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Saturday, August 1, 2015

बरसा सावन





धरा नवोढ़ा
डाले अवगुंठन
प्रफुल्ल वदन
तरंगित तन
धारे पीत वसन  
उल्लसित मन
विहँसती क्षण-क्षण !
उमड़े घन
करते गर्जन
कड़की बिजली
तमतमाया गगन
बरसा सावन 
तृप्त तन मन
कुसुमित कण-कण
संचरित नवजीवन
खिले सुमन
सजा हर बदन
सुरभित पवन
पंछी मगन
हर्षित जन-जन
धरा पुजारन  
मुग्ध नयन
अश्रु जल से
धोये चरण
करे अर्पण
निज जीवन धन
प्रकृति सुन्दरी  
तुम्हें नमन !  


साधना वैद