जलते रहे
ज़िंदगी की धूप में
पाँव के छालों की
परवाह किये बगैर
बिना रुके बिना थमे
दिन रात बस चलते रहे
चलते ही रहे ।
न मिला हमें ठौर कहीं
न ही कहीं मिली छाँह
और हम अभिशप्त से
समय की झंझा में
डाल से टूटे पत्ते की तरह
बेबस और बेआस बस
उड़ते रहे
उड़ते ही रहे ।
हालात की दुश्वारियों ने
इस तरह कर दिया लाचार
कि हम आज गर्दिशों के
उफनते सैलाब में
तिनके की तरह
बहते रहे
बहते ही रहे
सुनाई किसीको भूले से
कभी जो दास्ताने गम
ऊब कर वो उठ गया
और हम कहते रहे
कहते रहे
कहते ही रहे ।
चित्र - गूगल से साभार
साधना वैद

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