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Monday, December 6, 2021

मैं मूर्तिकार तो नहीं

 



मैं मूर्तिकार तो नहीं

लेकिन वर्षों पहले बनाई थी मैंने

तुम्हारी एक मूरत

अपने मनमंदिर में स्थापित करने के लिए !

जानते हो तुम यह मूरत

वैसी बिलकुल भी नहीं थी जैसे तुम थे

इसे मैंने बड़ी मेहनत से तराशा था !

अपनी कल्पना की छैनी से मैंने

इसके मुख पर भावों को उभारा था,

अपने मन की कोमलता से मैंने

इस मूरत के हर अंग को आकार दिया था,  

अपने अंतर में प्रवाहित करुणा की

अजस्त्र प्रवाहित अश्रुधारा से मैंने

इस मूरत की आँखों से झरते अलौकिक प्रेम के

दिव्य प्रकाश को सँवारा था ! 

मैं इस मूर्ति के शिल्प में

अपना ही प्रतिरूप देखना चाहती थी !

इसीलिये तो मेरे उर अंतर में बसी

इस मूर्ति का शिल्प शायद

उन सभी मूर्तियों से भिन्न है

जो संग्रहालयों की वीथियों में,

वहाँ के भव्य सभागारों में

युग युगांतर से सजी हुई खड़ी हैं !

क्योंकि इस मूर्ति में मेरे

मन के देवता का वास है

इसीलिये इसका शिल्प भी

मेरे मनोनुकूल है !


चित्र - गूगल से साभार 

साधना वैद  

 


Tuesday, November 30, 2021

बच्चों में गुम होता बचपन

 



समस्या गंभीर है और जल्दी ही यदि इसका निराकरण नहीं किया गया तो गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं ! ऐसा क्यों है कि बच्चों में मासूमियत और बचपना गुम होता जा रहा है ! इस समस्या पर चिंतन करें तो कई बातें ऐसी उभर कर सामने आती हैं जो हमें स्पष्ट संकेत देती हैं कि समस्या की जड़ कहाँ है और कितनी गहरी है !

सबसे पहला कारण है संयुक्त परिवारों का टूटना !

पहले जब समाज की बुनियाद संयुक्त परिवार पर टिकी हुई थी बच्चों के सामने कभी अकेले रहने की समस्या ही नहीं आती थी ! घर परिवार में चचेरे, तयेरे, फुफेरे कई बच्चों का साथ होता था जिनके साथ दिन रात खेल कूद, शरारतों और ऊधमबाजी में बच्चों का खूब वक्त बीतता था ! दादी बाबा की कहानियाँ सुनते उनके साथ बोलते बतियाते बच्चे सदैव प्रसन्न रहते और उनके अन्दर सामाजिकता और सद्गुणों का खूब विकास होता ! दादी नानी कहानियों के साथ साथ खूब पहेलियाँ भी पूछतीं जिनसे बच्चों का खूब बौद्धिक विकास भी होता साथ ही मनोरंजन भी खूब होता ! लेकन संयुक्त परिवारों के टूटने से अब बच्चों को स्कूल से घर आने पर कोई हमवयस्क नहीं मिलता ! या तो घर में अपने आप में उलझी थकी हुई माँ मिलती है या माता पिता दोनों ही कामकाजी हों तो या तो घर में सन्नाटा पसरा होता है या किसी आया का साथ मिलता है ! दोनों ही स्थितियाँ बच्चों के लिए हानिकारक होती हैं ! बच्चों को घर में खुल कर हँसते हुए चहकते हुए देखना अब बहुत ही विरल वस्तु हो गयी है ! माता पिता भी गाम्भीर्य का मुखौटा पहने बच्चों से खिंचे खिंचे से रहते हैं और बच्चे उम्र से पहले ही अपना बचपन और चंचलता खोकर खामोश हो जाते हैं !

माता पिता बच्चों की सुरक्षा के प्रति इतने सचेत हो गए हैं कि अब पार्क में खेलने वाले बच्चों के समूह कम ही देखने को मिलते हैं ! अधिकतर वे घरों में अकेले ही रहने लगे हैं ! इसकी भरपाई के रूप में माता पिता उन्हें वीडियो गेम्स दिला देते हैं या मँहगे वाले मोबाइल फोन दिला देते हैं ! बच्चे उन्हींके साथ खेलते हुए एकान्तप्रिय होते जाते हैं ! वे घंटों उसीमें उलझे रहते हैं और समूह में खेलने की भावना क्या होती है सामाजिकता के मायने क्या होते हैं इन मूल्यों को भूलते जा रहे हैं ! ज़ाहिर है ऐसे बच्चे कुंठित हो जाते हैं और समय से पहले ही बुढ़ा जाते हैं !    

एक तो करेला कड़वा ऊपर से नीम चढ़ा ! एक तो वैसे ही आजकल के बच्चे अकेले ही रहना पसंद करने लगे हैं उस पर कोरोना की इस आपदा ने बच्चों को बिलकुल अकेला कर दिया ! घर से बाहर निकलने पर बिलकुल पाबंदी हो गयी ! पार्क, बाग़ बगीचे, खेलों के मैदान और गलियाँ सब सूने हो गए और ऑनलाइन क्लासेस के बहाने सभी बच्चों के हाथों में मोबाइल फोन आ गए और खुल गया उनके सामने ऐसी तिलस्मी दुनिया का दरवाज़ा जिसमें घुसने से किसी समय में बड़ों को भी डर लगता था ! जब इतनी छोटी सी उम्र में बच्चे बाल सुलभ कहानियों और खेल कूद की जगह ऐसी वर्जित बातों की तरफ आकृष्ट होने लगेंगे तो उनमें बचपना, मासूमियत और भोलापन कहाँ रह जाएगा ! जैसे कार्यक्रम बच्चे देखने लगे हैं उनसे बच्चों के मन में नकारात्मकता को अधिक प्रश्रय मिलता है और उनकी सोच इससे प्रभावित होने लगती है !

बच्चों में सुसाहित्य के प्रति कम होती रूचि भी इसका एक बड़ा कारण है ! बच्चों की पत्रिकाएँ अब कहाँ इतनी लोकप्रिय रह गयी हैं ! हम लोग जब छोटे थे तो घर में चन्दा मामा, पराग, नंदन, चम्पक, बाल भारती ढेरों पत्रिकाएँ आती थीं जिनमें बहुत ही सुन्दर कहानियाँ आती थीं जो बच्चों के चारित्रिक विकास के लिए बहुत सहायक होती थीं और बच्चे उनसे बहुत कुछ सीखते थे ! अब ज़रा टी वी पर देखिये ! बच्चों के कार्यक्रम में छोटे छोटे बच्चे बड़ों की भूमिका में अभिनय करते हैं तो कितनी निम्न स्तरीय भाषा का प्रयोग करते हैं ! क्योंकि घर में अब सिर्फ उन्हें बड़ों की ही कंपनी मिलती है बच्चों की नहीं ! संवाद लिखने वाले लेखकों की कल्पना यहीं तक दौड़ पाती है कि पत्नी बनी छोटी सी बच्ची पति बने छोटे से बच्चे को खूब खरी खोटी सुनाये और खूब लड़ाई झगड़ा करे ! जब हमने इसे ही मनोरंजन का पर्याय समझ लिया है तो फिर बच्चों के मन से मासूमियत को खँरोंच कर फेंकने का इलज़ाम हम किस पर थोपें ! हमें खुद अपनी सोच, अपने व्यवहार और अपनी महत्वाकांक्षाओं का आकलन नए सिरे से करना होगा कि अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए हम अपने बच्चों के जीवन से जिस तरह से खिलवाड़ कर रहे हैं ! क्या यह वास्तव में उचित है ?

 

साधना वैद    


Saturday, November 27, 2021

यह चिर चंचल यायावर मन


 


चंचल, बेकाबू, मतवाला

भागा करता सपनों के संग,

रुकता ही नहीं पल भर को भी

उड़ता फिरता विहगों के संग !

कैसे रोकूँ दीवाने को

सुनता ही कहाँ ये पागल मन,

हाथों से छूटा जाता है

यह चिर चंचल यायावर मन !

नापा करता आकाश क्षितिज

सारी धरती सारे सागर,

विचरा करता परियों के संग

किस्सों से भरता है गागर !

पल भर में सागर के तल की

वह नाप जोख कर आता है,

अगले पल ग्रह नक्षत्रों की

वह छान बीन कर आता है !

फिर जूल्स वारने के संग वह

खुद धरती में घुस जाता है,

सागर की गहराई में जा

    जल परियों से मिल आता है !   

है भरा हुआ जिज्ञासा से

नित अन्वेषी उत्साही मन,

कैसे इसको मैं बहलाऊँ

है पागल यह यायावर मन !

हर पर्वत, झरने, गाँव, नदी

वन पंछी इसे लुभाते हैं,

किस्सों के सारे पात्र इसे

पुस्तक से निकल बुलाते हैं !

हर दूर देश की वादी में

इसका मन यूँ रम जाता है,

जैसे कितने ही जन्मों से

इसका उस थल से नाता है !

फिर भूला भूला रहता है

यह नादाँ खाम खयाली मन,

मुझको तो प्यारा लगता है

यह भोला सा यायावर मन !

किस्से हर राजा रानी के

परियों के इसको भाते हैं,

महलों, दुर्गों, दालानों के

इसके मन को ललचाते हैं !

इतिहास, सभ्यता, संस्कृति की

बातों में मन इसका रमता,

हो ज़िक्र किसी अन्वेषण का

इसका उत्साह नहीं थमता !

हर शै में डूबा रहता है

मेरा यह अति उत्साही मन,

है मेरे अंतर का दर्पण

मेरा निश्च्छल यायावर मन !

हाथों से छूटा जाता है

यह चिर चंचल यायावर मन !

 

साधना वैद

 

 

 

 

 

 

 


Sunday, November 21, 2021

अनाड़ी

 



दुनिया गाती है गुण चतुर सयानों के

लेकिन हमको प्यार ‘अनाड़ी’ लोगों से,

दुनिया को छल बल की लीला है प्यारी

हमको प्यारे वो जो बरी इन रोगों से !

 

दुनिया घिरती हानि लाभ का सौदों में

मगर ‘अनाड़ी’ प्यार का सौदा करते हैं,

दुनिया छल से अपनी झोली है भरती

ये खुद लुट कर जान का सौदा करते हैं !

 

कहते लोग ‘अनाड़ी’ ऐसे बन्दों को

जिनको बस देना ही देना आता है,

करते जो दूजों का सारा माल हड़प

उन्हें ‘सयाना’ कहना जग को भाता है !

 

जग की ऐसी रीत नहीं हमको प्यारी

हमको निश्छल प्रेम सुहाना लगता है

नहीं चाहिये हमें ‘सयानों’ की दौलत  

हमें ‘अनाड़ी’ दोस्त खज़ाना लगता है !

 


चित्र - गूगल से साभार 

साधना वैद

Saturday, November 20, 2021

पंडित जवाहर लाल नेहरू एक लेखक के रूप में

 


हमारे देश भारत के प्रथम प्रधान मंत्री, हमारे प्रिय नेता पंडित जवाहर लाल नेहरू, राजनीति के क्षेत्र में जितने सफल, प्रभावशाली, लोकप्रिय एवं नेता थे वे उतने ही महान दार्शनिक, एक अति संवेदनशील विचारक एवं अनुसंधनात्मक पैनी दृष्टि रखने वाले एक सिद्धहस्त लेखक भी थे !

प्रख्यात लेखक विजय शंकर सिंह लिखते हैं कि, “जवाहर लाल नेहरू अगर प्रधान मंत्री न होते तो भी यह विश्व उन्हें एक महान लेखक के रूप में याद रखता ! एक ऐसा लेखक जिसकी इतिहास दृष्टि ने इस देश की संस्कृति की अलग तरह से व्याख्या की और देश की सांस्कृतिक विरासत को व्याख्यायित किया ! नेहरू कोई अकादमिक इतिहासकार नहीं थे लेकिन उनकी समृद्ध इतिहास दृष्टि ने उन्हें एक अलग और विशिष्ट तरह के इतिहास लेखक के रूप में स्थापित किया !”

नेहरू जी द्वारा रचित कुल चार पुस्तकें प्रकाशित हुई !

लेटर्स फ्रॉम ए फादर टू ए डॉटर

द ग्लिम्पेज़ ऑफ़ वर्ल्ड हिस्ट्री

एन ऑटोबायोग्राफी

द डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया

नेहरू जी का बचपन और शिक्षा का काल अवश्य ऐशो आराम में बीता लेकिन इंग्लैण्ड से अपनी शिक्षा पूर्ण करने के बाद जब वे स्वदेश लौट कर आये यहाँ चल रहे स्वतन्त्रता आन्दोलन में उन्होंने भी दिलचस्पी लेना शुरू कर दी ! वे गाँधी जी के साथ सविनय अवज्ञा आन्दोलन में उनके सहयात्री बन गए और सन् १९१९ में हुए जलियाँवाला काण्ड के बाद वे पूरी तरह से इस आन्दोलन में कूद पड़े ! लिहाजा उनकी गतिविधियाँ अंग्रेज़ शासकों की आँखों में चुभने लगीं और उन्हें कई बार जेल की हवा खानी पड़ी ! स्वाधीनता संग्राम की इस लड़ाई में नेहरू जी को नौ बार कारावास की सज़ा सुनाई गयी ! कभी कुछ दिनों के लिए’ कभी कुछ महीनों के लिए, तो कभी कुछ साल के लिए ! कुल मिला कर नेहरू जी ने नौ साल देश के विविध कारागारों में बिताये ! वे अलग अलग समय में लाहौर, अहमदनगर, अल्मोड़ा, देहरादून, बरेली, लखनऊ व इलाहाबाद की नैनी सेन्ट्रल जेल में बंद रहे ! लेकिन उनके अन्दर के लेखक ने  कारावास के इस त्रासद काल को सबसे अधिक सकारात्मक एवं रचनात्मक काल के रूप में परिवर्तित कर लिया ! उनका अधिकतर लेखन जेल में ही हुआ क्योंकि अन्य कोई सामाजिक, पारिवारिक अथवा राजनीतिक गतिविधि न होने की वजह से उनके पास अध्ययन और लेखन के लिए पर्याप्त समय होता था जिसका उन्होंने भरपूर सदुपयोग किया !

नेहरू जी स्वभाव से ही स्वाध्यायी थे। उन्होंने महान् ग्रंथों का अध्ययन किया था। सभी राजनैतिक उत्तेजनाओं के बावजूद वे स्वाध्याय के लिए रोज ही समय निकाल लिया करते थे। परिणामस्वरूप उनके द्वारा रचित पुस्तकें भी एक अध्ययन-पुष्ट व्यक्ति की रचना होने की सहज प्रतीति कराती हैं ! नेहरू जी द्वारा रचित चार पुस्तकें सर्वाधिक चर्चित हैं !

उनकी पहली पुस्तक, ‘लेटर्स फ्रॉम ए फादर टू ए डॉटर’,अपने आप में अनूठी पुस्तक है ! ये पत्र उन्होंने अपने इलाहाबाद प्रवास के दौरान लिखे थे जब इंदिरा जी मसूरी के स्कूल में पढ़ रही थीं ! इन पत्रों के माध्यम से अपनी पुत्री इंदिरा को उन्होंने इतिहास के साथ साथ वन्य जीव जंतुओं, विकास के सिद्धांत एवं अन्य अनेकों विषयों के बारे में बताया है और उनकी बाल सुलभ जिज्ञासाओं का समाधान भी किया है ! इस पुस्तक का प्रकाशन सन् १९२९ में हुआ ! मूल रूप से ये पत्र अंग्रेज़ी में लिखे गए थे जिनका हिन्दी अनुवाद हिन्दी के मूर्धन्य साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद ने किया था ! अपनी बेटी इंदिरा को लिखे गए इन पत्रों के माध्यम से राजनेता नेहरू के विराट व्यक्तित्व में समाये एक आदर्श पिता के संवेदनशील हृदय के दर्शन भी हो जाते हैं जो परिस्थितिवश पुत्री से दूर रहने पर भी उसके सम्पूर्ण बौद्धिक विकास के लिए चिंतित भी है और प्रयत्नशील भी ! यह पुस्तक बच्चों के सामान्य ज्ञानवर्धन के लिए बहुत ही उपयोगी है ! इस पुस्तक का हिन्दी अनुवाद, ’पिता के पत्र पुत्री के नाम’ सन् १९३१ में प्रकाशित हुआ !

नेहरू जी की दूसरी चर्चित पुस्तक है, ‘द ग्लिम्प्सेज़ ऑफ़ वर्ल्ड हिस्ट्री’ !   

नेहरू जी जब पाँचवी बार इलाहाबाद की नैनी सेन्ट्रल जेल में दो साल सश्रम कारावास की सज़ा भुगत रहे थे उस दौरान उन्होंने विश्व के इतिहास से जुड़े विशिष्ट सन्दर्भों और तथ्यों को समेटे अनेक पत्र अपनी पुत्री इंदिरा नेहरू को लिखे जो कालान्तर में ‘द ग्लिम्प्सेज़ ऑफ़ वर्ल्ड हिस्ट्री’ के नाम से संकलित और प्रकाशित हुए ! मोटे तौर पर यह पुस्तक विश्व इतिहास की घटनाओं का एक सिलसिलेवार विवरण देती है ! इसे इतिहास की टेक्स्ट बुक या एकेडेमिक पुस्तक का दर्ज़ा तो नहीं दिया जा सकता लेकिन यह विश्व भर में घटने वाली घटनाओं का रोचक विवरण अवश्य प्रस्तुत करती है ! इस पुस्तक में उन्होंने एशिया के साम्राज्यों के उत्थान और पतन की तर्ज़ पर सभ्यताओं के उत्थान और पतन को रेखांकित करने का प्रयास किया है ! यह पुस्तक पत्र शैली में लिखी गयी है ! इतिहास को लिखने का यह भी एक अभिनव प्रयोग ही माना जाएगा ! यह पस्तक सन् १९३४ – ३५ में प्रकाशित हुई !

इन्ही दिनों नेहरू जी की आत्मकथा ‘माय ऑटोबायोग्राफी’ भी प्रकाशित हुई ! इस पुस्तक के लेखन के समय नेहरू जी युवा थे ! इसमें जो लिखा है वह नेहरू जी का अपने क्रिया कलापों का स्वयं अपने ही द्वारा किया गया ईमानदार विवेचन है ! इस आत्मकथा को सम्पूर्ण नहीं माना जा सकता क्योंकि इसके बाद भी नेहरू जी ने सार्वजनिक रूप से दीर्घ जीवन जिया, अनेक महत्वपूर्ण फैसले लिए जिनके सही गलत होने के विवाद अभी तक राजनीति के गलियारों में जब तब उठते रहते हैं ! स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद वे स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधान मंत्री बने ! देश का विभाजन हुआ और इस विभाजन का ठीकरा नेहरू जी के सर पर फोड़ा गया ! लेकिन ये सारी घटनाएँ उनकी आत्मकथा के लिखने के बाद घटित हुई इसलिए इन सारी बातों का ज़िक्र उनकी आत्मकथा में नहीं मिलता क्योंकि पुस्तक में लिखी उनकी आत्मकथा का काल सन् १९३२ - ३३ तक का ही है ! लन्दन टाइम्स ने इस आत्मकथा को  पठनीय पुस्तकों की श्रेणी में रखा था ! इस पुस्तक का प्रकाशन सन् १९३४ में हुआ !

‘द डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया’ नेहरू जी की सबसे अधिक सफल, लोकप्रिय और परिपक्व पुस्तक के रूप में जानी जाती है ! यह पुस्तक उन्होंने अपनी नौवीं व अंतिम जेल यात्रा के समय में लिखी थी जब उन्हें चार साल के सश्रम कारावास की सज़ा सुनाई गयी थी ! इस बार उन्हें सबसे पहले अहमदनगर किले की जेल में रखा गया, फिर बरेली सेन्ट्रल जेल भेजा गया और फिर वहाँ से उन्हें अल्मोड़ा स्थानांतरित कर दिया गया ! नेहरू जी की इस पुस्तक को देश विदेश के इतिहासकारों, विद्वानों, आलोचकों एवं पाठकों का बहुत ही अच्छा प्रतिसाद मिला ! ‘भारत एक खोज’ के नाम से दूरदर्शन पर निर्माता निर्देशक श्याम बेनेगल ने इस पुस्तक को आधार बना कर एक बहुत ही शानदार धारावाहिक भी बनाया जिसे दर्शकों की भूरी भूरी प्रशंसा मिली ! इस पुस्तक में सम्पूर्ण भारत की एक यात्रा है, वेदों और पुराणों के समय से लेकर आधुनिक काल तक का इतिहास है, संस्कृति, सभ्यता, रीति रिवाज़ और परम्पराओं का वर्णन है और इस पुस्तक में नेहरू जी का अपने देश भारत के प्रति गर्व का अनन्य भाव भी परिलक्षित होता है ! नेहरू जी के जीवनीकार एम जे अकबर के अनुसार उनकी दोनों ही पुस्तकें, ‘विश्व इतिहास की एक झलक’ और ‘भारत एक खोज’ उनकी लेखकीय प्रतिभा को ही नहीं उनके पांडित्य को भी प्रदर्शित करती हैं ! ‘भारत एक खोज’ पुस्तक का प्रकाशन सन् १९४४ में हुआ !

नेहरू जी इतिहास के विद्यार्थी नहीं थे न ही वे कोई इतिहासकार थे लेकिन उन्होंने अतीत को अपनी विलक्षण दृष्टि से देखा और जैसा देखा उसे वैसा ही प्रस्तुत कर दिया ! अपने लेखन के सन्दर्भ में नेहरू जी ने स्वयं लिखा है,

“अतीत मुझे अपनी गर्माहट से स्पर्श करता है और जब वह अपनी धरणा से वर्तमान को प्रभावित करता है तो मुझे हैरान भी कर देता है !”

समस्त राजनीतिक विवादों से दूर नेहरू जी निःसंदेह एक उत्तम लेखक थे ! उनके लेखन में एक साहित्यकार के भावप्रवण तथा एक इतिहासकार के खोजी हृदय का मिला-जुला रूप सामने आया है ! इन पुस्तकों के अतिरिक्त नेहरू जी ने अगणित व्याख्यान दिये, लेख लिखे तथा पत्र लिखे ! इनके प्रकाशन हेतु 'जवाहरलाल नेहरू स्मारक निधि' ने एक ग्रंथ-माला के प्रकाशन का निश्चय किया। इसमें सरकारी चिट्ठियों, विज्ञप्तियों आदि को छोड़कर स्थायी महत्त्व की सामग्रियों को चुनकर प्रकाशित किया गया ! जवाहरलाल नेहरू वांग्मय नामक इस ग्रंथ माला का प्रकाशन अंग्रेजी में 15 खंडों में हुआ तथा हिंदी में सस्ता साहित्य मंडल ने इसे 11 खंडों में प्रकाशित किया है !

 

साधना वैद


Sunday, November 14, 2021

सपनों का आँचल

 



आँचल उसके सपनों का था ,
आँचल में सितारे हसरतों के टंके थे ,
किरण मुरादों की लगी थी ,
इन्द्रधनुषी सतरंगी फूल उसकी उम्मीदों के थे !
अपने ख़्वाबों खयालों की दुनिया में
उस सतरंगी चूनर को ओढ़
वह सारी रात खोई रहती थी
अपने सपनों के राजकुमार की प्रतीक्षा में
जो उसे सफ़ेद अश्व पर बैठा कर
ले जाएगा किसी दूर देश में
जहाँ न दुःख होगा, न ग़रीबी,
न भूख, न बीमारी, न जिल्लत, न जहालत,
न आँसू, न अपमान !
होगा तो बस प्यार !
प्यार प्यार और सिर्फ प्यार !
लेकिन भोर की पहली किरण के साथ
जैसे ही उसकी आँख खुलती है
खुली आँखों से उसके सारे सपने
आँसू की तरह नीचे ढुलक जाते हैं
सपनों का आँचल सर से सरक जाता है
और वह बन जाती है
चाबी भरी पुरानी धुरानी
एक टूटी फूटी गंदी सी गुड़िया
जो अपनी जर्जर साड़ी को
कस कर कमर में लपेट कर
निरत हो जाती है रोज़ की नीरस दिनचर्या में
और सुनती रहती है सबके ताने,
पीती रहती है अपमान के घूँट
और सूनी आँखों से प्रतीक्षा करती रहती है
रात के आगमन की
जब फिर उसके सर पर
सपनों का आँचल होगा
और सफ़ेद अश्व पर सवार होकर
उसका राजकुमार उसके पास आयेगा
और उसे प्यार के गीत सुनाएगा
और जी लेगी वह एक सच्ची खुशी
उस झूठी सी एक रात में !


साधना वैद

Sunday, November 7, 2021

महारास




सुनो न कृष्ण

जब तुम आस पास होते हो,

जब गोकुल की गलियों में

तुम्हारी मुरली की मधुर धुन

सुनाई देने लगती है,

जब यमुना के तट पर गोपियों की

आह्लादित ठिठोलियों के स्वर

हवा में गूँजने लगते हैं

तब प्रकृति भी उल्लसित हो

उनके साथ संगत देने लगती है !

घटाओं की ताल पर बारिश की

रिमझिम बरसती बूँदें मधुर गीत

गुनगुनाने लगती हैं,

यमुना की चंचल लहरें तरंगित हो

गोपिकाओं के आँचल से

उलझने लगती हैं !

हवाओं के साथ तुम्हारी मुरली की तान

दूर दूर के प्रदेशों तक पहुँच जाती है

और हर पैर थिरक उठता है,

हर मनुज के अंतर में

प्रेम का सितार बज उठता है 

और तब सृजन होता है

उस दिव्य अलौकिक संगीत का

जिसकी लय पर हर गोपिका

तुम्हारी संगति में स्वयं को

राधा समझने लगती है !

फिर रचा जाता है एक महारास

जिसकी गूँज युगों युगों तक

इस धरा पर सुनाई देती है !

साधना वैद


Tuesday, October 26, 2021

मन की बातें - सायली छंद


 


पुकारूँ

नित्य तुम्हें

कहाँ छिपे हो

मेरे प्यारे

गिरिधारी !

 

जब

मैं बुलाऊँगी

तुम आओगे ना

वादा करो

मुझसे !

 

लगता

कितना प्यारा

तुम्हारा सुन्दर मुखड़ा

बलिहारी जाऊँ

मैं !

 

खिले

रंग बिरंगे

फूल उपवन में

हवा लहराई

मदभरी !

 

विसंगति

कैसी अघोर

कविता कोमल तुम्हारी

किन्तु हृदय

कठोर !

 

जीतना

होगा इसे 

किसी भी तरह  

हारेगा नहीं

मन !  


चित्र - गूगल से साभार  

साधना वैद   

Sunday, October 17, 2021

सच्चा दशहरा

 



स्वागत है राम तुम्हारा

तुम्हारी अपनी अयोध्या में !

दशहरे के पावन अवसर पर

लंकाधिपति रावण को पराजित कर

तुम सगर्व सीता को अपने घर

सुरक्षित लौटा तो लाये हो !

लाखों दीप प्रज्वलित कर अयोध्यावासियों ने

दीवाली भी मना ली है !

लेकिन सच कहना राम क्या तुम

वास्तव में पूरी तरह से आश्वस्त हो कि

रावण का वध हो गया है ?

अब इस संसार में कोई भी रावण शेष नहीं ?

अगर ऐसा है राम तो वह कौन था

जिसने अप्रत्यक्ष रूप से

गर्भवती सीता का हरण कर लिया ?

तुम्हारे ही हाथों उसे निष्कासित करवा

दर दर जंगलों में भटकने के लिए और

दुष्कर जीवन जीने के लिए विवश कर दिया ?

क्या वह रावण का प्रतिरूप नहीं था ?  

नहीं राम तुम भ्रमित हो !

रावण एक शरीर नहीं जिसका वध कर

तुम आश्वस्त हो जाओ कि

अब इस संसार में कोई रावण नहीं बचा !

रावण तो एक दूषित मानसिकता है

एक भ्रमित विचारधारा है

जिसने नारी को केवल भोग्या ही माना

न कभी उसका सम्मान किया

न ही कभी उसे उचित संरक्षण दिया !

यह दूषित विचारधारा हर युग में

हर समाज में पैदा होती रहती है !

और इसके विनाश के लिए राम तुम्हें

हर घर में हर परिवार में

अपना एक प्रतिरूप पैदा करना होगा

ताकि समाज के कोने कोने में साँस ले रहे

रावणों का खात्मा हो सके और नारी को

उसकी गरिमा के अनुकूल उचित

संरक्षण और सम्मान प्राप्त हो सके !

जिस दिन समाचार पत्र में

किसी भी स्त्री के शोषण का समाचार नहीं होगा

उसी दिन मेरे लिए सच्चा दशहरा होगा राम

और तब ही तुम्हारे स्वागत में

पूरी श्रद्धा से मैं दीवाली के दीप जला पाउँगी !  

 

साधना वैद