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Friday, September 22, 2017

ज़रा ठहरो




ज़रा ठहरो ! 
तुम इनको न छूना, 
ये एक बेहद पाकीजा से रिश्ते के 
टूट कर बिखर जाने से 
पैदा हुई किरचें हैं जिन्हें छूते ही 
धारा प्रवाह खून बहने लगता है , 
डरती हूँ तुम्हारे छू लेने से 
कहीं इनकी धार कुंद ना हो जाए, 
अगर इनकी चुभन से लहू ही ना बहा
तो इनकी सार्थकता क्या रह जायेगी !

ज़रा ठहरो !
तुम इनको ना मिटाओ, 
ये मेरे मन के कैनवास पर 
उकेरे गये मेरे अनन्य प्रेम की 
मोहक तस्वीरों को बिगाड़ कर 
खरोंचने से बने बदनुमा धब्बे हैं 
अगर ये मिट गए तो मेरे तो 
जीने का मकसद ही खत्म हो जाएगा,
जब 'देखो, ढूँढो पहचानो' का खेल
ही खत्म हो जाएगा तो फिर मैं 
इस कैनवास में क्या ढूँढ पाउँगी 
और मुझे कैसे चैन आएगा ! 

ज़रा ठहरो !
तुम इनको ना समेटो, 
ये मेरी अनकही, अनसुनी
अनभिव्यक्त उन प्रेम पातियों के 
फटे हुए टुकड़े हैं जो कभी 
ना भेजी गयीं, ना ही पढ़ी गयीं
लेकिन आज भी मैं दिन भर में
मन ही मन ना जाने कितनी बार 
इन्हें दोहराती हूँ और जो आज भी 
मेरे जीने का संबल बनी हुई हैं ! 

ज़रा ठहरो !
अब जब तुम आ ही गए हो
तो मेरे इस अनमोल खजाने 
को भी देखते जाओ
जिसमें एक पाकीजा सी मोहब्बत की 
चंद यादें, चंद खूबसूरत तस्वीरें,
ढेर सारे आँसू, ढेर सारी चुभन 
चंद फटे खत और पुरानी डायरी के 
जर्जर पन्नों पर दर्द में डूबी
बेरंग लिखावट में धुली पुछी 
चंद नज्में मैंने सहेज रखी हैं !
इन्हें जब जब मैं बहुत हौले से 
छू लेती हूँ, सहला लेती हूँ 
तो इनका स्पर्श मुझे याद दिला देता है 
कि मैं आज भी ज़िंदा हूँ और 
मेरा दिल आज भी धड़कता है ! 

साधना वैद

चित्र - गूगल से साभार 

Sunday, September 17, 2017

बस ! अब और नहीं ---



वक्त और हालात ने
इतने ज़ख्म दे दिए हैं
कि अब हवा का
हल्का सा झोंका भी
उनकी पर्तों को बेदर्दी से
उधेड़ जाता है
मैं चाहूँ कि न चाहूँ
मेरे मन पर अंकित
तुम्हारी पहले से ही
बिगड़ी हुई तस्वीर पर 
कुछ और आड़ी तिरछी
लकीरें उकेर जाता है !
मन आकंठ दर्द में डूबा है
हर साँस बोझिल हुई जाती है
ऐसे में तुम्हारी जुबां से निकला
हर लफ्ज़ जाने क्यों
पिघले सीसे सा कानों में
उतर जाता है
और मेरे अंतर्मन की  
बड़े जतन से संजोई हुई
थोड़ी सी हरियाली को
तेज़ाब जैसी बारिश से
निमिष मात्र में ही
झुलसा जाता है !
यह इंतहा है
मेरे धैर्य की,
यह इंतहा है  
मेरी बर्दाश्त की
और यह इंतहा है
मेरी दर्द को सह जाने की
अदम्य क्षमता की !
बस ! अब और नहीं,
अब और बिलकुल भी नहीं !
अब यह ज्वालामुखी
किसी भी वक्त
फट सकता है !
जो बचा सकते हो
समय रहते बचा लो
काल के किसी भी अनजान,
अनचीन्हे, अनपेक्षित से पल में
अकस्मात ही अब
कुछ भी घट सकता है
फिर न कहना मैंने
समय रहते पहले ही
चेताया क्यों नहीं !

साधना वैद
  


Monday, September 11, 2017

हम और तुम




वर्षों से भटक रहे थे हम तुम 
ज़िंदगी की इन अंधी गलियों में 
कुछ खोया हुआ ढूँढने को 
और मन प्राण पर सवार 
कुछ अनचाहा कुछ अवांछित 
बोझ उतार फेंकने को !
थके हारे बोझिल कदमों से 
जब घर में पैर रखा तो 
अस्त व्यस्त बिखरे सामान से 
टकरा कर औंधे मुँह गिरे !
चोट लगी, दर्द भी हुआ 
तभी यह ख़याल आया 
आज बहुत करीने से 
कमरे की हर चीज़ को सँवार देंगे 
कमरे के बाहर का बरामदा 
बरामदे के आगे का बागीचा 
सब बिलकुल व्यवस्थित कर 
शीशे सा चमका देंगे ! 
एक दूसरे को बता कर 
हम दोनों अपने-अपने घर की 
सफाई में जुट गए ! 
और देखो मेहनत रंग ले आई 
हम दोनों को ही अपनी 
खोयी हुई चीज़ें मिल गयीं ! 
मुझे बगीचे के सबसे 
निर्जन कोने में पड़ी बेंच पर 
सूखे पत्तों के नीचे दबी ढकी 
मेरी सबसे कीमती 
सबसे अनमोल उपलब्धि मिल गयी 
जिसे शायद कभी बेध्यानी में 
या बहुत ही अनमने पलों में 
मैं गलती से वहाँ छोड़ आई थी ! 
बड़े जतन से सहेज कर उसे मैं 
घर के अन्दर ले आई ! 
और अपने उर अंतर के 
सबसे निजी कोने में 
जीवन भर के लिए मैंने 
उसे सुरक्षित कर लिया !
मेरी तलाश पूरी हो गयी थी !
उसी दिन वहाँ अपने घर में 
तुम्हारी तलाश भी पूरी हुई थी !
तुमने ही तो बताया था मुझे !
अपने कमरे की सफाई में 
तुम्हें भी पुरानी जर्जर किताबों की 
अलमारी में कहीं दबा पड़ा
वह सामान मिल गया था 
जिसका वजूद, जिसका अहसास 
वर्षों से तुम्हारी आत्मा, 
तुम्हारी चेतना पर एक भारी 
शिला की तरह पड़ा हुआ था ! 
उसे अपने हृदय से उतार तुम 
मुक्ति की साँस लेना चाहते थे 
स्वयं को उससे उन्मुक्त कर 
पूर्णत: स्वछन्द हो आसमान में 
ऊँचे खूब ऊँचे उड़ना चाहते थे ! 
तुम्हारी चाह भी पूरी हुई 
एक पल भी गँवाए बिना 
तुमने उस अवांछनीय वस्तु को 
झाड़ कर अपने घर से 
बाहर कर दिया और कबाड़ की 
कोठरी में फेंक दिया !
अब तुम्हारी आत्मा भी निर्बंध है 
तुम्हारी चेतना पर कोई बोझ नहीं है ! 
जान तो गए हो ना ! 
वो कुछ हमारी यादें थी 
कुछ हमारी चाहतें थीं जिन्हें 
मैंने बड़े प्यार से 
अपने अंतर में संजो लिया 
और तुमने बड़ी बेरहमी से 
उन्हें दिल के बाहर कर दिया ! 
अच्छा ही तो है 
काँटा निकला पीर गयी !




साधना वैद

Sunday, September 3, 2017

गुरू और शिष्य

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शिक्षक दिवस पर विशेष

गुरू रहे ना देव सम, शिष्य रहे ना भक्त
बदली दोनों की मती, बदल गया है वक्त !

शिक्षक व्यापारी बना, बदल गया परिवेश
त्याग तपस्या का नहीं, रंच मात्र भी लेश !

बच्चे शिक्षक का नहीं, करते अब सम्मान
मौक़ा एक न छोड़ते, करते नित अपमान !

कहते विद्या दान से, बड़ा न कोई दान  
लेकिन लालच ने किया, इसको भी बदनाम !

कोचिंग कक्षा की बड़ी, मची हुई है धूम
दुगुनी तिगुनी फीस भर, माथा जाये घूम !

साक्षरता के नाम पर, कैसी पोलम पोल
नैतिकता कर्तव्य को, ढीठ पी गए घोल !

सच्चे झूठे आँकड़े, भरने से बस काम
प्रतिशत बढ़ना चाहिए, साक्षरता के नाम !

कक्षा नौ में छात्र सब, दिए गए हैं ठेल
जीवन के संघर्ष में, हो जायेंगे फेल !

 ऐसी शिक्षा से भला, किसका होगा नाम !
लिख ना पायें नाम भी, ना सीखा कुछ काम !

करना होगा पितृ सम, शिक्षक को व्यवहार
रखें शिष्य भी ध्यान में, सविनय शिष्टाचार !

अध्यापक और छात्र में, हो न परस्पर भीत  
जैसे भगवन भक्त में, होती पावन प्रीत !


साधना वैद





Wednesday, August 30, 2017

बंद हो जाने चाहिए सारे धार्मिक डेरे, आश्रम और सत्संग स्थल



तथाकथित धर्म गुरुओं और बाबाओं के चेहरों से इन दिनों जिस तरह से नकाब उठ रहे हैं और उनकी पोल खुल रही है मन में घोर जुगुप्सा सी होने लगी है ! ये हैं हमारे समाज के आध्यात्मिक उद्धारक जो यह दावा करते हैं कि वे जनता को धर्म और नीति के रास्ते पर चलने के लिए उनका मार्गदर्शन करते हैं और ईश्वर के निकट जाने के लिए उनके पथ को सुगम बनाते हैं ! घृणा होती है ऐसे बाबाओं से ! एक प्रभावी क़ानून बना कर ऐसे सारे पाखंडी और ढोंगी बाबाओं के आश्रम और डेरों को जब्त कर लेना चाहिए जहां सत्संग और प्रवचन के नाम पर इस तरह के घिनौने कृत्य किये जाते हैं ! जनता को भी जागरूक होना चाहिए और समझना चाहिए कि वे अपनी सारी आस्था, जमा पूँजी और मेहनत कहाँ व्यर्थ कर रहे हैं और कैसे असामाजिक तत्वों को पाल पोस कर सशक्त बना रहे हैं जो उनकी अपनी बहन बेटियों पर ही बुरी नज़र रखते हैं !

अपने भक्तों के बल पर ये तथाकथित ‘वैरागी’ और ‘सन्यासी’ बाबा महाराजाओं की तरह सारे सांसारिक सुखों का भोग करते हैं और भक्तों को लूट कर भिखारी बना देते हैं ! संभव है इनमें कुछ सच्चे महात्मा भी हों जो वास्तव में समाज के हित में काम कर रहे हों ! लेकिन उनकी आड़ में जो इन पाखंडियों की बन आई है वह समाज के हित में बहुत हानिकारक है ! इसमें संदेह नहीं कि इस तरह का कोई क़ानून बनाने पर सच्चे धर्म गुरुओं के आश्रमों पर भी ताला लग जाएगा लेकिन यदि वे सच में समाज का हित चाहते हैं तो वे इस पहल का समर्थन ज़रूर करेंगे ! मेरे विचार से इन सभी प्रवचन, सत्संग और कथा कीर्तनों पर अविलम्ब बैन लगा दिया जाना चाहिए जहाँ पर भोली भाली जनता को फ़िज़ूल की बातें सिखा कर गुमराह किया जाता है और उनका आर्थिक, मानसिक व दैहिक शोषण किया जाता है ! आपका क्या ख़याल है ?

साधना वैद

Sunday, August 27, 2017

धुंध



नज़र कमज़ोर हो चली है
आँखों से धुँधला दिखने लगा है
अच्छा ही है !
धुंध के परदे में कितनी
कुरूपताएं, विरूपताएं छिप जाती हैं
पता ही नहीं चल पाता और मन
इन सबके अस्तित्व से नितांत अनजान
उत्फुल्ल हो मगन रहता है !
नया चश्मा भी नहीं बनवाती अब
क्या करना है
जो नज़र साफ़ हो जाए और
सारे दाग़ धब्बे, कुरूपताएं, विरूपताएं
एकबारगी ही दिखाई दे जाएँ
तो क्या फिर इतने सुख से जी सकूंगी ?
नज़र के साथ साथ
दिमाग़ की धुंध को भी अब
इसीलिये हटाना नहीं चाहती
कहीं बड़े जतन से पाले पोसे
ये भरम टूट न जाएँ और
यथार्थ एकबारगी ही
अपनी सारी कटुता के साथ
मेरे सामने उजागर न हो जाए !
कमरे की छत और दीवारों पर लगे
जाले भी अब साफ़ नहीं करती
इनकी आड़ में बेरंग हुई दीवारें
और जगह-जगह से उखड़ा प्लास्टर
छिपे जो रहते हैं !
लोग मुझे निपट आलसी,
अकर्मण्य, फूहड़ जो कुछ भी
समझते हैं तो समझें !
कुछ बदसूरत छिपाने के लिए
उससे भी बड़ी बदसूरती का
सहारा लेना ही पड़ता है !
वो कहते हैं ना
तिनका ओट पहाड़ होता है
मैं तो हर ओर से कुरूप और
भयावह पहाड़ों की विशाल
श्रंखला से घिरी हुई हूँ
इसीलिये मैंने अपनी आँखों के आगे
हर तरफ तिनकों से बुने
परदे ही परदे टाँग लिए हैं !    
आखिर सुख से जीने के लिए
किसी भरम का होना भी तो
ज़रूरी है ना !
कहो, ठीक कहा न मैंने ?

साधना वैद


Thursday, August 24, 2017

महाप्रबंधक - हमारे गणपति महाराज



हिन्दू धर्म अनेक पर्व परम्पराओं व अनुष्ठानों से समृद्ध है ! विभिन्न सिद्धियों के लिए व हर प्रकार के कष्टों के निवारण के लिए तैंतीस कोटि देवी देवताओं की पूजा की जाती है ! परन्तु हर पूजा एवं यज्ञ तथा हर प्रकार के शुभ कार्य के आरम्भ में सर्व प्रथम गणेश जी की ही वन्दना की जाती है ! श्रीगणेश जी का रूप स्वरुप व काया बच्चों व बड़ों सबके लिए कौतुहल एवं आकर्षण का विषय है ! धार्मिक तथा सामाजिक कार्यक्रमों से थोड़ा हट कर आधुनिक प्रबंधन ( मैनेजमेंट ) के सन्दर्भ में भी गणेश जी की काया से अनेक प्रकार की प्रेरणा मिलती है व कई प्रशिक्षक ( ट्रेनर्स ) एवं प्रेरक ( मोटीवेटर्स ) वक्ताओं ने अपने भाषणों में इसका उल्लेख किया है ! आइये हम भी देखें कि गणेश जी का वृहदाकार एक सफल प्रबंधन के लिए हमें कैसे प्रेरित कर सकता है !

विशाल सिर – हमारी सोच, हमारे सपने ऊँचे और बड़े होने चाहिए जिससे हम अपनी सफलताओं को ऊँचाई तक ले जा सकें और अपने उद्योग, अपने संस्थान एवं अपने सहयोगियों को अपार सफलता दिला सकें ! गणेश जी का सिर हाथी का है जो अपनी अभूतपूर्व स्मरण शक्ति के लिए जाना जाता है ! एक अच्छा प्रबंधक अपनी अतीत की सफलताओं और विफलताओं को कभी भूलता नहीं है और उनका सही आकलन और विश्लेषण करके वर्तमान सन्दर्भों में उसका लाभ उठाता है ! जिस प्रकार एक हाथी हर प्रकार से अपने स्वामी के प्रति वफादार होता है एक अच्छा प्रबन्धक अपने उद्योग के प्रति समर्पित होता है !

बड़े–बड़े कान – एक सफल प्रबंधक के लिए एक अच्छा श्रोता होना परम आवश्यक है ! प्रबंधक को चाहिए कि वह सबकी बात सुने जिससे छोटे से छोटे कर्मचारी को भी संतुष्टि हो कि उसकी बात को महत्त्व दिया गया ! अक्सर बहुत छोटा कर्मचारी भी बहुत उपयोगी सुझाव दे देता है ! एक अच्छे प्रबंधक का यह गुण होना चाहिये कि वह सबकी बातों को ध्यान से सुन कर केवल सार को ही ग्रहण करे और फालतू बातों को दूसरे कान से बाहर निकल जाने दे !

लम्बी सूँड - हर चीज़ का गहराई से और समझ बूझ कर अधययन करने में सूँड एक अत्यंत महत्वपूर्ण सहायक अंग है साथ ही यह उपयोगी चीज़ों को पास या दूर से उठा कर ग्रहण करने में भी सहायक होती है ! व्यर्थ व निरर्थक विचारों एवं सलाहों का भली प्रकार निरीक्षण परीक्षण कर त्याग देने में ज़रा भी समय नहीं लगाती ! वहीं दूर की अच्छी चीज़ों को यदि लीक से हट कर भी ग्रहण करना पड़े तो उसमें भी देर नहीं लगाती ! अर्थात हमें लकीर का फ़कीर न बने रहने के लिए प्रेरित करती है !

छोटी-छोटी आँखें – परिस्थितियों का सूक्ष्मता के साथ गहन अध्ययन करने की प्रेरणा देती हैं और इधर उधर भटकने के स्थान पर अपने लक्ष्य पर ही समग्र ध्यान केन्द्रित किये रहने के लिये प्रेरित करती हैं !

एक दाँत - गणेश जी के दो दाँतों में से एक दाँत टूटा हुआ है ! कहा जाता है कि जब महर्षि वेदव्यास गणेश जी से महाभारत के अध्याय लिखवा रहे थे तो उनकी कलम टूट गयी ! व्यवधान के बाद भी उन्होंने कार्य रुकने न दिया और तत्काल अपना एक दाँत तोड़ कर उससे कलम का काम लेकर अपना कार्य पूरा किया ! इससे प्रेरणा मिलती है कि किसी भी कार्य के संपादन में विपरीत स्थितियाँ तो निश्चित रूप से आयेंगी ही लेकिन अपनी बुद्धि का प्रयोग कर उपलब्ध साधनों का ही प्रयोग करके अपना कार्य पूरा कर लेना चाहिये !

छोटे-छोटे पैर – गणेश जी के छोटे छोटे पैर इतने मजबूत हैं कि उनके पूरे शरीर का भार उठा लेते हैं ! यहाँ तक कि अनेक स्थानों पर गणेश जी को नृत्य करते हुए भी दिखाया जाता है ! इसी प्रकार एक अच्छे प्रबंधक को प्रफुल्ल चित्त से पूरी ज़िम्मेदारी अपने ऊपर लेने की क्षमता रखनी चाहिए और किसी भी विषम परिस्थिति में घबराना नहीं चाहिए ! कितना भी बड़ा दायित्व हो उसकी सारी सफलताओं और विफलताओं का दायित्व भी उसे खुद ही उठाना चाहिये !

बड़ा पेट – किसी भी काम को करने में अनेक अच्छे व बुरे अनुभवों से दो चार होना अवश्यम्भावी है ! यश अपयश भी मिलता है परन्तु इनको अपने ऊपर हावी नहीं होने देना चाहिये और इन सब बातों को शान्ति से पचा लेने की क्षमता भी एक अच्छे प्रबंधक में होनी चाहिए ! हर उद्योग, व्यापार या संस्थान की अनेक गोपनीय जानकारियाँ व सूचनाएं होती हैं जिनको अपने तक ही सीमित रखने की क्षमता भी होनी चाहिए ! सहयोगियों की कमजोरियों को भी अपने तक ही रख कर हम उनका सर्वश्रेष्ठ सहयोग प्राप्त कर सकते हैं व उनके वास्तविक नायक बन सकते हैं !

चार हाथ – श्रीगणेश के चार हाथ मनुष्य के लिए सुझाए गए चारों पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की प्राप्ति के द्योतक हैं ! एक मैनेजर के सामने अनेक लक्ष्यों को प्राप्त करने का दायित्व होता है ! लक्ष्य को समय से हासिल करना, लक्ष्य को अपने सीमित संसाधनों में ही प्राप्त करना, काम करने वाले समस्त कर्मचारियों की सुविधाओं का ध्यान रखते हुए अपने लक्ष्य को हासिल करना साथ ही निर्धारित नियमों को बिना तोड़े हुए इस प्रकार सफलता प्राप्त करना कि हमारे यश एवं प्रभाव में चहुँ ओर वृद्धि हो इसी बात का ध्यान रखते हुए काम करने की प्रेरणा बप्पा के ये चार हाथ हमें देते हैं !

वाहन मूषक – श्रीगणेश जी का वाहन मूषक है ! यह दर्शाता है कि गणेश जी ने व्यर्थ के दिखावे की परवाह न कर जो कुछ उन्हें सहज रूप से उपलब्ध हुआ उसीसे अपना काम चला लिया ! यह उनके त्याग व सादगीपूर्ण जीवनदर्शन की ओर संकेत करता है ! ये ही गुण किसी भी प्रबंधक को नायक से महानायक बनाने में सहायक हो सकते हैं !

तो देखा आपने हमारे गणपति महाराज अपने आप में ही एक सम्पूर्ण प्रबंधन संस्थान हैं और उनमें एक अच्छे प्रबंधक होने के सारे गुण मौजूद हैं ! अब यह हम पर निर्भर करता है कि हम उनसे क्या और कितना सीख पाते हैं और कितना अपने जीवन में उतार पाते हैं !

गणपति बप्पा मोरया !

साधना वैद