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Friday, December 31, 2010

स्वागतम् नव वर्ष

नया साल २०११ आप सभीके लिये मंगलमय हो और आपकी हर मनोकामना पूर्ण हो यही शुभकामना है !


हर्ष और उल्लास का बन कर प्रतीक
सुबह का सूरज गगन पर है चढ़ा,
अश्रु आँखों में लिये बोझिल हृदय
चाँदनी का काफिला आगे बढ़ा ।

भोर की पहली किरण के साथ में
अल्पना के बेल-बूटे हैं सजे ,
खेत पोखर पनघटों के रास्ते
उल्लसित मन ग्रामवासी हैं चले ।

झूम कर प्रकृति सजाती साज है
है वसंती भाव स्वागत गान में,
नत वदन है खेत में सरसों खड़ी
गा रहे पंछी सुरीली तान में ।

ओस की हर जगमगाती बूँद में
और कल कल छलकती जलधार में,
बालकों की निष्कपट मुस्कान में
मन्दिरों में गूँजते प्रभुगान में ।

घन चलाते हाथ के आघात में
लपलपाती भट्टियों की ज्वाल में,
भोर के सूरज तेरी अभ्यर्थना
बोझ लादे हर श्रमिक की चाल में ।

आँख से पर्दे हटा अज्ञान के
चीर दे अवसाद का यह अंधकार,
जगमगा दे विश्व ज्ञानालोक से
दूर कर दे मनुज चिंतन के विकार ।

मान लेना तू मेरी यह प्रार्थना
हो तेरा अनुग्रह हमारी श्वास पे,
विश्व सारा कर रहा स्वागत तेरा
इसी आशा और इस विश्वास पे ।

साधना वैद्

यह साल भी आखिर बीत गया

साल का अंत हमें हमेशा पीछे मुड़ कर देखने के लिये मजबूर करता है और कम से कम मुझे तो उदास कर जाता है ! कल नया वर्ष आरम्भ होगा हम उत्साह और जोश से भर कर उसका स्वागत करेंगे ! लेकिन इस पर भी विचार करना ज़रूरी है कि बीते वर्ष का हमारा हासिल क्या रहा !

यह साल भी आखिर बीत गया ।

कुछ खून बहा, कुछ घर उजड़े,
कुछ कटरे जल कर राख हुए,
कुछ झीलों का पानी सूखा,
कुछ सुर बेसुर बर्बाद हुए ।
कुछ विरहा से कुछ तीली से
जल जीवन का संगीत गया ।

यह साल भी आखिर बीत गया ।

कुछ आँचल फट कर तार हुए,
कुछ दिल ग़म से बेज़ार हुए,
कुछ बहनों की उजड़ी माँगें,
कुछ बचपन से लाचार हुए ।
मौसम तो आये गये बहुत
दहशत का मौसम जीत गया ।

यह साल भी आखिर बीत गया ।

कुछ लोगों ने जीना चाहा
कुछ जानों का सौदा करके,
कुछ लोगों ने मरना चाहा
कुछ सिक्कों का सौदा करके ।
कुछ वहशत से कुछ नफरत से
खुशियों का हर पल रीत गया ।

यह साल भी आखिर बीत गया ।

सभी शहीदों को मेरा भावभीना नमन !

साधना वैद

Tuesday, December 28, 2010

वेदना की राह पर

वेदना की राह पर
बेचैन मैं हर पल घड़ी ,
तुम सदा थे साथ फिर
क्यों आज मैं एकल खड़ी !

थाम कर उँगली तुम्हारी
एक भोली आस पर ,
चल पड़ी सागर किनारे
एक अनबुझ प्यास धर !

मैं तो अमृत का कलश
लेकर चली थी साथ पर ,
फिर भला क्यों रह गये
यूँ चिर तृषित मेरे अधर !

मैं झुलस कर रह गयी
रिश्ते बचाने के लिये ,
मैं बिखर कर रह गयी
सपने सजाने के लिये !

रात का अंतिम पहर
अब अस्त होने को चला ,
पर दुखों की राह का
कब अंत होता है भला !

चल रही हूँ रात दिन
पर राह यह थमती नहीं ,
कल जहाँ थी आज भी
मैं देखती खुद को वहीं !

थक चुकी हूँ आज इतना
और चल सकती नहीं ,
मंजिलों की राह पर
अब पैर मुड़ सकते नहीं

कल उठूँगी, फिर चलूँगी
पार तो जाना ही है ,
साथ हो कोई, न कोई
इष्ट तो पाना ही है !

साधना वैद

Saturday, December 25, 2010

क्रिसमस की हार्दिक शुभकामनायें

 


आज आप सभी का परिचय एक बाल कवि से करवा रही हूँ ! यह है मेरा नन्हा सा पोता श्रेयस ! २७ दिसंबर को यह सात वर्ष का होने जा रहा है ! लेकिन अभी से इसमें कवितायें बनाने का शौक आकार ले रहा है ! इसकी बनाई कम्पोज़िशंस इसकी मम्मी कॉपी में लिखती रहती हैं और मेरे पास भेज देती हैं क्योंकि अभी वह खुद इतना लिख नहीं पाता ! श्रेयस अमेरिका में ही रहता है और उसे हिन्दी कम आती है ! उसकी कंपोजिशंस अंग्रेज़ी में ही होती हैं ! आज की रचना सामयिक है इसलिए मैंने सोचा इसे आप सबके साथ शेयर करूँगी तो आप सबको भी अवश्य प्रसन्नता होगी ! मुझे पूरा विश्वास है यह आपको ज़रूर पसंद आयेगी !

I am a snowman
I love my hat
But one day
My hat flew away,
I was so sad
Because it was my favorite hat.

Then Santa came over,
He saw my hat,
He gave me a lift
To a giant tree top.
And that's how
I found my hat.
My favorite hat.
I am a snowman
I love my hat.

Shreys Vaid
Posted by Picasa

Friday, December 24, 2010

गुत्थी

कभी-कभी
नितांत अजनबी,
अपरिचित चेहरों पर
जैसा अपनत्व,
जैसी गहन आत्मीयता,
और जैसी
एक कोमल सी अंतरंगता का
मधुर सा प्रतिबिम्ब झलक जाता है
वह उन चेहरों की रुखाई
और अजनबियत से कितना
अलग होता है ना
जिन्हें ईश्वर ने
आपका सगा संबंधी बना कर
इस धरती पर भेजा है,
और जिनके लिये आपने
ना जाने
कितनी कसमसाती रातों के
अंधेरों की दहशत
और कितने सुलगते दिनों की
तपती धूप को
उनकी हर विपदा में
उनके साथ झेला है ?

कभी-कभी
किसी नितांत अजनबी,
अपरिचित की वाणी में
कितनी मिठास,
कितना अपनापन और
कितनी सच्चाई महसूस होती है ना
जो आप अपने उन तथाकथित
‘अपनों’ की वाणी में ढूँढने का
बारम्बार भागीरथ प्रयास
करते रहते हैं
लेकिन हर बार
निराशा ही
आपके हाथ लगती है ?

कभी-कभी
कुछ लम्हों की
क्षणिक मुलाक़ात में ही
ना जाने कैसे
किसी अनजान अपरिचित के सामने
आपको अपना हृदय उड़ेल कर
रख देने की प्रेरणा मिल जाती है ना
जिसकी थाह
सदैव आपके साथ रहने वाले
आपके निकटतम संबंधी भी
कभी नहीं ले पाते ?

बहुत सोचती हूँ
ऐसा क्यों हो जाता है ,
ऐसा कैसे हो जाता है ,
लेकिन यह गुत्थी
मैं कभी
सुलझा नहीं पाती !

साधना वैद

Sunday, December 12, 2010

मुझे आता है

मुझे खुशियों के संदेशों
के भीतर दबी
दर्द की इबारतों को
पढ़ना और उस
दर्द में छिपी
अनकही व्यथा कथा को
गुनना आता है !

मुझे आँसुओं के गहरे
समंदर में उतर
सब्र की सीपियों से
मिथ्या मुस्कुराहट के
नकली मुक्ताओं को
चुनना और
उन्हें चुन कर
अपने लिये माला
पिरोना आता है !

स्कूल कॉलेज की
किताबों की पढ़ाई ने
चाहे कभी
सिखाया हो या नहीं
किन्तु जीवन के
अनुभवों की पढ़ाई ने
मुझे जी जी कर मरना
और मर मर कर जीना
अच्छी तरह
सिखाया है!
और शायद इसीलिये
अब मुझे
ज़िंदा लाशों और
मुर्दा इंसानों में फर्क
करना बखूबी
आ गया है !

साधना वैद

Wednesday, December 8, 2010

एक सवाल

वाराणसी के धमाके ने एक बार फिर सबको दहला दिया है ! यह सब
हमारे यहाँ शायद इतनी आसानी से इसलिए घटित हो जाता है क्योंकि
अत्यंत धीमी न्याय प्रक्रिया की वजह से आतंकवादी बखौफ रहते हैं और
उन्हें स्थानीय लोगों की निर्बाध सहायता मिल जाती है जो क्षुद्र स्वार्थों की
पूर्ति के लिये अपने देश के साथ गद्दारी करने से ज़रा भी नहीं हिचकिचाते !

एक सवाल

कल फिर बनारस में एक
धमाका हुआ ,
एक माँ की गोद सूनी
एक पिता के मन के आँगन में
सन्नाटा हुआ !
एक नन्हीं सी जान ने
नफ़रत और आतंक के
घातक वार को
अपनी छाती पर झेला है !
उसकी बलि लेकर
शायद उन नर पिशाचों के
कलेजे में ठंडक पड़ गयी हो
जिन्होंने दरिंदगी भरा
यह घिनौना खेल खेला है !
जिन हाथों ने
इस बम को लगाया होगा
क्या उन्होंने भी कभी
अपनी मासूम बच्ची को
अपने सीने से लगा कर
उसके बालों को प्यार से
सहलाया होगा ?
जिन उँगलियों ने
इस बेजान रिमोट के
विध्वंसक ट्रिगर को
दबाया होगा
क्या उन्होंने भी कभी
दर्द से बिलखते
अपने बच्चे के
आँसुओं को पोंछ कर
रूमाल से
सुखाया होगा ?
कैसे कोई इतना
बेरहम हो सकता है ?
कैसे कोई सर्वशक्तिमान
उनके इस गुनाह को
उनके इस अक्षम्य पाप को
माफ कर सकता है ?
यहाँ तो उन्हें सज़ा मिलने में
शायद सालों लग जाएँ
लेकिन हे ईश्वर !
अगर तू कहीं है
तो कब उस अबोध नन्हीं बच्ची को
न्याय मिल पायेगा
जो इस जघन्य काण्ड की
अकारण शिकार हुई है !


साधना वैद

Friday, December 3, 2010

मेरा दिल तब-तब रोता है

अपनी इस रचना में मैंने अपने आस पास के जीवन से उद्धृत दो विभिन्न प्रकार के दृश्यों को चित्रित करने का प्रयास किया है ! ये दृश्य हम प्रतिदिन देखते हैं और शायद इतना अधिक देखते हैं कि इनके प्रति हमारी संवेदनाएं बिलकुल मर चुकी हैं ! लेकिन आज भी जब इतने विपरीत विभावों को दर्शाती ऐसी तस्वीरें मेरे सामने आती हैं मेरा मन दुःख से भर जाता है ! समाज में व्याप्त इस असमानता और विसंगति को मिटाने के लिये क्या हम कुछ नहीं कर सकते ? क्या करें कि सारे बच्चे एक सा खुशहाल बचपन जी सकें खुशियों से भरपूर, सुख सुविधा से संपन्न ! जहाँ उनके लिये एक सी अच्छी शिक्षा हो, सद्विचार हों, अच्छे संस्कार हों, स्वस्थ वातावरण हो और सबके लिये उन्नति के सामान अवसर हों ! क्या ऐसे समाज की परिकल्पना अपराध है ? क्या ऐसे समाज की स्थापना के लिये हम कुछ नहीं कर सकते ? क्या ऐसे सपनों को साकार करने के लिये किसीके पास कोई संकल्पना, सुझाव या सहयोग का दिशा निर्देश नहीं ? क्या आपका हृदय ऐसे दृश्य देख कर विचलित नहीं होता ? इस रचना में 'उनका' शब्द सुख सुविधा संपन्न अमीर वर्ग के लिये प्रयुक्त किया गया है !

मेरा दिल तब-तब रोता है

एक छोटा बच्चा अपने सर पर
भारी बोझा ढोता है,
और उनके बच्चों के हाथों में
बॉटल बस्ता होता है !
मेरा दिल तब-तब रोता है !

एक भूखे बच्चे का नन्हा सा
हाथ भीख को बढ़ता है,
और उनके बच्चों के हाथों में
बर्गर बिस्किट होता है !
मेरा दिल तब-तब रोता है !

एक बेघर बच्चा सर्दी में
घुटनों में सर दे सोता है
और उनके बच्चों के कमरे में
ए सी , हीटर होता है ,
मेरा दिल तब-तब रोता है !

एक छोटा बच्चा गुण्डों की
साजिश का मोहरा होता है
और उनका बच्चा अपने घर
महफूज़ मज़े से होता है !
मेरा दिल तब-तब रोता है !

एक नन्हा बच्चा बिलख-बिलख
माँ के आँचल को रोता है
और उनका बच्चा हुलस हुमक
माँ की गोदी में सोता है
मेरा दिल तब-तब रोता है !

जब छोटे बच्चे के हाथों में
कूड़ा कचरा होता है
और उनके बच्चे के हाथों में
खेल खिलौना होता है !
मेरा दिल तब-तब रोता है !

बच्चों की किस्मत का अंतर
जब पल-पल बढ़ता जाता है ,
और सबकी आँखें बंद
जुबाँ पर ताला लटका होता है
मेरा दिल तब-तब रोता है !

साधना वैद

Wednesday, December 1, 2010

मेरा परिचय

किसी विशाल हिमखण्ड के नीचे
मंथर गति से बहती
सबकी नज़रों से ओझल
एक गुमनाम सी जलधारा हूँ मैं !

अनंत आकाश में चहुँ ओर
प्रकाशित अनगिनत तारक मंडलों में
एक टिमटिमाता सा धुँधला सितारा हूँ मैं !

निर्जन वीरान सुनसान वादियों में
कंठ से फूटने को व्याकुल
विदग्ध हृदय की एक अधीर
अनुच्चरित पुकार हूँ मैं !

सुदूर वन में सघन झाड़ियों के बीच
खिलने को आतुर दबा छिपा
एक संकुचित नन्हा सा फूल हूँ मैं !

वेदना के भार से बोझिल
कलम से कागज़ पर शब्दबद्ध
होने को तैयार किसी कविता का
एक अनभिव्यक्त भाव हूँ मैं !

करुणा से ओत प्रोत किसी
निश्छल, निष्कपट, निर्मल हृदय की
अधरों की कैद से बाहर
निकलने को छटपटाती
किसी मासूम प्रार्थना की
एक अस्फुट प्रतिध्वनि हूँ मैं !

वक्त की चोटों से जर्जर, घायल, विच्छिन्न
किन्तु हालात के आगे डट कर खड़े
किसी मुफलिस की आँख से
टपकने को तत्पर
एक अश्रु विगलित मुस्कान में छिपा
विद्रूप का रुँधा हुआ स्वर हूँ मैं !

इस अंतहीन विशाल जन अरण्य में
अपनी स्थापना के लिये संघर्षशील
नितांत अनाम, अनजान,
अपरिचित एवं विस्मृत प्राय
एक नगण्य सी शख्सियत हूँ मैं !

साधना वैद

Friday, November 26, 2010

अनुनय

सुबह सुबह जब घरेलू काम वाली बाइयों के साथ उनकी छोटी-छोटी लडकियों को सर्दी से बचने के लिये बगल में हाथ दबाये अपनी माँओं के साथ काम पर जाता हुआ देखती हूँ तो मन में दर्द की लकीर सी खिंच जाती है ! जिन छोटे-छोटे हाथों में कॉपी किताबें होनी चाहिए वे ठिठुरन भरी सर्दी में बर्तन घिसने के लिये विवश हैं ! लगभग पन्द्रह बीस वर्ष पहले मेरे यहाँ एक महरी काम करती थी मुन्नी ! उसके साथ उसकी बेटी अनीता भी आती थी उसका हाथ बँटाने ! जब भी मौक़ा मिलता वह कभी बच्चों की कहानी की किताब या कोई पत्रिका उठा लेती और उसके पन्ने पलटने लगती ! मुझे लगा वह रंगीन तस्वीरें देखने के लिये मैग्जीन उठा लेती है ! पर एक दिन गौर से देखा तो वह कुछ बुदबुदा रही थी ! मैंने ऐसे ही कौतुहलवश उससे पूछ लिया, “ तुम्हें पढ़ना आता है ? “
और उसका प्रत्युत्तर आशातीत था, “ हाँ, थोड़ा-थोड़ा आता है ! “
मेरे कहने पर कुछ गलत-सलत कुछ सही उसने मुझे थोड़ा सा पढ़ कर दिखाया ! मेरी सोच को दिशा देने के लिये वह एक टर्निंग पॉइंट था ! मैंने उसकी माँ से पूछा इसे पढ़ाती क्यों नहीं हो तो उसकी अंतहीन दुःख भरी कहानी शुरू हो गयी ! पति शराब पी पी कर इतना बीमार है कि उसके दवा इलाज में ही सारे रुपये खर्च हो जाते हैं ! अनीता के अलावा तीन बच्चे और भी हैं ! बस एक बेटे का दाखिला कराया है स्कूल में ! अनीता को साथ ले आती है मदद के लिये ! दूसरी लड़की घर और छोटे बच्चे को सम्हालती है ! सुन कर मुझे दुःख हुआ !
मैंने अनीता से पूछा, “क्या तुम पढ़ना चाहती हो ?” और उस वक्त उसकी आँखों में जो चमक मैंने देखी थी वह अभी तक मेरे ज़ेहन में बिलकुल सुरक्षित है ! मैंने पहले घर पर रोज उसे दिन में एक दो घण्टे पढ़ा कर तैयारी करवाई और नया सत्र आरम्भ होते ही पास के एक अच्छे स्कूल में वहाँ की प्रधानाध्यापिका से मिल कर उसका दाखिला तीसरी कक्षा में करा दिया ! उसकी फीस, स्कूल यूनीफ़ॉर्म, कॉपी किताबें और अन्य सभी चीज़ों का दायित्व मैंने स्वयम् सम्हाल लिया ! रोज घर पर बुला कर उसे पढ़ाना, होम वर्क कराना, उसके हैण्ड क्राफ्ट के काम में उसकी मदद करना यह सब मेरी दिनचर्या के अनिवार्य अंग हो चुके थे ! बीच-बीच में स्कूल जाकर मैं उसकी टीचर्स से मिल कर उसकी रिपोर्ट भी लेती रहती थी ! बहुत बढ़िया तो नहीं लेकिन वह क्लास में ठीक-ठीक चल रही थी ! इसी तरह दो साल गुजर गये और अनीता पाँचवी कक्षा में आ गयी ! मेरे मन में बड़ा संतोष था कि मैं एक पुण्य का काम कर रही हूँ ! और सोचा था कि इसे कम से कम ग्रेजुएट तो ज़रूर बना दूँगी ! सब कुछ मन के मुताबिक़ चल रहा था कि एक दिन मुन्नी खूब सजी-धजी एक निमंत्रण पत्रिका हाथ में लिये चौड़ी सी मुस्कान बिखेरती उपस्थित हो गयी, “ अनीता की सगाई कर दी है बहूजी आज ! अगले महीने में ब्याह की तारीख निकली है ! आपको ज़रूर आना है ! “
क्या कहूँ समझ नहीं पा रही थी ! इस बालिका वधु के ब्याह की खबर पर खुशी व्यक्त कर उसे बधाई दूँ या एक संभावना से भरपूर आकार लेते व्यक्तित्व के मटियामेट हो जाने के लिये दुःख मनाऊँ ! और फिर अगले महीने अनीता की शादी हो गयी और वह पढ़ाई अधूरी छोड़ अपनी ससुराल चली गयी ! कुछ दिन के बाद मुन्नी भी मेरा काम छोड़ गयी ! उसके बाद आठ दस साल गुजर गये होंगे ! मेरी उससे मुलाक़ात नहीं हुई ! एक दिन अचानक वह रास्ते में मिल गयी ! मैंने अनीता के हाल चाल पूछे तो बोली राजी खुशी है अपने घर में ! मैंने पूछा, “कुछ पढ़ाई लिखाई आगे की उसने या सब छोड़ दिया !”
“ अरे कहाँ बहूजी ! चार-चार बच्चे हैं उसके पास ! उन्हें पढ़ायेगी कि खुद पढ़ेगी ! “
मन कसैला हो आया था ! मेरे सुंदर सपने का पटाक्षेप हो चुका था !
आज की मेरी यह रचना ऐसी ही बच्चियों के मन की दमित इच्छओं की प्रतिध्वनि है !

अनुनय

माँ तू देख मुझे भी अब तो लिखना पढ़ना आता है,
भैया जैसा मुझको क ख ग घ लिखना आता है !

नहीं भेजती मुझको तू स्कूल मगर ऐसा क्यों है ?
सारे घर का काम सदा मुझको करना पड़ता क्यों है ?

सब कहते मैं भैया से भी ज्यादह बुद्धी वाली हूँ,
फिर क्यों तुझको माँ लगती मैं निपट अकल से खाली हूँ !

मुझको भी अच्छी लगती है पुस्तक में लिक्खी हर बात,
भैया पढ़ता जोर-जोर से, हो जाती हैं मुझको याद !

मैं भी खूब इनाम लाऊँगी भेजेगी जो तू स्कूल,
अव्वल आऊँगी कक्षा में, नहीं करूँगी कोई भूल !

वापिस घर आकर फिर माँ मैं तेरा हाथ बटाऊँगी,
पर पढ़ने दे मुझको माँ मैं बन कर ‘कुछ’ दिखलाऊँगी !

साधना वैद

Tuesday, November 23, 2010

अब और नहीं

अपने अंतर महल की रसोई में
हर आम भारतीय नारी ने
अपने सपनों की आँच को
सुलगा कर चूल्हा जलाया है,
और कर्तव्यों की कढ़ाही में
अपनी खुशियों और अरमानों
का छौंक लगा कर अपनी
सम्पूर्ण निष्ठा और लगन,
प्रतिभा और समर्पण,
सद्भावना और प्यार के साथ
समस्त परिवार के लिये
आजीवन सुस्वादिष्ट
व्यंजनो को पकाया है !

महज़ इस आस में कि
कभी तो कोई उसके
समर्पण की कद्र करेगा,
उसके अनमोल असाध्य
श्रम को समझेगा, सराहेगा
उसकी कोमल भावनाओं का
सम्मान करेगा !

लेकिन अक्सर यह आशा
धूमिल होते-होते
वक्त की स्लेट से
बिल्कुल ही मिट जाती है
और उस नारी की
प्रत्याशा भी क्षीण होकर
दम तोड़ जाती है !
क्योंकि प्रशंसा के बदले
वह पाती है
उपालंभ और उलाहने,
व्यंग और कटूक्तियां,
तिरस्कार और अवहेलना !

तभी एक आक्रोश उसके मन में
जन्म लेता है और कहीं
अंतरतम की गहराई से
विद्रोह के स्वर फूटते हैं,
“बस बहुत हो गया,
अब और नहीं !”
अब उसे अपनी खुशियों का
और बलिदान नहीं करना है !
अब उसे हर व्यंजन अपनी
खुशियों और अरमानों से सजा कर
किसी और के लिये नहीं
केवल अपने लिये बनाना है
जिससे उसे सुख मिले
उसे संतुष्टि प्राप्त हो
और अपनी नज़रों में उसका
अपना मान बढ़े !

साधना वैद

Saturday, November 20, 2010

जिजीविषा

शुष्क तपते रेगिस्तान के
अनंत अपरिमित विस्तार में
ना जाने क्यों मुझे
अब भी कहीं न कहीं
एक नन्हे से नखलिस्तान
के मिल जाने की आस है
जहां स्वर्गिक सौंदर्य से ओत प्रोत
सुरभित सुवासित रंग-बिरंगे
फूलों का एक सुखदायी उद्यान
लहलहा रहा होगा !

सातों महासागरों की अथाह
अपार खारी जलनिधि में
प्यास से चटकते
मेरे चिर तृषित अधरों को
ना जाने क्यों आज भी
एक मीठे जल की
अमृतधारा के मिल जाने की
जिद्दी सी आस है जो मेरे
प्यास से चटकते होंठों की
तृषा बुझा देगी !

विषैले कटीले तीक्ष्ण
कैक्टसों के विस्तृत वन की
चुभन भरी फिजां में
ना जाने क्यों मुझे
आज भी माँ के
नरम, मुलायम, रेशमी आँचल के
ममतामय, स्नेहिल, स्निग्ध,
सहलाते से कोमल
स्पर्श की आस है
जो कैक्टसों की खंरोंच से
रक्तरंजित मेरे शरीर को
बेहद प्यार से लपेट लेगा !

सदियों से सूखाग्रस्त घोषित
कठोर चट्टानी बंजर भू भाग में
ना जाने क्यों मुझे
अभी भी चंचल चपल
कल-कल छल-छल बहती
मदमाती इठलाती वेगवान
एक जीवनदायी जलधारा के
उद्भूत होने की आस है
जो उद्दाम प्रवाह के साथ
अपना मार्ग स्वयं विस्तीर्ण करती
निर्बाध नि:शंक अपनी
मंजिल की ओर बहती हो !

लेकिन ना जाने क्यों
वर्षों से तुम्हारी
धारदार, पैनी, कड़वी और
विष बुझी वाणी के
तीखे और असहनीय प्रहारों में
मुझे कभी वह मधुरता और प्यार,
हितचिंता और शुभकामना
दिखाई नहीं देती
जिसके दावे की आड़ में
मैं अब तक इसे सहती आई हूँ
लेकिन लाख कोशिश करने पर भी
कभी महसूस नहीं कर पाई !


साधना वैद

Thursday, November 18, 2010

चंद शिकवे

चंद शिकवे हैं हमें आपकी इनायत से ,
कभी तो हाले दिल फुर्सत से सुनाया होता !

उजाड़े आशियाने अनगिनत परिंदों के ,
कोई एक पेड़ मौहब्बत से लगाया होता !

चुभोये दर्द के नश्तर तुम्हारी नफरत ने ,
कभी दिल प्यार की दौलत से सजाया होता !

खिलाए भोज बड़े मंदिरों के पण्डों को ,
कभी भूखों को किसी रोज खिलाया होता !

जलाए सैकड़ों दीपक किया रौशन घर को ,
दिया एक दीन की कुटिया में जलाया होता !

उठाये बोझ फिरा करते हो अपने दिल का ,
कभी तो बोझ किसी सर का उठाया होता !

किये थे वादे जो तुमने महज़ सुनाने को ,
कोई वादा तो कभी मन से निभाया होता !

सुना है बाँटते फिरते हो मौहब्बत अपनी ,
किसी मजलूम को सीने से लगाया होता !

साधना वैद

Sunday, November 14, 2010

बाल दिवस – बच्चों की नज़र में

बच्चों का बहु प्रतीक्षित बाल दिवस फिर से आ पहुँचा है और बच्चे खुश हैं कि स्कूल में आज खूब मज़े आने वाले हैं उन्हें यूनीफ़ार्म नहीं पहननी होगी ! रंगीन कपडे पहन कर जा सकेंगे ! अपनी सबसे खूबसूरत ड्रेस पहनने का और सब दोस्तों को दिखा कर रौब जमाने का मौक़ा मिला है जिसे कोई भी गँवाना नहीं चाहता ! स्कूल में मिठाई मिलेगी और कुछ सांस्कृतिक कार्यक्रम भी होंगे ! आज के दिन टीचर्स की झिड़कियों और पढ़ाई के नीरस क्रम में कुछ ब्रेक लगेगा ! शायद किसी स्कूल में बच्चों को फिल्म दिखाई जाये या किसी स्कूल में बच्चों को पिकनिक पर ले जाया जाए ! जो कुछ भी हो बस आज खूब मस्ती होगी और खूब धमाल होगा ! आज के बच्चों के लिये ‘बाल दिवस’ का इतना ही महत्त्व है !
कल का अखबार देख कर दुःख हुआ कि शहर के नामी गिरामी स्कूलों के बच्चों से जब यह पूछा गया कि बाल दिवस क्यों मनाया जाता है तो अधिकाँश बच्चे इसका सही उत्तर नहीं दे पाए ! कई बच्चों में से केवल दो ही बच्चे बता पाये कि नेहरू जी के जन्मदिन को बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है क्योंकि वे बच्चों से बहुत प्यार करते थे ! आश्चर्य होता है कि स्कूल्स में शिक्षक बच्चों को क्या पढ़ाते हैं और बच्चे क्या ग्रहण करते हैं ! जिस दिवस को हर साल इतने जोर शोर से मनाया जाता है, जिसके कार्यक्रमों के लिये कई दिन पहले से रिहर्सल होती रहती है क्या उस दिन के महत्त्व के बारे में बच्चों को कोई जानकारी नहीं दी जाती ! किसीने इसे डॉ. राधाकृष्णन का जन्मदिन बताया तो किसीने इंदिरा गाँधी का तो किसीने कह दिया ‘किसी नेता का जन्मदिन होता है नाम नहीं मालूम !’ दुःख होता है यह देख कर कि हम पौधों के पत्तों को तो खूब चमका रहे हैं धो पोंछ कर पर उनकी जड़ों की उपेक्षा कर रहे हैं ! जिस महामानव ने देश के लिये अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया, अपने शरीर के कण-कण को देश के लिये समर्पित करने के उद्देश्य से जिसने मरणोपरांत अपने शरीर की राख को गंगा में विसर्जित करने के स्थान पर देश की माटी में मिला देने की इच्छा व्यक्त की, उसके बलिदान को कितनी आसानी से सबने भुला दिया ! जब देश के नेताओं ने और प्रबुद्ध वर्ग ने ही नेहरू जी के आदर्शों को तिलांजलि दे दी है और उन्हें भुला दिया है तो बच्चों से क्या उम्मीद रखी जा सकती है ! वे अबोध तो उतना ही जान पायेंगे जितना उन्हें बताया जाएगा ! उनके चरित्र निर्माण का दायित्व, उनकी रुचियों की निखारने का दायित्व और उनकी सोच को एक सार्थक दिशा देने का दायित्व किसका है ? क्या शिक्षक गण और माता पिता अपने इस कर्तव्य को भूल गये हैं ? वरना क्या कारण है कि आज के बच्चे जितना अभिनेता अभिनेत्रियों के बारे में जानकारी रखते हैं अपने देश के नेताओं के बारे में कुछ भी नहीं जानते ! क्या हमें अपनी शिक्षा प्रणाली में कुछ सुधार लाने की ज़रूरत नहीं है या फिर माता पिता को भी अपने बच्चों के सामान्य ज्ञान के सन्दर्भ में कोई दिलचस्पी नहीं रह गयी है ?

साधना वैद

Wednesday, November 10, 2010

अबूझे सवाल

तुमने ही पुकारा था तब सौ बार हमें,
जब प्यार नहीं था तो जताया क्यों था !

रहने को ठिकाने थे बहुत मेरे लिये,
आँखों में बसा कर के गिराया क्यों था !

हमसे तो वफ़ा की बहुत तकरीरें कीं,
जो खुद नहीं सीखे वो सिखाया क्यों था !

मुझको तो ज़मीं से भी बहुत निस्बत थी,
फिर ऊँचे फलक पर यूँ बिठाया क्यों था !

जब वक्त की आँधी से बचाना ही न था,
बुझने के लिये दीप जलाया क्यों था !

जो इश्क इबादत सा कभी लगता था,
उस इश्क की कसमों को भुलाया क्यों था !

जिस नाम की कीमत बहुत थी नज़रों में,
दिल पर उसे लिख कर के मिटाया क्यों था !

तुम थे ही नहीं प्यार के काबिल फिर भी,
हर रस्म को इस दिल ने निभाया क्यों था !

साधना वैद

Monday, November 8, 2010

कभी तो सोचिये

हमारे देश में एक वक्त ऐसा भी आया था जब सम्पूर्ण भारत भीषण खाद्य समस्या से जूझ रहा था ! खाद्यान्न आयात करने के लिये हमें अन्य संपन्न देशों की मुखापेक्षा करनी पड़ती थी किन्तु फिर भी गरीबी की रेखा के नीचे रहने वाले अनेक भारतवासियों को आधे पेट भूखे रह कर या कंद मूल खाकर अपनी जठराग्नि को शांत करना पड़ता था ! तब हमारे देश के प्रधानमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री थे ! मुझे याद है उन्होंने आह्वान किया था कि यदि सभी लोग सप्ताह में एक दिन एक समय का भोजन त्याग दें तो खाद्य समस्या के निवारण में बहुत मदद मिलेगी और कितने ही भूखे लोगों की क्षुधा शांत करने का उपाय संभव हो सकेगा ! उनकी एक पुकार पर अनेक भारतवासियों ने सोमवार की शाम को भोजन ना करने का संकल्प लिया था और उस दिन हमारे यहाँ भी घर के सभी सदस्य व्रत रखते थे ! इस व्रत को जितनी भावना और ईमानदारी के साथ हम लोग रखते थे शायद किसी भी धार्मिक व्रत को इस तरह हमने कभी नहीं रखा होगा ! हमें याद है कि कैसे थाली में जूठा खाना छोडने के लिये डाँट पडती थी और खाना परोसने से पहले कई बार हिदायत दी जाती थी कि उतना ही खाना लेना जितना खा सको ! मुझे यह भी याद है कि एक सर्वे के निष्कर्ष में यह तथ्य भी सामने आया था कि संपन्न लोग यदि ओवर ईटिंग ना करें और खाना बर्बाद ना करें तो खाद्य समस्या से आसानी से निपटा जा सकता है ! उस समय की यादें आज भी मन मस्तिष्क में ताज़ा हैं ! कैसे हम सब सहेलियां मिल कर इस गंभीर समस्या पर तर्क वितर्क करते थे और स्कूल में लंच टाइम में जो लडकी खाना फेंकते हुए या जूठा छोडते हुए दिखाई दे जाती थी कैसे बाकी सब लडकियां मिल कर जी भर कर उसकी भर्त्सना कर उस पर टूट पड़ते थे ! उन दिनों के संस्कार आज भी मुझमें ज्यों के त्यों जीवित हैं और आज भी मुझे थाली में जूठन छोडना या खाना बर्बाद करना बिलकुल अच्छा नहीं लगता !
देश में खाद्य समस्या का राग अब सुनाई नहीं देता ! लेकिन हालात में सुधार शायद अभी भी बहुत अधिक नहीं हुआ है ! अब खाद्यान्न के मामले में देश आत्मनिर्भर तो हो गया है लेकिन यह अनाज गरीबों के मुख तक अब भी नहीं पहुँच पाता ! वह या तो मुनाफाखोर व्यापारियों को औने पौने दामों में उपलब्ध करा दिया जाता है जिसकी चौगुनी कीमत बढ़ा कर वे उसे बाज़ार में बेचते हैं या फिर वह सरकारी गोदामों नें सड़ कर अंतत: समुद्र के हवाले कर दिया जाता है ! किसी भी दशा में वह गरीब आदमी की पहुँच से दूर होता है ! ऐसे हालात में क्या हमें अपनी आदतों और तौर तरीकों पर एक बार चिंतन मनन नहीं करना चाहिए ?
आजकल किसी भी आयोजन में दावतों का स्वरुप बिलकुल बदल गया है ! इतने असंख्य व्यंजन मेनू में होते हैं कि सभी को तो चखना भी संभव नहीं होता ! पहले तो स्टार्टर्स के नाम पर अनेक प्रकार के चाट के आइटम होते हैं ! चाट के शौक़ीन लोग इन आइटम्स पर टूट पड़ते हैं और स्वाद स्वाद में ज़रूरत से कहीं ज्यादह अपनी प्लेटों में भर लेते हैं और जब खाया नहीं जाता तो भरी भराई प्लेटें नीचे सरका देते हैं ! इसके बाद बारी आती है मेन कोर्स की ! पेट तो तरह तरह की चाट से ही भर जाता है लेकिन अगर मेन कोर्स का खाना नहीं खाया तब तो समझिए जीवन ही निष्फल हो गया ! और फिर वही होता है जो नहीं होना चाहिए ! अगर आप ध्यान देंगे तो पायेंगे कि खाना खाकर अपनी प्लेट को जब लोग बास्केट में रखते हैं तो उन प्लेटों में इतना खाना भरा पड़ा होता है कि किसी एक व्यक्ति का पेट आसानी से भर जाए ! ऐसी कितनी प्लेटों का जूठा खाना कूड़े के ढेर पर फेंक दिया जाता है और कई पेटों की भूख के निवारण का साधन इस तरह बर्बाद कर दिया जाता है ! क्या यह विचारणीय नहीं है कि अपनी प्लेट में सिर्फ उतना ही भोजन परसें कि जूठा बचे ही नहीं ! और उससे भी बड़ी ज़रूरत इस बात पर ध्यान देने की भी है कि क्या दावतों का स्वरुप और मेनू छोटा नहीं किया जा सकता कि खाने की इस तरह से बर्बादी ना हो ? मैंने ऐसे आयोजन स्थलों के आस पास कई गरीब और भूखे बच्चों और वयस्कों को भोजन की आशा में घूमते हुए देखा है जिन्हें निर्ममता से वहाँ से दूर खदेड़ दिया जाता है लेकिन क्या हम इतने असंवेदनशील हो गए हैं कि हमें किसीकी भूख प्यास, दुःख दर्द अब बिलकुल नहीं छूते ? ना ही अपना गैर जिम्मेदाराना व्यवहार हमें अखरता है जब हम भोजन को बर्बाद कर फेंकने में ज़रा भी नहीं हिचकते और ना ही किसी गरीब को खाना देने की बजाय उसे अपमानित कर दुरदुरा कर भगाने में कोई शर्म महसूस होती है !
भगवान का आप धन्यवाद करिये कि उसने आपको इतना सक्षम और संपन्न बनाया है कि आप इतनी आलीशान दावतें खिलाने और खाने की हैसियत रखते हैं लेकिन अपनी विभिन्न प्रकार के व्यजनों से भरी जूठी प्लेट फेंकते वक्त इतना ज़रूर याद रखियेगा कि कहीं कुछ ऐसे इंसान भी हैं जिन्हें इस भोजन की सख्त ज़रूरत है और अगर आपने इसे इस तरह से बर्बाद न किया होता तो शायद आज किसी भूखे का पेट भर जाता !

साधना वैद

Saturday, October 30, 2010

टूटे घरौंदे

जब मन की गहनतम
गहराई से फूटती व्याकुल,
सुरीली, भावभीनी आवाज़ को
हवा के पंखों पर सवार कर
मैंने तुम्हारा नाम लेकर
तुम्हें पुकारा था !
लेकिन मेरी वह पुकार
वादियों में दूर दूर तक
ध्वनित प्रतिध्वनित होकर
मुझ तक ही वापिस लौट आई
तुम तक नहीं पहुँच सकी !

जब तीव्र प्रवाह के साथ बहती
वेगवान जलधारा की
चंचल चपल लहरों पर
अपनी थरथराती तर्जनी से
मैंने तुम्हारा नाम लिखा था
और जो अगले पल ही पानी में
विलीन हो गया और
जिसे तुम कभी पढ़ नहीं पाये !

जब जीवन सागर के किनारे
वक्त की सुनहरी रेत पर
मैंने तुम्हारे साथ एक नन्हा सा
घरौंदा बनाना चाहा था
लेकिन उसे बेरहम चक्रवाती
आँधी के तेज झोंके
धरती के आँचल के साथ
अपने संग बहुत दूर उड़ा ले गये
और तुम उस घरौंदे को
कभी देख भी ना सके !

और अब जब ये सारी बातें
केवल स्मृति मंजूषा की धरोहर
बन कर ही रह गयी हैं तो
कैसा दुःख और कैसी हताशा !
जहाँ नींव ही सुदृढ़ नहीं होगी
तो भवन तो धराशायी होंगे ही
फिर चाहे वो सपनों के महल हों
या फिर यथार्थ के !

साधना वैद !

Thursday, October 28, 2010

चुनौती

खामोशियों के किनारों से
मौन की निशब्द बहती धारा में
मुझे बहुत गहरे उतरना है
और अंगार सी धधकती सीपियों से
शीतल, सुमधुर, सुशांत शब्दों के
माणिक मुक्ता चुन कर लाने हैं !

दर्द भरे स्वरों के आरोह अवरोह पर
सवार हो वेदना के गहरे सागर में
डूब कर भी मुझे अपने कंठ के
अवसन्न मृतप्राय स्वरों में
उमंग और उल्लास के
जीवन से भरपूर उन
स्वरों को जिलाये रखना है
जो सुखों की सृष्टि कर सकें !

कड़वाहट के बदरंग घोल में
डूबे अपनी चाहतों के
जर्जर आँचल को मुझे
बाहर निकालना है
और उसे झटकार कर
दायित्वों की अलगनी पर
इस तरह सुखाना है
कि किसी पर भी उस
बदरंग घोल के छींटे ना आयें
और मेरे उस जर्जर आँचल से
हर्ष और उल्लास के
खुशनुमां सुगन्धित फूल
चहुँ ओर बिखर जाएँ !

साधना वैद

Sunday, October 24, 2010

संकल्प

अब से
आँखों के आगे पसरे
मंज़रों को झुठलाना होगा,
कानों को चीरती
अप्रिय आवाजों को भुलाना होगा,
मन पर पड़ी अवसाद की
शिलाओं को सरकाना होगा,
दुखों के तराने ज़माने को नहीं भाते
कंठ में जोश का स्वर भर
कोई मनभावन ओजस्वी गीत
आज तम्हें सुनाना होगा !
ऐ सूरज
आज मुझे अपने तन से काट
थोड़ी सी ज्वाला दे दो
मुझे अपने ह्रदय में विद्रोह
की आग दहकानी है,
मुझे बादलों की गर्जन से,
सैलाब के उद्दाम प्रवाह से,
गुलाब के काँटों की चुभन से
और सागर की उत्ताल तरंगों की
भयाक्रांत कर देने वाली
वहशत से बहुत सारी
प्रेरणा लेनी है !
अब मुझे श्रृंगार रस के
कोमल स्वरों में
संयोग वियोग की
कवितायें नहीं कहनी
वरन् सम्पूर्ण बृह्मांड में
गूँजने वाले
वीर रस के ओजस्वी स्वरों में
जन जागरण की
अलख जगानी है !
और सबसे पहले
स्वयं को नींद से जगाना है !

साधना वैद

Wednesday, October 20, 2010

कोई तो होता

कोई तो होता
जिसे अपने पैरों के छाले
मैं दिखा पाती और
जो महसूस कर पाता कि
कितने दिनों से अंगारों पर
मैं अकेली चली जा रही हूँ,
वो आगे बढ़ कर मुझे सहारा देकर
इन अंगारों से बाहर खींच लेता
और मेरे जलते पैरों पर
प्यार की बर्फ फेर कर
उन्हें शीतल कर देता !

कोई तो होता
जिससे मैं अपने मन की
हर बात कह पाती
और वह अपनी ओर से
कुछ भी जोड़े घटाए बिना
सिर्फ मुझे बोलने देता
और मैं अपना सारा गुबार
उसके सामने बाहर निकाल कर
बिलकुल रिक्त हो जाती !

कोई तो होता
जो मेरे दग्ध ह्रदय की
हर बात बिन बोले ही
समझ लेने का माद्दा रखता,
मेरी हर ख्वाहिश को
पूरा करने की चाहत रखता ,
जिसे मेरी बातें सुनना अच्छा लगता,
जिसे मेरे साथ समय बिता कर
मुस्कुराने का मन होता,
जो मन से मेरे साथ की लालसा
अपने ह्रदय में संजो कर रखता !

कोई तो होता
जो मेरे व्यथित ह्रदय की
वेदना की भाषा को समझता
मेरे मस्तक पर प्यार से हाथ फेर
मुझे आश्वस्त कर देता,
और मेरी आँखों से बहती
अविरल अश्रुधारा को
अपनी उँगलियों से पोंछ
मेरे मन को पीड़ा के भार से
हल्का कर देता !

कितना प्राणान्तक है
यह ख़याल कि
किसी को मेरी चाहत नहीं,
किसीको मेरी ज़रूरत नहीं,
किसीको मेरे होने ना होने से
कोई फर्क नहीं पड़ता,
मैं बस व्यर्थ में जिए जा रही हूँ
बेवजह, बेज़रूरत,
बेआस, बेआवाज़
सिर्फ इसलिए कि
साँसों के विस्तार पर
अपना कोई वश नहीं है !

कोई तो होता
जो सिर्फ एक बार कह देता
ऐसा तो बिलकुल नहीं है
मेरे लिये तुम
बहुत कीमती हो
और मुझे तुम्हारी
बहुत ज़रूरत है !

साधना वैद

Thursday, October 7, 2010

* क्या है मेरा नाम *

उस दिन अपनी एक डॉक्टर मित्र संजना के यहाँ किसी काम से गयी थी ! संजना अपने क्लीनिक में मरीजों को देख रही थी ! मुझे हाथ के संकेत से अपने पास ही बैठा लिया ! सामने की दोनों कुर्सियों पर एक अति क्षीणकाय और जर्जर लगभग ८० वर्ष के आस पास की वृद्ध महिला और एक नौजवान लड़की, लगभग १६ -१७ साल की, बैठी हुईं थीं ! वृद्धा की आँखों पर मोटे लेंस का चश्मा चढ़ा हुआ था ! कदाचित वह अपनी पोती के साथ अपनी किसी तकलीफ के निदान के लिये संजना के पास आई थीं ! संजना ने उनकी सारी बातें ध्यान से सुनीं और प्रिस्क्रिप्शन लिखने के लिये पेन उठाया ! आगे का वार्तालाप जो हुआ उसे आप भी सुनिए –

संजना - अम्मा जी अपना नाम बताइये !

पोती - आंटी ज़रा जोर से बोलिए दादी ऊँचा सुनती हैं !

संजना - अम्मा जी आपका नाम क्या है ?

पोती - दादी आंटी आपका नाम पूछ रही हैं !

दादी - नाम ? मेरो नाम का है ? मोए तो खुद ना पतो !

संजना – तुम ही बता दो उन्हें याद नहीं आ रहा है तो !

पोती – आंटी दादी का नाम तो मुझे भी नहीं पता ! हम तो बस दादी ही बुलाते हैं !

संजना – अम्माजी आपको घर में किस नाम से बुलाते हैं सब ?

इतनी देर में वार्तालाप के लिये सही वोल्यूम सेट हो गया था !

दादी – घर में तो सब पगलिया पगलिया कहत रहे ! छोट भाई बहन जीजी जीजी कहके बुलात रहे ! सादी के बाद ससुराल में अम्माजी बाऊजी दुल्हन कह के बुलात रहे ! मोकूँ कबहूँ मेरो नाम से काऊ ने ना बुलायो ! तो मोए तो पतो ही नईं है ! ना जाने का नाम रखो हतो बाउजी ने !

संजना – घर में और रिश्तेदार भी तो होंगे जो आपसे बड़े होंगे वो कैसे बुलाते थे ?

दादी – हाँ बुलात तो रहे पर कोई को मेरो नाम लेबे की कबहूँ जरूरत ही ना परी ! सब ऐसे ही बुलात रहे बिसेसर की दुल्हन, के रोहन की माई और के रजनी की माई ! बच्चा बच्ची सब अम्मा, माई कहके बुलात रहे !

विश्वेश्वर उनके पति का और रोहन और रजनी उनके बच्चों का नाम था !

संजना – अरे कोई तो होगा आस पड़ोस में जो आपको किसी नाम से बुलाता होगा !

दादी सोच में डूबी कुछ असहज हो रही थीं !

दादी – हाँ बुलात काहे नहीं रहे ! रामेसर और दुलारी दोऊ देबर ननद भाभी कहत रहे ! उनके बाल गोपाल बबलू, बंटी, गुडिया, मुनिया सब ताईजी कहत रहे ! भाई बहिन के बच्चा कोऊ बुआ तो कोई मौसी कहत रहे ! नन्द के बच्चा मामी कहके बुलात रहे ! आस पड़ोस के लोग कोई काकी तो कोई चाची कहके बुलात रहे ! मेरे को अपनो नाम सुनबे को कोई काम ही ना परो कबहूँ ! मोए सच्चेई याद ना परि है कि मेरो का नाम है !पोती को भी दिलचस्पी हो रही थी वार्तालाप में बोल पडी !

पोती – अच्छा दादी दादाजी आपको किस नाम से बुलाते थे ?

दादी सकुचा गईं !

दादी – जे कैसो सवाल है लली ? हमार जमाने में मरद अपनी जोरू को नाम ना ले सकत थे ! ना उन्होंने कभी मोए पुकारो ! बस पास आयके काम बता देत थे सो हम कर दिया करती थीं ! कभी बहुत जरूरत परी तो ‘नेक सुनियो’ से काम चल जात थो !

दादी घोर असमंजस में थीं ! मैं भी सोच रही थी वाकई स्त्री की क्या पहचान है ! उसका अपना सारा परिचय इतने टुकड़ों में बँट जाता है कि वह स्वयं अपनी पहचान खो देती है ! वृद्धा दादी की याददाश्त क्षीण हो गयी थी ! वे शायद इसीका इलाज कराने आयी थीं ! विडम्बना देखिये उन्हें बाकी सबके नाम याद थे लेकिन अपना नाम ही याद नहीं था ! शायद इसलिये कि अपनी याददाश्त में उन्हें उनके अपने नाम से कभी किसीने पुकारा ही नहीं ! शायद इसलिए कि उन्होंने कभी अपने लिये जीवन जिया ही नहीं ! अनेक रिश्तों में बंधी वे अपने दायित्व निभाती रहीं और अपनी पहचान खोती रहीं और उससे भी बड़ी बात बच्चों तक को उनका नाम याद नहीं है जैसे स्त्री का अपना कोई स्थान, कोई वजूद या कोई पहचान नहीं है वह महज एक रिश्ता है और उसका दायित्व उस रिश्ते के अनुकूल आचरण करना है ! इन सारे रिश्तों की भीड़ में वह कभी ढूँढ नहीं पाती कि उसका स्वयं अपने आप से भी कोई रिश्ता है जिसके लिये उसे सबसे अधिक जागरूक और प्रतिबद्ध होने की ज़रूरत है !

यह संस्मरण सत्य घटना पर आधारित है ! हैरानी होती है यह देख कर कि आज के युग में भी ऐसे चरित्रों से भेंट हो जाती है जो सदियों पुरानी स्थितयों में जी रहे हैं ! ग्रामीण भारत में जहाँ आज भी शिक्षा का प्रसार यथार्थ में कम और सरकारी फाइलों में अधिक है ऐसे उदाहरण और भी मिल सकते हैं ! सोचिये, जागिये और कुछ ऐसा करिये कि कम से कम आपके आस पास रहने वाली हर स्त्री सबसे पहले खुद से रिश्ता जोड़ना सीख सके !

साधना वैद

Monday, October 4, 2010

* अंतर्व्यथा *

मेरी सपनीली आँखों के बेहद

सुन्दर उपवन में अचानक

सूने मरुथल पसर गए हैं

जिनमें ढेर सारे ज़हरीले

कटीले कैक्टस उग आये हैं ,

ह्रदय की गहरी घाटी में

उमंगती छलकती अमृतधारा

वेदना के ताप से जल कर

बिल्कुल शुष्क हो गयी है,

और अब वहाँ गहरे गहरे

गड्ढे निर्मित हो गए हैं,

भावना के अनंत आकाश में

उड़ने के लिये आतुर मेरे

अधीर मन पंछी के पंख

टूट कर लहू लुहान हो गए हैं

और वह भूमि पर आ गिरा है,

बहुत प्यार से परोसी गयी

"तुम्हारी" अत्यंत स्वादिष्ट

व्यंजनों की थाली की हर कटोरी में

रेत ही रेत मिल गयी है,

जो मेरे मुख को किसकिसा

कर घायल कर गयी है !

अपने बदन को जिस बेहद

मुलायम, मखमली, रेशमी

आँचल से लपेट मैं आँखें मूँद

उसकी स्निग्ध उष्मा और नरमाई

को महसूस कर रही थी

किसीने अचानक झटके से

उसे मेरे बदन से खींच डाला है

और अनायास ही वह

मखमली आँचल रेगमाल सा

खुरदुरा हो मेंरे सारे जिस्म को

खँरोंच कर रक्तरंजित कर गया है !

जीवन खुशनुमाँ हो न हो

पर इतना भी बेगाना

इससे पहले तो कभी न था

जैसा आज है !

साधना वैद

Friday, October 1, 2010

* कहाँ हो तुम बापू *

बापू के पुण्य जन्म दिवस २ अक्टूबर पर उन्हें एक भावभीनी श्रद्धांजलि एवं एक सविनय प्रार्थना !


बापू तब तुमने जिनके हित बलिदान दिया,

अपने सुख, अपने जीवन को कुर्बान किया,

अब देख पतन उनका दिल तो दुखता होगा,

अपने सपनों का यह दुखांत चुभता होगा !

सच को अपने जीवन में तुमने अपनाया,

सच पर चलने का मार्ग सभी को दिखलाया,

पर भटक गए हैं बापू तेरे शिष्य सभी,

वो भूल चुके हैं जो शिक्षा थी मिली कभी !

है उनका इष्ट आज के युग में बस पैसा,

वह काला हो या फिर सफ़ेद बस हो पैसा,

जो सत्ता की कुर्सी पर जम कर बैठे हैं,

वो आदर्शों की चिता जला कर बैठे हैं !

सच की अवहेला उनका पहला धर्म बना,

हिंसा के पथ पर चलना उनका कर्म बना,

अब नहीं रहे वो वैष्णव पर दुःख कातर जो,

वो नहीं बाँटते पीर पराई कुछ भी हो !

भोली जनता है फिर से शोषित आज हुई,

वह अपनों के ही हाथों फिर से गयी छली,

भारत है फिर से वर्ग भेद में बँटा हुआ ,

पैसे वाला औ धनी, गरीब गरीब हुआ !

है जनता संकटग्रस्त कहाँ हो तुम बापू,

हैं भ्रष्ट हमारे नेता, तुम आओ बापू,

क्या जात पाँत का भेद भाव सह पाओगे ?

हिंसा का तांडव देख सहम ना जाओगे ?

अपने स्व;राज में भी जनता है शोषित क्यों,

जैसी तब थी उसकी हालत है ज्यों की त्यों,

बापू है जनता हिंसक और अराजक गर,

इसको विरोध का ढंग सिखाओ तुम आकर !

पर हित तुमने सुख अपने सब बिसराए थे,

तन ढँक सबका खुद एक वस्त्र में आये थे,

पर खुद से आगे नहीं देख ये पाते हैं,

मानवता की बातें भी ना सुन पाते हैं !

जब करते हैं विकास की नकली सी बातें,

जब शतरंजी चालों की हैं बिछती बीसातें,

जब आम आदमी प्यादे सा मारा जाता,

जब मँहगाई की मार नहीं वह सह पाता !

जब धर्म जाति के नाम लहू है बह जाता,

जब निज लालच के हित इमान है बिक जाता,

जब आधा भारत भूखा ही है सो जाता,

जब टनों नाज गोदामों में है सड़ जाता !

जब घटती है थाली में सब्जी की गिनती,

जब सुनता कोई नहीं गरीबों की विनती,

तब याद तुम्हारी आती है प्यारे बापू,

तुम होते तो कर देते कुछ ऐसा जादू !

सब जोर जुल्म का विलय दिलों में हो जाता,

छल कपट ह्रदय का पल में ओझल हो जाता,

तुम सत्य, अहिंसा, प्रेम, त्याग का पाठ नया,

फिर से सिखला दो और दिखा दो मार्ग नया !

भारत का गर्त हुआ गौरव दिखता होगा,

इस धूमिल छवि को देख ह्रदय जलता होगा,

तुम आओ बापू, एक बार फिर आ जाओ,

अपने भारत को फिर से मान दिला जाओ !

तुम आओ बापू, एक बार फिर आ जाओ,

अपने भारत को फिर से मान दिला जाओ !


साधना वैद

Monday, September 27, 2010

* हमारी भी सुनो *

मैं राम,
मैंने तो तुम्हें सदा
दया का मार्ग दिखाया था,
सदा प्रेम और अहिंसा का
पाठ पढ़ाया था !
यह आज तुम मेरी किस
शिक्षा का अनुसरण कर रहे हो ?
ऐसी क्रूरता और निर्ममता की सीख
मैंने तुम्हें कब दी थी बताओ
कि आज तुम अपने ही
भाई बंधुओं को मारने पर
तुले हुए हो !
क्या रामायण और अन्य सभी
वेद पुराणों को पढ़ कर
तुम्हें यही सब करने की
प्रेरणा मिलती है ?
मैं गोविन्द सिंह,
मैंने तो हमेशा तुम्हें
निर्बल और मजबूर की
रक्षा करने का
संकल्प लेने के लिये
प्रेरित किया था
यह आज तुम किस पर
हथियार उठा रहे हो ?
क्या गुरु बानी के
किसी भी सबद में
ऐसी धर्मान्धता का सन्देश
तुम्हें सुनाई देता है
जो आज तुम
सारी इंसानियत और भाईचारे
की भावना को बिसरा कर
एक दूसरे का गला काटने के लिये
तलवारें भांज रहे हो ?
मैं मौहम्मद,
मैंने तो तुम्हें सदा एक
रहमदिल इंसान बनने का
मशवरा दिया था,
हर गरीब और मजलूम की
हिफाज़त करने का हुक्म दिया था
फिर यह तुम किसकी इजाजत से
बर्बरता का नंगा नाच
नाचने पर आमदा हो ?
क्या तुम्हारे अंदर का इंसान
बिलकुल मर चुका है ?
क्या कुरान-ए-पाक की आयतों
को पढ़ कर तुम्हें यही
सीख मिलती है कि तुम अपने ही
भाइयों की हिफाज़त करने की जगह
उनके सर कलम करना चाहते हो ?
मैं यीशू,
मैंने तो अपने मूल्यों
अपने आदर्शों की कीमत पर
कभी कोई समझौता नहीं किया
और हँसते-हँसते सूली पर चढ़ गया
फिर तुम आज किस धर्म की रक्षा की
दुहाई दे रहे हो ?
क्या पवित्र बाइबिल को पढ़ कर
तुमने यही सीखा है ?
ज़रा अपनी ज़मीनी
महत्वाकांक्षाओं से उबरो,
अपनी संकीर्ण मानसिकता
की कैद से बाहर निकलो,
बरगलाने वाले और
गुमराह करने वाले
मतलबी और स्वार्थी
अपने तथाकथित रहनुमाओं
की चढाई हुई धर्मान्धता की
काली पट्टी को
अपनी आँखों से उतारो
और ऊपर देखो
हम चारों भाई
कितने प्यार और विश्वास से
यहाँ हिलमिल कर रहते हैं
और चाहते हैं कि तुम भी धरती पर
प्यार और भाईचारे का ऐसा ही
सन्देश प्रचारित प्रसारित करो !
हमें ही तो खुश करना चाहते हो ना ?
तो यही हमारी शिक्षा है
और यही हमारी आज्ञा है !
तुम हमारे सच्चे अनुयायी हो
तो आज यह संकल्प लो
कि अहिंसा और सत्य के मार्ग पर चलोगे
और कभी किसी निर्बल और
बेगुनाह पर वार नहीं करोगे
यही हमारी सच्ची पूजा,
सच्ची सेवा, सच्ची इबादत
और सच्ची पार्थना होगी
इसके विपरीत सब गुनाह है
सिर्फ और सिर्फ गुनाह !

साधना वैद

Saturday, September 25, 2010

* डिजनीलैंड -- एक स्वप्नदृष्टा का साकार हुआ सपना * -भाग २



पिछले भाग में हम लोगों ने डिजनीलैंड में मेन स्ट्रीट यू एस और एडवेंचरलैंड की सैर की थी चलिये अब हम इसके आगे बढ़ते हैं !
एडवेंचरलैंड से आगे है न्यू ओर्लियंस स्क्वेयर ! इसमें प्रमुख दो राइड्स हैं, पाइरेट्स ऑफ कैरीबियन और हॉन्टेड मैन्शन ! पाइरेट्स ऑफ कैरीबियन की राइड बहुत दिलचस्प है ! यह हमें खींच कर उस युग विशेष में ले जाती है जब यात्राएं जहाज़ों और नावों के द्वारा की जाती थीं और समुद्री डाकू हमला करके नाविकों की सारी धन दौलत लूट लेते थे ! पूरी राइड के दौरान झाँकियों और साउंड ट्रैक के माध्यम से उस काल को बखूबी जीवंत किया गया है ! अट्टहास करते, हीरे-मोती, सोने-चाँदी के आभूषण और सिक्के बटोरते लुटेरों के दृश्य रीढ़ की हड्डी में कंपन पैदा कर देते हैं ! यह यात्रा बहुत ही ज्ञानवर्धक और आनंददायी थी !
इसके उपरान्त हॉन्टेड मैन्शन की सैर भी उतनी ही दिलचस्प थी ! इस महल में रहने वाले लोगों की दुर्घटनावश मृत्यु हो जाती है और अब उनकी प्रेतात्माएं इसी महल में रहती हैं ! महल के हर कक्ष में उनकी गतिविधियाँ दर्शकों का भरपूर मनोरंजन करती है ! कहीं वे डाइनिंग टेबिल पर बैठी है तो कहीं बॉल डांस करती नज़र आती हैं ! इस भवन की सैर भी मजेदार सी थी किन्तु अन्धकार में भूत प्रेतों के कारनामें छोटे बच्चों को सहमा देते हैं !
फ्रंटियरलैंड हमारा अगला पड़ाव था ! इसमें सबसे मजेदार राइड बिग थंडर माउन्टेन रेल है ! यह भी एक ज़बरदस्त रोलर कोस्टर राइड है ! पहाड़ी के खतरनाक ऊँचे-नीचे, टेढ़े-मेढे रास्तो पर कभी अंधेरी सुरंग के बीच तो कभी तेज धूप में होकर गुज़रती तेज गति की यह ट्रेन राइड अत्यंत रोमांचकारी है और दिल की धड़कनों को बढ़ा देती है ! ट्रेन के हर कोच में केवल दो लोगों के ही बैठने की व्यवस्था होती है ! सुरक्षा के इंतजाम बहुत पुख्ता होते हैं हर राइड में ! एक और विशेषता है कि हर राइड में उतरने वालों के लिये अलग मार्ग होता है और चढने वालों के लिये अलग ! इस तरह भीड़ का संचालन बहुत कुशलता से हो जाता है !
इसीके पास गोल्डन होर्स शू सैलून है जहां बिलीहिल और हिलबिली म्यूजिशियंस का स्टेज पर संगीत का प्रोग्राम चलता रहता है ! कई कलाकार दर्शकों का मन बहलाने के लिये कॉमीकल स्किट्स करते रहते हैं ! डिज़्नी लैंड में किसी राइड पर बैठें या ना बैठें दर्शकों के लिये बाहर ही मनोरंजन के भरपूर साधन होते हैं ! डिज़्नी के सारे कार्टून केरेक्टर्स दर्शकों से मिलने के लिये और उनके साथ फोटो खिंचवाने के लिये ग्राउंड में घूमते हुए मिल जाते हैं ! अपने प्यारे प्लूटो, मिकी माउस, मिनी माउस, गूफी, टिगर इत्यादि से मिल कर और उनके साथ फोटो खिंचवा कर बच्चे बहुत खुश होते हैं !
फ्रन्टियरलैंड के ही सामने है क्रिटर कंट्री ! इसकी सबसे रोमांचक राइड है स्प्लैश माउन्टेन राइड ! इस रोलर कोस्टर राइड में जब सवारी जलधारा के बीच तेज गति से दौड़ती हुई गहरे अन्धकार से बाहर निकल कर अनायास गहरी ढलान पर तेज़ी से नीचे गिरती है तो भय के मारे आँखे बंद हो जाती हैं और मुँह से चीख निकल जाती है ! इसी पॉइंट पर कहीं छिपे कैमरे सबकी तस्वीरें कैद कर लेते हैं और राइड से बाहर आते समय प्रोजेक्टर पर अपनी तस्वीर देख कर दर्शक बहुत उल्लसित हो जाते हैं ! आमदनी का यह भी एक बहुत अच्छा साधन है ! शायद ही कोई व्यक्ति होगा जो खरीदने से इनकार करेगा ! डिजनीलैंड की इससे मधुर स्मृति और क्या होगी ! यहाँ पर ऐसी रोमांचक कई राइड्स में इसी तरह से कैमरे लगे हुए हैं !
अगला मुकाम हमारा था फैन्टेसीलैंड ! इसमें बच्चों की कई सारी राइड्स हैं ! एलिस इन वंडरलैंड , पिनाकियो, स्नोव्हाईट एंड सेवेन ड्वार्फ्स , स्लीपिंग ब्यूटी आदि की कहानियाँ ऐसी ही रोलर कोस्टर राइड्स के माध्यम से झाँकियों और चित्रों के द्वारा दिखाई गयी हैं ! बस यहीं पर मुझे एक बात पसंद नहीं आई और वह यह थी कि यह सेक्शन विशेष रूप से छोटे बच्चों के लिये था ! बच्चे इतनी खतरनाक राइड्स में डरावनी आवाजों और अँधेरे से डर जाते हैं और पूरे समय कस कर माता पिता से चिपके रहते हैं ! ऐसी स्थिति में वे कहानी को कैसे एन्जॉय करेंगे ! हर राइड को रोलर कोस्टर राइड बनाना आवश्यक नहीं होता ! इसके स्थान पर अगर कोई धीमी गति वाली स्मूद राइड होती और अँधेरे की जगह भरपूर रोशनी में सुन्दर झाँकियों, चित्रों और पपेट शो के माध्यम से कहानी को समझाया जाता तो बच्चे बहुत खुश होते ! साउंडट्रैक भी इतना भयानक होता है कि बच्चे भयभीत हो जाते हैं !
इसके आगे था मिकी का टूनटाउन ! इसमें मुख्य रूप से मिकी माउस, मिनी और गूफी के घर हैं ! मिकी माउस के घर की सैर बहुत ही आनंद दायक है ! घर के पीछे बार्न में मिकी माउस अपने घर आने वाले मेहमानों से मिलता है और सबके साथ फोटो खिंचवाता है ! यहाँ इसके अलावा अन्य और भी आकर्षण हैं जैसे गजेट्स गो कोस्टर, रोजर रैबिट्स कार टून स्पिन ! लेकिन समयाभाव के कारण हम इन्हें देख नहीं पाए !
डिजनीलैंड का आख़िरी पड़ाव है टुमारोलैंड ! इसकी राइड्स तकनीक और विषयवस्तु के हिसाब से बहुत आधुनिक और विकसित हैं ! इसमें स्पेस माउन्टेन राइड, इनोवेशन्स, ओटोपिया, बज़लाईट ईयर एस्ट्रो ब्लास्टर्स और फाइंडिंग नीमो सबमैरीन वोयेज विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं ! नीमो वाली राइड बहुत ही दिलचस्प है ! इसमें सबमैरीन की यात्रा का पूरा लुत्फ़ उठाया जा सकता है ! समुद्री प्राणियों के जीवन के बारे में भी उल्लेखनीय जानकारी मिलती है ! बज़ लाइटईयर की राइड इंटरेक्टिव है ! इसमें दर्शक भी शूटिंग का मज़ा उठाते हैं ! स्पेसमाउन्टेन में बादलों और ग्रह नक्षत्रों के बीच ब्रह्माण्ड की सैर कराई जाती है ! इसका आनंद ही अलग है !
यहीं पर मोनोरेल का भी टर्मिनल है ! मोनोरेल में बैठ कर उन सारी जगहों की सैर की जा सकती है जहां आप पैदल जा सके हों !
डिजनीलैंड में इसके अलावा भी इतना कुछ है कि कोई लिखना चाहे तो अच्छा खासा उपन्यास लिख सकता है ! रोज रात को रिवर ऑफ अमेरिका में फैंटास्मिक नाईट टाइम शो होता है ! इसमें तीस फीट ऊंचे म्यूजिकल फाउंटेन के साथ लेज़र रेज का अद्भुत शो होता है ! फ्लोटिंग बार्जेज़,मार्क ट्वेन शिप, सेलिंग शिप कोलंबिया और रिवर बोट्स सभी का इस शो में बेहतरीन इस्तेमाल होता है ! मिकी माउस के नाईट मेयर को परास्त करने के लिये डिज़्नी के सारे कार्टून चरित्र एक जुट हो जाते हैं ! लेज़र रेज के जरिये ये करेक्टर्स जब आसमान में तीस फीट ऊंचे मिस्ट स्क्रीन पर अवतरित होते हैं तो दर्शक खुशी से तालियाँ बजा कर उनका स्वागत करते हैं !
इस शो के अलावा रोज दिन में दो बार परेड निकलती है जो बहुत ही आकर्षक होती है इसमें डिजनी के सारे कार्टून करेक्टर्स होते हैं ! इस बार की परेड में टॉय स्टोरी के पात्रों, बज़, वुडी, जैसी की धूम मची हुई थी ! प्रतिदिन रात को
डिज़नी सॉन्ग्स की ताल के साथ लयबद्ध तरीके से मनोहारी आतिशबाजी का प्रदर्शन होता है ! यह आतिशबाजी स्लीपिंग ब्यूटी के कासिल के ऊपर की जाती है ! यहीं से मेन स्ट्रीट से होकर बाहर निकले का रास्ता है ! और हम भी इस खूबसूरत से दृश्य को आँखों में बसा कर और डिजनीलैंड की ढेर सारी सुखद स्मृतियों को अपने मन में बसा कर अपने होटल के लिये चल पड़े ! इति !

साधना वैद