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Saturday, December 3, 2016

इम्तहान


अब बस भी कर
ऐ ज़िंदगी !
और कितने इम्तहान
देने होंगे मुझे ?
मेरे सब्र का बाँध
अब टूट चला है !
मुट्ठी में बँधे
सुख के चंद शीतल पल
न जाने कब फिसल कर
हथेलियों को रीता कर गए
पता ही नहीं चला !
बस एक नमी सी ही 
बाकी रह गयी है जो
इस बात का अहसास
करा जाती है कि भले ही
क्षणिक हो लेकिन कभी
कहीं कुछ ऐसा भी था
जीवन में जो मधुर था,
शीतल था, मनभावन था !
वरना अब तो चहुँ ओर
मेरे सुकुमार सपनों और
परवान चढ़ते अरमानों की
प्रचंड चिता की भीषण आग है,
अंगारे हैं, चिंगारियाँ हैं
और है एक
कभी खत्म न होने वाली
जलन, असह्य पीड़ा और
एक अकल्पनीय घुटन
जो हर ओर धुआँ भर जाने से  
मेरी साँसों को घोंट रही है
और जिससे निजात पाना
अब किसी भी हाल में
मुमकिन नहीं !

साधना वैद


Monday, November 28, 2016

हासिल



कितनी बातें थीं कहने को
जो हम कहते तुम सुन लेते
कितनी बातें थी सुनने को
जो तुम कहते हम सुन लेते !

लेकिन कुछ कहने से पहले
घड़ी वक्त की ठहर गयी  
सुनने को आतुर प्राणों की
आस टूट कर बिखर गयी !

बीत गयी वो घड़ी तो देखो
किस्सा ही सब खतम हुआ
खतम हुआ किस्सा तो घुट कर
दो रूहों की मौत हुई ! 

फिरते हैं अब दोनों ही बुत
अपनी-अपनी धुरियों पर  
जैसे कहीं दूर जाने को
सारी वजहें खतम हुईं  

क्यों जीते हैं सपनों में जब
स्वप्न टूट ही जाते हैं
खामखयाली में जीने की
सज़ा यही तजवीज हुई ! 

सपनों में जीने वालों का
एक यही तो हासिल है   
दिन भी बीता रीता-रीता
रात बिलखते बीत गयी !

साधना वैद

Wednesday, November 23, 2016

मुखौटा



मिथ्या बौद्धिकता,
झूठे अहम और छद्म आभिजात्य
के मुखौटे के पीछे छिपा
तुम्हारा लिजलिजा सा चेहरा
मैंने अब पहचान लिया है
और सच मानो
इस कड़वे सत्य को
स्वीकार कर पाना मेरे लिए
जितना दुष्कर है उतना ही
मर्मान्तक भी है !
मुखौटे के आवरण के बिना
इस लिजलिजे से चहरे को
मैंने एक बार
पहले भी देखा था
पर किसी भी तरह उसे
तुम्हारे लोकरंजित
गरिमामय व्यक्तित्व के साथ
जोड़ नहीं पा रही थी
क्योंकि मैं यह विश्वास
कर ही नहीं कर पा रही थी
कि एक चेहरा तुम्हारा
ऐसा भी हो सकता है !
मेरे लिए तो तब तक
तुम्हारा मुखौटे वाला
चेहरा ही सच था न
और शायद इसीलिये खुद को
छल भी पा रही थी कि
यह लिजलिजा सा चेहरा
तुम्हारा नहीं
किसी और का होगा !
लेकिन अब जब
सारी नग्न सच्चाइयाँ
मेरे सामने उजागर हैं
खुद को छलना मुश्किल है !
और उससे भी मुश्किल है
अपनी इस पराजय को
स्वीकार कर पाना
कि जीवन भर मैंने जिसे
बड़े मान सम्मान,
श्रद्धा और आदर के साथ
अपने अंतर्मन के
सर्वोच्च स्थान पर
स्थापित किया
अपना सबसे बड़ा आदर्श
और पथदर्शक माना
वह सिर्फ और सिर्फ
माटी का एक
गिलगिला सा ढेला है
इससे अधिक कुछ भी नहीं ! 


साधना वैद

Saturday, November 19, 2016

तुरुपी चाल





अचूक वार
किये एक तीर से
कई शिकार

फुस्स हो गया
आतंकी कारोबार
कड़ा प्रहार

मन में खोट
बाँटे थे जाली नोट
आतंकी चाल

जनता खुश
काले धन पे गाज
नेता नाराज़

मन में चोर
नेता जी बौखलाएं
हल्ला मचाएं

तुरुपी वार
चित्त एक बार में
सारे मक्कार

मन में आस
सूर्योदय सा भास
मुख पे हास

लम्बी कतार
घंटों का इंतज़ार
सब भूलेंगे
जब मिलेगा न्याय
   खत्म होगा अन्याय ! 




साधना वैद




Wednesday, November 16, 2016

बेरुखी


हर मौसम में हमेशा ही
भरपूर बहार की बेपनाह खूबसूरती
और दिलकश खुशबू से भरे रहने वाले
इस रंगीन बाग़ का रास्ता 
बहार शायद अब भूल गयी है !
मुद्दत हुई इस बाग़ में
अब फूल नहीं खिलते
और सारे फूलदार पौधे
सर झुकाए पशेमान से खड़े हैं
एकदम बेरौनक, वीरान 
और बेहद उदास !
खूबसूरत परिंदों ने अपना बसेरा
शायद किसी और बाग़ में
बना लिया है !
अब सुबह शामें उनकी
ज़िंदगी से भरी चहचहाहट से
गुलज़ार नहीं होतीं ! 
खुशबू की जगह हवाओं में
अब धूल सी उड़ने लगी है
जो आँखों को हमेशा किरकिराहट
और आँसुओं से तर रखती है
कि ये धुँधलाई आँखें
कोई दूसरा दिलनशीं मंज़र देख
कभी मुतासिर हो ही न सकें !
फूल नहीं हैं तो
तितलियों ने भी
बाग़ में आना छोड़ दिया है
और शायद इसीलिये
ज़िंदगी की छोटी-छोटी
खुशियों और खूबसूरती से
रौनक और रंगीनियों से
जीने की ख्वाहिश और जज़्बे से
यह दिल इतना
बेज़ार हो चुका है कि
अब कुछ भी दिल को नहीं छूता !
कहीं इन सबका सबब
तेरी बेरुखी तो नहीं !

साधना वैद