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Monday, January 16, 2017

जीवन



लिया जनम

मिला माँ का आँचल

पिता की छाया

जानी दुनिया

जीवन की गतियाँ

जग की माया


स्कूल कॉलेज

खेल कूद पढ़ाई

हो गए बड़े

पता न चला

कब अपने पैरों 

हो गए खड़े


हुआ विवाह

बंध गया बंधन

सुखी संसार

जाने कर्तव्य

जाने जग बंधन

हर्ष अपार


स्वीकार की है

जीवन की चुनौती

पूरे मन से

लड़ेंगे हम

जीवन संघर्ष में

पूरे दम से


बीत जायेंगे

जीवन के संकट

धैर्य के साथ 

जीत जायेंगे

जीवन की ये बाज़ी 

तुम्हारे साथ


धूप या छाँव

जीवन की राहों पे

थके हैं पाँव

ढूँढ ही लेंगे

जीवन छलकाता

प्यारा सा गाँव


बिछी हुई है

जीवन शतरंज

मोहरे हम

जन्म मरण

शाश्वत है नियम

जीवन क्रम


कितनी शांत

कितनी मनोहर

जीवन संध्या

कटने को है

जीवन की पतंग

साँसों की संख्या


निरुद्वेग है

विराम की प्रतीक्षा

आया विमान

जिया जीवन

अब तो करना है

महा प्रस्थान


साधना वैद












Friday, January 13, 2017

दुश्चिंता


ज़िंदगी के टेढ़े मेढ़े रास्तों पर

अब तक चलती आई हूँ

तुम्हारा हाथ थामे !

कभी हाथों में संचित

चंद पाँखुरियाँ बिछा कर

तुम्हारे पैरों को कंकड़ों की

चुभन से बचाने के लिए
   
उम्र खत्म हुई जाती है

लेकिन राह की दुश्वारियाँ

कभी नीचे झुक कर

यथा शक्ति राह में बिछे

कंकड़ पत्थरों को बीन कर

तुम्हारी राह को सुगम

बनाने के लिए !

ज़रा भी कम होतीं

नज़र नहीं आतीं !

समय के साथ

मेरी क्षमता और सामर्थ्य

दोनों अब चुकी जाती हैं !

तुम्हारे ही शब्दों में

अद्भुत इच्छाशक्ति

अदम्य साहस और

अनिर्वचनीय उत्साह का

तुम्हारा यह ‘शक्तिपुंज’

अब बिलकुल रीत चुका है !

तुम समझ रहे हो ना ?

अब आगे का सफर तुम्हें

अकेले ही तय करना होगा !

इस सफर में तुम

सम्हाल तो लोगे ना

खुद को भी और

जब तक मैं हूँ

मुझे भी ?



साधना वैद

Sunday, January 8, 2017

प्रेम


प्रेम का धागा

विश्वास के मनके

रिश्तों की माला


प्रेम के गीत

अधरों पे थिरके

फैला सौहार्द्र



प्रेम की वर्षा

नाचे मन मयूर

भीगा जीवन



प्रेम हो ऐसा 

जैसे चाँद चकोर

मन विभोर



प्रेम हो ऐसा

जैसे अम्बर धरा

खालिस खरा



प्रेम हो नैया

विश्वास पतवार

तुम्हारा साथ



अनन्य प्रेम 

उर में छिपा जैसे 

सीप में मोती



प्रेम का दीप

आलोकित करता

जीवन पथ



भीग गयी मैं 
  
नख से शिख तक

प्रेम रंग में



प्रेम की नदी

नफरत की पौध

बहा ले चली



साधना वैद





Wednesday, January 4, 2017

राजनीति का खेल




बाप रहा ना बाप सा, पूत रहा ना पूत

पाँसे दोनों चल रहे, बिछी हुई है द्यूत !


राजनीति के खेल में, रिश्तों का क्या काम

पापा चाचा बैठ घर, भजें राम का नाम !


सत्ता छूटे ना छुटे, समझो ना यह बात

जो आओगे बीच में, पड़ जायेगी लात !


कुर्सी से इस मोह का, सीखा तुमसे पाठ

मैं बैठा इस पर रहूँ, तुम पकड़ो अब खाट !


अवसरवादी हैं यहाँ, राजनीति में लोग

सब हैं चखना चाहते, सत्ता का सुख भोग !


कौन तुम्हारा मित्र है, याद किसे उपकार

अब सब उसके साथ हैं, जिसकी है सरकार !


सत्ता का यह रूप भी, है कितना बलवान

उगते सूरज को सभी, करते मिले प्रणाम !


साधना वैद 


चित्र - गूगल के सौजन्य से 

Friday, December 30, 2016

मुदित मन से आ रहा नव वर्ष है



हास है, उल्लास है, उत्कर्ष है
मुदित मन से आ रहा नव वर्ष है !

हो रहा है अवतरण नव वर्ष का
और है अवसान बीते साल का
प्रफुल्लित कण-कण प्रकृति का हर्ष से
पर्व अनुपम है सकल संसार का ! 

दर्द दुःख की कालिमा से मुक्त हो
उदित हो सूरज क्षितिज के भाल पे
उल्लसित हो थिरकने वसुधा लगे
मुग्ध हो संसृति प्रकृति की चाल पे !

बह चले गंगा पराई पीर से
पिघलता हो मन किसी बदहाल पे
जंग और आतंक की बातें न हों  
शुभाशंसा हो लिखी हर भाल पे !

शुद्ध हो मन आचरण भी शुद्ध हो
प्रेम और करुणा से अंतस हो भरा
रख सकूँ मरहम किसी के ज़ख्म पर
कोटि सुख पर दर्द को मैंने वरा !

है हरा हर ज़ख्म जो सौगात में
साल बीता दे गया धर थाल में
कब तलक रोते रहेंगे हम उन्हें
हमें तो जीना ही है हर हाल में !

भूल सब संकल्प यह मन में करें
   हर कदम आगे बढ़ें दृढ़ चाल में    
है मिटाना बैर और नफ़रत हमें
प्रेम मय संसार हो नव साल में !


इसी मंगलकामना के साथ आप सभी को नूतन वर्ष २०१७ की हार्दिक बधाई एवं अशेष शुभकामनायें !


साधना वैद

Wednesday, December 28, 2016

अलविदा प्यारे सम्राट



अलविदा प्यारे सम्राट

मिलेगा न तुझसा कोई दोस्त प्यारा  
अकेले पलों का तू ही था सहारा
न होंगी किसीसे अब बातें हमारी
कटेगा न काटे समय अब हमारा !

तू था घर की रौनक कलेजे का टुकड़ा
तेरे जाने से घर लगे उजड़ा-उजड़ा
हैं मायूस सब सबकी आँखें हैं गीली
कहें किससे मन में छिपा अपना दुखड़ा !

चमकती थी आँखें हमें सूँघते ही
थिरकते थे अंग एक पुचकार से ही
न होगा कभी ऐसा स्वागत हमारा
हिलाता था दुम दूर से देखते ही !

न आएगा अब सुन के आवाज़ कोई
न भौंकेगा हल्की सी आहट पे कोई
कहाँ पायेंगे तुझसा न्यारा कहीं हम
न माँगा कभी हमसे उपहार कोई !

है सूना हर एक कोना घर का तेरे बिन
न भाएगा अब कुछ भी खाना तेरे बिन
तुझे ही नज़र ढूँढती हर जगह है
तू था जैसे साया मेरे संग पल छिन !

फिर क्यों चल दिया उठ के बेगानों जैसे !
न सोचा कि तुझ बिन रहेंगे हम कैसे
तू था सबसे प्यारा खिलौना हमारा
तेरे बिन जियेंगे मरेंगे हम कैसे !

न मुड़ के ही देखा खफा हो गया तू
बिना कुछ भी बोले विदा हो गया तू
न भूलेंगे हम तुझको पल के लिए भी
रहेगा हमारे दिलों में सदा तू !

अलविदा गुड बॉय !




साधना वैद

  

Sunday, December 25, 2016

अवमूल्यन



नहीं आये न तुम !
अच्छा ही किया !
जो आते तो शायद
निराश ही होते ! 
कौन जाने मैं पहले की तरह
तुम्हारी आवभगत
तुम्हारा स्वागत सत्कार
तुम्हारी अभ्यर्थना  
कर भी पाती या नहीं ?
आखिरकार इंतज़ार भी तो
निरंतर कसौटी पर कसा जाकर
कभी न कभी  
दम तोड़ ही देता है !
आशा की डोर भी तो
कभी न कभी
कमज़ोर होकर
टूट ही जाती है और
जतन से सहेजी हुई
माला के सारे मनके
एक ही पल में भू पर
बिखर कर रह जाते हैं !
पथ पर टकटकी लगाए
आँखे भी तो थक कर
कभी न कभी  
पथरा ही जाती हैं और
परस्पर पत्थरों के मध्य
भाव सम्प्रेषण की
सारी संभावनाएं फिर 
शून्य हो जाती हैं !
और अनन्य प्रेम की
सुकोमल पौध में भी
बारम्बार गुज़रते मौसमों की
बेरहम चोटों से
कभी न कभी
नाराज़गी की दीमक
लग ही जाती है
जो कालान्तर में उसे
समूल नष्ट कर जाती है !
अब इस खंडहर में
इन अनमोल भावनाओं के  
सिर्फ चंद अवशेष ही बाकी हैं !
जो शायद किसी को भी
प्रीतिकर नहीं होंगे !
कम से कम
तुम्हें तो हरगिज़ नहीं !
क्योंकि अपना ही ह्रास
अपना ही अवमूल्यन
अपना ही क्षरण
भला कोई कैसे
स्वीकार कर सकता है !
इसलिये
वक्त की फिरी हुई
नज़रों के इस वार से
जो तुम बचना चाहते हो
तो इस वीरान खंडहर में
अब फिर कभी
भूले से भी न आना
वही ठीक रहेगा !

साधना वैद