Followers

Wednesday, August 30, 2017

बंद हो जाने चाहिए सारे धार्मिक डेरे, आश्रम और सत्संग स्थल



तथाकथित धर्म गुरुओं और बाबाओं के चेहरों से इन दिनों जिस तरह से नकाब उठ रहे हैं और उनकी पोल खुल रही है मन में घोर जुगुप्सा सी होने लगी है ! ये हैं हमारे समाज के आध्यात्मिक उद्धारक जो यह दावा करते हैं कि वे जनता को धर्म और नीति के रास्ते पर चलने के लिए उनका मार्गदर्शन करते हैं और ईश्वर के निकट जाने के लिए उनके पथ को सुगम बनाते हैं ! घृणा होती है ऐसे बाबाओं से ! एक प्रभावी क़ानून बना कर ऐसे सारे पाखंडी और ढोंगी बाबाओं के आश्रम और डेरों को जब्त कर लेना चाहिए जहां सत्संग और प्रवचन के नाम पर इस तरह के घिनौने कृत्य किये जाते हैं ! जनता को भी जागरूक होना चाहिए और समझना चाहिए कि वे अपनी सारी आस्था, जमा पूँजी और मेहनत कहाँ व्यर्थ कर रहे हैं और कैसे असामाजिक तत्वों को पाल पोस कर सशक्त बना रहे हैं जो उनकी अपनी बहन बेटियों पर ही बुरी नज़र रखते हैं !

अपने भक्तों के बल पर ये तथाकथित ‘वैरागी’ और ‘सन्यासी’ बाबा महाराजाओं की तरह सारे सांसारिक सुखों का भोग करते हैं और भक्तों को लूट कर भिखारी बना देते हैं ! संभव है इनमें कुछ सच्चे महात्मा भी हों जो वास्तव में समाज के हित में काम कर रहे हों ! लेकिन उनकी आड़ में जो इन पाखंडियों की बन आई है वह समाज के हित में बहुत हानिकारक है ! इसमें संदेह नहीं कि इस तरह का कोई क़ानून बनाने पर सच्चे धर्म गुरुओं के आश्रमों पर भी ताला लग जाएगा लेकिन यदि वे सच में समाज का हित चाहते हैं तो वे इस पहल का समर्थन ज़रूर करेंगे ! मेरे विचार से इन सभी प्रवचन, सत्संग और कथा कीर्तनों पर अविलम्ब बैन लगा दिया जाना चाहिए जहाँ पर भोली भाली जनता को फ़िज़ूल की बातें सिखा कर गुमराह किया जाता है और उनका आर्थिक, मानसिक व दैहिक शोषण किया जाता है ! आपका क्या ख़याल है ?

साधना वैद

Sunday, August 27, 2017

धुंध



नज़र कमज़ोर हो चली है
आँखों से धुँधला दिखने लगा है
अच्छा ही है !
धुंध के परदे में कितनी
कुरूपताएं, विरूपताएं छिप जाती हैं
पता ही नहीं चल पाता और मन
इन सबके अस्तित्व से नितांत अनजान
उत्फुल्ल हो मगन रहता है !
नया चश्मा भी नहीं बनवाती अब
क्या करना है
जो नज़र साफ़ हो जाए और
सारे दाग़ धब्बे, कुरूपताएं, विरूपताएं
एकबारगी ही दिखाई दे जाएँ
तो क्या फिर इतने सुख से जी सकूंगी ?
नज़र के साथ साथ
दिमाग़ की धुंध को भी अब
इसीलिये हटाना नहीं चाहती
कहीं बड़े जतन से पाले पोसे
ये भरम टूट न जाएँ और
यथार्थ एकबारगी ही
अपनी सारी कटुता के साथ
मेरे सामने उजागर न हो जाए !
कमरे की छत और दीवारों पर लगे
जाले भी अब साफ़ नहीं करती
इनकी आड़ में बेरंग हुई दीवारें
और जगह-जगह से उखड़ा प्लास्टर
छिपे जो रहते हैं !
लोग मुझे निपट आलसी,
अकर्मण्य, फूहड़ जो कुछ भी
समझते हैं तो समझें !
कुछ बदसूरत छिपाने के लिए
उससे भी बड़ी बदसूरती का
सहारा लेना ही पड़ता है !
वो कहते हैं ना
तिनका ओट पहाड़ होता है
मैं तो हर ओर से कुरूप और
भयावह पहाड़ों की विशाल
श्रंखला से घिरी हुई हूँ
इसीलिये मैंने अपनी आँखों के आगे
हर तरफ तिनकों से बुने
परदे ही परदे टाँग लिए हैं !    
आखिर सुख से जीने के लिए
किसी भरम का होना भी तो
ज़रूरी है ना !
कहो, ठीक कहा न मैंने ?

साधना वैद


Thursday, August 24, 2017

महाप्रबंधक - हमारे गणपति महाराज



हिन्दू धर्म अनेक पर्व परम्पराओं व अनुष्ठानों से समृद्ध है ! विभिन्न सिद्धियों के लिए व हर प्रकार के कष्टों के निवारण के लिए तैंतीस कोटि देवी देवताओं की पूजा की जाती है ! परन्तु हर पूजा एवं यज्ञ तथा हर प्रकार के शुभ कार्य के आरम्भ में सर्व प्रथम गणेश जी की ही वन्दना की जाती है ! श्रीगणेश जी का रूप स्वरुप व काया बच्चों व बड़ों सबके लिए कौतुहल एवं आकर्षण का विषय है ! धार्मिक तथा सामाजिक कार्यक्रमों से थोड़ा हट कर आधुनिक प्रबंधन ( मैनेजमेंट ) के सन्दर्भ में भी गणेश जी की काया से अनेक प्रकार की प्रेरणा मिलती है व कई प्रशिक्षक ( ट्रेनर्स ) एवं प्रेरक ( मोटीवेटर्स ) वक्ताओं ने अपने भाषणों में इसका उल्लेख किया है ! आइये हम भी देखें कि गणेश जी का वृहदाकार एक सफल प्रबंधन के लिए हमें कैसे प्रेरित कर सकता है !

विशाल सिर – हमारी सोच, हमारे सपने ऊँचे और बड़े होने चाहिए जिससे हम अपनी सफलताओं को ऊँचाई तक ले जा सकें और अपने उद्योग, अपने संस्थान एवं अपने सहयोगियों को अपार सफलता दिला सकें ! गणेश जी का सिर हाथी का है जो अपनी अभूतपूर्व स्मरण शक्ति के लिए जाना जाता है ! एक अच्छा प्रबंधक अपनी अतीत की सफलताओं और विफलताओं को कभी भूलता नहीं है और उनका सही आकलन और विश्लेषण करके वर्तमान सन्दर्भों में उसका लाभ उठाता है ! जिस प्रकार एक हाथी हर प्रकार से अपने स्वामी के प्रति वफादार होता है एक अच्छा प्रबन्धक अपने उद्योग के प्रति समर्पित होता है !

बड़े–बड़े कान – एक सफल प्रबंधक के लिए एक अच्छा श्रोता होना परम आवश्यक है ! प्रबंधक को चाहिए कि वह सबकी बात सुने जिससे छोटे से छोटे कर्मचारी को भी संतुष्टि हो कि उसकी बात को महत्त्व दिया गया ! अक्सर बहुत छोटा कर्मचारी भी बहुत उपयोगी सुझाव दे देता है ! एक अच्छे प्रबंधक का यह गुण होना चाहिये कि वह सबकी बातों को ध्यान से सुन कर केवल सार को ही ग्रहण करे और फालतू बातों को दूसरे कान से बाहर निकल जाने दे !

लम्बी सूँड - हर चीज़ का गहराई से और समझ बूझ कर अधययन करने में सूँड एक अत्यंत महत्वपूर्ण सहायक अंग है साथ ही यह उपयोगी चीज़ों को पास या दूर से उठा कर ग्रहण करने में भी सहायक होती है ! व्यर्थ व निरर्थक विचारों एवं सलाहों का भली प्रकार निरीक्षण परीक्षण कर त्याग देने में ज़रा भी समय नहीं लगाती ! वहीं दूर की अच्छी चीज़ों को यदि लीक से हट कर भी ग्रहण करना पड़े तो उसमें भी देर नहीं लगाती ! अर्थात हमें लकीर का फ़कीर न बने रहने के लिए प्रेरित करती है !

छोटी-छोटी आँखें – परिस्थितियों का सूक्ष्मता के साथ गहन अध्ययन करने की प्रेरणा देती हैं और इधर उधर भटकने के स्थान पर अपने लक्ष्य पर ही समग्र ध्यान केन्द्रित किये रहने के लिये प्रेरित करती हैं !

एक दाँत - गणेश जी के दो दाँतों में से एक दाँत टूटा हुआ है ! कहा जाता है कि जब महर्षि वेदव्यास गणेश जी से महाभारत के अध्याय लिखवा रहे थे तो उनकी कलम टूट गयी ! व्यवधान के बाद भी उन्होंने कार्य रुकने न दिया और तत्काल अपना एक दाँत तोड़ कर उससे कलम का काम लेकर अपना कार्य पूरा किया ! इससे प्रेरणा मिलती है कि किसी भी कार्य के संपादन में विपरीत स्थितियाँ तो निश्चित रूप से आयेंगी ही लेकिन अपनी बुद्धि का प्रयोग कर उपलब्ध साधनों का ही प्रयोग करके अपना कार्य पूरा कर लेना चाहिये !

छोटे-छोटे पैर – गणेश जी के छोटे छोटे पैर इतने मजबूत हैं कि उनके पूरे शरीर का भार उठा लेते हैं ! यहाँ तक कि अनेक स्थानों पर गणेश जी को नृत्य करते हुए भी दिखाया जाता है ! इसी प्रकार एक अच्छे प्रबंधक को प्रफुल्ल चित्त से पूरी ज़िम्मेदारी अपने ऊपर लेने की क्षमता रखनी चाहिए और किसी भी विषम परिस्थिति में घबराना नहीं चाहिए ! कितना भी बड़ा दायित्व हो उसकी सारी सफलताओं और विफलताओं का दायित्व भी उसे खुद ही उठाना चाहिये !

बड़ा पेट – किसी भी काम को करने में अनेक अच्छे व बुरे अनुभवों से दो चार होना अवश्यम्भावी है ! यश अपयश भी मिलता है परन्तु इनको अपने ऊपर हावी नहीं होने देना चाहिये और इन सब बातों को शान्ति से पचा लेने की क्षमता भी एक अच्छे प्रबंधक में होनी चाहिए ! हर उद्योग, व्यापार या संस्थान की अनेक गोपनीय जानकारियाँ व सूचनाएं होती हैं जिनको अपने तक ही सीमित रखने की क्षमता भी होनी चाहिए ! सहयोगियों की कमजोरियों को भी अपने तक ही रख कर हम उनका सर्वश्रेष्ठ सहयोग प्राप्त कर सकते हैं व उनके वास्तविक नायक बन सकते हैं !

चार हाथ – श्रीगणेश के चार हाथ मनुष्य के लिए सुझाए गए चारों पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की प्राप्ति के द्योतक हैं ! एक मैनेजर के सामने अनेक लक्ष्यों को प्राप्त करने का दायित्व होता है ! लक्ष्य को समय से हासिल करना, लक्ष्य को अपने सीमित संसाधनों में ही प्राप्त करना, काम करने वाले समस्त कर्मचारियों की सुविधाओं का ध्यान रखते हुए अपने लक्ष्य को हासिल करना साथ ही निर्धारित नियमों को बिना तोड़े हुए इस प्रकार सफलता प्राप्त करना कि हमारे यश एवं प्रभाव में चहुँ ओर वृद्धि हो इसी बात का ध्यान रखते हुए काम करने की प्रेरणा बप्पा के ये चार हाथ हमें देते हैं !

वाहन मूषक – श्रीगणेश जी का वाहन मूषक है ! यह दर्शाता है कि गणेश जी ने व्यर्थ के दिखावे की परवाह न कर जो कुछ उन्हें सहज रूप से उपलब्ध हुआ उसीसे अपना काम चला लिया ! यह उनके त्याग व सादगीपूर्ण जीवनदर्शन की ओर संकेत करता है ! ये ही गुण किसी भी प्रबंधक को नायक से महानायक बनाने में सहायक हो सकते हैं !

तो देखा आपने हमारे गणपति महाराज अपने आप में ही एक सम्पूर्ण प्रबंधन संस्थान हैं और उनमें एक अच्छे प्रबंधक होने के सारे गुण मौजूद हैं ! अब यह हम पर निर्भर करता है कि हम उनसे क्या और कितना सीख पाते हैं और कितना अपने जीवन में उतार पाते हैं !

गणपति बप्पा मोरया !

साधना वैद






Tuesday, August 22, 2017

कैसे लूँ विदा - रेल हादसा



कैसे लूँ विदा
वादा किया था मैंने
जल्दी आऊँगा

तुम्हारी साड़ी
अम्मा के लिए गीता
साथ लाऊँगा

टूटा है वादा
किसी और पथ पे
मृत्यु ले चली

देख रहा हूँ
कैसे सुख स्वप्नों की
चिता है जली !

बदले रास्ते
बदली है मंजिल
महा प्रयाण

नैनों में बच्चे
अंतर में तुम हो
घर में प्राण

क्षण भंगुर
मानव का जीवन
रोज़ हादसे

बैठे ही रहें
घर में अगर तो
कमायें कैसे

कैसे आ जाता
मौत ले चली मुझे
अपने साथ

जितना मिला
बहुत सुखद था
हमारा साथ

चाहता तो था
चलना साथ तेरे
वक्त न मिला

प्रभु की इच्छा
जब है यही, करें
किससे गिला

माफ़ करना
अधूरी रह गयी
दास्ताँ हमारी

कौन करेगा
देख भाल बच्चों की
चिंता है भारी

भूल किसीकी
खामियाजा भुगतें
यात्री बेचारे

कहाँ सोचा था
लौट के न जायेंगे
घर बेचारे

करते रहे
औरों की रेखा पढ़
भविष्यवाणी

पढ़ न पाए
अपनी रेखाओं की
छिपी कहानी

विदा दो प्रिये
खड़ा है मृत्यु दूत
बिल्कुल पास

दबा है तन  
मलबे में, मन है
तुम्हारे पास

साधना वैद



Sunday, August 20, 2017

विश्वास



‘विश्वास’

कितना आभासी है ना

यह शब्द !

कितना क्षणिक,

कितना छलनामय,

कितना भ्रामक !

विश्वास के जिस धागे से

बाँध कर  

कल्पना की पतंग को

आसमान की ऊँचाइयों तक

पहुँचा कर मन अत्यंत

हर्षित और उल्लसित था

मेरी मुट्ठी में कस कर

लिपटा विश्वास का वह सूत्र

उँगलियों में ही उलझा

रह गया और

किसी और की पतंग

विश्वास के उस धागे को

आसमान में ही काट

मेरी भावना की पतंग को

अनजान वीरानों में

भटकने के लिये

विवश कर गयी !

कैसा था यह विश्वास

जो मन की सारी आस्था

सारी निष्ठा को

निमिष मात्र में हिला गया !  

किस विश्वास पर भरोसा करूँ

काँच से नाज़ुक विश्वास पर या

ओस की बूँद जैसे नश्वर

विश्वास पर ?

सुदूर वीराने से रह रह कर

आती भ्रामक

पुकार की आवाज़ से

विश्वास पर या

आसमान में लुका छिपी का

खेल खेलते टिमटिमाते सितारों की

धुँधली सी रोशनी से

विश्वास पर ?

अनंत अथाह सागर के

सीने पर उठती त्वरित तरंगों से

क्षणिक विश्वास पर या

वृक्ष की हर टहनी पर विकसित

अल्पकालिक सुन्दर सुकोमल

सुगन्धित फूलों के

लघु जीवन से

विश्वास पर ?

जो भी हो ‘विश्वास’ शब्द

जितना सम्मोहक है

उतना ही भ्रामक भी !

दृढ़ होने पर यह जिस तरह  

जीवन जीने के लिये

प्रेरित करता है

टूट जाने पर यह उसी तरह 

जीवन जीने की

सम्पूर्ण इच्छा को ही

पल भर में मिटा जाता है !



साधना वैद  

Friday, August 18, 2017

तुम गाँधी तो नहीं !



ना ना पीछे मुड़ कर ना देखना
क्या पाओगे वहाँ वीभत्स सचाई के सिवा
जिसे झेलना तुम्हारे बस की बात नहीं
तुम कोई गाँधी तो नहीं !  
सामने देखो तुम्हें आगे बढ़ना है
वह रास्ता भी तो आगे ही है
जिसका निर्माण तुमने स्वयं किया है
आगे जलसे हैं, जश्न है, जलवा है
मेवा मिष्ठान्न हैं, पूरी है, हलवा है !
तुम्हारे सामने समूचा सुनहला संसार है
जहाँ आनंद ही आनंद है  
झूठ के कच्चे झिलमिल धागों से
बुना हुआ है तो क्या, है तो खूबसूरत
आँखों को ठंडक, दिल को तसल्ली देता है
मुख पर हँसी, अधरों पर गीत ले आता है
यहाँ तुम्हारा रसूख, रुतबा, रुआब रोज़ बढ़ता है
तुम्हारी शान में दो चार कसीदे रोज़ पढ़ता है ! !
ऐसे में पीछे मुड़ कर कोई देखता है क्या !
और फिर पीछे रखा ही क्या है
जिसे मुड़ कर तुम देखना चाहते हो
वहाँ हैं कड़वे कसैले सत्य के अम्बार
ज़िंदगी से कभी न ख़त्म होने वाली जंग
जद्दोजहद, गरीबी, भुखमरी, बीमारी
बदनीयती, बदहाली, भ्रष्टाचार, और मक्कारी
जो तुम्हारी आत्मा को झिंझोड़ देंगे
तुम्हारी चहरे से हँसी गायब हो जायेगी
आँखों में आँसू भर आयेंगे
दिल का सुकून छिन जाएगा
गीत कंठ ही में घुट जायेंगे
मुझे डर है तुम्हारे अन्दर का
सोया हुआ गाँधी कहीं जाग न जाए
और पल भर में ही तुम्हारा परम सुखदाई
मिथ्या आडम्बर का यह सुनहला संसार
भरभरा कर भूमि पर धराशायी न हो जाए !
बोलो है तुममें इतना आत्मबल,
इतना त्याग, इतना समर्पण और
इतनी संवेदनशीलता कि गाँधी की तरह
सारे सुख त्याग एक धोती में आ जाओ ?
उस समय कम से कम आँखों की
इतनी शर्म तो बाकी थी कि
तमाम विरोधों के बावजूद भी
जीवित रहते बापू सम्मान से जिए
यहाँ तक कि गोली मारने से पहले
हत्यारे ने भी हाथ जोड़ कर उनके प्रति   
अपनी श्रद्धा, अपना सम्मान प्रकट किया !
इस युग में इसकी आशा भी व्यर्थ है
भाषणों में ही सही इतने सालों बाद भी
लोग उनका नाम तो आदर से लेते हैं
लेकिन तुम काल के किस लम्हे में,
किस गह्वर में, कहाँ गुम हो जाओगे
किसीको पता भी नहीं चलेगा
और तुम्हारा नाम ?
तुम्हारे पोते पोतियों को भी याद रहेगा
इसमें भी संदेह है मुझे !
‘गाँधी’ का मुखौटा पहनना आसान है
लेकिन ‘गाँधी’ होना बिलकुल अलग बात है
सोच लो कि तुम्हें क्या करना है ?

साधना वैद    
  


Saturday, August 12, 2017

यह कैसा विरोध




अपना विरोध और असहमति प्रकट करने का एक अजब ही ट्रेंड चल पड़ा है फेसबुक पर इन दिनों ! विशेष रूप से यदि किसी महिला की आलोचना करनी हो तो लोग बड़े दम ख़म के साथ तैयारी करके न केवल तीखे एवं अपमान जनक ढंग से उस लेखिका और उसकी पोस्ट की बखिया उधेड़ने में लग जाते हैं बल्कि उस पोस्ट को अपनी वाल पर शेयर कर लेते हैं और फिर अपनी ही सोच जैसे तमाम मित्रों को खुले तौर पर आमंत्रित करते हैं कि वे भी आकर उस लेखिका की पोस्ट और उसकी सोच की जी भर कर भर्त्सना करें और उसे सार्वजनिक रूप से अपमानित करें ! यह और बात है कि रचनाकार ने रचना के माध्यम से क्या कहना चाहा है उसका धेला कौड़ी भी उनकी समझ में आया हो या न आया हो !  
ऐसा ही एक वाकया मेरे साथ भी हुआ जब मेरी एक पोस्ट ‘वापिसीपर एक पाठक ने अत्यंत तीखी आलोचना कर मुझे कटघरे में खड़ा कर दिया कि मैं घोर अधर्मी हूँ ! सच बात केवल इतनी थी कि मैंने मंदिर, पूजा और पूजन विधि के बिम्ब को लेकर हमारी सामाजिक व्यवस्था की किसी और विसंगति की ओर इशारा कर अपनी पोस्ट लिखी थी जिसे वे महाशय ना तो समझ ही पाए ना ही स्वीकार कर पाए ! हद तो तब हो गयी जब उन्होंने अपनी वाल पर मेरी पोस्ट को शेयर कर लिया और अपनी जैसी ही रुग्ण मानसिकता वाले अपने कई मित्रों को मेरी पोस्ट पर टीका टिप्पणी के लिए आमंत्रित भी किया ! उनकी एक महिला मित्र ने तो त्वरित प्रतिक्रिया में यहाँ तक कह दिया कि मुझ जैसी लेखिका साहित्य और हिन्दू धर्म के नाम पर कलंक है ! खैर जैसी उनकी क्षुद्र मानसिकता वैसी ही उनकी प्रतिक्रिया ! इस पर चर्चा कर मैं क्यों अपना कीमती समय नष्ट करूं !

जो हुआ सो हुआ लेकिन इन सारी कवायदों के बाद एक बात मेरे मन को गहराई तक कचोटती रही कि स्वयं को आदर्श धर्मावलम्बी सिद्ध करने के लिए क्या सच में हमें अपने धर्म की कुरीतियों, कमियों, और कुप्रथाओं की ओर से आँखें मूँद लेनी चाहिए ? क्या उनका ज़िक्र कर देना ही हमें अधर्मी बना देता है ? जहाँ चिंतन ख़त्म हो जाएगा, जहाँ विमर्श ख़त्म हो जाएगा, जहाँ आत्म निरीक्षण, आत्म परीक्षण और आत्म विश्लेषण ख़त्म हो जाएगा, जहाँ नए विचारों और नयी नीतियों को अपनाने के विरोध में धर्म के तथाकथित झंडाबरदार खंभ ठोक कर तन कर खड़े हो जायेंगे तो वहाँ तो सडांध का पैदा होना अवश्यम्भावी है ! क्या शुतुरमुर्ग की तरह रेत में मुँह घुसा हर गलती हर कमी से आँखें मूँद लेना उचित है ? इसमें कोई संदेह नहीं कि शायद सबसे अधिक धर्म भीरु और आस्थावान होने के बावजूद भी सबसे अधिक गंदे, उपेक्षित और अव्यवस्थित हिन्दुओं के धर्म स्थल ही होते हैं ! यहीं सबसे ज्यादह कर्मकांड किये जाते हैं, अनेकानेक तरह की पूजन की विधियाँ हैं और शायद सबसे अधिक लूट खसोट भी है जिनके निराकरण की ओर किसीका ध्यान नहीं जाता ! उस पर विडम्बना यह है कि अपनी इन विधियों पद्धतियों पर सबसे अधिक गर्व भी हमें ही है ! जोर शोर से धर्म का डंका पीटने से हम कभी पीछे नहीं हटते और हर किस्म की गन्दगी से आँखें मूँदे स्वयं को महिमा मंडित करते रहने से ज़रा सा भी नहीं चूकते ! किस भुलावे में हम हैं यह मेरी समझ से परे है !

आपके सामने चंद दृष्टांत रखना चाहती हूँ जो मेरी आँखों के सामने ही घटित हुए हैं ! बद्रीनाथ के मंदिर में मैंने स्वयं वहाँ के व्यवस्थापकों को त्वरित दर्शन कराने के एवज़ में दर्शनार्थियों से २०००/- रुपये की रिश्वत की माँग करते हुए देखा है ! हुआ यूँ कि दर्शन हेतु लम्बी लाइन में घंटों से लोग खड़े हुए थे ! चींटी की रफ़्तार से लाइन आगे सरक रही थी ! हमसे आठ दस लोग आगे बड़ी दूर से आये एक दम्पत्ति भी उसी लाइन में लगे हुए थे ! उनको शायद उसी शाम अपने शहर वापिस लौटना था ! शाम की ट्रेन से वापिसी का रिज़र्वेशन था ! समय कम रह गया था इसलिए उन्होंने जो पुजारी व्यवस्था देख रहा था उससे कुछ जल्दी दर्शन करवा देने की अपनी अभिलाषा और समयाभाव की विवशता व्यक्त की ! पुजारी जी ने त्वरित दर्शन कराने की एवज़ में २००० रुपयों की माँग रख दी ! दर्शनार्थी ने जब इतने रुपये देने में अपनी असमर्थता जताई तो कुपित होकर उस पुजारी ने श्राप देकर कहा ,”भगवान् के दर्शन के लिए रुपयों का मोह कर रहे हो जाओ तुम्हारा कभी भला नहीं होगा !बताइये जो इंसान ईश्वर की कृपाकांक्षा के लिए सौ तरह की व्यवस्थाएं कर और अनेकों तकलीफें उठा अपने घर से इतनी दूर गया है तो उसके मन में प्रबल आस्था और भक्ति होगी तब ही गया होगा न ! कैसा लगा होगा उसे यह सब सुन कर ! हो सकता है उसके पास इतने पैसे हों ही नहीं ! यह हाल है हमारे तीर्थस्थलों का !

हरिद्वार के मनसा देवी मंदिर में अत्यधिक भीड़ में दम घुटने से महिला को बेहोश होते और अव्यवस्था और गन्दगी के चलते मंदिर की सीढ़ियों से फिसल कर एक व्यक्ति को परदेस में अपनी हड्डियाँ तुड़ाते हुए भी मैंने देखा है ! गया जी, मथुरा, जगन्नाथ पुरी, हरिद्वार, प्रयाग कहीं भी चले जाइए पण्डे किस तरह जिजमान का खून चूसते हैं इस अनुभव से आप में से अनेकों लोग गुज़र चुके होंगे ! सब जानते हैं कि मंदिरों में जो हार, चुनरी और नारियल चढ़ाए जाते हैं वही बैक डोर से फिर से बिकने के लिए बाहर दुकानों पर आ जाते हैं ! कितनों के पर्स, चेन, रुपये, घड़ियाँ, जूते चप्पल मंदिरों में गायब हो जाते हैं ! गर्भगृह में भगवान् की पूजा के समय जिस प्रकार से जल, दूध, पुष्प इत्यादि चढ़ाए जाते हैं और वहाँ पर तमाम फिसलन, गन्दगी और कीचड़ हो जाती है इसकी साफ़ सफाई की ओर किसीका ध्यान नहीं जाता ! भीड़ भाड़ की वजह से अक्सर दर्शनार्थी फिसल कर गिर जाते हैं और चोट खा जाते हैं ! मुझे भगवान से कोई बैर नहीं है ना ही उनके प्रति अश्रद्धा है ! लेकिन इस पकार की अव्यवस्थाओं से असंतोष अवश्य है ! ऐसा सिर्फ मंदिरों में ही क्यों होता है ! किसी भी गुरुद्वारे में, चर्च में, या मस्जिद में चले जाइए इस तरह की अव्यवस्था वहाँ तो नहीं दिखाई देती ! ना कोई शोर शराबा होता है, न कोई कर्मकांड और ना ही कोई लूट खसोट ! तो क्या अपने ईश्वर के प्रति उनकी आस्था हम हिन्दुओं से कम है ? या हमें बहुत अधिक पुण्य मिल जाता है और उन्हें कम ? या हम बहुत उच्च कोटि के भक्त हैं और वे निम्न कोटि के ? हर गली मोहल्ले में जहाँ कहीं भी जुगत लग जाती है भगवान् की कोई भी फोटो या मिट्टी की मूर्ति रख कर, दो अगरबत्ती जला कर और दो फूल चढ़ा कर पूजा का स्थान बना दिया जाता है ! यह भी देखने की कोशिश नहीं करते कि वह स्थान कितना साफ़ है ! मैंने घूरे पर चोरी की बिजली का कनेक्शन लेकर भगवान् का मंदिर बनाते हुए स्वयं अपनी आँखों से बस्ती के लोगों को देखा है ! रोकने टोकने का तो प्रश्न ही पैदा नहीं होता ! तुरंत ही लोगों की धार्मिक आस्थाएं ‘आहत’ हो जाती हैं और वे बलवा करने पर उतारू हो जाते हैं ! मंदिर के पीछे घूरे के ऊँचे ढेर पर कुत्ते घूमते रहते हैं और भगवान् के प्रसाद को सफाचट कर जाते हैं इन सब बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता ! रोज़ का जेबखर्च जो निकल आता है ! मैंने इस पर एक पोस्ट भी लिखी थी –

 “अपना देश महान - घूरे पर भगवान्” ! लिंक इस प्रकार है -

 http://sudhinama.blogspot.in/2015/06/blog-post_19.html

क्या यह सब करते हुए हमारे धर्म का अपमान नहीं होता ? इस तरह गली मोहल्लों में, घूरे पर, या पेड़ों के नीचे आप लोगों ने कभी किसी गुरुद्वारे, चर्च या किसी मस्जिद की कोई शाखा उप शाखा देखी है ?

आप स्वयं विचार करें और जिस किसी भी निष्कर्ष पर पहुँचें कृपया मुझे भी अवश्य अवगत करायें ताकि मैं भी अपनी शंकाओं का निवारण कर सकूँ और स्वयं को सुधार कर सही कर सकूँ ! आभार होगा आपका !



साधना वैद