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Thursday, July 2, 2020

बचपन – हाइकू




याद आते हैं
शैशव के वो दिन
कितने प्यारे,
खेला करते
सहेलियों के संग
खेल वो न्यारे


मिट्टी के गुट्टे
बोल मेरी मछली
कितना पानी
शादी का खेल
गुड़िया की अम्माँ मैं
घर की रानी


सावन के गीत
कजरी औ’ मल्हार
कौन सुनावे
सूने हैं पेड़
ना झूले न सखियाँ
कौन झुलावे


वो गिल्ली डंडा,
क्रिकेट, गेंद बल्ला,
बच्चों की रेल,
ऊँची पतंग,
साँप सीढ़ी, कैरम,
खो खो का खेल


काँच के कंचे
घोड़ा जमाल शाही
खो गये सारे
बच्चों के खेल
आधुनिक युग में
हो गये न्यारे


कोई लौटा दे
बचपन हमारा
प्यारा सुहाना
देदे हमारी
लुटी हुई खुशियाँ
मीठा तराना !



साधना वैद

Tuesday, June 30, 2020

हवाओं में उड़ती जिज्ञासाएं



हर रोज़ सुबह देखती हूँ
हवाओं में उड़ती जिज्ञासाओं को
पंछियों के झुण्डों के रूप में !
उड़ते ही जाते हैं दूर दूर तक गगन में
जब तक दृष्टि से ओझल ना हो जाएँ !
मेरा मन भी उल्लसित हो
उड़ता जाता है उनके साथ
न जाने किस आशा में किस उम्मीद में !
दिन भर एक पुलक सी छाई रहती है हृदय में
जैसे कुछ अद्भुत आने वाला है सामने !
संध्या होते ही हर रोज़ देखती हूँ उन्हें
लौटते हुए क्लांत, श्रांत, विभ्रांत
कौन जाने अपना लक्ष्य उन्हें मिला या नहीं
नहीं जानती वे खुश लौटते हैं या उदास
लेकिन मेरे मन में छन्न से कुछ टूट जाता है
और मेरा मन बहुत उदास हो जाता है
हवाओं में उड़ती सुबह की जिज्ञासाएं
साँझ होते ही छिन्न भिन्न हो जाती हैं
एक दिन और बीत जाता है ज़िंदगी का
उम्र एक दिन और कम हो जाती है !

साधना वैद  


Sunday, June 28, 2020

मुझे अच्छा लगता है




इन दिनों
मन की खामोशियों को
रात भर गलबहियाँ डाले
गुपचुप फुसफुसाते हुए सुनना
मुझे अच्छा लगता है !  

अपने हृदय प्रकोष्ठ के द्वार पर
निविड़ रात के सन्नाटों में
किसी चिर प्रतीक्षित दस्तक की
धीमी-धीमी आवाजों को
सुनते रहना
मुझे अच्छा लगता है !
  
रिक्त अंतरघट की  
गहराइयों में हाथ डाल
निस्पंद उँगलियों से
सुख के भूले बिसरे
दो चार पलों को  
टटोल कर ढूँढ निकालना
मुझे अच्छा लगता है !

थकान के साथ
शिथिलता का होना  
अनिवार्य है ,
शिथिलता के साथ
पलकों का मुँदना भी
तय है और
पलकों के मुँद जाने पर
तंद्रा का छा जाना भी
नियत है ! 

लेकिन सपनों से खाली
इन रातों में
थके लड़खड़ाते कदमों से  
खुद को ढूँढ निकालना
और असीम दुलार से
खुद ही को निज बाहों में समेट  
आश्वस्त करना  
मुझे अच्छा लगता है !

साधना वैद  



Wednesday, June 24, 2020

संध्या और चाँद




संध्या के चेहरे पर पड़ा
खूबसूरत सिंदूरी चूनर का
यह झीना सा अवगुंठन
आमंत्रित कर रहा है
प्रियतम चन्द्रमा को कि
वह अपनी स्निग्ध किरणों की
सुकोमल उँगलियों से 
सांध्य सुन्दरी के मुख पर पड़े
घूँघट के इस अवरोध को
हटा दे ,
और अपनी सम्पूर्ण ज्योत्सना
भव्यता और दिव्यता के साथ
विशाल गगन महल के
सुन्दर झरोखे पर आकर
अपनी प्रियतमा को दर्शन दे
प्रतीक्षा के इन विकल पलों की
अवधि को घटा दे ! 

संध्या की सतरंगी चूनर में
टाँकने के लिये लाखों सितारे
चन्द्रमा ने अपने हाथों से
गगन में बिखेर दिये हैं ,
और अनुरक्त प्रियतमा ने
वो सारे सितारे पुलक-पुलक कर
अपनी पलकों से दामन में
समेट लिये हैं ! 

चन्द्रमा की प्रतिदिन घटती बढ़ती
कलाओं के अनुरूप  
संध्या के हृदय में भी
हर्ष और विषाद की मात्रा
नित्य घटती बढ़ती है ,
पूर्णिमा के दिन सर से पाँव तक
सोलह श्रृंगार कर दुल्हन सी
सजी अति उल्लसित संध्या
अमावस्या की रात में
विरहाकुल हो अपने
प्रियतम की प्रतीक्षा में
व्याकुल मलिन मुख  
सारी रात रोती है ! 

संध्या और चन्द्रमा का
आकर्षण और विकर्षण 
अनुराग और वीतराग का 
यह खेल सदियों से 
इसी तरह
चल रहा है ,
सुख के समय में
संयत रहने का और
दुःख के समय में धैर्य
धारण करने का सन्देश
हमें दे रहा है !


चित्र - गूगल से साभार 
साधना वैद  

Thursday, June 18, 2020

एक बाँझ सी प्रतीक्षा


सदियों से प्रतीक्षा में रत
द्वार पर टिकी हुई
उसकी नज़रें
जम सी गयी हैं !
नहीं जानती उन्हें
किसका इंतज़ार है
और क्यों है
बस एक बेचैनी है
जो बर्दाश्त के बाहर है !
एक अकथनीय पीड़ा है
जो किसीके साथ
बाँटी नहीं जा सकती !
रोम रोम में बसी
एक बाँझ विवशता है
जिसका ना कोई निदान है
ना ही कोई समाधान !
बस एक वह है
एक अंतहीन इंतज़ार है
एक अलंघ्य दूरी है
जिसके इस पार वह है
लेकिन उस पार
कोई है या नहीं
वह तो
यह भी नहीं जानती !
वर्षों से इसी तरह
व्यर्थ, निष्फल, निष्प्रयोजन
प्रतीक्षा करते करते
वह स्वयं एक प्रतीक्षा
बन गयी है
एक ऐसी प्रतीक्षा
जिसका कोई प्रतिफल नहीं है !

साधना वैद !

Friday, June 12, 2020

अब तो जागो



कब तक तुम
अपने अस्तित्व को
पिता या भाई
पति या पुत्र
के साँचे में ढालने के लिये
काटती छाँटती
और तराशती रहोगी ?
तुम मोम की गुड़िया तो नहीं !

कब तक तुम
तुम्हारे अपने लिये
औरों के द्वारा लिये गए
फैसलों में
अपने मन की अनुगूँज को
सुनने की नाकाम कोशिश
करती रहोगी ?
तुम गूंगी तो नहीं !

कब तक तुम
औरों की आँखों में
अपने अधूरे सपनों की
परछाइयों को
साकार होता देखने की
असफल और व्यर्थ सी
कोशिश करती रहोगी ?
नींदों पर तुम्हारा भी हक है !

कब तक तुम
औरों के जीवन की
कड़वाहट को कम
करने के लिये
स्वयम् को पानी में घोल
शरबत की तरह
प्रस्तुत करती रहोगी ?
क्या तुम्हारे मन की
सारी कड़वाहट धुल चुकी है ?
तुम कोई शिव तो नहीं !

कब तक तुम
औरों के लिये
अपना खुद का वजूद मिटा
स्वयं को उत्सर्जित करती रहोगी ?

तुम बेड़ियों में जकड़ी 
कोई परतंत्र बंदिनी तो नहीं !

क्यों ऐसा है कि
तुम्हारी कोई आवाज़ नहीं?
तुम्हारी कोई राय नहीं ?
तुम्हारा कोई निर्णय नहीं ?
तुम्हारा कोई सम्मान नहीं ?
तुम्हारा कोई अधिकार नहीं ?
तुम्हारा कोई हमदर्द नहीं ?
तुम्हारा कोई अस्तित्व नहीं ?

अब तो जागो
तुम कोई बेजान गुडिया नहीं
जीती जागती हाड़ माँस की
ईश्वर की बनायी हुई
तुम भी एक रचना हो
इस जीवन को जीने का
तुम्हें भी पूरा हक है !
उसे ढोने की जगह
सच्चे अर्थों में जियो !

अब तो जागो 
तुम भी स्वतंत्र हो 
औरों की ही तरह खुद को 
तलाशने के लिये 
 सँवारने के लिये 
निखारने के लिये
स्थापित करने के लिये !

अब तो जागो
नयी सुबह तुम्हें अपने
आगोश में समेटने के लिये
बाँहे फैलाए खड़ी है !
दैहिक आँखों के साथ-साथ
अपने मन की आँखें भी खोलो !
तुम्हें दिखाई देगा कि
जीवन कितना सुन्दर है !


साधना वैद