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Thursday, September 20, 2018

जा रहा मधुमास है





पंछियों के स्वर मधुर खोने लगे
चाँद तारे क्लांत हो सोने लगे    
क्षीण होती प्रिय मिलन की आस है  
मलिन मुख से जा रहा मधुमास है ! 

वन्दना के स्वर शिथिल हो मौन हैं
करें किसका गान अतिथि कौन है
भ्रमित नैनों में व्यथा का भास है
भाव विह्वल जा रहा मधुमास है !

राह कितनी दूर तक सुनसान है
पंथ की कठिनाइयों का भान है
किन्तु मन में ढीठ सा विश्वास है
आओगे तुमजा रहा मधुमास है !

प्रेम की प्रतिमा सजाने के लिए
अर्चना के गीत गाने के लिये
तृषित उर में भावना का वास है
चकित विस्मित ठगा सा मधुमास है !

हृदय की तृष्णा विकल हो बह रही
युगों से पीड़ा विरह की सह रही
प्रियमिलन की साध का यह मास है
व्यथित व्याकुल जा रहा मधुमास है !

आओगे कब फूल मुरझाने लगे
खुशनुमां अहसास भरमाने लगे
जतन से थामे हूँ जो भी पास है
आ भी जाओ जा रहा मधुमास है ! 

साधना वैद







Wednesday, September 19, 2018

मेरा ‘मैं’





जब भी अपने
हृदय का बंद द्वार
खोल कर अंदर झाँका है
अपने ‘मैं’ को सदैव सजग,
सतर्क, संयत एवँ दृढ़ता से अपने
इष्ट के संधान के लिये
समग्र रूप से एकाग्र ही पाया है !
ऐसा क्या है उसमें जो वह
सागर की जलनिधि सा अथाह,
आकाश सा अनन्त, धरती सा उर्वर,
वायु सा जीवनदायी व गतिमान एवँ
पवित्र अग्नि सा ज्वलनशील है !
ऐसा क्या है उसमें जो
संसार का कोई भी आतंक
उसे भयभीत नहीं करता,
कोई भी भीषण प्रलयंकारी तूफ़ान
उसे झुका नहीं सकता,
कैसे भी अनिष्ट का भय उसका
मनोबल तोड़ नहीं पाता !
लेकिन जो अपनी अंतरात्मा की
एक चेतावनी भर से सहम कर
निस्पंद हो जाता है,
जो मेरी आँखों में लिखे
वर्जना के हलके से संकेत को
पढ़ कर ही सहम जाता है और
मेरे होंठों पर धरी निषेधाज्ञा की
उँगली को देख अपनी वाणी
खो बैठता है !
मैं जानती हूँ
दुनिया की नज़रों में
मेरा यह ‘मैं’
एक जिद्दी, अड़ियल, अहमवादी,
दम्भी, घमण्डी और भी
न जाने क्या-क्या है !
लेकिन क्या आप जानते हैं  
मेरा यह ‘मैं’
मेरे आत्मसम्मान का एक
सबसे शांत, सौम्य और
सुदर्शन चेहरा है,
जिस पर मैं अपनी सम्पूर्ण
निष्ठा से आसक्त हूँ !
वह इस रुग्ण समाज में विस्तीर्ण   
वर्जनाओं, रूढ़ियों और सड़ी गली
परम्पराओं की गहरी दलदल से
बाहर निकाल मुझे किनारे तक
पहुँचाने के लिये मेरा एकमात्र एवँ
अति विश्वसनीय अवलंब है !
अपने स्वत्व की रक्षा के लिये
मेरे पास उपलब्ध मेरा इकलौता
अचूक अमोघ अग्नेयास्त्र है !
मेरी विदग्ध आत्मा के ताप को
हरने के लिये अमृत सामान
मृदुल, मधुर, शीतल जल का
अजस्त्र अनन्त स्त्रोत है !
मुझे कोई परवाह नहीं
लोग मुझे क्या समझते हैं
लेकिन मेरी नज़रों में मेरी पहचान
मेरे अपने इस ‘मैं’ से है
और निश्चित रूप से मुझे
अपनी इस पहचान पर गर्व है !
जिस दिन मेरी नज़र में
इस ‘मैं’ का अवमूल्यन हो जाएगा
वह दिन मेरे जीवन का
सर्वाधिक दुखद और कदाचित
अंतिम दिन होगा क्योंकि
कदाचित उसके बाद जीवन में
ऐसा कुछ अनमोल
शेष नहीं रह जायेगा
जिस पर मैं अभिमान कर सकूँ !


चित्र - गूगल से साभार

साधना वैद
 








Monday, September 17, 2018

हैरान हिंदी





हिन्दी दिवस 
सतही उपक्रम 
खोखली बातें


हिंदी है शान 
मातृभाषा हमारी 
हमारा मान


हिंदी हैरान 
अपने ही लोगों ने 
किया न मान


मातृभाषा का 
करते अपमान 
शर्म की बात


आज के बच्चे 
रोमन में लिखते 
हिंदी की बात


उपेक्षित हो 
हाशिये पर खड़ी
हिंदी हमारी


समृद्ध भाषा 
सबसे वैज्ञानिक 
हिन्दी हमारी


लिखते जैसे 
पढ़ते भी वैसे ही 
हिंदी की खूबी


हिंदी हमारी 
राजनीति लोगों की 
आकंठ डूबी


अब तो चेतो 
मातृभाषा हिंदी का 
सम्मान करो


हिंदी भाषा का 
करो यशवर्धन 
सुनाम करो !



साधना वैद

Saturday, September 15, 2018

हिन्दी दिवस और हिन्दी

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हिन्दी दिवस भी हमारे देश में साल में एक बार त्यौहार की तरह ही मनाया जाने लगा है ठीक उसी तरह जैसे हम होली, दीवाली, ईद, क्रिसमस मनाते हैं ! यह ‘दिवस’ मनाने का चलन भी खूब निकला है ! बस साल के पूरे ३६५ दिनों में एक दिन, असली हों या नकली, हिन्दी के मान सम्मान की ढेर सारी बातें कर लो, अच्छे-अच्छे लेख, कवितायें, कहानियाँ लिख कर अपनी कर्तव्यपरायणता और दायित्व बोध का भरपूर प्रदर्शन कर लो और फिर बाकी ३६४ दिन निश्चिन्त होकर मुँह ढक कर गहरी नींद में सो जाओ अगले हिन्दी दिवस के आने तक !
जब तक हम अंग्रेज़ी भाषा की मानसिक दासता से खुद को मुक्त नहीं करेंगे और हिन्दी भाषा को पढ़ाई का माध्यम नहीं बनाएंगे हिन्दी इसी तरह अपने ही घर के बाहर सिसकती खड़ी दिखाई देगी ! स्कूलों में पढ़ाई का माध्यम हिन्दी भाषा को होना चाहिये और अंग्रेज़ी भाषा को सेकण्ड लेंग्वेज की तरह पढ़ाया जाना चाहिए न कि हिन्दी को ! बच्चे जिस भाषा में सारे विषय पढ़ते हैं उनकी पकड़ उस भाषा पर मज़बूत हो जाती है और वे सहजता से उस भाषा में अभिव्यक्ति कर पाते हैं !
इससे बड़ी विडम्बना और शर्म की बात और क्या होगी कि आजकल स्कूलों में बच्चों को हिन्दी में बात करने के लिए दण्डित किया जाता है ! यदि बच्चे स्कूल परिसर में अवकाश के समय में भी आपस में हिन्दी में बात करते हुए पाए जाते हैं तो टीचर्स उन्हें डाँटते हैं ! इस पर हम हिन्दी दिवस पर हिन्दी के उत्थान और सम्मान की बातें करते हैं और हिन्दी भाषा के भविष्य के प्रति अपनी चिंता व्यक्त करते हैं ! जिस भाषा में बात करने पर सज़ा मिले उस भाषा का सम्मान आज की युवा होती पीढ़ी कैसे करेगी और क्यों करेगी ? अपनी मातृ भाषा में बात करने पर किस देश में स्कूलों में बच्चों को दण्डित किया जाता है यह शोध का विषय हो सकता है ! क्या इस सन्दर्भ में हमारे शिक्षाविद् और स्कूलों के व्यवस्थापक किसी सकारात्मक नीति का निर्धारण करेंगे ? वैसे आज स्कूल से घर आने के बाद मेरी पोती ने बड़े खुश होकर बताया कि हिन्दी दिवस की वजह से आज स्कूल में हिन्दी में बात करने पर किसीको डाँट नहीं पड़ी ! क्या बात है ? साल में कम से कम एक दिन तो बच्चों को अपनी मातृ भाषा में बात करने की आज़ादी मिली ! स्कूल प्रशासन को तो फूलों का गुलदस्ता पेश करना चाहिए !
अंग्रेज़ी भाषा से मेरा कोई विरोध नहीं है ! अपने ज्ञान में वृद्धि करने के लिए और विश्व की विभिन्न भाषाओं के साहित्य का अध्ययन करने के लिए जितनी भाषाओं को सीखा जाए उतनी कम हैं ! फिर केवल अंग्रेज़ी भाषा के लिए ही यह पक्षपात पूर्ण आग्रह क्यों ? जिस व्यक्ति में सीखने की इच्छा और ललक है वह कोई भी भाषा किसी भी अवस्था में सीख सकता है लेकिन इसके लिए अपनी राष्ट्र भाषा का तिरस्कार करना ज़रूरी तो नहीं ! आज का युग ग्लोबलाइजेशन का युग है इस बात से इनकार नहीं ! अध्ययन एवं कैरियर की माँग के अनुसार लोगों का विदेशों में आना जाना पहले से अधिक बढ़ गया है यह भी सच है लेकिन इसके लिए जब जैसी आवश्यक्ता हो उस देश की भाषा को सीखा जा सकता है ! दूसरे देश की भाषा का अल्प ज्ञान होगा तो कोई नहीं हँसेगा लेकिन अपनी ही भाषा की सम्यक् जानकारी न होने पर वे सब जगह उपहास के पात्र बनेंगे ! आजकल के बच्चे हिन्दी के वाक्य रोमन में लिखने में अधिक सहज अनुभव करते हैं क्योंकि उन्हें या तो हिन्दी के वर्णों को ठीक से बनाना नहीं आता या सोच कर बनाने में देर बहुत लगती है ! अंग्रेज़ी के लेटर्स वे जल्दी से बना लेते हैं ! हिन्दी केवल एक विषय के रूप में पढ़ाई जाती है जिसे पढ़ने में बच्चों को कोई रूचि नहीं होती ! इससे अधिक दयनीय दशा और क्या होगी हिन्दी की ! स्कूलों में बच्चों को यदि सारे विषय हिन्दी में पढ़ाए जाएँ और उनके प्रश्न उत्तर भी बच्चों से हिन्दी में ही लिखवाये जाएँ तो उन्हें हिन्दी सीखने में रूचि भी होगी और हिन्दी के प्रति उनकी सोच भी बदलेगी ! अपने समय में हमारी समवयस्क पीढ़ी ने हिन्दी माध्यम से ही शिक्षा ग्रहण की है और आज के अंग्रेज़ी माध्यम से पढ़े हुए शिक्षित वर्ग से हम स्वयं को किसी भी तरह कम नहीं आँकते !
हिन्दी के प्रति उपेक्षात्मक रवैये और अंग्रेज़ी भाषा के अधकचरे ज्ञान ने आज के औसत बच्चों को ऐसे दोराहे पर ला खड़ा किया है जहाँ से उन्हें अपने उज्जवल भविष्य के लिए कोई रास्ता दिखाई नहीं देता ! घरों में भी माता-पिता की मानसिकता बच्चों को येन केन प्रकारेण परीक्षा में उत्तीर्ण कराने भर की रह गयी है ! बच्चे क्या सीख रहे हैं किस भाषा का कितना और कैसा अध्ययन कर रहे हैं इस बारे में जानने का ना तो उनके पास समय है और ना ही वे इसे जानने में कोई रूचि रखते हैं ! यही कारण है कि आज हिन्दी सिर्फ बोलचाल की साधारण सी भाषा बन कर रह गयी है ! आज के बच्चों के हिन्दी लेखन में ना तो गुणवत्ता के दर्शन होते हैं ना ही साहित्यिकता के ! और सबसे अधिक दुःख की बात यह है कि जिस अंग्रेज़ी भाषा में तीन चार साल की उम्र से बच्चे पढ़ रहे हैं उसमें भी यदि चंद अपवादों को छोड़ दें तो आम साधारण बच्चे एक पैरेग्राफ भी शुद्ध रूप से नहीं लिख पाते !
क्या हमारे नीति नियंताओं ने कभी इस ओर ध्यान दिया है और क्या वे इस दिशा में कोई ठोस कदम उठा सकेंगे ?


साधना वैद

Wednesday, September 12, 2018

व्योम के उस पार



दूर क्षितिज तक पसरे
तुम्हारे कदमों के निशानों पर
अपने पैर धरती
तुम तक पहुँचना चाहती हूँ !
सारी दिशाएँ खो जायें,
सारी आवाजें गुम हो जायें,
सारी यादें धुँधला जायें,
मेरी डायरी में लिखे
तुम्हारे पते की स्याही
वक्त के मौसमों की मार से
भले ही मिट जाये
मेरे मन की मरुभूमि की रेत पर
अंकित ये निशान आज भी
उतने ही स्पष्ट और ताज़े हैं
जितने वो उस दिन थे
जब वर्षों पहले मुझसे
आख़िरी बार मिल कर
तुम्हारे पल-पल दूर जाने से
मेरे मन पर बने थे !  
तुम्हारे कदमों के
उन्हीं निशानों पर पैर रखते हुए
चलते रहना मुझे बहुत
अच्छा लगता है !
फासले कुछ कम होते से
लगते हैं और
उम्मीद की शाख हरी
होने लगती है !
जानती हूँ राह अनन्त है
मंज़िल का कोई ओर छोर भी
दिखाई नहीं देता
लेकिन मुझे विश्वास है
तुम्हारे पैरों के इन निशानों पर
पैर रखते हुए मैं
एक न एक दिन ज़रूर  
तुम तक पहुँच जाऊँगी
फिर चाहे यह मुलाक़ात
इस लोक में हो या
व्योम के उस पार !


साधना वैद    

Friday, September 7, 2018

मेरे मितवा




मेरे मितवा
न कोई ख़त, न सन्देश, न संकेत
हर जगह से आज फिर मुझे   
खाली हाथ, रिक्त हृदय, रिक्त मन
लौटाया है तुमने   
एक बार फिर मेरी उम्मीदों,
मेरी आशा, मेरे विश्वास को
नर्मम होकर बलि
चढ़ाया है तुमने !
मितवा मेरे
ठान लिया है मैंने
तुम्हारे ज़ुल्म ओ सितम से
अब हार नहीं मानूँगी
चाहे जितनी बेरुखी दिखा लो
मैं हथियार नहीं डालूँगी !
ओ मनमीत   
आशा निराशा की इन
सावनी बदलियों को
अपने मनाकाश के किसी
सुदूर कोने में बहुत सहेज कर
छिपा लूँगी मैं और अगले बरस
सावन के महीने में
जब फिर से पुरवा चलेगी
मेरे मन में छिपी
आशा निराशा की ये बदलियाँ
एक बार फिर उमड़ घुमड़ कर
घिर आयेंगी और प्रेम रस की
उस घनघोर बारिश में भीग कर  
तुम्हारी बेरुखी का यह ताप   
खुद ब खुद शीतल हो जाएगा !
मितवा मेरे
प्रकृति से यही तो सीखा है मैंने
हर मौसम अपना पूरा जलवा दिखा
एक दिन उतार पर
अवश्यमेव आता ही है
और अंतत: परास्त हो कहीं
पार्श्व में विलीन हो जाता है
 अगले बरस एक बार फिर
उसी जोश खरोश के साथ
लौट कर आने के लिए !
मनमितवा
मैं भी अगली बार
फिर से लौट कर ज़रूर आऊँगी
और साथ ले आऊँगी वह जादू
जो विवश कर देगा तुम्हें
बेरुखी का अपना यह मुखौटा
उतार फेंकने के लिए
क्योंकि कभी हारना तो मैंने
सीखा ही नहीं !


साधना वैद 




  

Tuesday, September 4, 2018

गुरु शिष्य



शिक्षक दिवस पर विशिष्ट 

गुरु गोविन्द 
खड़े मेरे सामने
शीश उठाये 

भ्रमित मन 
सोच है भारी शीश 
किसे नवाये 

राह दिखाओ 
हरो विपदा सारी 
बाँँके बिहारी 

किसको गहूँँ 
असमंजस भारी 
कृष्ण मुरारी

गुरु को बड़ा 
बताया था जग ने 
जानता हूँ मैं 

गुरू का स्थान 
है प्रभु से भी ऊँचा
मानता हूँ मैं 

लेकिन है क्या 
शिक्षक का दायित्व 
जानते हैं वे ?

भोले बच्चों का 
क्या खुद को सर्जक 
मानते हैं वे ?  

निर्दय होके 
बच्चों पे हिंसा नहीं 
गुरु का धर्म 

देना सुशिक्षा 
सँँवारना  व्यक्तित्व 
गुरू का कर्म 

हुए शिक्षक 
लक्ष्मी के उपासक 
भूले कर्तव्य 

छोड़ी कलम 
भूले सरस्वती को 
उठाया द्रव्य 

देना सम्मान 
आदेश का पालन 
छात्र का कर्म 

गुरु की शिक्षा 
धारना अंतर में 
छात्र का धर्म 

जीवन डोर 
सौंप दी है तुमको 
पार लगाना 

दे के सुशिक्षा 
संस्कार औ' करुणा
मान बढ़ाना 

हर के तम 
भर देना प्रकाश 
सूर्य समान 

मेरे श्रद्धेय 
मेरे अभिभावक 
तुम्हें प्रणाम 



साधना वैद