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Thursday, July 9, 2026

असर - लघुकथा



टी वी पर समाचार चल रहे थे ! इन दिनों की सबसे प्रमुख खबर, केतन अग्रवाल मर्डर मिस्ट्री को बड़े विस्तार के साथ दिखाया जा रहा था ! शालिनी का मन घबराने लगा था ! उनके घर में भी जवान बेटी है सुनेत्रा ! बहुत सुन्दर, सुशिक्षित, आधुनिक ख्यालों वाली ! खूब प्रखर और मुखर भी ! एकदम निर्भीक और आत्मविश्वास से भरी हुई ! स्कूल कॉलेज में हर एक्टीविटी में सबसे आगे रहने वाली और घर परिवार में भी सबसे अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाने वाली ! शालिनी माँ होकर भी हमेशा उसकी हर बात मानतीं और खुद से भी अधिक उसके फैसलों पर भरोसा करतीं ! 

खबरें देखते-देखते उनका मन विचलित हो रहा था ! जाने कैसा डर उनके मन में घनीभूत होता जा रहा था ! उसी समय बड़े करीने से सजी धजी सुनेत्रा अपने हाथ में घड़ी बाँधती हुई घर कमरे में आई ! 

“मम्मी, मैं जा रही हूँ शाम को आने में देर हो जाए तो फ़िक्र मत करना ! हम लोग मूवी देखने जा रहे हैं ! आज रोहित का जन्मदिन है ! उसके बाद वह हमें डिनर के लिए ले जाएगा ! प्रज्ञा और विनोद भी जा रहे हैं साथ में ! दस बजे तक आ जाएंगे ! देर होगी तो फोन कर दूँगी आपको !” सुनेत्रा अपना सामान इधर उधर से समेटती हुई पर्स में रखती जा रही थी और शालिनी को अपने शाम के प्रोग्राम के बारे में बता भी रही थी ! 

“तुम कहीं नहीं जा रही हो !” शालिनी की कठोर आवाज़ सुन कर सुनेत्रा दंग थी ! आज तक मम्मी ने उसके साथ इस टोन में बात नहीं की थी ! 

“क्या हुआ मम्मी ? आपकी तबीयत तो ठीक है ? आज के प्रोग्राम के बारे में मैंने आपको तीन चार दिन पहले ही बता दिया था ! उसके बाद ही सबसे हाँ कहा था ! अब क्या हो गया ? जल्दी आने की कोशिश करूँगी ! एन वक्त पर नहीं जाउँगी तो सबका मूड खराब होगा ! कुछ हुआ है क्या ?“ 

सुनेत्रा की नज़रें मम्मी की नज़रों का अनुसरण करते हुए टी वी समाचारों पर टिक गईं ! सिया केतन की कहानी को विस्तार के साथ वहाँ दिखाया जा रहा था ! शालिनी ने काँपते हाथों से सुनेत्रा के हाथों को थाम लिया ! सुनेत्रा ने आगे बढ़ कर टी वी बंद कर दिया ! 

“क्या मम्मी ! आप भी बस जाने क्या-क्या सोचती रहती हो ! अच्छा यह बताओ आपको मेरे चरित्र और संस्कारों पर संदेह है या अपनी परवरिश और सीख पर ? क्या सच में आपको इतना डरने की ज़रुरत है ?” सुनेत्रा मम्मी की पीठ को हौले-हौले सहला रही थी और शालिनी का उद्विग्न मन धीरे-धीरे शांत होता जा रहा था ! उसने प्यार से सुनेत्रा के माथे को चूम लिया, “अब जा जल्दी से नहीं तो फिल्म छूट जाएगी !” और सुनेत्रा लम्बे-लम्बे डग भरते हुए कमरे से बाहर निकल गई ! 


साधना वैद  

चित्र - गूगल से साभार 


Wednesday, July 8, 2026

बंद हैं दरवाज़े

 




चित्र - गूगल से साभार 


साधना वैद        

Thursday, July 2, 2026

फ़िल्में और हमारा बचपन

 





हम लोग जब छोटे थे तो मनोरंजन के बहुत ही सीमित साधन हुआ करते थे ! या तो घर में लूडो, साँप सीढ़ी, गुट्टे, अष्टा चंगा खेल लो या शाम के समय बाहर सखियों सहेलियों के साथ घोड़ा है जमालशाही, खो खो, बोल मेरी मछली कितना पानी और छुपम  छुपाई खेल लो ! सिनेमा जाने का कार्यक्रम तभी बन पाता था जब घर के बड़ों को भी जाने का अवकाश मिले या उनके मतानुसार देखने लायक फिल्म हो ! बच्चों के अकेले जाने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता था ! उस ज़माने में ब्लैक एंड व्हाईट फ़िल्में बना करती थीं और उनके कथानक भी बहुत ही सुन्दर और उद्देश्यपूर्ण होते थे ! उस ज़माने की फ़िल्में पारिवारिक,  ऐतिहासिक, सामाजिक, या बालोपयोगी हुआ करती थीं ! उस वक्त के प्रसिद्ध साहित्यिक  उपन्यासों पर भी बहुत ही शानदार फ़िल्में बनीं ! 

देवदास, आनंद मठ, परिणीता, दो बीघा ज़मीन, मंझली दीदी, छोटी बहू, गबन, गोदान आदि अनेकों कालजयी फ़िल्में हैं जो प्रेमचंद, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, शरदचंद्र आदि उपन्यासकारों के उपन्यासों पर बनीं और जिन्होंने न केवल हमारी उत्कृष्ट साहित्य के प्रति रूचि को जगाया वरन हमारी सोच, हमारी भावनाओं और हमारे परिवार के प्रति दायित्व बोध को भी परिमार्जित किया ! 

भाभी, लाजवंती, तूफ़ान और दिया, हीरा मोती, मदर इंडिया, कठपुतली, घर घर की कहानी ऐसी अनेकों पारिवारिक फ़िल्में थीं जिन्होंने नारी उत्पीडन के उन्मूलन में यथेष्ट योगदान दिया और नारी सशक्तिकरण की मशाल को जला कर नारी को  अपने अधिकारों और अस्मिता की रक्षा के लिए जागरूक किया ! 

हम पंछी एक डाल के, जागृति, मासूम, आगरा रोड, प्यार की प्यास, ज़मीन के तारे, भाई बहन जैसी बच्चों की फ़िल्में अलग से बना करती थीं जिनमें बच्चों के लिए सुन्दर सन्देश होते थे ! फ़िल्में न केवल मनोरंजन करती थीं वरन हमारे चरित्र निर्माण में भी प्रमुख भूमिका निभाती थीं और हमें एक स्वस्थ समाजोपयोगी व्यक्ति के रूप में विकसित होने में हमारी सहायता करती थीं ! अगर कोई देश प्रेम की थीम वाली या बच्चों के लिए स्वस्थ मनोरंजन देने वाली फ़िल्में आती थीं तो अक्सर हमें स्कूल से हमारी टीचर्स वे फ़िल्में दिखाने के लिए ले जाती थीं ! हमने के फ़िल्में स्कूल के  सहपाठियों के साथ देखी हैं ! जागृति, भाई बहन, पुरानी वाली मासूम, जमीन के तारे आदि ! आज भी बचपन में देखी हुई अनेकों फ़िल्में ज्यों की त्यों स्मृति में सुरक्षित हैं ! आजकल के तो टी वी धारावाहिक ही कभी कभी इतने घटिया हो जाते हैं कि परिवार के सभी सदस्यों के साथ बैठे हों तो बड़ी ऑकवर्ड सिचुएशन हो जाती है ! लेकिन पहले की फिल्मों में न संवाद घटिया होते थे, न पोशाकें घटिया होती थीं न ही दृश्यांकन घटिया होता था ! पूरा परिवार साथ में फिल्म का आनंद लेता था ! अब न तो इतनी अच्छी फ़िल्में बनती हैं न बच्चों में वैसी मासूमियत रह गयी है ! आजकल की फिल्मों में इतनी हिंसा दिखाई जाती है कि वह बच्चों के कोमल मन पर बहुत अधिक दुष्प्रभाव डालती है ! अवास्तविक दृश्यांकन होते हैं ऐसे दृश्यों के और बच्चे इनकी नक़ल करते हुए कई बार अपनी जान खतरे में डाल देते हैं ! हम लोगों ने अपना बचपन  जितना सुरक्षित और खूबसूरत बिताया है आजकल के बच्चे उसकी कल्पना भी नहीं कर सकते ! वे अति काल्पनिक वीडियो गेम्स में व्यस्त रहते हैं और एकान्तप्रिय होते जा रहे हैं !  


चित्र - गूगल से साभार 

साधना वैद 


Saturday, June 27, 2026

मानसिक रूप से रुग्ण आज की पीढ़ी

 


मानसिक रूप से रुग्ण आज की पीढ़ी हमें सोचने के लिए विवश करती है कि हमारा समाज कहाँ जा रहा है, हमारे बच्चे किस तरह से विकृत मानसिकता के शिकार हो रहे हैं और वे कौन से कारक और कारण हैं जो बच्चों को ऐसे अपराध करने के लिए उकसाते हैं ! माता पिता के दिए संस्कार, उनकी परवरिश, स्कूल कॉलेजों में मिली शिक्षा और ज्ञान क्या सच में अब इतना निरर्थक और बेमानी हो गया है कि बच्चे न उनसे कुछ सीखते हैं, न उन्हें अपने जीवन में उतारते हैं और न ही उनका सम्मान करते हैं ! 

पूना का हाई प्रोफाइल सिया केतन का केस इसी ओर इशारा करता है कि आज की पीढ़ी कितनी आत्म केन्द्रित, स्वार्थी और निरंकुश हो गयी है कि उन्हें अपने सुख के आगे किसी का भी दुःख कुछ लगता ही नहीं ! ऐसी ही एक घटना कुछ समय पूर्व हुई थी जिसमें इंदौर की एक लड़की सोनम ने अपने पति को मेघालय की घाटियों में अपने प्रेमी के साथ मिल कर धकेल दिया था और इस घटना में भी उस युवक की मौत हो गयी थी ! यह मानसिक विकृति की पराकाष्ठा है और लड़कियों की संकुचित सोच और हृदयहीनता को उजागर करती है ! आजकल की पीढी सुविधाभोगी और स्वच्छंद होती जा रही है ! वे शॉर्ट टर्म सुख को देखते हैं और उसे पाने के लिए कुछ भी कर गुज़रने के लिए तैयार हो जाते हैं ! यहाँ तक कि किसी की जान भी लेने से वे पीछे नहीं रहते ! नहीं सोच पाते कि इन घटनाओं का क्या अंजाम होगा ! क्या उन पर अपराध तय हो जाने के बाद उन्हें घर परिवार समाज में कोई स्वीकार्यता मिलेगी ? क्या उनके जानने वाले उनसे वैसा ही प्यार करेंगे, उन्हें वही सम्मान देंगे जो वे अब तक पाती आई हैं ! माथे पर हत्यारिन का टैग लग जाने के बाद क्या उनके ही अपने प्रेमी का परिवार ऐसी हत्यारिन लड़की को बहू के रूप में स्वीकार करेगा और सबसे पहले तो क्या वे पुलिस और क़ानून के शिकंजे से बच भी पाएंगी ! क्या वे खुद से भी नज़रें मिला पाएंगी ! सालों जेल के सींखचों के पीछे अपना शेष जीवन बिताते हुए उनका सारा प्रेम का उबाल ठंडा पड़ जाएगा और पछतावे के सिवा उनको और कुछ हासिल नहीं होगा ! क्या इन्हीं लड़कियों पर हम गर्व कर सकते हैं ? 

अब इस मानसिकता को धार देने वाले कारकों पर दृष्टिपात करें तो मुझे आजकल टी वी पर चौबीसों घंटे चलने वाले घटिया धारावाहिकों और हिंसाप्रधान फिल्मों से बड़ी शिकायत है ! टी वी धारावाहिकों में स्त्री की जैसी छवि दिखाई जाती है वह मुझे हैरान कर देती है ! बचपन से अब तक एक नारी में हमने संसार के सारे सद्गुणों को समाहित होते हुए ही जाना था ! प्यार, ममता, दया, करुणा, त्याग, निष्ठा, समर्पण और आत्मोत्सर्जन की वह अधिष्ठात्री होती है ! वह किसीको ज़रा सा भी कष्ट नहीं दे सकती ! वह औरों की पीड़ा को भी स्वयं झेलने के लिए सदैव तत्पर होती है ! लेकिन ये आजकल की लड़कियाँ तो इस परिभाषा में कहीं से भी फिट नहीं बैठतीं ! वे तो बड़ी बेदिली से किसीके घर के चिराग को फूँक मार कर बुझा देती हैं ! ये तो खुद अपने ही माता पिता की मान प्रतिष्ठा और इज्जत को तार-तार करने में सबसे आगे रहती हैं ! टी वी धारावाहिकों में ऐसी नकारात्मक भूमिका वाले किरदारों की बाढ़ आई हुई है जो तरह-तरह की क्रूर भंगिमाओं के साथ किसीके भी प्राण हर लेने की घोषणा करती रहती हैं ! पिस्तौल रिवॉल्वर से खिलौनों की तरह खेलती हैं ! कमज़ोर मानसिकता वाले युवा ऐसे किरदारों से जल्दी प्रभावित हो जाते हैं और उन्हीं की तरह सोचने लगते हैं ! इन धारावाहिकों पर और ऐसी फिल्मों पर तत्काल प्रभाव से रोक लगनी चाहिए ! ये समाज में निगेटिव प्रभाव डालते हैं और कोमल मन के मासूम बच्चों की सोच को प्रदूषित करते हैं ! सैंसर बोर्ड पर शिकंजा कसना चाहिए जो इन्हें प्रसारण की अनुमति दे देता है ! माता पिता लाख टी वी बंद रखें ! खुद भी देखना बंद कर दें लेकिन आजकल फोन ऐसा जादुई यंत्र है कि अब सब कुछ बच्चों की मुट्ठी में बंद है ! बड़ा मुश्किल वक्त है यह हम देख रहे हैं कि यह भेड़चाल किस तरह से पूरी पीढ़ी को तबाह कर रही है और कोई कारगर समाधान सुझाई नहीं देता !


चित्र - गूगल से साभार 

साधना वैद 

  


Wednesday, June 24, 2026

धरम-भ्रष्ट

 



आज श्रेया बहुत खुश थी उसका जन्मदिन जो था और आज पापा ने प्रोमिस किया था कि वे उसका जन्मदिन सब बच्चों के साथ शहर के सबसे मशहूर स्थान  चोखी धाणी में मनाएंगे ! वहाँ का खाना तो बहुत स्वादिष्ट होता ही है वहाँ मनोरंजन के लिए भी बहुत सारी गतिविधियाँ हैं जैसे ऊँट की सवारी, चरखी वाला झूला, जादू का खेल और नटों के करतब ! सबसे बड़ी बात वहाँ का पारम्परिक खाना दादी को भी बहुत पसंद आता है ! 

पापा के कहने पर श्रेया शाम की पार्टी की बात बताने दादी के पास पहुँची तो देखा दादी काम की तलाश में आई किसी महिला से बातों में उलझी हुई थीं !

“यहाँ आने से पहले किसके घर में काम करती थीं ? वहाँ कितने पैसे मिलते थे ? कौन जात हो ?” 

महिला सवालों की बौछार से घबरा सी गई ! 

“माताजी हम महार हैं ! बगल वाले भल्ला जी के यहाँ काम किया है ! अभी उनकी दूसरे शहर में बदली हो गई है तो नया काम देख रही हूँ !”

दादी सुनते ही चौंक गईं ! “महार हो तो तुमसे कैसे काम करवाएंगे ! अपनी रसोई में तो हम तुम्हें जाने न देंगे ! अपना धरम थोड़े ही भ्रष्ट करना है हमें ! तुम कहीं और देखो काम !” 

महिला मायूस होकर चली गई ! तभी पापा ने श्रेया से कहा, “बेटा आज की पार्टी में तो दादी नहीं जा पाएंगी ! बोलो तो पार्टी घर में ही मना लें ?” 

“अरे, हम काहे नहीं जा पाएंगे ! हम तो ज़रूर जाएंगे बिटिया के जन्मदिन पर ! हमें तो वहाँ की दाल बाटी, चूरमा, खीर सभी बहुत पसंद आती हैं ! तुमसे कौन बोला हम नहीं जाएंगे !” दादी हैरान थीं ! 

“नहीं अम्माँ, वहाँ तुमको कैसे पता चलेगा कि खाना बनाने वाले की और परसने खिलाने वाली की जात कौन सी है ! कहीं तुम्हारा धरम भ्रष्ट हो गया तो क्या होगा !” 

पापा और श्रेया का ठहाका बाहर तक गूँज रहा था और दादी खिसिया गई थीं !  



चित्र - गूगल से साभार 


साधना वैद  


Friday, June 19, 2026

हरदिल अजीज़ सुषमा जी

 



जीवन में हमें समय-समय पर कई लोग मिलते हैं ! कुछ की भूमिका औपचारिक दुआ सलाम तक सीमित रह जाती है, कुछ मन मस्तिष्क पर अपना प्रभाव छोड़ने में सफल हो जाते हैं और कुछ ऐसे होते हैं जो हमारे हृदय पर अपना आधिपत्य स्थापित कर हमारी ज़रुरत बन जाते हैं ! सुषमा जी उन विशिष्ट व्यक्तियों में शामिल हैं कि जो भी उनसे एक दो बार मिल लेता है वह उनके आत्मीयता भरे व्यवहार और उनकी निश्छल मुस्कुराहट की गिरफ्त में बँध कर सदा के लिए उनका मुरीद बन जाता है ! आज मैं अपनी उन्हीं अभिन्न मित्र डॉक्टर सुषमा सिंह जी के साथ जुड़ी कुछ मधुर यादें एवं सुखद संस्मरण आपके साथ साझा करने जा रही हूँ ! सुषमा जी आगरा शहर की बड़ी नामचीन हस्ती हैं ! आर. बी. एस. कॉलेज की वे लोकप्रिय प्राचार्या रह चुकी हैं ! जाने कितने विद्यार्थी उनके निर्देशन में पी. एच. डी. कर चुके हैं ! जाने कितने सम्मान और पुरस्कार उन्हें मिल चुके हैं ! सूची इतनी लम्बी है कि सबका उल्लेख करना हमारे लिए तो संभव ही नहीं ! उच्च कोटि की साहित्यकार हैं ! गद्य और पद्य दोनों में ही उन्हें महारत हासिल है ! हर साहित्यिक कार्यक्रम की वे जान होती हैं ! उनके बिना हमें तो हर कार्यक्रम अधूरा लगता है ! इन सबके अलावा वे एक बहुत ही सहृदय, खुशमिजाज़ और उदारमना आत्मीय इंसान हैं जिनसे मित्रता कर हर व्यक्ति स्वयं को भाग्यशाली समझता है ! 

सुषमा जी से मिलने का अवसर पहली बार सन 2019 में विश्व मैत्री मंच के वार्षिक सम्मलेन में मिला था जो आगरा में ही हुआ था ! किसी साहित्यिक कार्यक्रम में भाग लेने का मेरा यह पहला अवसर था ! अपने ब्लॉग के समय के कुछ आभासी मित्रों से मिलने की उत्कट अभिलाषा हमें इस कार्यक्रम में खींच लाई थी जो इसी कार्यक्रम में भाग लेने के लिए आगरा आए हुए थे ! मिले तो इनसे भी कभी नहीं थे लेकिन ब्लॉग के ज़माने से एक दूसरे के लेखन के प्रशंसक भी थे और एक दूसरे की पोस्ट पर दिल खोल कर अपनी प्रतिक्रिया भी देते थे ! सरस दरबारी जी, रवीन्द्र प्रभात जी और महिमा श्रीवास्तव जी से प्रत्यक्ष मिलने की लालसा हमें रोक न पाई और हमने तय कर लिया कि यह फंक्शन तो हमें अटेंड करना ही है ! ज़रिया बनीं सुषमा जी ! इस कार्यक्रम के आयोजन का उन पर बड़ा दायित्व था ! किसीने हमें उनका नंबर दिया और उनसे जानकारी हासिल कर हम निश्चित दिवस पर होटल वैभव पैलेस पहुँच गए जहाँ यह कार्यक्रम होने वाला था ! इस कार्यक्रम में भाग लेने वाले सभी साहित्यकार और अतिथि हमारे लिए नितांत अपरिचित थे ! इन अपरिचित लोगों की भीड़ में एक बहुत अपना सा मुस्कुराता चेहरा सुषमा जी का था जिन्होंने बड़ी आत्मीयतापूर्वक हमसे बात की और हमारी झिझक को दूर किया ! इसी दिन हम विश्व मैत्री मंच के सदस्य भी बने और कई स्थानीय साहित्यकारों से हमारा परिचय हुआ ! आगरा के साहित्य के महासमुद्र में हम जैसे नवागंतुक के लिए सुषमा जी का साथ एक बहुत बड़ा सहारा था ! अब जब भी कहीं कोई कार्यक्रम होता वे एक दो दिन पहले हमें बता देतीं और आने का आग्रह भी करतीं ! उन्होंने हमें साहित्य साधिका समिति से भी जोड़ लिया ! हमारी साहित्य साधिका समिति की सदस्याओं से अच्छी जान पहचान हो गयी और अब तो यह ग्रुप हमें अपने परिवार सा लगने लगा है ! इसका सारा श्रेय मैं सुषमा जी को देती हूँ ! सुषमा जी हरदिल अजीज़ इंसान हैं और तारीफ़ की बात यह है कि इतनी विदुषी और नामचीन हस्ती होने पर भी उनमें नाम मात्र का दर्प नहीं है ! जब भी किसीसे मिलती हैं इतने प्यार और अंतरंगता के साथ मिलती हैं कि पल भर की मुलाक़ात वर्षों के साथ में बदल जाती है !  

सन 2020 में विश्व मैत्री मंच का वार्षिक सम्मलेन छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में हुआ था ! इस कार्यक्रम में मेरा कविता संग्रह, ‘मौन का दर्पण’ पुरस्कृत किया जाने वाला था ! रायपुर जाने का बड़ा मन था लेकिन अकेले कैसे जाएंगे यही समस्या थी ! हर समस्या का समाधान हमारी सुषमा जी के पास रहता है ! आगरा से पाँच लोगों के जाने का प्रोग्राम तय हुआ ! सुषमा जी ने पूछा, “अमरकंटक भी चलना है क्या ?” हमारा तो मन बल्लियों उछलने लगा ! अंधा क्या चाहे दो आँखें ! बस फ़टाफ़ट टिकिट भी बुक हो गए और हमारा अमरकंटक देखते हुए रायपुर जाने का कार्यक्रम तय हो गया ! इस यात्रा के सहयात्री थे सुषमा जी, पूनम तिवारी जी, मिथिलेश पाठक जी, अलका अग्रवाल जी और हम ! टिकिट सुषमा जी ने बुक कराए थे ! हम जब भी उनसे पेमेंट के लिए पूछें वे हँस के टाल दें, “अरे हो जाएगा सब !” खैर रायपुर जाने की शुभ घड़ी भी आ गयी ! हम लोग ट्रेन में सवार हुए ! पूनम जी और मिथिलेश जी से पहली मुलाक़ात स्टेशन पर ही हुई ! इनके टिकिट्स शायद बाद में बुक हुए थे तो इनकी  सीट्स भी दूसरे कम्पार्टमेंट में थीं ! हम और अलका अलग बोगी में थे ! सुषमा जी बीच-बीच में चक्कर लगा कर सबको कंपनी दे रही थीं लेकिन कुछ मज़ा नहीं आ रहा था ! डिब्बे इंटर कनेक्टेड थे ! सुषमा जी ने दो तीन यात्रियों से बात कर उन्हें सीटें एक्सचेंज करने के लिए राज़ी कर लिया और पूनम जी व मिथिलेश जी को भी अपने ही डिब्बे में ले आईं ! अब हमारा कोरम भी फुल था और हमारा जोश भी फुल था ! पूरे वक्त खाते-पीते मौज-मस्ती करते हुए हम बिलासपुर की ओर बढ़ रहे थे ! सुषमा जी को पढ़ने का बहुत शौक है ! उनके फोन में खूबसूरत कविताओं का विपुल भण्डार संगृहित रहता है ! ट्रेन में वे अपने फोन से चुन-चुन कर बढ़िया कवितायेँ सुनाती रहीं ! मिडिल एज की हम महिलाओं के ग्रुप की बातें और कवितायेँ हमारे डिब्बे के सहयात्री भी शौक से सुन रहे थे और आनंदित हो रहे थे ! सुषमा जी की इस खूबी का पता इस यात्रा के दौरान ही हुआ कि वे स्वयं जितना बढ़िया लिखती हैं उससे भी अधिक औरों के श्रेष्ठ लेखन को सराहती हैं, महत्त्व देती हैं और सबको सुना कर औरों को भी उपकृत करती हैं ! वरना आजकल के रचनाकार तो आत्मकेंद्रित होते जा रहे हैं ! अपने आगे वे किसी और का लिखा न पढ़ना चाहते हैं न सुनना ! हमारी सुषमा जी बड़े दिल वाली भी हैं और हरफनमौला भी ! 

इस यात्रा की हमारी पहली मंज़िल बिलासपुर थी जहाँ एक रात हमें पूनम जी के रिश्तेदार श्री मनीष श्रीवास्तव जी के यहाँ रुकना था ! अमरकंटक बिलासपुर के पास है और मनीष जी ने ही हमारी अमरकंटक घूमने की बहुत ही बढ़िया व्यवस्था की थी ! अगले दिन बड़े सवेरे हमारी गाड़ी बिलासपुर स्टेशन पर पहुँची ! इलाहाबाद से इन्दुबाला जी और मंजू निगम जी को दूसरी गाड़ी से बिलासपुर आना था ! उनकी ट्रेन हमारी ट्रेन के बाद आने को थी ! अमरकंटक जाने वाले ग्रुप में वो भी हमारे साथ बिलासपुर से जुड़ने वाली थीं ! स्टेशन के वेटिंग रूम में बैठ कर हम लोग गर्म चाय की चुस्की लेते हुए उन लोगों का इंतज़ार कर रहे थे ! फरवरी की सुबह ठिठुरन भरी थी ! वहाँ स्टेशन पर न बिस्तर था न हीटर लेकिन हम लोगों की बातों में इतना रस और ऊष्मा थी कि सर्दी महसूस ही नहीं हो रही थी ! समय से इलाहाबाद वाली ट्रेन भी आ गई और हमारा सात सखियों का ग्रुप पूरा हो गया ! 

दिन का उजाला फैलता जा रहा था ! पूनम जी के भांजे मनीष जी हम लोगों को रिसीव करने के लिए स्टेशन आ गए थे ! उनके घर पहुँच कर बहुत अच्छा लगा ! इतनी गर्मजोशी के साथ उनके परिवार ने हम लोगों का स्वागत किया कि मन गदगद हो गया ! जब कि पूनम जी को छोड़ कर हम सभी उनके लिए बिल्कुल अपरिचित थे ! मनीष जी की पत्नी रश्मि जी ने बहुत ही स्वादिष्ट नाश्ता बना कर रखा था हम लोगों के लिए ! उनकी दोनों बेहद प्यारी बेटियाँ निमिषा और आहना भाग-भाग कर हम लोगों की सारी ज़रूरतों को पूरा कर रही थीं ! नाश्ता करके तैयार होकर हम सब बैठे ही थे कि अमरकंटक ले जाने वाली हमारी गाड़ी दरवाज़े पर आ चुकी थी ! 

सारे रास्ते हँसते-गाते, गप-शप लगाते हम लोग अमरकंटक की ओर बढ़ रहे थे ! बिलकुल कॉलेज के दिनों वाली फीलिंग आ रही थी ! अमरकंटक के घुमावदार रास्तों पर कहीं कुछ खरीदते, कहीं कुछ खाते-पीते और कहीं किसी दर्शनीय स्पॉट पर रुक कर एक दूसरे की तस्वीरें खींचते उम्र की सीढियाँ उतर कर हम जैसे सोलह सत्रह बरस की किशोरियों में तब्दील हो चुके थे ! 

सतपुड़ा और विन्ध्याचल पहाड़ियों के संधि स्थल मैकाले पर्वत श्रंखला की गोद में यह स्थान है और यहीं पर पवित्र नदी नर्मदा का उद्गम स्थल भी है ! सर्वप्रथम हमने अमरेश्वर द्वादश ज्योतिर्लिंग मंदिर के दर्शन किये ! बारह फीट ऊँचे ज्योतिर्लिंग पर जल चढ़ाने के लिए और पूजा करने के लिए सीढ़ियों से ऊपर जाने की व्यवस्था है ! बड़े से हॉल में दोनों तरफ महादेव के बारह छोटे ज्योतिर्लिंग भी स्थापित हैं ! हम सबने बड़े भक्तिभाव से ऊपर चढ़ कर जल चढ़ाया और पूजा की ! इसके बाद हमने कलचुरी काल के मंदिर समूहों को देखा ! इन्हें ग्यारहवीं शताब्दी में कलचुरी महाराजा कर्णदेव ने 1047 से 1073 के बीच बनवाया था ! लगभग डेढ़ हज़ार साल पहले बने हुए ये भव्य मंदिर अपनी अद्भुत कारीगरी से आज भी पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं ! इसके बाद हम लोगों ने सर्वोदय जैन मंदिर देखा जिसका स्थापत्य देखने लायक है ! इस मंदिर में भगवान् आदिनाथ की मूर्ति स्थापित है जिसका वज़न चौबीस टन है और यह अष्ट धातु के जिस कमल पर विराजमान है उस कमल का वज़न सत्रह टन है ! इस मंदिर के निर्माण में सीमेंट व लोहे का बिलकुल भी प्रयोग नहीं किया गया है इसीलिये यह मंदिर अपने आप में एक अद्वितीय मंदिर है ! इस मंदिर का निर्माण कार्य अभी भी चल रहा है ! 

विशाल परिसर में इतने सारे मंदिर घूमते-घूमते खूब भूख लग आई थी ! मनीष जी ने किसी गेस्ट हाउस में हम सबके भोजन की व्यवस्था की थी ! गाड़ी के ड्राइवर्स को सारी जानकारी उन्होंने पहले ही दे दी थी ! हमारे वहाँ पहुँचते ही एकदम गरमागरम बहुत ही स्वादिष्ट खाना एक बड़ी सी डाइनिंग टेबल पर सर्व कर दिया गया ! खाना वाकई बहुत अच्छा बना था ! हम सबने तृप्त होकर खाया और गेस्ट हाउस की जिस महिला कुक ने खाना बनाया था उन्हें दिल से धन्यवाद भी दिया और उनके साथ बड़ी आत्मीयतापूर्वक तस्वीरें भी खिंचवाईं ! 

खाना खाने के बाद हम लोग नर्मदा कुंड देखने गए ! नर्मदाकुंड नर्मदा नदी का उदगम स्‍थल है ! इसके चारों ओर अनेक मंदिर बने हुए हैं ! इन मंदिरों में नर्मदा और शिव मंदिर, कार्तिकेय मंदिर, श्रीराम जानकी मंदिर, अन्‍नपूर्णा मंदिर, गुरु गोरखनाथ मंदिर, श्री सूर्यनारायण मंदिर, वंगेश्‍वर महादेव मंदिर, दुर्गा मंदिर, शिव परिवार, सिद्धेश्‍वर महादेव मंदिर, श्रीराधा कृष्‍ण मंदिर और ग्‍यारह रूद्र मंदिर आदि प्रमुख हैं ! कहा जाता है कि भगवान शिव और उनकी पुत्री नर्मदा यहाँ निवास करते थे ! माना जाता है कि नर्मदा उदगम की उत्‍पत्ति शिव की जटाओं से हुई है, इसीलिए शिव को जटाशंकर भी कहा जाता है ! कहते हैं कि पहले इस स्थान पर बाँस का झुण्ड था ! बाद में रेवा नायक द्वारा इस स्थान पर कुंड और मंदिर का निर्माण करवाया गया ! स्नान कुंड के पास ही रेवा नायक की प्रतिमा है ! रेवा नायक के कई सदी पश्चात् नागपुर के भोंसले राजाओं ने उद्गम कुंड और कपड़े धोने के कुंड का निर्माण करवाया ! इसके बाद 1939 में रीवा के महाराज गुलाब सिंह ने माँ नर्मदा उद्गम कुंड, स्नान कुंड और परिसर के चारों ओर का परकोटा बनवाया और शेष मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया ! इस मंदिर को देख कर अद्भुत तृप्ति मिली ! 

शाम होने को थी ! हम लोगों को बिलासपुर भी समय से लौटना था ! मंदिर के आस पास की दुकानों से सबने सोवेनियर टाइप की कुछ चीज़ें खरीदीं और हम लोग सोनमुड़ा  की ओर चल पड़े ! सोनमुड़ा सोन नदी का उद्गम स्‍थल है ! यहाँ से घाटी और जंगल से ढ़की पहाडियों के सुंदर दृश्‍य देखे जा सकते हैं ! सोनमुड़ा नर्मदाकुंड से 1.5 किलोमीटर की दूरी पर मैकाल पहाडियों के किनारे पर है ! सोन नदी 100 फीट ऊँची पहाड़ी से एक झरने के रूप में यहाँ से गिरती है ! सोन नदी की सुनहरी रेत के कारण ही इस नदी को सोन नदी कहा जाता है ! सभी लोग थक भी चुके थे ! अँधेरा भी गहराने लगा था ! 

अमरकंटक की सुखद यात्रा को यहीं विराम दे हम लोग बिलासपुर की ओर चल पड़े जहाँ रश्मि जी ने हम लोगों के लिए स्वादिष्ट गरमागरम भोजन तैयार करके डाइनिंग टेबिल पर सजा रखा था ! मनीष जी और रश्मि जी की बेहद प्यारी दोनों बेटियाँ, निमिषा और आहना भी हम लोगों के साथ थीं और बहुत जल्दी हम सबके साथ घुलमिल गई थीं ! खाना खाकर हम सब जल्दी ही सो गए ! सुबह रायपुर के लिए ट्रेन भी पकड़नी थी ! 

सुबह हम लोग समय से तैयार होकर अपने मेजबानों से विदा लेकर स्टेशन पहुँचे और ट्रेन में सवार होकर रायपुर भी समय से पहुँच गए ! विश्व मैत्री मंच का कार्यक्रम अगले दिन होना था ! दिन में हम सब लोग शॉपिंग करने के लिए बाज़ार चले गए ! सुषमा जी ने जम के शॉपिंग की ! बेटियों को वीडियो कॉल करके वे उनसे उनकी पसंद के कपड़े सिलेक्ट करवा रही थीं और फिर उन्हें खरीद रही थीं ! मुझे उनकी यह अदा बड़ी अच्छी लगी ! अगली सुबह मुख्य कार्यक्रम था ! सुषमा जी कितनी सोशल हैं यह रायपुर पहुँच कर पता चला ! दिन भर सबसे मेल मुलाक़ात में कार्यक्रम की गतिविधियों में ही हम सब व्यस्त रहे ! शाम को सुषमा जी के साथ अलका, मिथिलेश जी और मैं उनकी एक साहित्यकार मित्र जया जी के यहाँ मिलने गए ! उनसे यह मुलाक़ात बहुत ही आनंददायक रही ! अगली सुबह हमारी आगरा के लिए रवानगी तय थी ! इस यात्रा ने सुषमा जी के साथ मेरे संबंधों को और प्रगाढ़ बना दिया ! 

साहित्य साधिका समिति के मासिक कार्यक्रमों में और विश्व मैत्री मंच की उत्तर प्रदेश इकाई की काव्य चौपाल में उनसे नियमित मुलाकातें होती ही रहती थीं ! इन्हीं कार्यक्रमों में मैंने सुषमा जी की एक और विलक्षण प्रतिभा को नोटिस किया कि वे किसी भी कार्यक्रम की प्रेस विज्ञप्ति कार्यक्रम में बैठे-बैठे ही चुटकियों में बना लेती हैं ! पेन और कागज़ उनके पास सदैव उपलब्ध रहते हैं ! हर प्रतिभागी की रचना की संक्षिप्त समीक्षा वे कार्यक्रम के बीच ही करती रहती हैं और कार्यक्रम समाप्त होते-होते एक बहुत ही उत्कृष्ट प्रेस रिपोर्ट तैयार हो जाती है ! इसीलिये हर कार्यक्रम की प्रेस विज्ञप्ति बनाने का दायित्व उन्हें ही सौंपा जाता है ! भाषा पर जैसा उनका अधिकार है विरले ही किसीका होता है ! 

सुषमा जी के साथ मेरी अगली यात्रा पुन: विश्व मैत्री मंच के भोपाल में आयोजित होने वाले 2024 के वार्षिक समारोह के सन्दर्भ में हुई ! इस यात्रा में मैं, सुषमा जी और अलका अग्रवाल तीन लोग ही थे ! आगरा से ट्रेन देर रात में चलती है और बड़े सवेरे भोपाल पहुँच जाती है ! थ्री टायर की बोगी में बीच की सीट पर सोने के कारण यात्रा कष्टप्रद थी लेकिन सुबह होटल पहुँच कर नहा धोकर वे इतनी फ्रेश और खुश दिखाई दे रही थीं जैसे पूरी रात बड़े चैन से सोई हों ! हर हाल में खुश रहने की और परिस्थिति के साथ समझौता करने की सीख उनसे ही पाई मैंने ! उनका व्यक्तित्व सच में बहुत प्रेरक है ! कार्यक्रम के बाद उसी रात हमें वापिस आगरा लौटना था ! दिन भर कार्यक्रम की गतिविधियों में और सबसे मिलने मिलाने में व्यस्तता रही ! इन यात्राओं की बड़ी प्यारी तस्वीरें हैं मेरे पास ! 

सुषमा जी का एक और गुण जो मैंने नोटिस किया कि वे घूमने की भी बहुत शौक़ीन हैं ! उनका सूटकेस हमेशा पैक रहता है ! देश विदेश की जाने कितनी यात्राएं वो कर चुकी हैं और एक सबसे बड़ी और सबसे विशेष बात यह कि वे कभी अपने दोस्तों को निराश नहीं करतीं ! मुझे याद है मेरा कविता संग्रह ‘बंजारा मन’ प्रकाशन के लिए तैयार था ! मैं उसकी भूमिका सुषमा जी से लिखवाना चाह रही थी ! लेकिन सुषमा जी उन दिनों जापान गयी हुई थीं ! मैं उनके लौटने का इंतज़ार कर रही थी ! उनके लौट कर आने के बाद मैंने उन्हें फोन किया ! वे शायद एक दिन पहले ही जापान से लौटी थीं और दिल्ली में अपनी बेटी के पास थीं और कुछ अस्वस्थ भी थीं ! मैंने बहुत संकोच के साथ उनसे अपनी किताब की भूमिका लिखने का निवेदन किया ! मुझे पूरी आशंका थी कि वे मना कर देंगी लेकिन आश्चर्य कि उन्होंने सहर्ष मेरा अनुरोध स्वीकार कर लिया ! उनकी सहमति मिल जाने के बाद मैंने अपने कविता संग्रह की पी. डी. एफ़. उनके पास भेज दी और उन्होंने बहुत ही शानदार विस्तृत भूमिका अपने हाथ से लिखी और उसके फोटो खींच कर मेरे पास भेज दिए ! उनकी इस उदारता के लिए मैं सदैव उनकी ऋणी रहूँगी !

पिछले साल 2025 में भी विश्व मैत्री मंच के वार्षिक सम्मलेन में भाग लेने के लिए मैं और सुषमा जी साथ में ही भोपाल गए थे ! हम लोग वहाँ के हिन्दी भवन में ठहरे थे ! हम लोगों ने जितना भी समय साथ बिताया वह सच में यादगार था ! जाने कितनी खूबसूरत कवितायेँ और लघुकथाएं उन्होंने सुना डालीं ! सुषमा जी के साथ एक पल भी कोई बोर नहीं हो सकता ! इतना खुशमिजाज़ होना भी सबकी किस्मत में नहीं होता ! जब भी मिलती हैं बेहद प्यार से मिलती हैं, हँस कर मिलती हैं और चुटकियों में अपना बना लेती हैं ! हमें गर्व है कि वे हमारी अभिन्न सखी हैं ! उनके उज्जवल, सुखद और सफल भविष्य के लिए मेरी हार्दिक शुभकामनाएं हैं ! सुषमा जी आपको हमारा बहुत सारा प्यार और बहुत-बहुत आभार ! 


साधना वैद       

  


Tuesday, June 9, 2026

अजब तेरी लीला

 



औरतों ने पुरुषों की तरह पैसे कमाए 

तो भी किसीने उन्हें शाबाशी नहीं दी 

औरतों ने पुरुषों की तरह घर की बागडोर सम्हाली 

उन्हें तब भी किसी ने शाबाशी नहीं दी 

औरतों ने ज़ुल्म के खिलाफ आवाज़ उठाई 

तब भी किसीने उनका साथ नहीं दिया 

औरत ईश्वर का रचा वह अक्षय पात्र है 

जिसका अवदान कभी घटता नहीं 

प्रेम, दया, करुणा

सेवा, सहानुभूति, संवेदना 

वह जितनी बाँटती है 

प्रभु उसका अक्षय पात्र फिर से भर देता है ! 

स्त्री से सिर्फ लोगों को अपेक्षा ही अपेक्षा है 

न उसका कोईअधिकार है  

न उसकी कोई ज़रुरत 

न उसका कोई ख्वाब है 

न उसकी कोई हसरत 

वह सिर्फ एक पेड़ की छाँव है 

जिसके नीचे पथिक अपनी थकन उतार कर 

चला जाता है और जाने के बाद 

कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखता 

कि किस पेड़ ने खुद दिन भर 

कठिन धूप में जल कर 

उसे ठंडी छाँव दी थी !  



चित्र - गूगल से साभार 

साधना वैद 

Sunday, May 31, 2026

फूल और काँटे

 




फूलों की चाह है तो काँटों को चुनना होगा 

उड़ने की चाह है तो पंखों को खुलना होगा 

ऐसे ही नहीं होती हर चाहत किसी की पूरी 

कुछ बनने की चाह है तो सपनों को बुनना होगा ! 


साधना वैद  


 



प्यारी बिटिया 

कितनी मोहक 

कितनी आकर्षक है 

तुम्हारे अधरों पर 

ठिठकी यह मुस्कान !

कितना लुभा रहे हैं  

तुम्हारे खुले बिखरे ये बाल !

लगता है दो तीन दिन से 

कंघी ने स्पर्श नहीं किया है इन्हें, 

लेकिन फिर भी कितना 

खिल रहा है तुम्हारा चेहरा 

इस बिखरी केशराशि से घिरा !

आँखों में कितना निश्छल सा आग्रह है 

कितना निष्पाप सा आमंत्रण है 

अपना अधखाया हुआ 

जूठा सैंडविच साझा करने का !

कैसे न बलिहारी जाऊँ 

तुम्हारी मासूमियत पर 

मेरी प्यारी सी गुड़िया रानी ! 

माँ हूँ न तुम्हारी ! 

सौ सौ जान कुर्बान जाती हूँ  

तुम्हारी इस दरियादिली पर 

तुम्हारी लाड़ भरी मनुहार पर !

किसीकी नज़र ना लगे 

मेरी राजकुमारी को 

बस यही दुआ है 

नसीबों वाली इस माँ की ! 


साधना वैद 





Saturday, May 30, 2026

तू आस पास है - अलिवर्ण पाद छंद

 




गहरा सागर

उत्ताल तरंगें

कम्पित बदन

कूल न किनारा

घना अँधियारा

व्याकुल है मन !

 

लम्बी पगडंडी

दूर है मंज़िल

थके हुए पाँव

मुश्किल है जाना

ठौर न ठिकाना

ले चल तू गाँव !

 

विहँसती हवा

मुस्काता गगन

खिलते सुमन

कहते कान में

दिन क्यों ख़ास है

तू आसपास है !

 


चित्र - गूगल से साभार 


साधना वैद

 

 

 

 

 

Sunday, May 17, 2026

ग्रीष्म ऋतु

 





आ ही गयी 

ग्रीष्म ऋतु भी 

ज्येष्ठ मास की 

भीषण गर्मी 

और विकट गर्मी से 

व्याकुल प्राण

स्वेद बिन्दुओं से सिक्त 

बोझिल अंग

शिथिल शरीर और 

कल्पनाएँ निष्प्राण 

कोमल बदन को 

भस्मसात करते

गर्म लू के थपेड़े और 

सुलगती हवाएं 

प्रचंड आँधी तूफानों से 

थर-थर काँपते वृक्ष 

और दरकती धराएं

बूँद-बूँद को तरसते 

प्यासे पंछी और

गुमसुम कुम्हलाए फूल 

खामोश भँवरे और 

स्वेद में भीगे ललनाओं के 

मुलायम दुकूल 

इन गर्म हवाओं की छुअन 

मुझे सदा ही

व्याकुल कर जाती है 

ग्रीष्म ऋतु मुझे 

सबसे कम भाती है !


चित्र - गूगल से साभार 


साधना वैद


Saturday, May 16, 2026

परिवार - हाइकु

 



वटवृक्ष सा 

हमारा परिवार 

शीतल छाँव 


मासूम बच्चे 

करते कलरव 

गूँजता घर 


बाबा की सीख 

दादी की कहानियाँ

हमारी नींव 


चाचा का लाड़

चाचियों का दुलार

बुआ का प्यार 


माँ अन्नपूर्णा 

पिता शिव शंकर 

दीदी लक्ष्मी सी 


सारे अपने 

सुर नर किन्नर 

स्वर्ग सा घर 


बचपन का

अनमोल खजाना 

अमीर हम 


मिली सुशिक्षा 

संस्कार, सुविचार 

परिवार में 


है परिवार 

प्रथम पाठशाला 

सब बच्चों की 


अनुशासन, 

सभ्यता, शिष्टाचार 

सीखते यहीं 


जीवन मूल्य 

सीखे हमने इसी 

परिवार में 


बने समाज 

सशक्त औ’ सुदृढ़ 

परिवारों से 


जो कुछ पाया 

उपकार मानते

परिवार का  


मान मर्दन  

कभी होने न देंगे 

इस प्यार का !


चित्र - गूगल से साभार 


साधना वैद 







Friday, May 15, 2026

नसीहत

 


सद्कर्मों का सद्परिणाम

धीरज से तुम लेना काम 

रखना तुम खुद पर विश्वास 

पूरी होगी हर इक आस ! 


मिहनत से होता है नाम 

करना होगा तुमको काम 

घबरा कर मत जाना बैठ 

रखनी होगी गहरी पैठ !


रहना तुम हर पल तैयार 

हर बाधा कर लोगे पार 

श्रम से ही मिलता सम्मान  

मिले तुम्हें प्रभु का वरदान !


चित्र - गूगल से साभार 

साधना वैद 

Monday, May 11, 2026

चौपई – एक प्रयास

 




नमस्कार साथियो,
'चौपई' एक नई विधा है ! यह 'चौपाई' से भिन्न है ! 
इस  पर मेरा एक प्रयास !


मुद्दत से दिल में थी प्यास 

जाने कब पूरी हो आस 

मिल कर जब बैठेंगे पास 

बाटेंगे खुशियाँ तब ख़ास !


हो जाएंगे दुःख सब दूर 

चिंता हो जाएगी चूर 

मन्नत सबकी होगी पूर

चेहरों पर उतरेगा नूर !



चित्र - गूगल से साभार 


साधना वैद 






Friday, May 8, 2026

मदर्स डे

 




क्या इस बार भी  

खूबसूरत आभासी गुलदस्ते, 

तरह-तरह के आभासी केक 

और वंचना भरे शुभकामना सन्देश

भेज कर मना लोगे तुम

‘मदर्स डे’,

और खुश हो जाओगे  

अपनी दयानतदारी पर, 

या अपनी व्यस्ततम दिनचर्या से 

निकाल पाओगे 

कुछ दिन, कुछ घंटे, कुछ पल 

और कर दोगे उन्हें समर्पित

अपनी वास्तविक माँ के लिए 

जो वर्षों से दूर देश के किसी

निर्जन एकांत में  

तुम्हारी राह देखते-देखते हर क्षण

हताश होती जा रही है,

वृद्ध होती जा रही है,

दुर्बल होती जा रही है ? 

तुम्हारी माँ की आँखें 

अब पथरा गई हैं,

घुटनों के दर्द ने

चलना दुश्वार कर दिया है, 

तुम्हारे लिए स्वादिष्ट पकवान

बनाने वाले अभ्यस्त हाथ 

अब पानी से भरा 

गिलास उठाने में भी 

काँपने लगे हैं !

बिस्तर पर लेटे-लेटे वह

जोहती रहती है तुम्हारी बाट ! 

इससे पहले कि उसकी आँखें 

इतनी धुँधला जाएं कि वह

तुम्हें पहचान ही न पाए 

एक बार तो मना लो ‘मदर्स डे’

उसके साथ, उसके पास, 

उसके सानिध्य में ! 

इससे बड़ा उपहार उसके लिए 

शायद और कुछ न होगा !

एक बात याद रखना 

दुनिया के सारे खूबसूरत मंज़र 

सदियों बाद भी ऐसे ही 

सुंदर बने रहेंगे लेकिन 

माता-पिता की नश्वर देह 

पल-पल छीजती जाती है,

शिथिल होती जाती है, 

चुकती जाती है !

देर न हो जाए कहीं 

देर न हो जाए !  

 

चित्र - गूगल से साभार 

साधना वैद 

 

  

 


Tuesday, May 5, 2026

कुछ कहते हैं ये ताँका

 




ग़रीब तो हैं 

खुद्दार भी हैं हम

टूटते हैं तो

जानते है जुड़ना

गिर के खड़े होना !


मजदूर हैं 

मजबूर नहीं हैं

रच डालेंगे 

स्वेद की सियाही से

निज सौभाग्यनामा !


उठायें बोझ

सारे जग का हम

और हमारा ?

बोलो, कौन उठाये ?

सीने से चिपटाये ?

 

क्या दोगे तुम

          किताब या कुदाल ?         

खुशी या आँसू ?

खिलौने या फावड़ा?

जीवन या मरण ?


जाती बाहर 

रोटी की जुगत में

माँ काम पर   

मैं हूँ घर की रानी

करती चौका पानी !

 

हर चुनौती

आसान या मुश्किल

साध्य है मुझे !

नहीं स्वीकार अब

वर्चस्व पुरुषों का ! 


ओ मेरे मौला  

माथे पे गहराती

चिंता की रेख

सोने की कलम से

लिख नया सुलेख !


तू है महान

धरा से नभ तक

हर दिशा में

गुंजित तेरा गान

ओ माँ तुझे सलाम ! 


बोझ उठाते

नये घर बनाते

न जाने कैसे

हम बेघर हुए

खुद पे बोझ हुए !


चित्र - गूगल से साभार 


साधना वैद


Wednesday, April 29, 2026

औकात - लघुकथा


 






दीनू एक शानदार भव्य भवन के ऊँचे से गेट के बाहर दो घंटे से खड़ा हुआ घर के मालिक मल्होत्रा जी का इंतज़ार कर रहा था ! उन्होंने ही संदेशा भेज कर उसे गाँव से बुलवाया था ! उनके किसी दोस्त का मकान बन रहा था और उन्हें किसी होशियार मिस्त्री की ज़रुरत थी ! मल्होत्रा जी जानते थे कि इस काम के लिए दीनू से बढ़िया और कोई मिस्त्री नहीं हो सकता इसीलिये उन्होंने उसके पास ड्राईवर की मार्फ़त संदेसा भिजवाया था ! उनका ड्राईवर भी तो उसी गाँव का है जहाँ दीनू रहता है ! जैसे ही मल्होत्रा जी की गाड़ी आई दरबान ने अदब से उठ कर गेट खोला ! गाड़ी के साथ-साथ दीनू ने भी भवन के अहाते में प्रवेश कर लिया !


मल्होत्रा जी अपनी चमचमाती हुई गाड़ी से उतरे और घर की ओर बढ़े ! दीनू भी उनके पीछे चल दिया ! तभी दरबान की कड़कती हुई आवाज़ आई
, “कहाँ घुसा चला जा रहा है ! औकात है तेरी ऐसे फर्श पर पैर धरने की ! चल बाहर निकल ! मालिक को बात करनी होगी तो बुला लेंगे तुझे !”


दीनू वहीं ठिठक गया ! उसकी आँखें भर आईं ! कैसे बताए कि तीन साल पहले इस भवन की हर दीवार की एक-एक ईंट उसीकी ही लगाई हुई है और जिस फर्श पर पाँव धरने की आज उसकी औकात नहीं आँकी जा रही उस फर्श की ऐसी चिकनी और सुन्दर सूरत उसीकी जी तोड़ मेहनत और घिसाई के बाद ही निकल कर आई है ! विडम्बना देखिये आज उसीके बनाए फर्श पर पाँव धरने के लायक उसकी औकात है या नहीं यह एक दरबान तय कर रहा है !

साधना वैद


Friday, April 24, 2026

मूँगफली पुराण

 



कितनी फुर्सत से रचा, प्रभु ने यह उपहार

सजे हुए हैं खोल में, दाने सुंदर चार !

दाने सुंदर चार, ईश की लीला न्यारी 

लगते कितने स्वाद, धरा पर कूड़ा भारी !

कहे साधना आज, बात तो है बस इतनी 

प्रभु ने यह उपहार, रचा फुर्सत से कितनी ! 


बैठे महफिल में सभी, छेड़ रहे हों राग

मूँगफली हों सामने, खुल जायेंगे भाग !

खुल जायेंगे भाग, बड़ी गुणकारी मेवा 

भर-भर बाँटो आज, करो तुम सबकी सेवा 

कहे साधना आज, “अजी तुम काहे ऐंठे 

चलो बढ़ाओ हाथ, रहो ना गुमसुम बैठे !” 


भावे सबको कुरकुरी, स्वाद मिले भरपूर

हाथ रुके ना एक पल, होय न पैकिट दूर !

होय न पैकिट दूर, मज़ा हो जाए दूना 

खाते जाएं दोस्त, लगे कितना भी चूना

कहे साधना आज, न कोई उठ के जावे

मूँगफली के साथ, मसाला सबको भावे ! 


होकर तन्मय देखते, परदे पर है चोर 

अँधियारे में सब सुनें, चटर पटर का शोर !

चटर पटर का शोर, कहीं गिर जाए दाना 

होता मन बेचैन, ढूँढ कर उसको लाना 

कहे साधना आज, दुखी हैं दाना खोकर  

मिल जाए तब फिल्म, देखते तन्मय होकर !  



साधना वैद 

Tuesday, April 14, 2026

फायकू - 2

 




लिख डाले कितने खत

जोश में हमने

तुम्हारे लिए

 

कितने ही कोरे कागज

रंग डाले हमने

तुम्हारे लिए

 

सोचते थे ले आएंगे

तोड़ कर तारे

तुम्हारे लिए

 

चाँद भी उतार लाएंगे

इस ज़मीन पर

तुम्हारे लिए

 

लेकिन चूर चूर हुआ

जो सपना देखा

तुम्हारे लिए

 

हम वंदनवार लगाते रहे 

चौक पुराते रहे

तुम्हारे लिए

 

हज़ारों दीप जलाते रहे

फूल बिछाते रहे

तुम्हारे लिए

 

पूरा घर सजाते रहे

रंगोली बनाते रहे

तुम्हारे लिए

 

तुम अनदेखा करते रहे

हम मिटते रहे

तुम्हारे लिए



चित्र - गूगल से साभार 

 

साधना वैद


Monday, March 30, 2026

कह मुकरी - 2

 




दिन भर मुझको काम बताता

सारे घर में नाच नचाता

लेकिन मन का है वो सच्चा

को सखी साजन ? ना सखी बच्चा !

ले आता मँहगे उपहार

चूड़ी, कंगन, झुमके, हार

चाहे खुश होकर दूँ दाद

को सखी साजन ? ना री दमाद !

१०

रात को जब खिड़की से आये

देख उसे दिल घबरा जाए

मन चाहे कर दूँ मैं शोर

को सखी साजन ? ना सखी चोर !

११

जैसे ही वो घर में आये

मेरी साँस गले घुट जाए

रौब दाब है उसका जबरा

को सखी साजन ? ना सखी ससुरा !

१२

जो कह दूँ वो कभी न सुनता

जो बतलाऊँ उलटा करता

करता है अपनी मनमर्ज़ी

को सखी साजन ? ना सखी दर्ज़ी !

१३

दबे पाँव घर में आ जाए

किचिन खोल सब माल उड़ाये

मक्खन, ब्रेड, जैम, अंगूर

                 को सखी साजन ? ना लंगूर !

१४

जब आकर खिड़की से झाँके

पहरों बैठा मुझको ताके

लगे मुझे हर दुःख तब मंदा

को सखी साजन ? ना सखी चंदा !

१५

मुझे देख कर सीटी मारे

ज़ोर ज़ोर से नाम पुकारे

और सुनाये मीठे बैना

को सखी साजन ? ना सखी मैना !

चित्र - गूगल से साभार 

साधना वैद