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Tuesday, June 18, 2019

एक पिता की फ़रियाद




हमने भी जिया है जीवन ! मर्यादाओं के साथ ! मूल्यों के साथ ! सीमाओं में रह कर ! अनुशासन के साथ !

जीवन तुम भी जी रहे हो ! लेकिन अपनी शर्तों के साथ ! नितांत निरंकुश होकर ! बिना किसी दखलंदाजी के ! बिलकुल अपने तरीके से !

असहमति तब भी थी ! असंतोष तब भी था ! झुँझलाहट तब भी थी ! विरोध तब भी था ! हर नयी पीढ़ी का अपने से पुरानी पीढ़ी से कुछ न कुछ, कम या ज्यादह मतभेद स्वाभाविक है ! 
हर युग में होता है ! लेकिन हर युग में उसे व्यक्त करने के तरीके बदल जाते हैं !

तब असभ्यता नहीं थी ! उच्श्रन्खलता नहीं थी ! उद्दंडता नहीं थी और निर्लज्जता नहीं थी !

रिश्तों का सम्मान था ! छोटे बड़े का लिहाज़ था ! मर्यादा का मान था ! अनुशासन का ज्ञान था !

विरोध था लेकिन विद्रोह नहीं था ! असहमति थी लेकिन असभ्यता नहीं थी ! असंतोष था लेकिन जोड़ने और जुड़े रहने की भावना प्रबल थी ! गुस्से में यदि कभी मुँह खुल भी गया तो पश्चाताप भी था मानसिक अनुताप भी था ! झुकने से परहेज़ नहीं था ! माफी माँग लेने से कोई गुरेज़ नहीं था !

तुम्हारी छोटी छोटी भूलों और नादान शरारतों पर दूसरों के गुस्से से  
तुम्हें बचाने के लिए हम औरों से लड़ पड़ते थे ! अब औरों की
बड़ी बड़ी गलतियाँ और गुनाह छिपाने के लिए तुम हम से लड़ पड़ते हो !   

तुम्हारी हर छोटी से छोटी फरमाइश को पूरा करने के लिए मैंने लगभग हर रोज़ ओवरटाईम किया ! रोज़ रात को अपनी जेब खाली कर गिनता था कि तुम्हारे मुख की मुस्कान खरीदने के लिए अभी कितने रुपयों की ज़रुरत और है ! हिसाब तुम भी रोज़ लगाते हो कि आज दिन भर में मैंने चाय के कितने कप पिये और कितनी रोटियाँ अधिक बनानी पडीं ताकि गृहस्थी पर पड़े बोझ की चर्चा कर तुम मेरे मुख की मुस्कान छीन सको !

अब युग बदल गया है अब अपनी ही संतान अपने माता पिता से हिसाब माँगती है कि बचपन में उन्होंने अपने बच्चों के लिए क्या किया, कितना किया और जितना किया सिर्फ उतना ही क्यों किया ! माता पिता ने जो किया वह भी कैसे किया यह जानने की शायद उन्हें ज़रुरत ही नहीं !

लेकिन डंके की चोट पर दिन भर सबके सामने यह गाने और जतलाने में उन्हें कोई एतराज़ नहीं कि, भले ही महीने दो महीने ही सही, अपने वृद्ध, बीमार और असहाय माता पिता को ज़िंदा रखने की प्रक्रिया में उन्होंने कितना हाथ पैरों से काम किया और कितना धन व्यय किया !

जिन माता पिता ने जीवन भर संघर्ष कर अपना पेट काट अपनी हर इच्छा को मार बच्चों को सीने से लगा पैरों पर खड़ा कर दिया उनके वे ही दुलारे बच्चे उन्हें घर से बाहर का रास्ता दिखाने में तनिक भी देर नहीं लगाते !

यह कलयुग है भाई यहाँ दूसरों की आँखों के तिनके गिनने के सब अभ्यस्त हैं लेकिन अपनी ही आँखों के शहतीर हटाना या तो उन्हें आता नहीं या वे इसकी ज़रुरत ही नहीं समझते !   


साधना वैद  

Monday, June 17, 2019

जीवन आधारे - वृक्ष हमारे



कितना देते 
फल, फूल, सुगंध 
वृक्ष हमारे ! 

खुश होते हैं 
हिला कर पल्लव 
वृक्ष साथ में ! 

जिलाते हमें 
देकर प्राण वायु 
वृक्ष उदार !

सुन्दर वन 
रखते सदा स्वच्छ 
पर्यावरण ! 

सिर्फ देते हैं 
कुछ नहीं माँगते 
वृक्ष हमसे ! 

ऊँची डालियाँ 
धूप छाहीं जालियाँ
मोहक रूप ! 

घर का वैद्य
तुलसी का बिरवा
रोगनाशक ! 

केले का पेड़ 
हर रूप में भोज्य 
स्वाद का पुंज ! 

तने से बँधे 
वटसावित्री  पर 
आस्था के धागे ! 

शोभित वृक्ष 
धरा के बदन पर 
आभूषण से ! 

सुदृढ़ वृक्ष 
कमनीय लताएँ 
गाते विहग ! 

शीतल छाँह 
पल्लवों के चँवर
पेड़ों की भेंट ! 

साजिन्दे वृक्ष 
गीत गाती पवन 
मगन धरा ! 

फुदकते हैं 
तरु डालियों पर 
नन्हे परिंदे ! 

झूले की पींगें 
कजरी के अलाप 
नीम का पेड़ ! 

आम  का पेड़ 
खट्टी मीठी कैरियाँ 
यादों का घर ! 

वृक्षों  के जैसा 
दूजा परोपकारी 
कहाँ मिलेगा ! 

वृक्ष जागते 
जगत जब सोता 
बन प्रहरी !

रक्षा वृक्षों की 
कर्तव्य हमारा 
मानना होगा ! 

प्रण लेते हैं 
कटने नहीं देंगे 
एक भी पेड़ !




साधना वैद

Saturday, June 15, 2019

पिता

पितृ दिवस की आप सभीको हार्दिक शुभकामनायें ! 



पिता
एक ऐसा जुझारू व्यक्तित्व
जिसने चुनौतियों से
कभी हार न मानी
हर मुश्किल घड़ी में
वह और मज़बूत होकर निखरा
हर विपदा को अपने ध्रुव इरादों से
जिसने चूर चूर करने की ठानी !

पिता
एक ऐसा सहृदय इंसान
जिसने अपनी कोमल भावनाओं को
हमेशा सीप की तरह
एक कठोर आवरण में छिपा कर रखा
जो अपने बच्चों के लिये
कभी गुरू बना तो
कभी बंधु और कभी सखा !

पिता
एक ऐसा सम्पूर्ण व्यक्तित्व
जिसने अकेले ही अपने बलिष्ठ कन्धों पर
गृहस्थी का जुआ रखा
अपनी मेहनत, अपनी लगन
और अपने समर्पण से
हर अनुकूल और प्रतिकूल मौसम में
इतनी फसल उगाई कि
अपने घर परिवार, नाते रिश्तेदार के अलावा
किसी भी अतिथि किसी भी साधू को  
कभी भूखा न रखा !

पिता
एक ऐसा ज्योतिपुन्ज
जिसका प्रकाश चौंधियाता नहीं
राह दिखाता है,
एक ऐसा शक्तिपुंज
जिसकी ताकत आतंकित नहीं करती
हमारी क्षमता को बढ़ाती है,
एक ऐसा प्रेमपुन्ज
जिसका प्यार हमारे व्यक्तित्व को
दबाता नहीं
विकसित करता है
निखारता है, उभारता है, 
हमें सम्पूर्ण बनाता है
बिलकुल अपनी ही तरह !


साधना वैद


Thursday, June 13, 2019

हारती संवेदना


क्या करोगे विश्व सारा जीत कर

हारती जब जा रही संवेदना ! 


शब्द सारे खोखले से हो गये ,

गीत मधुरिम मौन होकर सो गये ,

नैन सूखे ही रहे सुन कर व्यथा ,

शुष्क होती जा रही संवेदना ! 


हृदय का मरुथल सुलगता ही रहा ,

अहम् का जंगल पनपता ही रहा ,

दर्प के सागर में मृदुता खो गयी ,

तिक्त होती जा रही संवेदना ! 


आत्मगौरव की डगर पर चल पड़े ,

आत्मश्लाघा के शिखर पर जा चढ़े ,

आत्मचिन्तन से सदा बचते रहे ,

रिक्त होती जा रही संवेदना !


भाव कोमल कंठ में ही घुट गये ,

मधुर स्वर कड़वे स्वरों से लुट गये ,

है अचंभित सिहरती इंसानियत ,

क्षुब्ध होती जा रही संवेदना ! 


कौन सत् के रास्ते पर है चला ,

कौन समझे पीर दुखियों की भला ,

हैं सभी बस स्वार्थ सिद्धि में मगन ,

सुन्न होती जा रही संवेदना !





साधना वैद

Wednesday, June 12, 2019

जीवन चक्र


शहर की सुन्दर सी कॉलोनी में मलिक साहेब की बड़ी सी कोठी थी और उस कोठी में अमलतास का एक बहुत बड़ा हरा भरा और सुन्दर सा पेड़ था ! उस पेड़ पर एक प्यारी सी बया रहती थी ! बया रानी दिन भर मेहनत करती ! अमलतास के पेड़ पर अपना खूबसूरत घरौंदा बनाने के लिये अनगिनत घास पत्ते और तिनकों में से चुन-चुन कर सबसे बेहतरीन तिनके वह बटोर कर लाती ! अंदर से उसे इतना मुलायम, चिकना और आरामदेह बना देती कि उसके सुकुमार अण्डों को कोई नुक्सान न पहुँचे और उसके नन्हे-नन्हे चूज़े एकदम सुरक्षित माहौल में इस संसार में अपनी आँखें खोल सकें ! कड़ी मेहनत से बनाया हुआ उसका घोंसला लगभग तैयार हो चुका था ! आज वह आख़िरी चंद तिनके अपनी चोंच में दबा कर लाई थी कि अपने घोंसले को अंतिम रूप दे सके ! संध्या के समय श्रांत क्लांत जब वह अमलतास तक आई तो उसके दुःख का कोई पारावार न था ! दुष्ट बन्दर ने उसका मेहनत से बनाया हुआ खूबसूरत घोंसला तिनका-तिनका बिखेर कर ज़मीन पर फेंक दिया था ! 

सारी रात बया दुःख में डूबी रही लेकिन सुबह होते-होते उसने किसी तरह सब्र कर लिया ! जीवन गीत गुनगुनाते हुए अगले दिन से नीड़ के निर्माण के लिये तिनके जोड़ने का बया का सिलसिला एक बार फिर नये सिरे से आरम्भ हुआ ! कमर कस कर बया ने फिर से तिनके बटोरना शुरू किये और एक बार फिर कड़ी मेहनत कर अपना घोंसला दोबारा तैयार कर लिया ! लेकिन कहते हैं ना – ‘अपने मन कछु और है कर्ता के कछु और !’ इस बार घर के मालिक मलिक साहेब ने पेड़ को सुन्दर आकार देने के लिये कुछ डालियाँ कटवा दीं और उन डालियों के साथ बया का घोंसला भी कूड़े के ढेर पर पहुँच गया ! 

इस बार बया ने अमलतास के सघन हिस्से में अपना घोंसला बनाने का निश्चय किया ताकि उसे कोई देख न पाए और वह अपने अंडे उस घोंसले में निश्चिन्त होकर दे सके ! रोज़ चहचहाते गीत गुनगुनाते वह फिर से नये जोश के साथ घोंसला बनाने में जुट गयी ! ईश्वर का धन्यवाद कि इस बार उसका घोंसला भी ठीक से बन गया और उसके अंडे भी उसमें सुरक्षित बच गये ! अब बया को नयी चुनौती का सामना करना था ! उसे अपने चूजों की रक्षा कौओं, बिल्ली, बन्दर और चील से करनी थी ! उसे रोज़ उनके लिये दाना खोज कर लाना होता था और उन्हें सबकी नज़र से बचा कर धीरे-धीरे उड़ना भी सिखाना होता था ! बया दिन भर मेहनत करती ! कभी बच्चों की चोंच में दाना डाल उन्हें खाना खिलाती ! कभी दुष्ट कौए और चील को घोंसले के करीब आते देख खदेड़ कर भगाती तो कभी बन्दर और बिल्ली से पंगा लेकर अपने बच्चों की हिफाज़त करती ! लेकिन सुबह शाम बहुत तल्लीन होकर वह अपना जीवन गीत ज़रूर गाती और अपने बच्चों को भी खूब दुलारती !

बच्चे अब बड़े हो गये थे ! बया रानी रोज़ की तरह अपने बच्चों के लिये दाना लाने गयी थी ! शाम को जब वह अपने घर लौटी तो घोंसला खाली था ! उसके सारे बच्चे उड़ गये थे अपने हिस्से का आसमान ढूँढने के लिये ! बया हतप्रभ थी, उदास थी, दुखी थी और बिलकुल अकेली थी ! आशंका थी इस बार बया यह सदमा झेल नहीं पायेगी लेकिन अगली सुबह उसके घरौंदे से रोज़ की तरह फिर से उसी मीठी आवाज़ में जीवन गीत की मधुर ध्वनि सुनाई दे रही थी ! 

जितनी सहजता से निस्पृह होकर ये पंछी अपने इस जीवन चक्र को आत्मसात कर लेते हैं हम मानव क्यों नहीं कर पाते ?


साधना वैद

Friday, June 7, 2019

लम्हा भर रोशनी




आँखों पर कस कर
हालात की काली पट्टी बाँध
जिन्दगी ने
घुप अँधेरे में
अनजानी अनचीन्ही राहों पर
जब अनायास ही
धकेल दिया था
तब मन बहुत घबराया था !
व्याकुल विह्वल होकर 
सहारे के लिए
मैंने कितनी बार पुकारा था,
लेकिन मेरी
हर पुकार अनुत्तरित ही
रह जाती थी !
अवलम्ब के लिये
आस पास कोई दीवार,
कोई लाठी ,
कोई सहारा भी ढूँढ
नहीं पाती थी !
हृदय की आकुलता का
शमन करने के लिए
आश्वस्त करता  
कोई मृदुल हाथ
अपने माथे पर रखा
नहीं पाती थी !
निर्जन नीरव शून्य में फ़ैली
निरुपाय बाँहों को
किन्हीं चिर परिचित उँगलियों का
जाना पहचाना
स्पर्श नहीं मिलता था !
कैसे आगे बढूँ,
कहाँ जाऊँ
किस दिशा में कदम उठाऊँ
कोई भी तो नहीं था
जो रास्ता बता देता !
हार कर खुद ही उठ कर
अपनी राह बनाने के लिये
स्वयं को तैयार किया !
गिरते पड़ते
ठोकर खाते
कितनी दूर चली आई हूँ
नहीं जानती !
लेकिन कुछ समय के बाद
ये अँधेरे ही
अपने से लगने लगे थे!
पैरों की उँगलियों से
टटोल कर नुकीले पत्थर
और काँटों की पहचान
कर लेना भी सीख लिया था !
हवाओं के खामोश
इशारों की फितरत भी
समझ में आने लगी थी !
और फिर धीरे-धीरे
मुझे इन अंधेरों की
आदत पड़ गयी 
ये अँधेरे मेरे एकाकी 
व्यक्तित्व का 
अविभाज्य अंग बन गये !
अँधेरे के बिस्तर पर 
अँधेरे की चादर ओढ़ 
खामोशी से आँख बंद कर 
लेटे रहने में
बड़ा सुकून सा मिलता था !
युग युगांतर के बाद
मेरी आँखों से
आज जब यह पट्टी उतरी है
मुझे इस घनघोर तिमिर में
एक जुगनू की
लम्हा भर रोशनी भी
हज़ार सूरजों की ब्रह्माण्ड भर
रोशनी से कहीं अधिक
चौंधिया गयी है
और मैं चकित हूँ 
कि आज इस रोशनी में 
मुझे कुछ भी
दिखाई क्यों 
नहीं दे रहा है !!

साधना वैद    

Tuesday, June 4, 2019

बोझ




“ देख कितने अच्छे लग रहे हैं दोनों ! स्कूल जा रहे हैं पढ़ने को !”

कूड़े में से बेचने लायक काम का सामान बीन कर इकट्ठा करना निमली और उसके छोटे भाई सुजान का रोज़ का काम है ! इसे बेच कर जो थोड़े बहुत पैसे घर में आ जाते हैं उनसे माँ कभी-कभी उन्हें मीठी गोली भी दिला देती है ! गोली के लालच में इस वक्त वही बटोरने के लिए बड़े-बड़े बोरे कंधे पर लटकाए दोनों डम्पिंग ग्राउंड की ओर जा रहे थे ! हठात् सामने से आते स्कूल जाने वाले सौरभ और कनिका पर नज़र पड़ी तो निमली के मन के उद्गार फूट पड़े !

उनकी चमचमाती ड्रेस और जूते देख सुजान की आँखों में भी हसरत भरी प्रशंसा के भाव थे ! फिर भी वह बोला -

“हाँ री निमली, देख ना उनकी पीठ पर भी बोझा है ! कैसे हैरान परेशान से दिखते हैं दोनों !”

“चल पागल, उनकी पीठ पर जो बोझा है वह है किताबों का और हमारी पीठ पर जो बोझा है वो है कूड़ कबाड़ का !”

दोनों की आँखों में पल भर को उदासी तैर गयी !

अचानक सुजान के मन में बिजली सी कौंध गयी ! वह चहक कर बोला,

“निमली, कितना अच्छा हो जो हम लोग अपना बोझा इनसे बदल लें ! मैं तो खुशी-खुशी उनका बस्ता उठा लूँगा ! और तू ?”

“चल पूछ कर देखें ! मेरे पास कल वाली गोलियां भी हैं ! वो भी दे देंगे !” सुजान का उत्साह देखते बनता था ! उसकी आँखों में सुन्दर तस्वीरों वाली चिकनी किताबें घूम रही थीं जो एक बार उसे रद्दी के ढेर में मिली थीं और जिन्हें उसने अभी तक अपने पास सम्हाल कर रख लिया है !

निमली उसे रोक पाती उससे पहले ही वह दौड़ कर सौरभ के पास चला गया ! निकर की जेब से मीठी गोलियाँ निकाल उसने सौरभ के आगे अपनी हथेली फैला दी !

“ खाओगे ?”

अपने सामने मैले कुचैले कपड़ों में खड़े सुजान को देख सौरभ चौंक गया !

“नहीं ! हटो सामने से हमें देर हो रही है !” वह झल्ला कर बोला !

“ले लो ना ! हम तुम्हारा भारी बोझा भी अपने हलके बोझे से बदल लेंगे !”

सुजान ने चतुराई से बात आगे बढ़ाई !

“क्या कहा तुमने ? हमारे बोझे से तुम अपना बोझा बदलना चाहते हो ?”

सौरभ के चहरे पर हैरानी झलक रही थी !

“पागल तो नहीं हो तुम ? यह बोझा नहीं है जो हमारी पीठ पर है ! इन किताबों में दुनिया भर की ज्ञान की बातें हैं जिन्हें पढ़ कर इंसान बड़ा आदमी बनता है ! अच्छे अच्छे काम करता है ! डॉक्टर इंजीनियर, वैज्ञानिक, अध्यापक, कलाकार बनता है ! तुमको भी पढ़ना चाहिए ! तुम्हारे पास बोरे में सिर्फ कूड़ा और गन्दगी है ! इसे फेंक दो ! अगर तुम पढ़ना चाहते हो हमारे साथ चलो ! हम अपने टीचर से तुम्हें मिलवा देंगे ! वो ज़रूर तुम्हारा एडमीशन किसी स्कूल में करवा देंगे !” सौरभ ने उसे समझाने की कोशिश की !

निमली सुजान का हाथ पकड़ उसे दूर खींच ले गयी, “जल्दी चल ! देर हो जायेगी तो माँ मारेगी ! उसे चौका बासन करने जाना है !”

सौरभ की बातें सुजान के मन में हलचल मचा रही थीं ! उसे भी स्कूल जाना है, किताबें पढ़ कर बड़ा आदमी बनना है ! मगर कैसे ? कंधे के बोझ से कहीं अधिक भारी बोझ इस समय उसके मन पर सवार था !



साधना वैद