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मंगलवार, 14 फरवरी 2012

फागुन


फागुन का मास तो

हर बरस आता है ,

लाल, पीले,

हरे, नीले

रंगों से सराबोर

ना जाने कितने कपड़े

हर साल बाँटती हूँ

फिर भी

नहीं जानती

मेरे मन की

दुग्ध धवल श्वेत चूनर

अभी तक

कोरी की कोरी

ही कैसे रह गयी !

कितना विचित्र

अनुभव है कि

एक प्राणवान शरीर

रंगों से खेल रहा होता है

और एक निष्प्राण आत्मा

नितांत पृथक और

निर्वैयक्तिक हो

असम्पृक्त भाव से

बहुत दूर से

इस फाग को अपने

निस्तेज नेत्रों से

अपलक निहारती

रहती है और

कामना करती है

कभी तो उसके श्याम

उसके आँगन में आयेंगे

और उसके मन की

चूनर पर रंग भरी

अपनी पिचकारी से

सतरंगी फूल बिखेरेंगे !



साधना वैद

शुक्रवार, 10 फरवरी 2012

तुम मिले जग मिल गया







कुछ मधुर तुम कान में जो कह गये

शूल मन के वेग से सब बह गये !


मलय ने आँचल मेरा लहरा दिया ,

भाव विह्वल गीत सारे हो गये !


पुष्प वासंती हृदय में खिल उठे ,

प्राण सुरभित एक पल में हो गये !


मन विहग ने क्षितिज तक भर ली उड़ान ,

स्वर मुखर हर इक दिशा में हो गये !


पवन पी पीयूष प्याला प्रेम का ,

प्रिय परस की वंचना में खो गये !


नयन उन्मीलित पुलक कर लाज से

प्रिय दरस की साध लेकर खुल गये !


अधर अस्फुट गीत दोहराते रहे ,

स्वप्न सब साकार जैसे हो गये !


निमिष भर को तुम मिले जग मिल गया ,

प्रार्थना के स्वर सफल सब हो गये !



साधना वैद

रविवार, 5 फरवरी 2012

क्या आप जानते हैं १०० नंबर भी कभी-कभी काम करता है ?



प्राय: सरकारी विभागों की और व्यवस्था की कमियाँ ही हम सबको दिखाई देती हैं और हम सब अक्सर उनसे जूझते ही नज़र आते हैं और शायद इसीलिये बहुत असंतुष्ट और नाराज़ भी रहते हैं लेकिन आज मुझे कुछ विपरीत सुखद अनुभव हुए हैं जिन्हें मैं आपके साथ बाँटना चाहती हूँ इसीलिए आज कई दिनों के बाद मैंने अपनी प्रिय कुर्सी पर आसन जमा लिया है ! फिर ऐसी घटनाएँ रोज़-रोज़ होती भी तो नहीं हैं !

हर रोज़ की तरह आज भी सामान्य सी ही सुबह थी ! वही दैनंदिन की सामान्य गतिविधियाँ और क्रिया कलाप ! राजन, मेरे पतिदेव, सुबह बगीचे में पेड़ पौधों की काट छाँट में व्यस्त थे ! मैं किचिन में नाश्ता बनाने की तैयारियों में व्यस्त थी ! अचानक पंछियों का एक बड़ा समूह बगीचे के हर छोटे बड़े पेड़ की डालियों पर आकर बैठ गया और ज़ोर-ज़ोर से शोर मचाने लगा ! घना पक्षी अभयारण्य पास में होने के कारण इन दिनों प्रवासी पक्षियों का आवागमन भी बड़े पैमाने पर होता है और कदाचित उनका यही रूट होता है इसलिए अक्सर हमारे बगीचे में भी कभी-कभी विदेशी पक्षी दिखाई दे जाते हैं ! पक्षियों के इस कलरव को मैंने इसी प्रक्रिया का हिस्सा मान कोई विशेष ध्यान नहीं दिया ! राजन को बर्ड वाचिंग का विशेष शौक है ! मुझे उत्साहित होकर उन्होंने बगीचे में बुलाया ! बताने लगे ये चिड़िया सेवेन सिस्टर्स के नाम से जानी जाती है ! तभी कुछ कौए भी आ गये और बंदरों का झुण्ड भी घर की छत और मुंडेर पर डेरा जमाने लगा ! अचानक से इतनी हलचल आसामान्य तो लग रही थी लेकिन कारण कुछ समझ में नहीं आ रहा था ! इतने कौए भी बड़े दिनों के बाद नज़र आये थे ! मुझे संदेह हुआ आसपास कोई जानवर शायद घायल हुआ पड़ा हो ! इसी सोच विचार में उलझी मैं फिर किचिन के कामों में व्यस्त हो गयी ! तभी अचानक इन्होंने जोर से आवाज़ देकर कहा, जल्दी से कैमरा लेकर आओ ! बडा रेयर सीन है ! कैमरा लेकर मैं बाहर गयी तो देखा खिड़की के छज्जे पर एक बहुत ही खूबसूरत और बड़े साइज़ का उल्लू बैठा हुआ है ! अक्सर उल्लू ब्राउन कलर के होते हैं लेकिन यह सफ़ेद रंग का था और चेहरे पर ब्राउन रंग का गोल घेरा बना हुआ था ! इससे पूर्व मैंने इतना बड़ा उल्लू कभी नहीं देखा था ! और वह इतना निश्चल बैठा हुआ था कि एक पल को तो मुझे आभास हुआ जैसे किसीने कोई शो पीस वहाँ पर सजा कर रख दिया है ! वह बिलकुल भी हिल डुल नहीं रहा था ! चिड़ियाँ और कौए उसे देख कर ही शोर मचा रहे थे और बन्दर उस पर घात लगाने की फ़िक्र में थे ! लेकिन इन सबसे बेखबर वह एक मूर्ति की तरह वहाँ बैठा हुआ था !

राजन, मेरे देवर राजेश, घर के अन्य सभी सदस्य और बच्चे सब उस उल्लू को बचाने के लिये सक्रिय हो गये ! बड़े-बड़े बाँस और डंडे लेकर सब बंदरों को भगाने में जुटे हुए थे ! लेकिन नज़र बचते ही वे हमला करने के लिये उल्लू के पास पहुँच जाते थे ! दिन की रोशनी में शायद वह ठीक से खतरे को भाँप नहीं पा रहा था और तटस्थ भाव से उसी जगह पर बैठा हुआ था ! उसे बचाने के लिये मैं भी कृत संकल्प थी लेकिन कोई उपाय समझ में नहीं आ रहा था किससे मदद माँगी जा सकती है ! जब कुछ समझ में नहीं आया तो मैंने १०० नम्बर डायल कर पुलिस से हेल्प माँगी ! उन्हें बताया कि यह लुप्तप्राय प्रजाति का संरक्षित पक्षी है और इस समय उसकी जान खतरे में है ! अगर तुरंत उसे बचाया नहीं गया तो बन्दर उसे मार देंगे ! मेरे स्वर की चिंता से फोन के दूसरे सिरे पर बात करने वाला व्यक्ति शायद कुछ प्रभावित हुआ ! सुखद आश्चर्य हुआ जब उसने न केवल मेरी समस्या को सुना बल्कि मुझे यह भी बताया कि इस सिलसिले में वन विभाग ही मेरी सहायता कर सकता है ! मेरे पास वन विभाग का कोई नंबर नहीं था ! यह भी आशंका थी कि मेरे कहने भर से ही कोई भला क्यों आ जायेगा मदद करने ! अत: मैंने उन्हीं सज्जन से वन विभाग को मेरी समस्या के बारे में सूचित करने के लिये कहा ! प्रत्युत्तर में ना केवल उन्होंने वन विभाग को फोन किया बल्कि मुझे भी बाद में कॉल बैक कर यह बता दिया कि उन्होंने मेरी प्रार्थना को सम्बंधित अधिकारी तक पहुँचा दिया है और वन विभाग का नंबर भी मुझे दे दिया ताकि आवश्यकता पड़ने पर मैं स्वयं भी उनसे संपर्क कर सकूँ ! इसके लिये वे वास्तव में धन्यवाद के पात्र हैं !

सुबह से २-३ घण्टे बीत चुके थे ! घर का हर सदस्य मुस्तैदी से बंदरों को भगाने में और उल्लू के प्राणों की रक्षा में जुटा हुआ था ! वन विभाग का ऑफिस शहर के दूसरे छोर कीठम पर स्थित है ! कई बार संपर्क करने की कोशिश की लेकिन वीक सिगनल की वजह से बात नहीं हो पाई ! अंतत: एक बार संपर्क सफल हुआ और ज्ञात हुआ कि वे लोग पहुँचने ही वाले हैं ! मन में बड़ी जिज्ञासा थी कि एक पक्षी को वे लोग कैसे पकड़ेंगे ! देखा बाइक पर केवल दो लोग आये हैं और वह भी बिलकुल खाली हाथ ! घर पर रखी लकड़ी की ऊँची सीढ़ी (घोड़ी) को उन्होंने खिडकी के सामने लगाया और उस पर चढ़ कर उल्लू को पकड़ने का इरादा बनाया ! सीढ़ी की ऊँचाई, खिड़की के सहारे लगी हुई बेलें और पेड़ और बिजली के तार उनके काम में बाधा डाल रहे थे ! अब तक निंद्रामग्न उल्लू भी पूरी तरह से सचेत हो गया था और जैसे ही बहेलिये ने उसे पकड़ने के लिये हाथ आगे बढ़ाया वह पंख फड़फड़ा कर बगीचे में ही कदम्ब के पेड़ पर जाकर बैठ गया ! हम सब का दिल बैठ गया ! लगा सारी मेहनत पर पानी फिर गया और सारा अभियान असफल हो गया ! इतने घंटे उस उल्लू के साथ उसकी हिफाज़त के लिये बिताने की वजह से अब तक उससे एक अबूझा प्यार का रिश्ता सा कायम हो गया था ! इस दुष्चिन्ता से कि अब तो पेड़ पर यह बन्दर. चील या किसी गिद्ध का शिकार हो जायेगा मन बहुत उद्विग्न हो रहा था ! वन विभाग के कर्मचारियों के गैर जिम्मेदाराना व्यवहार पर बहुत गुस्सा भी आ रहा था ! क्या ये सचमुच उसे एक शो पीस समझ बैठे थे कि हाथ बढ़ा कर उठा लेंगे ! लेकिन मेरे गुस्से के विपरीत वे बड़े निश्चिन्त भाव से नीचे उतर आये और पूर्ण विश्वास के साथ बोले, अब पेड़ पर से तो हम उसे पकड़ लेंगे !

उनकी इस उद्घोषणा का मुझ पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा था लेकिन फिर भी मैं चुपचाप उनकी सहायता कर रही थी ! उन्होंने मुझ से एक बोरी माँगी ! और दोनों लोग पेड़ के नीचे लकड़ी की घोड़ी लगा कर उस पर चढ़ने लगे ! उल्लू अब पूरी तरह से जाग गया था ! बहेलिया उल्लू की ऊँचाई तक पहुँच उसकी आखों में आँखें डाल उसे घूर रहा था ! उल्लू भी बहेलिये की चाल को समझने की जैसे कोशिश कर रहा था ! तभी पीछे से हाथ घुमा कर तेज़ी से झपट्टा मार बहेलिये ने उल्लू को पंखों से दबोच लिया ! उस समय उल्लू के पंख पूरी तरह से फैले हुए थे और उनकी खूबसूरती से हम सब सम्मोहित थे ! जैसे किसी कुशल चित्रकार ने संगमरमर के सफ़ेद पन्नों पर काले, पीले और ब्राउन कलर्स से सुन्दर चित्रकारी कर दी हो ! जैसे ही उल्लू को सुरक्षित बोरे में डाल कर बोरे का मुँह रस्सी से बाँध दिया गया सारा बगीचा तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा ! इतनी देर में कॉलोनी के सारे पड़ोसी और बच्चे बारी-बारी से आकर उस पक्षी के दर्शन कर गये थे ! और अपने घरों की खिड़कियों से इस अभियान के मूक दर्शक बने हुए थे !

वनविभाग के कर्मचारियों के आत्मविश्वास और दक्षता से हम सब अभिभूत थे ! उन लोगों के अलावा आज के इस अभियान की सफलता का कुछ श्रेय मैं पुलिस विभाग के उस अधिकारी को भी ज़रूर देना चाहूँगी जिसने सदय होकर मेरी समस्या को सुना, उस पर ध्यान दिया और उसके निराकरण के लिये मेरी सहायता भी की ! ऐसा नहीं है कि विदेशों में ही हेल्प लाइन्स काम करती हैं ! हमारे देश में भी कभी-कभी जब समस्या सही कानों में पड़ जाती है तो उसका निदान भी संभव हो जाता है ! मैं हृदय से उन लोगों की आभारी हूँ और अपना धन्यवाद ज्ञापित करना चाहती हूँ ! जय भारत ! जय हिन्दुस्तान !

साधना वैद

बुधवार, 25 जनवरी 2012

डायरी का दूसरा पन्ना


यह कैसी खामोशी !

जाने क्यों ऐसा लगता है कि इस एक लफ्ज़ में ही सारे ज़माने का शोर समाया हुआ है ! डर लगता है इसे उच्चारित करूँगी तो उससे उपजे शोर से मेरे दिमाग की नसें फट जायेंगी ! एक चुप्पी, एक मौन, एक नीरवता, एक निशब्द सन्नाटा जो हर वक्त मन में पसरा रहता है जैसे अनायास ही तार-तार हो जायेगा और इस शब्द मात्र का उच्चारण मुझे मेरे उस सन्नाटे की सुकून भरी पनाहों से बरबस खींच कर समंदर के तूफानी ज्वार भाटों की ऊँची-ऊँची लहरों के बीच फेंक देगा ! मुझे अपने मन की यह नीरवता मखमल सी कोमल और स्निग्ध लगती है ! यह एकाकीपन और सन्नाटा अक्सर आत्मीयता का रेशमी अहसास लिये मुझे बड़े प्यार से अपने अंक में समेट लेता है और मैं चैन से उसकी गोद में अपना सर रख उस मौन को बूँद-बूँद आत्मसात करती जाती हूँ !

साँझ के उतरने के साथ ही मेरी यह नि:संगता और अँधेरा बढ़ता जाता है और हर पल सारी दुनिया से काट कर मुझे और अकेला करता जाता है ! आने वाले हर लम्हे के साथ यह मौन और गहराता जाता है और मैं अपने मन की गहराइयों में नीचे और नीचे उतरती ही जाती हूँ ! और तब मैं अपनी क्षुद्र आकांक्षाओं, खण्डित सपनों, भग्न आस्थाओं, आहत भावनाओं, टूटे विश्वास, नाराज़ नियति और झुके हुए मनोबल के इन्द्रधनुष को अपने ही थके हुए जर्जर कंधों पर लादे अपने रूठे देवता की छुटी हुई उँगली को टटोलती इस घुप अँधेरे में यहाँ से वहाँ भटकती रहती हूँ ! तभी सहसा मेरे मन की शिला पर सर पटकती मेरी चेतना के घर्षण से एक नन्हीं सी चिन्गारी जन्म लेती है और उस चिन्गारी की क्षीण रोशनी में मेरे हृदय पटल पर मेरी कविताओं के शब्द प्रकट होने लगते हैं ! धीरे-धीरे ये शब्द मुखर होने लगते हैं और मेरे अंतर में एक जलतरंग सी बजने लगती है जिसकी सम्मोहित करती धुन एक अलौकिक संगीत की सृष्टि करने लगती है ! मेरा सारा अंतर एक दिव्य आलोक से प्रकाशित हो जाता है और तब कल्पना और शब्द की, भावना और संगीत की जैसी माधुरी जन्म लेती है वह कभी-कभी अचंभित कर जाती है ! मेरे मन के गवाक्ष तब धीरे से खुल जाते हैं और मेरे विचारों के पंछी सुदूर आकाश में पंख फैला ऊँची बहुत ऊँची उड़ान भरने लगते हैं साथ ही मुझे भी खामोशी की उस दम घोंटने वाली कैद से मुक्त कर जाते हैं !

मुझे अपने मन का यह शोर भला लगता है ! मुझे खामोशी का अहसास डराता है लेकिन मेरे अंतर का यह कोलाहल मुझे आतंकित नहीं करता बल्कि यह मुझे आमंत्रित करता सा प्रतीत होता है !

साधना वैद