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Wednesday, May 23, 2018

सियासी खेल



ख़तम हुआ 
हार जीत का खेल 
जनता क्षुब्ध


काबिज़ हुए 
जनता के नकारे 
सत्ता पे नेता


जिसे जिताया 
नेताओं की चालों ने 
उसे हराया


कैसे मनाये 
छली गयी जनता 
जीत का जश्न


बनाया गया 
बेवकूफ फिर से 
आम आदमी 


उड़ा मखौल 
लोकतंत्री मूल्यों का 
हारी जनता 


कुर्सी पे कौन 
कैसा था जनादेश 
कैसा है न्याय 


गढ़ें नियम 
रोकेंं दल बदल 
निभायें निष्ठा  


बंद हो चक्र 
ये मौकापरस्ती का  
बचे जनता 


ना खेल पाये
संविद सरकार 
सियासी खेल 



साधना वैद 
















Friday, May 18, 2018

भूमिजा हूँ मैं



आओ ना ! 
ठिठक क्यों गए ? 
चलाओ कुल्हाड़ी ! 
करो प्रहार !
सनातन काल से ही तो 
झेलती आई हूँ मैं 
अपने तन मन पर 
तुम्हारे सैकड़ों वार ! 
भय नहीं है मुझे तुम्हारा 
तुम्हारे इस आतंक के साये में ही तो 
गुज़ारा है मैंने अपना जीवन सारा ! 
तुम क्या बिगाड़ लोगे मेरा !
अदम्य हूँ मैं !
मिटाना चाहते हो मुझे ? 
मिटाओ, अपराजेय हूँ मैं  !
जानते भी हो मुझे ? 
भूमिजा हूँ मैं 
तुम एक भुजा काटोगे मेरी 
मैं सहस्त्र भुजाओं से लुटाऊँगी
मोक्षदा हूँ मैं ! 
तुम मेरी जड़ों पर एक जगह 
कुल्हाड़ी चलाओगे 
हवाओं के साथ मेरे बीज 
दिग्दिगंत तक उड़ जायेंगे 
तुम काट कर मुझे धरा पर लिटा दोगे
हज़ारों वृक्ष हज़ारों एकड़ में 
मेरे समरूप उग जायेंगे ! 
ये अबोध बालक प्यार करते हैं मुझे 
मेरी शीतल छाया में 
बीतता है दिन इनका !
मेरे मधुर रसीले फल और 
मेरी शाखों पर पड़े झूले हैं 
सबसे बड़ा मनोरंजन इनका ! 
लेकिन इन सबसे तुम्हारा क्या वास्ता ? 
जानती हूँ फिरा दोगे
तुम इनका भी दिमाग 
पढ़ा दोगे इन्हें भी हानि लाभ की पट्टी
और लगा दोगे इनके मासूम सपनों 
और भोले संसार में भौतिकता की आग ! 
कर लो जो करना है तुम्हे
स्वीकार है मुझे तुम्हारी हर चुनौती !
युग युग सही है मैंने यह पीड़ा 
कदम कदम पर झेली है ऐसी हर पनौती  ! 
नारी हूँ मैं 
पर अबला नहीं 
जान लो मुझे 
दुश्मन पर
जो पड़ जाये भारी 
वो बला हूँ मैं ! 


साधना वैद  



Friday, May 11, 2018

ख़्वाबों की पोटली



रात कस कर गाँठ लगी
अपने ख़्वाबों की पोटली को
बड़े जतन से एक बार फिर
मैंने खोला है !
कभी मैंने ही अपने हाथों से
इसे कस के गाँठ लगा
संदूक में सबसे नीचे
डाल दिया था कि आगे
फिर कभी यह मेरे हाथ न आये !
शायद डर लगा होगा
नन्हें, सुकुमार, सलोने सपने
पोटली से बाहर खिसक
मेरी आँखों के सूने दरीचों में
टहलने के लिये ना चले आयें !
और नींदों से खाली
मेरी जागी आँखों में
इन सपनों की उंगलियाँ थाम
व्योम के पार कहीं उस
सतरंगी दुनिया के
इन्द्रधनुषी आकाश में
विचरण करने की साध
एक बार फिर से
जागृत ना हो जाये
जिसे बहुत पहले मैंने
अपने ही हाथों से अपने
मन के किसी कोने में
बहुत गहराई से दबा दिया था !
लेकिन कल रात
संदूक के तल से मुझे
किसीके दबे घुटे रुदन की
आवाज़ सुनाई दे रही थी ,
वो मेरे सपने ही थे जो
वर्षों से पोटली में निरुद्ध  
प्राणवायु के अभाव में
अब मुक्त होने के लिये
जी जान से छटपटा रहे थे
और शुद्ध हवा की एक साँस
के लिये मेरे अंतर का द्वार
खटखटा कर मेरे सोये हुए
स्वत्व को जगा रहे थे !
मेरे सपनों की इस पोटली में
प्यार के इज़हार के नाम पर 
 एक सुर्ख गुलाब की वो चंद 
सूखी बिखरी पाँखुरियाँ थीं 
जो तुम तक कभी पहुँच ही न पाईं
और थे चंद आधे अधूरे ख़त 
जिन्हें तुमने कभी पढ़ा ही नहीं !
पोटली में और था 
एक नशाएक इंतज़ार
 एक हताशा एक खुमार  
और थी वफ़ा के नाम पर एक कसक
अपने प्यार के यूँ सरेआम 
रुसवा हो जाने की तीखी कसक 
और था एक बड़ा शदीद सा दर्द 
जो मेरी इन सारी कोशिशों के
यूँ तमाम हो जाने से उपजा था !  
इनकी पुकार मैं अनसुनी
नहीं कर सकी और मैंने
पोटली खोल उन सपनों को
कल मुक्त कर दिया  
अनन्त आकाश में उड़ने के लिये,
जी भर कर ताज़ी हवा में
साँस लेने के लिये और
कभी चुपके से
मेरी आँखों के दरीचों में आ
हौले से मेरी पलकों को सहला
मेरे नींदों में इन्द्रधनुषी रंग
भरने के लिये ! 
कहो, ठीक किया ना मैंने ! 

साधना वैद



Thursday, May 3, 2018

एक बाँझ सी प्रतीक्षा




सदियों से प्रतीक्षा में रत
द्वार पर टिकी हुई
उसकी नज़रें
जम सी गयी हैं !
नहीं जानती उन्हें
किसका इंतज़ार है
और क्यों है
बस एक बेचैनी है
जो बर्दाश्त के बाहर है !
एक अकथनीय पीड़ा है
जो किसीके साथ
बाँटी नहीं जा सकती !
रोम रोम में बसी
एक बाँझ विवशता है
जिसका ना कोई निदान है
ना ही कोई समाधान !
बस एक वह है
एक अंतहीन इंतज़ार है
एक अलंघ्य दूरी है
जिसके इस पार वह है
लेकिन उस पार
कोई है या नहीं 
वह तो
यह भी नहीं जानती !
वर्षों से इसी तरह
व्यर्थ, निष्फल, निष्प्रयोजन
प्रतीक्षा करते करते
वह स्वयं एक प्रतीक्षा
बन गयी है
एक ऐसी प्रतीक्षा
जिसका कोई प्रतिफल नहीं है !


साधना वैद !

Monday, April 30, 2018

नभ के चंदा



आसमान में
झिलमिल करता
चमका चन्दा

तारों के संग
दूर क्षितिज तक
दमका चन्दा

शीतल चंदा
गगन से उतरी
अमृत धारा

प्लावित होता
तृषित अवनि का
अंतर सारा

विहँँस उठा
सम्पूर्ण प्रकृति का
हरेक छौना

दमक उठा
सम्पूर्ण जगति का
हरेक कोना

झूम उठी है
धरा मुदित मन
इठलाई सी

शुभ्र वस्त्र में
नख से शिख तक
इतराई सी

माना तुमको
प्रियतम इसने
नभ के चन्दा

मिले कभी ना
बेहतर इससे
तुमको चन्दा



साधना वैद










Friday, April 27, 2018

मेरा वजूद


ढूँढती आ रही हूँ
बचपन से अपने वजूद को
ज़िन्दगी के हर कोने में झाँक आई
लेकिन अभी तक वो जगह नहीं मिली
जहाँ मैं अपने आप से
दो घड़ी के लिए ही सही
कभी मिल पाती !

बचपन में माँ की लोरियों में
ममता भरी थपकियों में
प्यार भरी मनुहारों में ढूँढा खुद को
बहुत कुछ मिला वहाँ
लेकिन मैं कहाँ थी !  
बाबूजी की अनुशासन में पगी हिदायतों में
भैया की संरक्षणात्मक वर्जनाओं में
दीदी की दुलार भरी झिड़कियों में भी
बहुत खोजा अपने वजूद को
लेकिन वहाँ भी चाबी से चलने वाली
एक खूबसूरत गुड़िया ही दिखी बस !
मैं कहाँ थी !

विवाहोपरांत जब बाहर निकली
उस विराट वटवृक्ष की छाया से
तो मन में अटूट विश्वास था कि
अपने अस्तित्व को अब तो मैं
ज़रूर पा सकूंगी लेकिन
गृहस्थी की शतरंज की बिसात पर
मेरी हैसियत उस अदना से प्यादे की थी
जिसके कर्तव्य तो अनंत होते हैं
लेकिन अधिकार अत्यंत सीमित !
परिवार के हर सदस्य की सुख सुविधा,
आवश्यकता, इच्छा की पूर्ति करते हुए
चलती रही दिन रात इधर से उधर 
शतरंज के चौंसठ खानों में और  
ढूँढती रही अपने टूटे सपनों की किरचों 
और धज्जी हुए अरमानों के रेशों में 
अपने खोये हुए अस्तित्व को 
लेकिन कहाँ पा सकी उसे वहाँ भी !

जीवनसाथी के
कभी मृदुल तो कभी कठोर
कभी मधुर तो कभी तिक्त
आदेशों के अनुपालन में 
तो कभी उनके चुने हुए मार्ग पर
एक आदर्श जीवनसंगिनी की तरह  
उनका अनुगमन करते रहने में  
सारा जीवन यूँ ही बीत गया  
लेकिन मेरा अस्तित्व, 
वह कहाँ मिला मुझे ?
जिससे भेंट हुई वह तो बस
एक जीती जागती
कठपुतली मात्र थी !
 
अब वृद्धाश्रम के निर्जन निसंग कोने में
धुँधलाती दृष्टि से अपनों की राह तकती
और काँपते हाथों से माला फेरती
इस बेआस जर्जर काया में
मैं अपना अस्तित्व ढूँढने का
प्रयास कर रही हूँ तो मेरे हाथ
यहाँ भी निराशा ही लगनी है !
क्योंकि बुझी आग पर भी कभी
रसोई पका करती है !


साधना वैद


  

Tuesday, April 24, 2018

तब और अब






तब भी कहीं ठहरी थी ज़िंदगी
कहीं रुक के मैंने भी
छाँह तलाशी थी !
तब हवाओं में खुशबू थी
गुलों में ताज़गी थी
मन में आशा थी
नैनों में सुनहरे सपने थे
कंठ में मुखरित होने को बेचैन
न जाने कितने मधुर
गाये अनगाये गीत ठहरे थे !
जाने कैसा विश्वास था
मैं पुकारूंगी तुम्हें और
तुम किसी देवपुरुष की भाँति
अनायास ही मेरे सामने
तुरंत ही प्रकट हो जाओगे
और आनन् फानन में
मेरी हर इच्छा पूरी कर दोगे !
ठहरी तो अभी भी है ज़िंदगी
जीवन की शाम भी ढल चुकी है !
और ज़िंदगी का पहिया भी
अब जाम हो चुका है !
ना कहीं हवाओं में खुशबू है
ना मुरझाये फूलों में कोई
ताज़गी ही बची है !
मन आस निरास की
आँख मिचौली से अब जैसे
बिलकुल विरक्त हो चला है !
नैनों के सपने
साकार होने से पहले ही
टूट चुके हैं !
कंठ में अवरुद्ध गीत वहीं
घुट कर खामोश हो गए हैं !
और विश्वास ?
तुमसे मिलने के बाद
इस शब्द की परिभाषा, मायने,
सन्दर्भ, प्रसंग सब बदल चुके हैं !
अब बस जीवन में जो कुछ
शेष रह गया है
वह एक प्रतीक्षा ही है
चिरंतन लक्ष्य तक 
पहुँचने की प्रतीक्षा
आतुर प्रतीक्षा 
कब...कैसे...और...किस दिन...!


चित्र -- गूगल से साभार 


साधना वैद