जला चुकी हूँ
कितने ही बर्तन
स्वादिष्ट खाने
दाल, चावल, सब्जी
चाय, दूध, घी
खीर, खिचड़ी, शीरा
मेरी भूल से
चमकते बर्तन
बने ठीकरा
तवा, कढाई, पैन
नया कुकर,
डेगची औ’ भगौने
भिगौते नैन
देख अपनी शक्ल
और हम भी
बिसूरते रहते
होते लज्जित
देख कर अपनी
ऐसी करनी !
लेकिन करें तो क्या
आदत बुरी
छूटे तो कैसे छूटे
भूल जाते हैं
गैस पर चढ़ा के
दाल या सब्जी
और खुल जाता है
फोन या टी वी
याद जब आती है
जल जाता है
खाना तब तक तो
सुर्ख कुकर
घूरता है हमको
लाल पीला हो !
हम डर जाते हैं
पछताते हैं
शर्मिन्दा हो जाते हैं
खुद पर ही
इसीलिये किया है
पूरी निष्ठा से
इस नए वर्ष में
यह संकल्प
खाना बन जाएगा
तभी आयेंगे
रसोई से बाहर
नहीं छोड़ेंगे
जलती गैस पर
कुछ भी चढ़ा कर !
साधना वैद