्थानांतरित होने तक यह नगर ही त्रिपुरा राजवंश की राजधानी बनाहा !  पवित्र 14 देवी मंदिर के पास हर साल जुलाई के महीने में खारची उत्सव का आयोजन किया जाता है और हजारों तीर्थयात्री और श्रद्धालु इस उत्सव में भाग लेने के लिए आते हैं !  इस पूजा में काफ़ी संख्या में सभी धर्मों के लोग सम्मिलित होते हैं !

यह एक स्थानीय कहावत है कि जो एक बार त्रिपुरा के चौदह देवी मंदिर के दर्शन करता है वह चौदह बार अगरतला आता है ! यहाँ पर पशु बलि देने के साथ रूढ़िवादी तांत्रिक विधि विधान से पूजा करने की पद्धति का निर्वाह अभी भी किया जाता है ! इस मंदिर के अलावा त्रिपुर सुन्दरी मंदिर में भी बकरों की बलि दी जाती है ! हम जिस दिन दर्शन के लिए गए उस दिन भी चतुर्दश मंदिर में चार बकरों की बलि दी गयी ! दिल दहल गया और मूड भी खराब हो गया ! बकरों की करूण चीत्कारें कानों में अभी तक गूँज रही हैं ! लेकिन वहाँ के लोगों के लिए जैसे यह एक सामान्य दैनिक क्रिया ही थी ! तमाम लोग निस्पृह भाव से इस क्रूर और वीभत्स दृश्य के चश्मदीद गवाह बन कर खड़े रहे और मंदिर का एक सेवक बड़ी ज़ोर ज़ोर से ढोल बजाता रहा ! वहीं के एक सज्जन ने बताया कि कार्तिक मास में त्रिपुरा सरकार की ओर से एक दिन में १०१ बकरों की बलि दी जाती है ! हमारे तो रोंगटे खड़े हो गए यह सुन कर !

उज्जयंता पैलेस

उज्जयंता पैलेस, जिसे नुयुंगमा  के नाम से भी जाना जाता है, त्रिपुरा के राजघराने का पूर्व शाही महल है ! इस महल को यह नाम रवीन्द्र नाथ टैगोर  ने दिया था ! इस महल का निर्माण 1899 और 1901 के बीच महाराजा राधा किशोर माणिक्य देवबर्मन के  द्वारा किया गया था ! इस महल में यूरोपीय शैली से प्रेरित बहुत खूबसूरत बगीचे हैं और यह दो झीलों के किनारे एक वर्ग किलोमीटर के एरिया में फैला हुआ है ! अक्टूबर 1949 में त्रिपुरा के भारत में विलय तक यह सत्तारूढ़ माणिक्य राजवंश का घर था !  महल को 1972-73 में त्रिपुरा सरकार द्वारा शाही परिवार से 2.5 मिलियन रुपयों में खरीदा गया ! जुलाई 2011 तक यह राज्य का विधान सभा भवन हुआ करता था ! उज्जयंता पैलेस अब एक राज्य संग्रहालय है और यह मुख्य रूप से पूर्वोत्तर भारत में रहने वाले समुदायों की जीवन शैली, कला, संस्कृति, परम्परा और व्यावसायिक कारीगरी के शिल्प को बहुत ही खूबसूरती के साथ प्रदर्शित करता है ! इस संग्रहालय का रख रखाव देखते ही बनता है ! प्रदर्शित झाँकियों में पुतलों को पहनाई गयी वेशभूषा और आभूषण देखने लायक हैं ! यह संग्रहालय हमें हर प्रकार से ज्ञान और अनुभव के आधार पर बहुत समृद्ध करता है ! इस संग्रहालय का उद्घाटन 25 सितंबर 2013 को भारत के तत्कालीन उपराष्ट्रपति  मोहोम्मद हामिद अंसारी द्वारा किया गया !

यह एक दो मंज़िला हवेली है, जिसमें तीन ऊँचे गुंबदों के साथ मिश्रित प्रकार की वास्तुकला के संयोजन दिखाई देते हैं !  केंद्रीय गुंबद 86′ ऊँचा है !  शानदार टाइल वाले फर्श, घुमावदार लकड़ी की छत और खूबसूरती से तैयार किए गए दरवाजे विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं !  ऊपर की मंज़िल में एक विशाल तोप भी रखी हुई है ! संग्रहालय का निकास एक बहुत ही सुन्दरता से नक्काशी किये हुए विशाल द्वार से हमें महल के सामने बनी हुई सीढ़ियों पर ला खड़ा करता है जिनसे नीचे उतरते हुए हम भी राजसी गर्व से भर जाते हैं ! महल की विशाल गुम्बदों, खूबसूरत बगीचों, सुन्दर झीलों, भव्य फ्लड लाइटिंग और फव्वारों ने इसकी सुंदरता में चार चाँद लगा दिए हैं ! यहाँ आकर हम लोगों का कला प्रेमी मन पूरी तरह से तृप्त हो गया ! अन्दर फोटोग्राफी प्रतिबंधित थी तो कुछ बहुत ही सुन्दर दृश्यों को कैमरे में कैद न कर पाने का अफ़सोस बना रहा !

भव्य एवं विशाल उज्जयंत पैलेस में घूम घूम कर सबको ज़ोरों की भूख लग आई थी ! हमारी फरमाइश पर राजा हमें एक बहुत ही बढ़िया रेस्टोरेंट में खाने के लिए ले गए ! रेस्टोरेंट का नाम था ‘शंकर’ और यहाँ का खाना बेहद लज़ीज़ और लाजवाब था !

हेरीटेज पार्क

भोजन से निबट कर हमारा अगला गंतव्य था हेरीटेज पार्क ! हेरिटेज पार्क शहर के मध्य में त्रिपुरा सरकार द्वारा बनाया गया है जिसका उद्घाटन वर्ष 2012 में त्रिपुरा के मुख्यमंत्री द्वारा किया गया था !

पार्क का प्रवेश द्वार कलात्मकता का एक अद्भुत नमूना है जो त्रिपुरा के इतिहास के आदिवासी और गैर आदिवासी दोनों वर्गों की कला और संस्कृति को मिश्रित करके कला संरचना की एक अनूठी बानगी प्रस्तुत करता है !  बगीचे को लैंडस्केप डिजाइनरों द्वारा बहुत अच्छी तरह से सजाया और सँवारा गया है ! 12 एकड़ का पार्क 1.1 किमी लंबे पार्क पथ से घिरा है जो हेरिटेज पार्क के तीन खंडों, मिनी त्रिपुरा, प्राकृतिक वन और औषधीय पौधे वाले टेबल टॉप को जोड़ता है !

हेरिटेज पार्क का मुख्य आकर्षण यह है कि यह यात्रियों को एक ही स्थान पर त्रिपुरा की सभी विशेषताओं के दर्शन करा देता है !  त्रिपुरा के आकर्षक पर्यटन स्थलों के लघु संस्करण, अर्थात् उनाकोटि की मूर्तियाँ, नीरमहल महल, उज्जयंता महल, त्रिपुरा सुंदरी मंदिर, पिलक, महामुनि, चंद्रपुर आदि के पत्थर के मॉडल हेरिटेज पार्क को और अधिक शोभा प्रदान करते हैं ! पार्क के प्राकृतिक वन भाग पर वानिकी लगाई गई है !  पार्क के इस हिस्से में देशी पेड़ों और विदेशी फूलों और जानवरों को संरक्षित किया गया है !  पार्क को हेरीटेज बेंचों, पत्थर की मूर्तियों, स्मारकों, मिट्टी के बर्तनों से सजाया गया है ! यहाँ पर हमने प्रवेश द्वार पर ही अगर का वह पेड़ भी देखा जिसके नाम पर इस शहर का नाम ‘अगरतला पड़ा ! पार्क के अन्दर एक सोवेनियर्स के दूकान से कुछ सामान भी खरीदा ! उस दूकान के मालिक ने पेड़ से ताज़ी ताज़ी तोड़ी हुई लीचियाँ भी हम लोगों को खिलाईं ! उसकी मेहमान नवाज़ी हमें अभिभूत कर गयी !

14 मई को हेरीटेज पार्क देखने के बाद हम लोगों ने तीन भव्य स्थानों को और देखा था ! उनका वर्णन भी उतना ही रोचक है ! लेकिन पोस्ट बहुत लम्बी हुई जाती है और मैं यह बिलकुल नहीं चाहती कि आप बोर होकर, ऊब कर या जमुहाई लेते हुए पोस्ट को पढ़ें ! इसलिए आज के लिए इतना ही काफी है ! बचे हुए स्थानों की सैर कराने के लिए आपको जल्दी ही ले चलूँगी ! बस थोड़ा सा इंतज़ार कर लीजिये ! अभी तो इस पोस्ट का आनंद लीजिये और मेरी आँखों से अगरतला को देखिये ! मुझे विश्वास है आपको भी खूब आनंद आ रहा होगा ! तो अब विदा लेती हूँ आपसे ! शुभ रात्रि !

साधना वैद