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Thursday, December 12, 2019

पूस की रात

चंद हाइकू और ताँका 

ठण्ड की रात
भारी अलाव पर
छाया कोहरा !

सीली लकड़ी
बुझता सा अलाव
जला नसीब !

बर्फ सी रात
फुटपाथ की शैया
मुश्किल जीना !

बर्फीली हवा 
बदन चीर जाये
फटा कम्बल !

पक्के मकान
मुलायम रजाई
पूस की रात !

दीन झोंपड़ी
जीर्ण शीर्ण बिस्तर 
कटे न रात ! 
                           
छाया कोहरा
चाँद तारे समाये
नीली झील में !

पूस की रात
‘हल्कू’ की याद आई
मन पसीजा !
 
चाँद ने पूछा
कौन उघडा पड़ा
सर्द रात में
बोल पड़े सितारे
ये हैं धरतीपुत्र !

करे लड़ाई
दिनकर धूप से
छाया कोहरा !
घर में घुसा रवि
छिपा कर चेहरा !


आज भी ‘हल्कू’
बिताते सड़क पे
ठण्ड की रात
कुछ भी न बदला
स्वतन्त्रता के बाद !


साधना वैद

Wednesday, December 11, 2019

सर्दी की रात




सर्दी की रात 
ठिठका सा कोहरा 
ठिठुरा गात ! 

मंदा अलाव 
कँपकँपाता तन 
झीने से वस्त्र !

तान के सोया 
कोहरे की चादर 
पागल चाँद ! 

काँपे बदन 
उघड़ा तन मन 
खुला गगन  !

चाय का प्याला 
सर्दी की बिसात पे 
बौना सा प्यादा ! 

लायें कहाँ से 
धरती की शैया पे 
गर्म रजाई ! 

ठंडी हवाएं 
सिहरता बदन
बुझा अलाव ! 

चाय की प्याली 
सर्दी के दानव को 
दूर भगाए ! 

दे दे इतना 
जला हुआ अलाव 
गरम चाय ! 

आँसू की बूँदें 
तारों के नयनों से 
झरती रहीं ! 

तारों के आँसू
आँचल में सहेजे 
धरती माता ! 


साधना वैद  

Tuesday, December 10, 2019

मौन का दर्पण - आदरणीया बीना शर्मा जी की नज़र से





मौन का दर्पण’--एक समीक्षा
मेरी बात निश्चित ही एक दिन अवश्य सिद्ध होगी कि साधना जी का लेखन स्त्री जाति के लेखन का प्रतिबिम्ब है. मेरा और उनका परिचय उनके लेखन के प्रथम सोपान से ही है. हर छह माह में उनकी एक नयी पुस्तक आना उनके लेखन की निरंतरता का प्रतिमान है. उनकी लेखनी की नोंक पर सरस्वती आकर बैठ जाती है. बहुत बहुत सोचा मैंने पर नहीं खोज पाई जो विषय उनसे अछूते रहे हों. छोटी से छोटी घटना उनकी निगाहें ताड़ लेती हैं. मुझे उनकी स्मरण शक्ति पर गर्व है.
‘मौन का दर्पण’ कविता संग्रह की रचनाओं को पढ़ते हुए कई बार आँख गीली हुई,दिल में बहुत कुछ बिखरा है, उसे सहेज कर फ़िर पढ़ने की हिम्मत जुटाई. बार बार मन अपने से सवाल करता रहा कि हम स्त्रियाँ इतने ज्वालामुखी के बाद भी शान्त चित्त कैसे रह लेती हैं कैसे सहेज लेती हैं सब कुछ और फ़िर कैसे चल देती हैं नई राह पर. सचमुच साधना जी के पात्र बहुत दुस्साहसी हैं.
इस संकलन की एक और विशेषता कि बारह खड़ी का कोई वर्ण छूटा नहीं जिसे कविता की मुख्य पंक्ति बनने का सौभाग्य न मिला हो. एक एक वर्ण से कई कई कविताएँ. पहले लगा शायद मुझे भ्रम हुआ है दोबारा पढ़ने बैठी तो आश्चर्य जनक सत्य यही था कि अनोखा दर्पण, आराधना,इन्द्रधनुष,उसके हिस्से का आसमान, एक कहानी, ऐसी ही होती है माँ, ओ कालीदास के मेघदूत, किसे सहेजू, खामोशी, गठरी, चल रही हूँ, छलना,जीवन नौका, झूला, तुझे देखा तो जाना, दिल दरिया, नियति, पिता, प्रश्न और रिश्ते, बह जाने दो, मेरा ‘मैं’, रोज़ देते हैं नया इक इम्तहाँ, वितान, शब्द वाण, श्रमिक दिवस, संकल्प, हर सिंगार की अभिलाषा, हरसिंगार सी यादें कितना बडा फ़लक है उनकी रचनाओं का, पूरी की पूरी ज़िन्दगी सिमट आई है.
कुछ पंक्तियाँ दिलो दिमाग पर छा गई हैं.....
ये धनुष की प्रत्यंचा पर चढ़ा कर नहीं, चलते हैं जिह्वा की कमान से.
हौसला
हार कर यूँ बैठना तेरी तो यह आदत नहीं, भूल अपना पन्थ पीछे लौटना फ़ितरत नहीं.
जिस दिन मेरी नज़र में मेरे इस ‘मैं’ का अवमूल्यन हो जायेगा, उस दिन सब समाप्त हो जायेगा.
सच तो यह है कि अब मैंने हर हाल में जीना सीख लिया है.
रोज़ मिट मिट कर सँवर जाते हैं हम.
पिता.. एक ऐसा प्रेम पुंज जिसका प्यार हमारे व्यक्तित्व को दबाता नहीं, विकसित करता है, निखारता है, उभारता है, हमें सम्पूर्ण बनाता है बिलकुल अपनी ही तरह.
बच्चा चाहे कैसा भी हो माँ तो बस होती है माँ. हो कोई भी देश विश्व में ऐसी ही होती है माँ.
और जब एक स्त्री पूछती है उसका खूँटा कहाँ गढ़ा हुआ है यहीं कहीं जमीन में या फ़िर मेरे मन में.
तो सारी कायनात स्तब्ध रह जाती है.
और ये अंतिम पंक्तियाँ तो नारी की सारी शक्ति का ही प्रदर्शन कर देती हैं... स्वार्थ किसी का भी सिद्ध हो रहा हो निमित्त नारी ही बनती है.
जिसके पास हारने के लिए कदाचित कुछ नहीं. जब वह कुपित होती है तो उसका रौद्र रूप देख, देवता भी काँप जाते है समस्त विश्व को भयहीन कर देती है नारी.
ये कविताएँ जीवनी शक्ति हैं जो डूबते को तिनके का सहारा हैं. रचनाकार बहुत बहुत बधाई की पात्र हैं मैं उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना करती हूँ.
प्रोफ़ेसर बीना शर्मा.
कुलसचिव
केन्द्रीय हिंदी संस्थान
आगरा
https://www.amazon.in/…/ref=cm_sw_r_wa_awdo_t1_ly45DbGYRWWEQ
साथियों यह पुस्तक अमेज़न पर उपलब्ध है और यह है इसका लिंक !

साधना वैद 

Friday, December 6, 2019

हालात जो बदले...



हालात जो बदले मयार ए ग़म बदल गया
आयी बहार खिजाँ का मौसम बदल गया !
मन को सुकून आया और ऐतबार हो चला
पल भर में ग़म ओ दर्द का जज़्बा बदल गया !
लोगों के रंज ओ ग़म का फ़साना हुआ ख़तम
हर आम जन और ख़ास का चेहरा बदल गया  !
बदले सभी के फैसले शिकवे गिले मिटे
मन का मलाल पल में खुशी में बदल गया !                 
जो पुलिस थी मक्कार और बेकार, निकम्मी
उसके लिए लोगों का नज़रिया बदल गया !
एन्काउंटर में मर गए चारों वो दरिन्दे
हैवानियत का, दर्द का आलम बदल गया !
चलते रहे नेता जो सियासत के पैंतरे
उनके रुखों से झूठ का चेहरा उतर गया !
जो ‘जानवर’ थे आज तक दुनिया के वास्ते
मरने के बाद ओहदा ‘मानव’ में बदल गया !
जो लड़ रहे हैं 'जानवर' के हक़ के वास्ते
कह दो उन्हें कि उनका ज़माना बदल गया !
वो कहाँ थे उस वक्त जब वो ‘पीड़िता’ जली
न क्यों उसके ‘हक़’ के वास्ते दिल उनका जल गया !  
अब रख रही जनता कदम हर फूँक फूक के
पल में हवा के झोंके से मंज़र बदल गया !
हालात के हाथों सभी मजबूर हैं यहाँ
इन खोखली रवायतों से दिल ही भर गया !

साधना वैद



Tuesday, December 3, 2019

ताशकंद यात्रा – ५ आइये समरकंद चलें


  


ताशकंद की बेहद सुखद और सुन्दर सैर के बाद रात बड़ी सुकून भरी नींद आई ! सोने से पहले अगली सुबह की थोड़ी तैयारी भी कर ली थी मैंने ! यह मेरी आदत में शुमार है ! सुबह के पहनने वाले कपड़े, यात्रा में काम आने वाला सामान, आवश्यक दवाएं और सफ़र में पढ़ने के लिए पत्रिका वगैरह सब मैंने रात को ही सोच समझ कर निकाल कर टेबिल पर रख दिए ! एक छोटे सूटकेस में समरकंद और बुखारा में प्रवास के दौरान आवश्यक सामान रख कर बाकी सारा सामान बड़े सूटकेस में पैक कर दिया जो यहीं पर क्लॉक रूम में छोड़ कर हमें जाना था ! रात की आधा पौन घंटे की मेहनत तो ज़रूर हुई लेकिन हम निश्चिन्त होकर सो सके ताकि सुबह तैयार होकर फ़ौरन निकल सकें ! समरकंद जाने की उत्सुकता ने अलार्म से पहले ही जगा दिया ! जल्दी जल्दी तैयार होकर डाइनिंग रूम में हम पहुँच गए ! इतनी जल्दी कुछ खाने की न तो आदत है ना ही भूख थी सो थोड़ा बहुत कुछ चख कर हम बाहर रिसेप्शन में आ गए जहाँ सामान क्लॉक रूम में रखवाया जा रहा था ! 
हमारे पास बिलकुल लाइट लगेज था यात्रा के लिए ! बस आ चुकी थी और हम सब जल्दी ही उसमें बैठ कर रेलवे स्टेशन की ओर चल पड़े ! इस यात्रा के लिए बड़ी उत्सुकता थी क्योंकि समरकंद हम बुलेट ट्रेन से जाने वाले थे ! और यही वह अवसर था जब हमें वास्तविक उज्बेकिस्तान के दर्शन होने वाले थे ! ताशकंद के बारे में तो यह सोच लिया था कि सन ६६ में आये भूकंप के बाद जब आधे से ज्यादह शहर पूरी तरह से तबाह हो चुका था इस शहर का एक तरह से नव निर्माण हुआ था ! यह उज्बेकिस्तान की राजधानी भी है तो इसका आधुनिक, खूबसूरत और इतना साफ़ सुथरा होना कोई आश्चर्य की बात नहीं ! लेकिन किसी भी देश की असली सूरत देखनी हो तो रेल मार्ग से बढ़ कर कोई और विकल्प नहीं है ! और अब हम उसी यात्रा के लिए सज्ज हो चुके थे !
दिन की रोशनी में ताशकंद का रेलवे स्टेशन बहुत ही भव्य, सुन्दर और साफ़ सुथरा दिखाई दे रहा था ! यहाँ पर आकर हमारे शब्दकोष में एक नए शब्द ‘वोकजाल’ की वृद्धि हुई ! स्टेशन की इमारत पर लिखा हुआ था वोकजाल ताशकंद ! पूछने पर पता चला कि रेलवे स्टेशन को वोकजाल कहते हैं ! प्लेटफार्म पर नीली सफ़ेद बुलेट ट्रेन हमारे सामने ट्रैक पर खड़ी थी ! हमारे गाइड मोहोम्मद ज़ायद ने हमें ट्रेन में बैठने में बहुत सहायता की ! बिलकुल सही वक्त पर सुबह के ठीक सात बजे ट्रेन समरकंद के लिए चल पड़ी ! ट्रेन आशातीत रूप से स्वच्छ और आधुनिक थी ! सीट्स बहुत आरामदेह थीं और लगेज दरवाज़े के पास ही शेल्फ में सहेज कर रख दिया गया था ! बुलेट ट्रेन के नाम से यह सोचा था इसकी रफ़्तार बहुत तेज़ होगी लेकिन ट्रेन सामान्य गति से ही चल रही थी ! बीच में थोड़ा लाईट रिफ्रेशमेंट भी सर्व किया गया ! हमने अपने लिए कॉफ़ी लाने का अनुरोध किया जिसके लिए रेलवे स्टाफ के उस सहायक कर्मचारी ने सर हिला कर अपनी सहमति भी दी लेकिन समरकंद आ गया कॉफ़ी नहीं आई ! पता नहीं भाषा की समस्या की वजह से वह समझा नहीं या ट्रेन में कॉफ़ी सर्व करने की सुविधा नहीं थी !
खिड़की से बाहर दूर तक अनाज, फलों और सब्जियों के खेत पसरे हुए दिखाई दे रहे थे ! एक बात जो मैंने नोटिस की कि उज्बेकिस्तान में देवदार, चीड, चिनार, साइप्रस आदि की तरह ऊपर से नुकीले पेड़ अधिक हैं; नीम, पीपल, बरगद जैसे घने और छायादार वृक्ष बहुत कम हैं ! ताशकंद से समरकंद के बीच ट्रेन कहीं नहीं रुकी ! बीच में छोटे बड़े गाँव कसबे कई आये मैं हैरान थी कहीं भी गन्दगी, कूड़ों के अम्बार, झुग्गी झोंपड़ियों की कतारें, तंगहाली या गरीबी के दर्शन नहीं हुए जो हमारे देश में रेल यात्राओं के अनिवार्य दृश्य होते ही होते हैं ! मकान छोटे थे या बड़े सब साफ़ सुथरे और सलीके के साथ रंगे पुते थे ! कोई भी घर या मकान ऐसा नहीं दिखा जो टूटा फूटा हो और आँखों में खटक जाए ! इस यात्रा ने यह तो स्पष्ट कर दिया कि उज्बेकिस्तान साफ़ सुथरा और संपन्न देश है और यहाँ के लोगों की जीवन शैली सलीकेदार है !
इस यात्रा के दौरान ग्रुप के और सदस्यों के साथ भी जान पहचान और मित्रता प्रगाढ़ होती जा रही थी ! मेरे साथ विद्या सिंह जी, जो देहरादून में एम. के. पी. पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज में हिन्दी की प्रोफ़ेसर हैं, बैठी हुई थीं ! उनके सानिध्य में बहुत ही अच्छा समय बीता ! विविध विषयों पर बहुत बातें हुईं उनसे !
समरकंद आ गया था ! हम लोग ट्रेन से उतर गए थे ! हमारी बस स्टेशन के बाहर खड़ी हुई थी ! बस तक अपने सामान के साथ पैदल ही जाना था ! रास्ते में कई स्पॉट्स फोटोग्राफी के ख़याल से बड़े सुन्दर दिखाई दिए ! ग्रुप के सभी सदस्यों ने अपनी तस्वीरें वहाँ खूब खींचीं ! कुछ ने सेल्फी लीं तो कई लोगों ने एक दूसरे के फ़ोटोज़ पहले अपने कैमरों से और फिर उनके कैमरों से खूब क्लिक कीं ! चलिए हम समरकंद तो पहुँच गए ! हमने तो सारा समरकंद उस एक दिन में ही घूमा था लेकिन आप ज़रूर थक गए होंगे इसलिए यहाँ के पर्यटन स्थलों की सैर आपको कल करवाउँगी ! तब तक आप भी कुछ आराम कर लीजिये और इन तस्वीरों का आनंद उठाइये ! कल की सैर बड़ी रोमांचक होने वाली है ! तो अभी विदा दीजिये मुझे ! मिलती हूँ आपसे जल्दी ही !

साधना वैद


Thursday, November 28, 2019

आये थे तेरे शहर में



आये थे तेरे शहर में मेहमान की तरह,
लौटे हैं तेरे शहर से अनजान की तरह !

सोचा था हर एक फूल से बातें करेंगे हम,
हर फूल था मुझको तेरे हमनाम की तरह !

हर शख्स के चहरे में तुझे ढूँढते थे हम ,
वो हमनवां छिपा था क्यों बेनाम की तरह !

हर रहगुज़र पे चलते रहे इस उम्मीद पे,
यह तो चलेगी साथ में हमराह की तरह !

हर फूल था खामोश, हर एक शख्स अजनबी,
भटका किये हर राह पर गुमनाम की तरह !

अब सोचते हैं क्यों थी तेरी आरजू हमें,
जब तूने भुलाया था बुरे ख्वाब की तरह !

तू खुश रहे अपने फलक में आफताब बन,
हम भी सुकूँ से हैं ज़मीं पे ख़ाक की तरह !

साधना वैद

Thursday, November 21, 2019

टुकड़ा टुकड़ा आसमान




अपने सपनों को नई ऊँचाई देने के लिये
मैंने बड़े जतन से टुकड़ा टुकड़ा आसमान जोड़ा था
तुमने परवान चढ़ने से पहले ही मेरे पंख
क्यों कतर दिये माँ ?
क्या सिर्फ इसलिये कि मैं एक बेटी हूँ ?
  
अपने भविष्य को खूबसूरत रंगों से चित्रित करने के लिये
मैने क़तरा क़तरा रंगों को संचित कर
एक मोहक तस्वीर बनानी चाही थी
तुमने तस्वीर पूरी होने से पहले ही
उसे पोंछ क्यों डाला माँ ?
क्या सिर्फ इसलिये कि मैं एक बेटी हूँ ?

अपने जीवन को सुख सौरभ से सुवासित करने के लिये
मैंने ज़र्रा ज़र्रा ज़मीन जोड़
सुगन्धित सुमनों के बीज बोये थे
तुमने उन्हें अंकुरित होने से पहले ही
समूल उखाड़ कर फेंक क्यों दिया माँ ?
क्या सिर्फ इसलिये कि मैं एक बेटी हूँ ?

अपने नीरस जीवन की शुष्कता को मिटाने के लिये
मैंने बूँद बूँद अमृत जुटा उसे
अभिसिंचित करने की कोशिश की थी
तुमने उस कलश को ही पद प्रहार से
लुढ़का कर गिरा क्यों दिया माँ ?
क्या सिर्फ इसलिये कि मैं एक बेटी हूँ ?

और अगर हूँ भी तो क्या यह दोष मेरा है ?

साधना वैद